हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३२ ☆ व्यंग्य – विष्णु भगवान को रिमाइंडर ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘विष्णु भगवान को रिमाइंडर‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ विष्णु भगवान को रिमाइंडर डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

 

प्रभु,

कई साल पहले मैंने आपको एक पत्र के द्वारा निवेदन किया था कि चूंकि अब मेरी उम्र आपके प्रत्यक्ष दर्शन के लायक हो गयी है, अतः मेरे सपने में किसी प्रतिनिधि को भेज कर जानकारी मुहैया करायें कि स्वर्ग और नरक में इंतज़ामात कैसे हैं। अभी कथावाचकों से जो जानकारी मिलती है उससे बहुत समाधान नहीं होता। अफसोस है कि मेरे निवेदन का आज तक कोई उत्तर नहीं मिला। लगता है आपके दफ़्तरों में कामकाज ठीक नहीं है।

मुझे यह निवेदन इसलिए करना पड़ा क्योंकि यहां मृत्युलोक में हमारी लाइफ़-स्टाइल में बहुत तरक्की हो गयी है। हम बहुत आराम-पसन्द हो गये हैं। हमारे बाप-दादा ने टेबिल-फ़ैन भी नहीं देखा था, लेकिन हम ए.सी. की हवा ले रहे हैं, भले ही बार-बार ज़ुकाम से पीड़ित हो रहे हों। हमारे बहुत से काम अब ‘रोबो’ और ‘रिमोट’ कर रहे हैं। आदमी को हिलने-डुलने की ज़रूरत नहीं है। एक दिन सीधा बिस्तर से ट्रांसफर होकर अर्थी पर चढ़ जाएगा।

प्रभु, यह ध्यान रहे कि अब हम रथ की सवारी के लायक नहीं रहे। हम में से ज़्यादातर ‘ऑस्टियोपोरोसिस’ और ‘आर्थ्राइटिस’ के मरीज़ हैं। ‘जंक फ़ूड’ खाते-खाते हमारी हड्डियां कमज़ोर हो गयी हैं। रथ पर बैठेंगे तो निश्चय ही दो-चार हड्डियां टूटेंगीं। यहां तो साधु-सन्यासी भी करोड़ों की कार में घूम रहे हैं और करोड़ों का सोना पहन रहे हैं। इसलिए निवेदन है कि हमारी हालत के मद्देनज़र आरामदेह ट्रांसपोर्ट का इंतज़ाम हो। डायबिटीज़ और ब्लड-प्रेशर के मरीज़ों के लिए वहां क्या इंतज़ाम है, यह भी शंका बनी हुई है।

एक विशेष बात जिसके लिए मैं यह पत्र लिख रहा हूं यह है कि आपके चित्रों में आप अपनी ससुराल यानी समुद्र में शेषशैया पर लेटे हैं और आपकी पत्नी लक्ष्मी आपके चरण चांप रही हैं। देख कर कुछ अजीब लगता है। एक तो आपका इतने दिन तक ससुराल में रहना ठीक नहीं है। हमारे यहां कहावत है ‘ससुरार सुख की सार, रहै दिना दो चार।’ यानी ससुराल में सुख मिलता है, बशर्ते कि दो-चार दिन ही रहा जाए। इसलिए समझना मुश्किल है कि आप वहां कैसे हज़ारों साल से डेरा जमाये हैं। ससुर साहब आपके लिहाज में कुछ न बोलते होंगे, लेकिन आपका वहां इतने लंबे समय तक घरजमाई की तरह टिकना उचित नहीं लगता।

लक्ष्मी जी का लगातार आपके चरण चांपना आपके बहुत से भक्तों को अटपटा लग रहा है। यह नारी-अस्मिता और स्त्री-स्वातंत्र्य का ज़माना है। करवा चौथ और तीजा को छोड़ दें तो आज की नारियां पति के चरण छूते हुए फोटो खिंचाने से हिचकती हैं। एक पुरानी फिल्म में पत्नी को पति-भक्ति में गाते हुए सुना था— ‘कौन जाए मथुरा, कौन जाए काशी, इन तीर्थों से मुझे क्या काम है; मेरे घर में ही हैं भगवान मेरे, उनके चरनों में मेरे चारों धाम हैं।’ ऐसे गीत अब सुनायी नहीं पड़ते। पतिदेव का मर्तबा भी पहले जैसा नहीं रहा। इस बीच नारी-अस्मिता के बड़े-बड़े आंदोलन हो गये, जिनके मार्फत स्त्री को समझा दिया गया कि पति नाम का प्राणी ‘परमेश्वर’ नहीं, महज़ हाड़-मांस का मामूली पुतला है। परिणामत: कई घरों में पति की इज़्ज़त दो कौड़ी की हो गयी है।

एक और बात यह कि आप अपने चार हाथों में से एक में पद्म यानी कमल धारण किये हैं और आपका एक हाथ अभय मुद्रा में उठा है। मुश्किल यह है कि कमल और हाथ हमारे यहां पार्टियों के चुनाव-चिन्ह हैं, इसलिए यहां दो पार्टियों के बीच सिरफुटव्वल हो रही है। दोनों आपके चित्रों की दुहाई देकर कहती हैं कि आपका आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हो रहा है। इस संबंध में आपकी तरफ से कुछ स्पष्टीकरण मिल सके तो यह खींचतान बंद हो। गनीमत है कि आपके शंख और चक्र किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह नहीं हैं, अन्यथा और बवाल मचता।

अन्त में मेरा आपसे पुनः निवेदन है कि  ‘वहां’ के इंतज़ामात के बारे में मेरे द्वारा चाही गयी जानकारी मुहैया करायें ताकि मेरे जैसे लोग निश्चिंत होकर स्वर्ग या नरक में प्रवेश कर सकें। दूसरे, आप जल्दी लक्ष्मी जी के साथ ससुराल छोड़कर अपने घर लौटें ताकि भक्तों का असमंजस दूर हो सके।

