English Literature – Poetry – ☆ Anguish of the River… ☆ – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM (We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi ji  for sharing his literary and art works with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. We present an excellent poetry depicting pain and sorrow of every river in the country.  Every one is aware of the reasons and worried about the level of pollution. But, who will take the first step for the mankind.  This poetry is actually anguish of the river sensed by Capt. Raghuwanshi ji.   In his own words Visiting my place in Varanasi, situated at the confluence of Ganga and Gomati... Wrote few lines on state of rivers in our country...     Capt. Raghuwanshi: Today, we present the poetry of Capt. Pravin Raghuwanshi ji "Anguish of the River..." .)   ☆ Anguish of the River... ☆   River is not like *Neelkanth*, the Lord Shiva!   She was once a playful translucent river And me, a carefree ambitious damsel Used to do *Aachman*, sipping her sacred water...
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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में व्यंग्य – भाग 1 ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’    (प्रस्तुत है प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी का हिन्दी साहित्य में व्यंग्य विधा पर एक सार्थक आलेख  वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में व्यंग्य।  आलेख का प्रथम भाग आज के अंक में प्रस्तुत कर रहे हैं एवं इसकी अंतिम कड़ी कल के अंक में आप पढ़ सकेंगे। )   ☆ वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में व्यंग्य - भाग 1 ☆ ज्यादा पुरानी बात नही है, जब साहित्य जगत में व्यंग्य की स्वतंत्र विधा के रूप में स्वीकारोक्ति ही नही थी.  पर आज लगभग प्रत्येक अखबार का संपादकीय पृष्ठ कम से कम एक व्यंग्य लेख अवश्य समाहित किये दिखता है. लोग रुचि से समसामयिक घटनाओ पर व्यंग्यकार की चुटकी का आनंद लेते हैं. वैसे व्यंग्य अभिव्यक्ति की बहुत पुरानी शैली है. हमारे संस्कृत साहित्य में भी व्यंग्य के दर्शन होते हैं. हास्य, व्यंग्य एक सहज मानवीय प्रवृति है. दैनिक व्यवहार में भी हम जाने अनजाने कटाक्ष, परिहास, व्यंग्योक्तियो का उपयोग करते हैं. व्यंग्य  आत्मनिरीक्षण और आत्मपरिष्कार के साथ ही मीठे ढंग से...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 1 – स्वयं की खोज में ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार   (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “स्वयं की खोज में”।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – #1  ☆   ☆ स्वयं की खोज में  ☆   दीवाली या दीपावली शब्द में, 'दीप' का अर्थ है प्रकाश और 'अवली' का अर्थ है पंक्ति ।तो दिवाली/दीपावली का अर्थ है रोशनी की पंक्ति । दिवाली हिन्दुओं का सबसे प्रमुखएवं बड़ा, रोशनी का त्यौहार है । यह त्यौहार भारत और अन्य देशों में जहाँ भी हिंदू रहते हैं हर साल शरद ऋतु, अक्टूबर या नवंबर माह में मनाया जाता है । आध्यात्मिक रूप से दिवाली त्यौहार अंधेरे पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई, अज्ञानता पर ज्ञान, जुनून पर...
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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – ☆ नासमझी ☆ – श्री नरेंद्र राणावत

श्री नरेंद्र राणावत ☆ नासमझी ☆ पिछले दिनों जालौर शहर में रात्रि आवास हुआ। उसी मध्यरात्रि तेज बारिश हुई। जल संधारण की कोई व्यवस्था नहीं थी । छत का पानी व्यर्थ ही बह गया। सुबह हुई। परिवार के मुखिया ने अपनी पत्नी को आवाज लगाई- "बाथरूम में बाल्टी रखना टांके से पानी भरकर नहा लूँ।" पत्नी बोली- "टंकी तो कल ही खाली हो गई है, नल अभी तक आया ही नहीं।" रात को बारिश से उठी सौंधी गंध और टीन पर घण्टों तक टप-टप के मधुर संगीत ने जलसंग्रहण सन्देश की जो कुंडी खटखटाई थी, उसे नासमझों ने जब अनसुना कर दिया तो सुबह होते ही सूरज ने भी अपनी आँखें तरेरी, तपिश बढ़ाई और सभी को पसीने से तरबतर कर दिया।   © नरेंद्र राणावत  ✍🏻 गांव-मूली, तहसील-चितलवाना, जिला-जालौर, राजस्थान +919784881588 ...
