हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # 63 – धुंधले नक्शे कदम रह गये… ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकेंगे।  आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण रचना –धुंधले नक्शे कदम रह गये।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # 63 – धुंधले नक्शे कदम रह गये… ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

अपनी हद में न हम रह गये

दंग, दैरो हरम रह गये

*

अनुसरण न बड़ों का किया 

धुंधले, नक्शे कदम रह गये

*

छोड़ महफिल को, सब चल दिये

सहते हम ही सितम रह गये

*

आशिकी का नतीजा है ये 

सर हमारे कलम, रह गये

*

हुस्न उनका जो ढलने लगा

चाहने वाले, कम रह गये

*

वो न साकी न वैसी है मय 

मयकशी के वहम रह गये

*

मयकशी के, चले दौर फिर 

जब, न महफिल में हम रह गये

 

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 137 – हल कुछ निकले तो सार्थक है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “हल कुछ निकले तो सार्थक है…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 137 –  हल कुछ निकले तो सार्थक है… ☆

हल कुछ निकले तो सार्थक है, लिखना और सुनाना ।

वर्ना क्या रचना, क्या गाना, क्या मन को बहलाना ।।

*

अविरल नियति-नटी सा चलता, महा काल का पहिया ।

विषधर सा फुफकार लगाता, समय आज का भैया ।।

*

भीष्म – द्रोण अरु कृपाचार्य सब, बैठे अविचल भाव से ।

ज्ञानी – ध्यानी मौन साधकर, बंधे हुये सत्ता सुख से ।।

*

ताल ठोंकते दुर्योधन हैं, घूम रहे निष्कंटक ।

पांचों पांडव भटक रहे हैं, वन-बीहड़ पथ-कंटक ।।

*

धृतराष्ट्र सत्ता में बैठे, पट्टी बाँधे गांधारी ।

स्वार्थ मोह की राजनीति से, धधक रही है चिनगारी ।।

*

गांधारी भ्राता शकुनि ने, चौपड़ पुनः बिछाई है ।

और द्रौपदी दाँव जीतने, चौसर – सभा बुलाई है ।।

*

शाश्वत मूल्यों की रक्षा में, अभिमन्यु की जय है ।

किन्तु आज भी चक्रव्यूह के, भेदन में संशय है ।।

*

क्या परिपाटी बदल सकेगी, छॅंट पायेगी घोर निशा ।

खुशहाली की फसल कटेगी, करवट लेगी नई दिशा ।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मन ? ?

राजहंस और भेड़िया,

एक ही पिंजड़े में बंद देखता हूँ,

मन की चारदीवारी में,

कैसे-कैसे रंग देखता हूँ !

© संजय भारद्वाज  

(प्रात: 11: 47 बजे, 6 जुलाई 2024)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आषाढ़ मास साधना ज्येष्ठ पूर्णिमा तदनुसार 21 जून से आरम्भ होकर गुरु पूर्णिमा तदनुसार 21 जुलाई तक चलेगी 🕉️

🕉️ इस साधना में  – 💥ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। 💥 मंत्र का जप करना है। साधना के अंतिम सप्ताह में गुरुमंत्र भी जोड़ेंगे 🕉️

💥 ध्यानसाधना एवं आत्म-परिष्कार साधना भी साथ चलेंगी 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “जलनाद (लम्बा नाटक)” – लेखक- श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆ चर्चा – श्री विभूति खरे ☆

☆ “जलनाद (लम्बा नाटक)” – लेखक- श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆ चर्चा – श्री विभूति खरे ☆

(17 तारीख को जलनाद (लम्बा नाटक) का विमोचन इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स में आयोजित है। ई-अभिव्यक्ति परिवार की हार्दिक शुभकमनाएं)

पुस्तक – जलनाद (लम्बा नाटक)

लेखक – विवेक रंजन श्रीवास्तव

प्रकाशक – इण्डिया नेट बुक्स, नोएडा

मूल्य – १२५ रु

चर्चा …. श्री विभूति खरे, बानेर, पुणे

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

न केवल जीवन और पर्यावरण में जल का महत्व निर्विवाद है बल्कि जल श्रोत सांस्कृतिक एवं धार्मिक आयाम में भी गहरे रूप से जुड़े हुए हैं। पानी की कमी या नदियों की बाढ़ दोनो ही स्थितियां त्राहि त्राहि की स्थितियां पैदा कर देती है। इसीलिये लोगों के मन में पानी का महत्व स्थापित करने हेतु प्रत्येक धर्म में पानी की शुद्धता और बचत को लेकर अनेक कथानक गढ़े गये हैं। विवेक रंजन श्रीवास्तव अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मानो से पुरस्कृत बहुविध लेखक हैं। वे शिक्षा तथा पेशे से मूलतः इंजीनियर रहे हैं। उनकी लगभग २० किताबें विभिन्न विषयों पर प्रकाशित और चर्चित हैं। ये पुस्तकें ई प्लेटफार्म किंडल आदि पर भी सुलभ हैं। विवेक रंजन श्रीवास्तव को नाटक के लिये मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का प्रसिद्ध हरिकृष्ण प्रेमी सम्मान प्राप्त हो चुका है। उन्होंने १२ अंको का लम्बा नाटक “जलनाद” लिखकर स्टेज के जरिये पानी के प्रासंगिक महत्व को रेखांकित किया है। जल के देवता भगवान इंद्र को ही वरुण देव और भगवान झूलेलाल के नामों से भी प्रतिपादित किया गया है। मुस्लिम धर्म में भी पानी के पीर, जिन्दह पीर की कल्पना है। भारत रत्न सर मोक्षगुण्डम विश्वैश्वरैया जी के महान कार्यों में से एक मैसूर का सुप्रसिद्ध नागार्जुन सागर बांध है। पानी भविष्य की एक बड़ी वैश्विक चुनौती है । भारत दुनियां का सर्वाधिक आबादी वाला देश बन चुका है, विश्व की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है, इससे स्वच्छ जल की आवश्यकता बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन और जन सांख्यकीय वृद्धि के कारण जल स्त्रोतो पर जल दोहन का असाधारण दबाव बन रहा है । बारम्बार बादलो के फटने और अतिवर्षा से जल निकासी के मार्ग तटबंध तोड़कर बहते हैं, बाढ़ से विनाश लीला के दृश्य बनते हैं । समुद्र के जलस्तर में वृद्धि से आवासीय भूमि कम होती जा रही है, अनेक द्वीप डूबने के खतरे हैं। पेय जल की कमी से वैश्विक रुप से लोगो के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है । विशेषज्ञों के अनुसार जल आपदा से बचने हेतु हमें अपने आचरण बदलने चाहिये, जल उपयोग में मितव्ययता बरतनी चाहिये .पर वास्तविकता इससे कोसों दूर है। पानी के प्रति जन मानस में सही समझ विकसित करने तथा पानी को लेकर सुव्यवस्थित इंफ्रास्ट्रकचर बांध, नहरें, पीने के पानी व सिंचाई के पानी की आपूर्ति की व्यवस्थायें, वर्षा जल के संग्रहण तथा   शहरों से निकासी पर बहुत काम करने की जरूरत है।

थियेटर वह समुचित मीडिया है जो दर्शको को भावनात्मक और मानसिक रूप से एक समग्र अनुभव देते हुये, मानव जाति और उसके पूर्वजो की अनुष्ठानिक पृष्ठ भूमि और सांकेतिकता के साथ उनकी विविधता किन्तु पानी के साथ एक सार्वभौमिक सम्बंध का सही परिचय करवा सकता है । इस तरह हमारी विविध सांस्कृतिक समानताओ को ध्यान में रखते हुये दुनिया को देखने और बेहतर समझने का बड़ा दायरा इस कला प्रदर्शन का सांस्कृतिक तत्व है । अगले विश्वयुद्ध के लिये आतुर दुनियां को पानी का सार्वभौमिक महत्व तथा हम सबके पूर्वजो द्वारा पानी के महत्व की समझ की शिक्षा दोहराने से पानी वैश्विक एका स्थापित करने का माध्यम बन सकता है। औद्योगिक प्रगति ने नदियों के प्रदूषण का विष दिया है, यह नाटक इन सभी बिन्दुओ को रेखांकित करता है।

पहले अंक में धरती पर जीवन के प्रादुर्भाव के लिये पानी की आवश्यकता बताई गई है, हम सब जानते हैं कि वैज्ञानिक अनुसंधानो के अनुसार पानी में ही सर्वप्रथम जीवन प्रारंभ हुआ था। यही कारण है कि ब्रह्माण्ड में अन्य ग्रहों पर जहां भी वैज्ञानिक जीवन की संभावना तलाश रहे हैं सर्वप्रथम वे वहां पानी की उपस्थिति की जांच करते हैं। जल में जीवन सृजित करने की क्षमता होती है वहीं यह विनाश भी कर सकता है .पानी समस्त मानवता को जोडता है, यह हम सबके लिये बराबरी से महत्व का तत्व है । विवेक जी के नाट्य लेखन की विशेषता है कि नाटक के न केवल संवाद लिखे गये हैं वरन् उन्होने दृश्य, मंच की साज सज्जा, म्युजिक, सूत्रधार के नेपथ्य व्यक्तव्य सब कुछ रेडी रूप से किताब में प्रस्तुत किये हैं। नाटक ज्ञानवर्धक और मनोरंजक है। काले वस्त्रों में मेघ, रेन ड्राप, नदी, समुद्र, धरती, सूर्य किरण, आदि को चरित्रो के रूप में रचकर उनसे अभिनय और नृत्य के मनोरम दृश्यों का निर्माण किया गया है जो दर्शकों को बांध रखने में सक्षम हैं। पौराणिक आख्यानों पर आधारित नाटक के अंक स्वतंत्र रूप से पूर्ण एकांकी हैं जो अलग से खुद एक छोटे नाटक की तरह प्रस्तुत किये जा सकते हैं। समुद्र मंथन के कथानक पर दूसरा अंक निर्मित है। तीसरा अंक बाल कृष्ण के द्वारा कालिका नाग के मद मर्दन पर आधारित है, जो नदियों के प्रदूषण के विरुद्ध संदेश देता है। नदियों के सामाजिक महत्व को रेखांकित करता “नर्मदा परिक्रमा” चौथा अंक है।