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मराठी साहित्य – मराठी कविता – ☆ वसंत फुलला मनोमनी ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे   (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है।  आज प्रस्तुत है उनकी वसंत ऋतु पर आधारित  भावप्रवण कविता  “वसंत फुलला मनोमनी”।)    ☆ वसंत फुलला मनोमनी ☆   नवपल्लवीने नटली सजली सृष्टी ! सुगरण विणते पिलांसाठी घरटी ! कोकीळेचा पंचमस्वर गुंजतो रानी ! भारद्वाजचे फ्लाईंग दर्शन सुखावते मनी ! भ्रमर गुंजती मधु प्राशती फुलातुनी ! आला वसंत आला झाला आनंद मनोमनी !!१!!   शेतात मोहरी सोनफुले फुले पीतमोहर ! घाटात भेटे लाल चुटुक पळसकाटेसावर ! दारोदारी फुलला लाल गुलमोहर ! बकुळ फुलांच्या गंधचांदण्या बहरे लाल कण्हेर ! देवचाफा सोनचाफा कडुलिंब ही बहरावर ! आला वसंत आला आनंद झाला खरोखर !!२!!   कमलपुष्पे फुलली बहरली जास्वंद सूर्यफुलं! रंगबिरंगी गुलाब फुलले फुलली बोगनवेल ! अननसाची लिली फुलली बहरे नीलमोहर ! झिनिया पिटोनिया गॅझेनियाला आला हो बहर ! डॅफोडिल्स अन् ट्यूलिप्सने केला हो कहर ! आला वसंत आला फुलला मनोहर !!३!!   कोकणात सुरंगी फुले मोहक मदधुंद ! त्यांचा सुंदर गजरा माळला केसात ! मोगऱ्याचा दरवळला मंदसा सुगंध ! मोहविते रातराणी धुंद आसमंत ! मोहरले मी अन् कळले मजला...
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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ BUDDHA: The Four Noble Truths & The Noble Eightfold Path ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer,  Author, Blogger, Educator and Speaker.) ☆ BUDDHA: The Four Noble Truths & The Noble Eightfold Path ☆ Video Link : BUDDHA: The Four Noble Truths & The Noble Eightfold Path    The essence of the Buddha's teaching can be summed up in two principles: the Four Noble Truths and the Noble Eightfold Path. The first covers the side of doctrine, and the primary response it elicits is understanding; the second covers the side of discipline, in the broadest sense of that word, and the primary response it calls for is practice. Two extremes that ought not to be cultivated by one who has gone forth: devotion to pursuit of pleasure in sensual desires, which is low, coarse, vulgar, ignoble and harmful; and devotion to self-mortification, which is painful, ignoble and harmful. The Middle Way: Avoid the two extremes – devotion to pursuit of pleasure in sensual desires and devotion to self-mortification. Follow the Noble Eightfold Path. The middle way -...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – चतुर्थ अध्याय (24) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ चतुर्थ अध्याय ( फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन )   ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्‌। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ।।24।।   यज्ञार्पण विधि ब्रम्ह,ब्रम्ह है हवन अग्नि भी ईश्वर है इसी दृष्टि सब कर्म ब्रम्ह हैं,सुलभ उसे ब्रम्ह अक्षर है।।24।।   भावार्थ :  जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है- उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही हैं।।24।।   