भागवत में वरुण देवता के विश्राम में विघ्न के वृतांत की कहानी को नात्य परिवर्तन कर पांचवा अंक लिखा गया है, जो जल स्त्रोतो से छेड़छाड़ के विरुद्ध शिक्षा देता है। यह अंक कथक नृत्य नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया जायेगा जिसमें संवाद न होकर नृत्य मुद्राओ से ही कथ्य कहा जायेगा। छठवें अंक में जल के दुरुपयोग के प्रति चेतना जागृत करने के लिये द्रौपदी द्वारा दुर्योधन के उपहास का प्रसंग उठाया गया है। सातवें अंक में कुंभ के मेलों के जरिये पानि के सामाजिक महत्व को रेखांकित किया गया है। आठवां अंक पुनः मेघदूत पर आधारित कथक नृत्य नाटिका है। जिसमें जल का मानवीकरण किया गया है। नौवें अंक का कथानक माण्डू के जल महल का है, जिसके माध्यम से वाटर हार्वेस्टिंग, के वैज्ञानिक संदेश को समझाया गया है। दसवें अंक का शीर्षक है नदी की मनोव्यथा। नदियों के प्रदूषण की वर्तमान स्थिति पर जन आव्हान के रूप में गीत और नृत्य नाटिका के मंचन द्वारा संदेश देने का यत्न इस अंक की कथा वस्तु है। ग्यारहवें अंक में बच्चों के खेल गोल गोल रानी इत्ता इत्ता पानी के जरिये हिन्दू और मुस्लिम धर्मों में पानी के महत्व पर संवाद हैं। बारहवें अंक में जलतरंग वाद्य यंत्र की प्रस्तुति के साथ काव्य वाचन है

हे जल देवता !

जो कुछ भी मुझमें अपवित्र हो

अशुभ हो

उसे बहा दे। ….

हे जल देवता

मेरा आचरण

अब तेरे जेसा हो

तेरा रसायन मुझमें समा जाये

तू आ

मुझे ओजस्वी बना। ….

जिस तरह जल सबका कल्याण करता है, जिस बर्तन में डालो वैसा ही रूप ले लेता है, …ॠग्वेद की सूक्ति के हिन्दी काव्य रूपांतर की ये अंतिम पंक्तियां नाटक का संदेश हैं।

सबसे बड़ा, सबसे ऊंचा बांध की जो होड़ हमें दुबा रही है, भूकंप ला रही है जंगलों का विनाश और गांवो का विस्थापन हुआ है। इन विभिन्न  समस्याओ पर यह नाटक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रकाश डालता है तथा  बौद्धिकता को मथकर सवाल खड़े करने में सफल है। अब समय आ गया है कि जलाशयो, वाटरबाडीज, शहरो के पास नदियो को ऊंचा नही गहरा किया जावे इन बिंदुओ पर काम हो । पानी के संरक्षण के हर सम्भव प्रयास करे जायें। पानी की इसी सार्व भौमिक भूमिका को ध्यान में रखते हुये इस आशा के साथ कि इसका नाट्य प्रदर्शन जल्दी ही आपके सम्मुख होगा। गाइड फिल्म का अल्ला मेघ दे पानी दे गुड़धानी दे ..। जैसे अकाल और सूखे के कारुणिक दृश्य पुनः सच न हों यह चेतना जन मानस में जगाने के लिये जलनाद के लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव को बहुत बधाई। किताब किंडल पर भी सुलभ है।  

चर्चाकार… श्री विभूति खरे

बानेर, पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मेरी डायरी के पन्ने से # 18 – भूटान की अद्भुत यात्रा – भाग – 1 ☆ सुश्री ऋता सिंह ☆

सुश्री ऋता सिंह

(सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुश्री ऋता सिंह जी द्वारा ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपने यात्रा संस्मरणों पर आधारित आलेख श्रृंखला को स्नेह प्रतिसाद के लिए आभार। आज प्रस्तुत है आपकी डायरी के पन्ने से …  – संस्मरण – भूटान की अद्भुत यात्रा)

? मेरी डायरी के पन्ने से # 18 – भूटान की अद्भुत यात्रा – भाग – 1 ?

(24 मार्च – 31 मार्च 2024)

हमारा पड़ोसी देश भूटान है और भारत के साथ इस देश का अच्छा स्नेह संबंध भी है।

भारतीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी हाल ही में भूटान जाकर आए थे। थिंप्फू नामक शहर से पारो नामक शहर को पहले से ही रंगीन पताकों से सजाया गया था। थिंप्फू शहर के रास्ते पर भारतीय झंडा और भूटान का झंडा सड़क के बीच लगातार लगाए गए थे तथा इस मैत्री संबंध को बनाए रखते हुए यहाँ के पाँचवे राजा की और मोदी जी की तस्वीरें सब तरफ़ लगाई हुई दिखाई दे रही थी। मन गदगद हो उठा। हमारा सौभाग्य ही है कि हम मोदी जी के यहाँ आने के दो दिन बाद ही भूटान की सैर करने पहुँचे।

हम तीन सहेलियों ने मार्च के महीने में भूटान जाने का निश्चय किया। हम 23 मार्च मध्य रात्रि पुणे से मुंबई के लिए रवाना हुए। 24 की प्रातः फ्लाइट से बागडोगरा पहुँचे। बागडोगरा से भूटान की सीमा तक पहुँचने के लिए टैक्सी बुक की गई थी। इस ट्रिप के दौरान हमने बागडोगरा से जयगाँव नामक शहर तक यात्रा की जो चार घंटे की यात्रा रही।

जयगाँव में पहुँचने पर हमें भूटान लेकर जानेवाला गाइड मिला। हम भारत की सीमांत पर बने भूटान के दफ़्तर से होते हुए अपना वोटर आई डी दिखाकर भूटान की ज़मीन पर पहुँचे। भूटान में प्रवेश करने के लिए पासपोर्ट या वोटर आई डी की आवश्यकता होती है। पाठकों को बता दें यहाँ आधार कार्ड नहीं चलता।

जयगाँव बंगाल का आखरी गाँव है। उसके बाद भूटान की सीमा प्रारंभ होती है। यहाँ कोई बॉर्डर नहीं है केवल भूटान कलाकृति के निशान स्वरूप एक बड़ा – सा प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस प्रवेश द्वार का उपयोग केवल गाड़ियाँ ही कर सकती हैं। यात्रियों को जयगाँव में उतरकर भूटान जाने के लिए एक अलग द्वार से पैदल ही जाना पड़ता है। लौटने के लिए भी यही व्यवस्था है। यह बड़ा अद्भुत अनुभव रहा।

भूटान जाने के लिए जो दफ़्तर बना हुआ है वह भीतर से साफ- सुथरा और हिंदी बोलनेवाले भूटानी तुरंत सेवा प्रदान करते हुए दिखाई दिए। जयगाँव की ओर से जानेवाला मार्ग अत्यंत संकरा और गंदगी से न केवल भरपूर है बल्कि लोकल लोगों की भीड़ भी बहुत रहती है। भूटान का यह एन्ट्री पॉइंट उस तुलना में साफ़ सुथरा लगा।

यह भारत के नज़दीक का पहला शहर है नाम है फुन्टोशोलिंग। स्वच्छ और छोटा – सा शहर है यह। फुन्टोशोलिंग शहर जयगाँव से आने -जानेवाले पर्यटकों की सुविधा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी शहर है।

हम फुन्टोशोलिंग के एक होटल में एक रात ही रहे। होटलका नाम था गा मे गा यह व्यवस्था हमारी थकान उतारने के लिए ही कई गई थी।

हम तीनों बहुत थकी हुई थीं क्योंकि हम 23 की मध्य रात्रि घर से रवाना हुई थीं और 24की शाम हम फुन्टोशोलिंग पहुँचे। हमने जल्दी डिनर कर सोने का निर्णय लिया। दूसरे दिन से हमारी भूटान की यात्रा प्रारंभ होने जा रही थी।

मेरी डायरी के पन्ने से…..

भूटान की अद्भुत यात्रा (25 मार्च 2024)

हमने प्रातः नाश्ता किया। हमारे साथ आठ दिनों तक मार्गदर्शन करनेवाला गाइड अपने साथ आठ दिन रहने वाली गाड़ी और ड्राइवर लेकर समय पर उपस्थित हो गया।

गाइड का नाम था पेमा और चालक का नाम था साँगे। दोनों भूटान के नागरिक थे। हिंदी बोलना जानते थे। पेमा कामचलाऊ अंग्रेज़ी बोल लेता था। वे दोनों ही अपने देश की वेश-भूषा में थे। दोनों ही अत्यंत तरुण, मृदुभाषी तथा व्यवहार कुशल भी थे। हम सीनियर पर्यटकों को साथ लेकर चलते समय सावधानी बरतने वाले अत्यंत सुशील नवयुवक थे। उन दोनों का स्वभाव हमें अच्छा लगा और एक परिवार की तरह हम आठ दिन एक साथ घूमते रहे। पाठकों को बता दें कि जहाँ तक समय का सवाल है भूटान भारत से 30 मिनिट आगे है अतः अपनी कलाई की घड़ी और मोबाइल की घड़ी को इसके अनुसार एडजेस्ट कर लेना आवश्यक है।

हमने सबसे पहले भूटान इमीग्रेशन का फॉर्म भरा जहाँ से हमें पेमा और सांगे के साथ उनकी प्राइवेट कार में 31मार्च तक घूमने की लिखित इजाज़त मिली। यह एक प्रकार का विज़ा है।