Brahman is  the  oblation;  Brahman  is  the  melted  butter  (ghee);  by  Brahman  is  the oblation poured into the fire of Brahman; Brahman verily shall be reached by him who always sees Brahman in action. ।।24।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८   (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 8 ☆ दोस्ती क्या? ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनका  विचारणीय आलेख  “दोस्ती क्या?”।    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 8 ☆   ☆ दोस्ती क्या? ☆   प्यार, वफ़ा, दोस्ती के/सब किस्से पुराने हो गए/एक छत के नीचे रहते हुए/एक-दूसरे से बेग़ाने हो गए/ अजब-सा है व्याकरण ज़िन्दगी का/हमें खुद से मिले जमाने हो गए/यह फ़साना नहीं, हक़ीक़त है जिंदगी की,आधुनिक युग की….जहां इंसान एक-दूसरे से आगे बढ़ जाना चाहता है, किसी भी कीमत पर…. जीवन मूल्यों को ताक पर रख, मर्यादा को लांघ, निरंतर बढ़ता चला जाता है। यहां तक कि वह किसी के प्राण लेने में तनिक भी गुरेज़ नहीं करता। औचित्य -अनौचित्य व मानवीय सरोकारों से उसका कोसों दूर का नाता भी नहीं रहता। रिश्ते-नाते आज कल मुंह छिपाए जाने किस कोने में लुप्त...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 6 ☆ स्त्री क्या है? ☆ – डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल (डॉ भावना शुक्ल जी  को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ  -साहित्य निकुंज”के  माध्यम से अब आप प्रत्येक शुक्रवार को डॉ भावना जी के साहित्य से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ. भावना शुक्ल जी की  एक भावप्रवण कविता   “स्त्री क्या है ?”। )    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 6  साहित्य निकुंज ☆   ☆ स्त्री क्या है ? ☆   क्या तुम बता सकते हो एक स्त्री का एकांत स्त्री जो है बेचैन नहीं है उसे चैन स्वयं की जमीन तलाशती एक स्त्री क्या तुम जानते हो स्त्री का प्रेम स्त्री का धर्म सदियों से वह स्वयं के बारे में जानना चाहती है क्या है तुम्हारी नजर मन बहुत व्याकुल है सोचती है स्त्री को किसी ने नहीं पहचाना कभी तुमने एक स्त्री के मन को है  जाना पहचाना कभी तुमने उसे रिश्तों के उधेड़बुन में जूझते देखा है.. कभी उसके मन के अंदर झांका है कभी पढ़ा है उसके भीतर का...
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पुस्तक समीक्षा/आत्मकथ्य – पूर्ण विनाशक (स्वयं की तलाश) – श्री आशीष कुमार

पूर्ण विनाशक (स्वयं की तलाश) - श्री आशीष कुमार  Book: Purn Vinashak Author: Ashish Kumar Published by: Evincepub Publications Publication Year: 2019 Formats: Amazon Kindle, Paperback Genre: Philosophical, Spiritual, Mystery, Religious Reviewed by: Ashish Rating: 4/5 stars Amazon Link - Purn Vinashak आत्मकथ्य:  एक दिन, जब मैं विलासिता का आनंद ले रहा था (आम तौर पर जिसे मैं पसंद नहीं करता हूँ), तो मुझे एहसास हुआ कि कहीं कुछ कमी है। उस समय मैं सोच रहा था कि अगर कोई रिश्तेदार या मित्र उस आनंद का भाग ना हो तो कोई भी विलासिता का आनंद कैसे ले सकता है। उस समय एक सेकंड का एक अंश मुझे एक युग की तरह लग रहा था। इसलिए मैंने दृढ़ विश्वास किया कि अकेले जीवन जीना खुद के लिए अपराध है। और यदि वह जीवन सबसे लम्बा हो, तो? उस दिन मैंने इस पुस्तक को लिखने का निर्णय किया। मेरा सिर्फ एक ही विचार पूरी किताब में परिवर्तित हो गया है। मैंने ब्रह्मांड के सबसे कठिन विषयों पर अपने बारह साल के शोध, अनुभव, अन्वेषण,...
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