हमारी यात्रा प्रारंभ हुई। पहला स्थान जो हम देखने गए उसका नाम था सांगे मिगायुर लिंग ल्हाकांग यह एक ऊँची टावर जैसी इमारत है। इसे लैंड ऑफ़ थंडर ड्रैगन कहा जाता है। और टावर को मिलारेपा कहते हैं। यह फुन्टोशोलिंग में ही स्थित है।

यह विश्वास है कि एक संत तिब्बत से भूटान आए थे। दुश्मनों से बदला लेने के लिए वे काला जादू सीख लिए थे और उसका उपयोग भी करते थे। उनके गुरु मार्पा थे। उन्हें जब काला जादू वाली बात ज्ञात हुई तो उन्होंने अपने शिष्य को अकेले हाथ मिट्टी से नौ मंजिली इमारत बनाने का हुक्म दिया। (चित्र संलग्न है ) गुरु को ज्ञात था कि शिष्य के भीतर बदले की भावना और बुराइयाँ भरी हुई है। इसी कारण इमारत को तोड़कर अन्यत्र बनाने का फ़रमान जारी किया। ऐसा कई बार हुआ अंततः शिष्य साधना के लिए चला गया और अपने भीतर की सारी हीन भावनाओं को समाप्त करने में सफल हुआ। इस इमारत में मेलारेपा की बड़ी मूर्ति स्थित है। आज भूटानी अपने मन से इस मंदिर का दर्शन करते हैं जो गुरु के मार्गदर्शन का प्रतीक भी है। इसकी नौ मंजिली इमारत के सामने बुद्ध मंदिर भी स्थित है। आस-पास कुछ भिक्षुक भी रहते हैं। परिसर अत्यंत स्वच्छ और सुंदर बना हुआ है। वातावरण शांतिमय है।

अब हम आगे की ओर प्रस्थान करते रहे। हमारा पहला पड़ाव था थिंम्फू। यह संपूर्ण पहाड़ी इलाका है। 10, 000फीट की ऊँचाई पर स्थित सुंदर, स्वच्छ शहर है। यह भूटान का सबसे बड़ा शहर है तथा भूटान राज्य की राजधानी भी है।

हमें भूटान इमीग्रेशन से रवाना होते -होते बारह बज गए थे। थिंप्फू पहुँचने में पाँच बज गए। वैसे यह यात्रा चार घंटे की ही होती है पर रास्ते में जैसै -जैसे हम ऊपर की ओर बढ़ने लगे हमें तेज़ वर्षा का सामना करना पड़ा। गाड़ी की रफ़्तार कम होती गई। साथ ही सड़क पर भयंकर कोहरा छाया रहा। भीषण शीत और कोहरे के कारण गाड़ी में हीटर चलाने की आवश्यकता हुई। पर यात्रा में कोई कष्ट न हुआ।

चालक अत्यंत अनुभवी और सतर्क रहा।

सड़क चौड़ी थी और दो लेन की थी। एक तरफ़ खड़ा ऊँचा पहाड़ और दूसरी ओर तराई थी। चालक सुपारी अवश्य खाते हैं पर कहीं भी न गंदगी फैलाते हैं न सुपारी का पैकेट फेंकते हैं। जिस कारण शहर स्वच्छ ही दिखाई देता है। जो हमारे लिए एक आनंद का विषय था।

हम पाँच बजे के करीब थिंप्फू के होटल में पहुँचे। हमारे रहने की व्यवस्था बहुत ही उत्तम थी। विशाल कमरे में तीनों सहेलियों के रहने की अत्यंत सुविधाजनक व आराम दायक व्यवस्था रही। अब तापमान 2° सेल्सियस था। कमरे में हीटर लगा होने की वजह से कोई तकलीफ़ महसूस न हुई। हम सबने गरम -गरम पानी से हाथ मुँह धोया ताकि थकावट दूर हो। और चाय पीकर गपशप में लग गए। उस रात तीव्र गति से वर्षा की झड़ी लगी रही।

हम जब थिंम्फ़ू की ओर जा रहे थे तो रास्ते में मोदी जी के आगमन के लिए की गई सजावट का दर्शन भी मिला। पहाड़ों पर और तराईवाले हिस्सों पर चौकोर, रंगीन चौड़े -चौड़े तथा बड़े- बड़े पताके लगाए गए थे। ये पताके लाल, हरे, पीले, नीले और सफ़ेद रंग के थे। किसी महान व्यक्ति के आगमन से पूर्व इस तरह के पताके लगाए जाने की भूटान में प्रथा है। यह सिल्क जैसा कपड़ा होता है और बीच -बीच में थोड़ा कटा सा होता है ताकि हवा लगने पर वे खूब लहराते रहे। लंबी रस्सी में ऐसे कई पताके लगाए जाते हैं। हवा चलते ही ये फड़फड़ाने लगते हैं। हवा कए साथ उसकी फड़फब़ाने की ध्वनि सुमधुर लगती है। दृश्य सुंदर और आँखों को सुकून दे रहे थे।

त्रिकोण सफेद तथा रंगीन पताकों पर मंत्र लिखे हुए पताके लगे हुए भी दिखे। भूटान निवासी बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। इस धर्म के अनुसार अपने पहाड़, पर्वत, नदी, जंगल आदि को सुरक्षित रखने तथा देश के नागरिकों को सुरक्षित रखने हेतु ये रंगीन त्रिकोणी पताके लगाए जाते हैं। इन पर सर्व कल्याण के मंत्र प्रिंट किए हुए होते हैं। जन साधारण का प्रकृति के प्रति प्रेम तथा सम्मान देखकर मन प्रफुल्लित हुआ।

इसके अलावा सफ़ेद रंग के बड़े – बड़े कई झंडे भी एक ऊँचे स्थान पर एक साथ लगाए हुए दिखाई दिए। उन पर भी मंत्र लिखे हुए होते हैं। ये सफ़ेद झंडे शांति के प्रतीक होते हैं। घर के मृत रिश्तेदार को मोक्ष मिले इसके लिए प्रार्थना के साथ ऊँचे बाँस में ये झंडे लगाए जाते हैं। जितनी ऊँचाई पर ये पताके लगाए जाएँगे उतना ही वे फड़फड़ाएँगे और यही ऊँचाई पर लगाए रखने का मूल कारण है। समस्त प्रकृति में झंडे पर लिखित मंत्र हवा के साथ फड़फड़ाते हुए प्रसरित होते रहेंगे यह उनका विश्वास है। कुछ हद तक शायद यह सच भी है। लोग धर्म को मानकर चलते हैं। एक दूसरे के प्रति सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते हैं। शोर मचाना या जोर से बोलना उनकी प्रकृति नहीं है। मूल रूप से वे अत्यंत शांति प्रिय लोग हैं। कहीं झगड़े -फ़साद या ऊँची आवाज़ में बात करते हुए हमें लोग न दिखे। पेमा ने हमें बताया कि उनके देश में पश्चात्य देशों से विशेषकर युरोप से बड़ी संख्या में लोग आते हैं। कानूनन छोटे वस्त्र पहनना, अंग प्रदर्शन करना, स्त्री- पुरुष का गलबाँही कर चलना या पब्लिक प्लेस पर चुंबन लेना दंडनीय अपरापध माना जाता है।

वे निरंतर प्रार्थना बोलते रहते हैं। कुछ लोग माला फेरते हुए भी दिखाई देते हैं।

शहर के सभी लोग, विद्यार्थी, शिक्षक, मज़दूर सभी राष्ट्रीय वेशभूषा में दिखाई देते हैं। शर्ट -पैंट में पुरुष नहीं दिखे। उनके वस्त्र चौकोर डिज़ाइन के कपड़े से बने होते हैं। पुरुषों के वस्त्र घुटने तक पहने जाते हैं और घुटने तक मोजे पहनते हैं। स्त्रियों के वस्त्र ऊपर से नीचे तक पूरा शरीर ढाककर पहने जाते हैं। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि उनके वस्त्र का कपड़ा हमारे देश के अमृतसर में बुना जाता है परंतु भारत में उसकी बिक्री नहीं की जाने का दोनों देशों के बीच कॉन्ट्रेक्ट है। दो देशों के बीच यह स्नेहसंबंध देख मन गदगद हो उठा। बाँगलादेश में आज भी हमारे देश में बनी सूती की साड़ियाँ बड़ी मात्रा में बिकती है। इस प्रकार के व्यापार से पड़ोसी देशों से संबंध पुख़्ता होते हैं।

हम लंबी यात्रा से थक गए थे और तापमान में भी बहुत अंतर पड़ गया था तो उस रात हमने आराम किया।

क्रमशः…

© सुश्री ऋता सिंह

फोन नं 9822188517

ईमेल आई डी – ritanani[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 420 ⇒ पार्ट टाइम/फुल टाइम… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पार्ट टाइम/फुल टाइम…।)

?अभी अभी # 420 ⇒ पार्ट टाइम/फुल टाइम? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ शब्द इतनी आसानी और सहजता से हमारी बोलचाल में शामिल हो गए हैं कि हम उसे किसी अन्य भाषा में न तो समझ सकते हैं, और ना ही समझा सकते हैं। पार्ट टाइम के साथ तो जॉब लगाने की भी आवश्यकता नहीं होती। जब कि नौकरी, धंधा, कृषि व्यवसाय अथवा महिलाओं का गृह कार्य फुल टाइम कहलाता है। सुविधा के लिए आप चाहें तो इन्हें अंशकालिक और पूर्णकालिक कार्य कह सकते हैं।

पार्ट टाइम में समय की सीमा होती है, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना, संगीत और नृत्य की शिक्षा के अलावा हमारे घर की कामवालियों की भी गिनती पार्ट टाइम जॉब में ही होती है। कुछ लोग मजबूरी में, अथवा आदतन फुल टाइम जॉब और पार्ट टाइम जॉब दोनों साथ साथ करते हैं। आठ घंटों का फुल टाइम और बाकी समय में कहीं पार्ट टाइम। ।

पार्ट टाइम में जहां समय सीमा निर्धारित होती है, फुल टाइम अपने आपमें पूरी तरह स्वतंत्र है। किसी नौकरी का फुल टाइम आठ अथवा दस घंटे का भी हो सकता है, जब कि एक किसान अथवा गृहिणी फुल टाइम काम करते हुए भी समय के बंधन से बंधे हुए नहीं है। जो बेरोजगार, निकम्मे, निठल्ले अथवा नल्ले हैं, वे तो फुल टाइम फ्री हैं।

हर व्यक्ति की कार्य करने की स्थिति, कार्य का तरीका और पद्धति अलग अलग हो सकती है, कहीं मेहनत मजदूरी तो कहीं लिखने पढ़ने का काम और कहीं प्रशासनिक जिम्मेदारी। ऑफिस अवर्स में कौन फुल टाइम काम करता है, और कौन गप्पें मारता रहता अथवा चाय पीते रहता है, यह भी काम के तरीके और व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर करता है।।

फुल टाइम हो अथवा पार्ट टाइम, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अपने व्यवसाय से अलग हटकर भी कुछ काम कर गुजरते हैं, इसके लिए वे जो समय निकालते हैं, वही टाइम मैनेजमेंट कहलाता है। फुरसत का समय तो हमेशा जीवन में एक्स्ट्रा और फ्री होता है, बिल्कुल फ्री।

जितनी भी ललित कलाएं हैं, उनमें साहित्य, संगीत, कला, वास्तु और अध्यात्म जैसी अनगिनत विधाएं शामिल हैं, जो व्यक्ति के जीवन को एक सार्थक दिशा देती है। वह अपने दैनिक जीवन के पार्ट टाइम और फुल टाइम के अलावा भी कुछ समय चुरा लेता है, और इन विधाओं में पारंगत हो, समय और जीवन को एक खूबसूरत मोड़ दे देता है।।

रोजी रोटी के साथ एक समानांतर यात्रा सृजन की भी चलती रहती है, जिसमें कहीं कला है, तो कहीं संगीत, कहीं नृत्य है तो कहीं साहित्य सृजन। हर व्यक्ति के पास उतना ही समय है, कोई उसमें पैसा कमाकर भौतिक सुखों का उपभोग कर रहा है, तो कोई निःस्वार्थ रूप से समाज सेवा कर रहा है।

हम सबके पास एक जैसा फुल टाइम है तो किसी के पास पार्ट टाइम। फिर भी अपने शौक और जुनून के लिए एक्स्ट्रा टाइम सब निकाल ही लेते हैं। समय को चुराना कहां सबको आता है। हमारा खूबसूरत कला और साहित्य का संसार इन्हीं फुल टाइम और पार्ट टाइम और उसके टाइम मैनेजमेंट की ही देन है। आइए, थोड़ा समय चुराएं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 199 – फफोले ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “फफोले ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 199 ☆

🌻लघु कथा फफोले 🌻

त्वचा जब जल जाती है तो उसमें फफोले पड़ जाते हैं। और असहनीय पीड़ा और जलन होती है जिसको सह पाना मुश्किल होता है।

पीड़ा की वजह से ऐसा लगता है कि क्या चीज लगा ले यह जलन शांत हो जाए।

आज की यह कहानी➖ फफोले एक बड़े से रेडीमेड कपड़े की दुकान के सामने सिलाई मशीन रख के कामता अपनी रोजी-रोटी चलाता था। पत्नी सुलोचना घर घर का झाड़ू पोछा बर्तन का काम करती थी।

कहते हैं पाई पाई जोड़कर बच्चों का परवरिश करते चले और जब समय ने करवट बदली। बच्चे पढ़ लिखकर बड़े हुए और थोड़ा समझदार होकर अपने-अपने छोटे-छोटे कामों में कमाने लगे। तब माता-पिता का सिलाई करना और घर में झाड़ू पोछा करना उनको अच्छा नहीं लगता था और हीन भावना से ग्रस्त होते थे।

बेटियां सदा पराई होती है शादी के सपने संजोए जाने कब उनके पंख उड़ने लगते हैं। ठीक ऐसा ही सुलोचना की बेटी ने आज सब कुछ छोड़ अपने साथ काम करने वाले लड़के के साथ शादी के बंधन में बंद गई।

माँ बेचारी रोटी पिटती रही। बेटे का रास्ता देख रही थी कि शायद बेटा शाम को घर आ जाए तो वह उसकी बहन की बात बता  कर कुछ मन हल्का करती या बेटा कुछ कहता।

बेटा दिन ढले शाम दिया बाती करते समय घर आया। साथ में उसके साथ सुंदर सी लड़की थी। दोनों के गले में फूलों की माला थी। सुलोचना आवाक खड़ी थी। दिन की घटना अभी चार घंटे भी नहीं हुए हैं। और बेटा बहू।

जमीन पर बैठ आवाज लगने लगी देख रहे हो… यह दोनों बच्चों ने क्या किया। पति ने दर्द से कहराते हुए कहा… अरे बेवकूफ हमने जो घोंसला बनाया था पंछी के पंख लगाते ही वह उड़ चले हैं। अब समझ ले यह आजाद हो गए हैं। हमारे घोसला पर अब हम आराम से रहेंगे।

तभी बेटे ने तुरंत बात काटते हुए कहा… पिताजी घर में तो अब हम दोनों रहेंगे। आप अपना सोने खाने का सामान उसी दुकान में एक किनारे पर रख लीजिएगा।

जहाँ आप सिलाई करते हैं। अब आपकी यहां जरूरत भी क्या है? तेज बारिश होने लगी थी।

पति पत्नी दोनों को आज सावन की बारिश आज के जलन के फफोले बना रही थीं।

जब बारिश होती थी तो चारों एक कोने में दुबके जगह-जगह ऊपर से टपकती खपरैल छत से झरझर बारिश भी  शांति देती थीं। सूखी रोटी में भी आनंद था।

परंतु आज रिमझिम बारिश की फुहार तन मन दोनों में फफोले बना रही थी। वह दर्द से छुटकारा पाने के लिए सिसकती चली जा रही हैं।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 92 – देश-परदेश – Wedding/ Marriage ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 92 ☆ देश-परदेश – Wedding/ Marriage ☆ श्री राकेश कुमार ☆

सांयकालीन फुरसतिया संघ उद्यान सभा में आज इस विषय को लेकर गहन चिंतन किया गया था।

चर्चा का आगाज़ तो “खरबपति विवाह” से हुआ।भानुमति के पिटारे के समान कभी ना खत्म होने वाले विवाह से ही होना था।हमारे जैसे लोग जो किसी भी विवाह में जाने के लिए हमेशा लालियत रहते हैं, कुछ नाराज़ अवश्य प्रतीत हुए।

पंद्रह जुलाई को post wedding कार्यक्रम आयोजित किया गया है।ये कार्यक्रम अधिकतर उन लोगों के लिए होता है, जो विवाह के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए जी जान से महीनों/वषों से लगे हुए थे।

इसको कृतज्ञता का प्रतीक मान सकते हैं। कॉरपोरेट कल्चर में भी इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पुराने समय में विवाह आयोजन में आसपास के परिचित लोग ही दरी इत्यादि बिछाने/उठने का कार्य किया करते थे।फिल्मी भाषा में “पर्दे के पीछे” कार्य करने वाले कहलाते हैं।

हमारे जैसे माध्यम श्रेणी के लोग विवाह को मैरिज कहते हैं। वैडिंग शब्द पश्चिम से है, इसलिए “वैडिंग बेल” का उपयोग भी पश्चिम में ही लोकप्रिय हैं। हमारे यहां तो” गेट  बेल ” बजने पर भी लोग कहने लगे है, अब कौन आ टपका है ?

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ आळंदीचा छंद… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

☆ आळंदीचा छंद... ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

अजब पालखी / ज्ञानेशाची दिंडी

वारकरी झुंडी  /  विठ्ठल पेले //

*

भक्ताची काळजी /आळंदीचा राजा/

सांभाळतो प्रजा /ग्रंथमाऊली//

*

जन्माचा सोहळा /भेटीसाठी आस/

अभंगाचे दास/लहानथोर //

*

ऐटीत पंढरी /पांडुरंगी वास /

चंद्रभागा खास/स्वर्गभुवरी //

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पंढरीची विठ्ठल… ☆ सुश्री नीलांबरी शिर्के ☆

सुश्री नीलांबरी शिर्के

? कवितेचा उत्सव  ?

पंढरीचा विठ्ठल… ☆ सुश्री नीलांबरी शिर्के 

पंढरीच्या विठ्ठलाने

मज लावलाय लळा

तेच माहेर गा माझे

तोच आनंद सोहळा

*

व्याप संसाराचा मोठा

त्यात गुंतलेला पाय          

इथे भेटालागी   येते

माझी सावळी ग माय

*

सडा शिंपताना दारी

हात रेखता रांगोळी

रंगातून  सुखे हासे

तिची मुरत वेगळी

*

केर काढता घरात

मल मनाचा ती काढे

संसाराची ओढ मनी

आपसूक मग वाढे

*

चुलीपाशी रांधताना

मुखी पांडुरंग नाम

घास कुटुबांच्या ओठी

तृप्त भक्तीमय धाम

*

सारे आवरता काम

पाठ टेकता धरणी

मिटलेल्या डोळ्यातुन

चंद्रभागा इंद्रायणी

*

त्या पवित्र जलातुन

वाहतसे श्रमताप

मुखी पांडुरंग हरी

उमटते आपोआप

©  सुश्री नीलांबरी शिर्के

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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