मेरी बातों को अन्यथा न लें। कृपा बनाये रखें।

आपका परम भक्त

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०३ – मौत की फकीरी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– मौत की फकीरी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०३ — मौत की फकीरी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

गरीब और धनवान धरती पर जीवन से बने रहे। धनवान ने खूब पाया और गरीब ने खूब खोया। गरीब कपड़े के लिए तरसता था और धनवान कपड़ों में बादशाह था। पर दोनों दो गज के कफन में लिपट कर भगवान के घर जाते। जाने में गरीब अपने दायरे से होताऔर धनवान इस तरह से होता दो गज से अधिक कफन में जाने की व्यवस्था हो तो वह जाने का रास्ता भूल जाता।

 © श्री रामदेव धुरंधर

14 — 04 — 2024

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३२ – असार का सार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३२

☆ असार का सार… ? श्री संजय भारद्वाज ☆

मनुष्य के मानस में कभी न कभी यह प्रश्न अवश्य उठता है कि उसका जन्म क्यों हुआ है? क्या केवल जन्म लेने, जन्म को भोगने और जन्म को मरण तक ले जाने का माध्यम भर है मनुष्य?

वस्तुत: जीवन समय का साक्षी बनने के लिए नहीं है अपितु समय के पार जाने की यात्रा है।   अपार सृष्टि के पार जाने का, मानव देह एकमात्र अवसर है, एक मात्र माध्यम है। यह सत्य है कि एक जीवन में कोई बिरला ही पार जा पाता है, तथापि एक जीवन में प्रयास कर अगले तिरासी लाख, निन्यानवे हजार, नौ सौ निन्यानवे जन्मों के फेरे से बचना संभव है। मानव देह में मिले समय का उपयोग न हुआ तो कितना लम्बा फेरा लगाकर लौटना पड़ेगा!

जीवन को क्षणभंगुर कहना सामान्य बात है। क्षणभंगुरता में जीवन निहारना, असामान्य दर्शन है। लघु से विराट की यात्रा, अपनी एक कविता के माध्यम से स्मरण हो आती है-

जीवन क्षणभंगुर है,

सिक्का बताता रहा,

समय का चलन बदल दिया,

उसने सिक्का उलट दिया,

क्षणभंगुरता में ही जीवन है,

अब सिक्के ने कहा,

शब्द और अर्थ के बीच,

अलख दृष्टि होती है,

लघु से विराट की यात्रा

ऐसे ही होती है.. !

ज्ञान मार्ग का जीव मनुष्येतर जन्मों को अपवाद कर देता है, एक छलांग में इन्हें पार कर लौट आता है फिर मनुज देह को धारण करने, फिर पार जाने के लिए।

मनुष्य जाति का आध्यात्मिक इतिहास बताता है कि ज्ञानशलाका के स्पर्श से शनै:-शनै: अंतस का ज्ञानचक्षु खुलने लगता हैं। अपने उत्कर्ष पर ज्ञानचक्षु समग्र दृष्टिवान हो जाता है महादेव-सा। यह दर्शन सम्यक होता है। सम्यक दृष्टि से जो दिखता है, अद्वैत होता है विष्णु-सा। अद्वैत में सृजन का एक चक्र अंतर्निहित होता है ब्रह्मा-सा। ज्ञान मनुष्य को ब्रह्मा, विष्णु, महेश-सा कर सकता है। सर्जक, सम्यक, जागृत होना, मनुष्य को त्रिदेव कर सकता है।

जिसकी कल्पना मात्र से शब्द रोमांचित हो जाते हैं, देह के रोम उठ खड़े होते हैं, वह ‘त्रिदेव अवस्था’ कैसी होगी! भीतर बसे त्रिदेव का साक्षात्कार, द्योतक है सृष्टि के पार का।

असार है संसार। असार का सार है मनुष्य होना। सार का स्वयं से साक्षात्कार कहलाता है चमत्कार। यह चमत्कार दही में अंतर्निहित माखन-सा है। माखन पाने के लिए बिलोना तो पड़ेगा। माँ यशोदा ने बिलोया तो साक्षात श्याम को पाया।

संभावनाओं की अवधि, हर साँस के साथ घट रही है। अपनी संभावनाओं पर काम आरंभ करो आज और अभी। असार से केवल ‘अ’ ही तो हटाना है। साधक जानता है कि से ‘आरंभ’ होता है। आरंभ करो, सार तुम्हारी प्रतीक्षा में है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Poetry ☆ Self Apology… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Self Apology ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ Self Apology… ??

☆ 

Standing before the mirror,

I apologized to myself

For all this while,

I was pleasing others— at the

cost of my own happiness…

*

Then slowly, I kept losing

pieces of my own exhilaration

Until one day I realized—

I had none left for myself…

As I kept choosing others,

over everything I was…

*

And in the end, there I was —

but not myself anymore

But that apology—

Led me back to my original self…!

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ आभासी… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ आभासी… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

राजेशजी मन ही मन बुदबुदा रहे थे–कयामत की धूप है पर जाना तो पड़ेगा। श्रद्धांजलि अर्पित करनी होगी। मन, हां कहे या ना कहे, समाज के कायदे कानून निभाने ही पड़ते हैं। उन्होंने  अल्मारी खोली और एक सफेद पुराना सा कुर्ता पाजामा निकाला। अवसर के अनुकूल परिधान पहनने ही पड़ते हैं। पड़ोसी चन्द्रप्रकाश को फोन किया साथ चलने के लिये। रमन इन दोनों का अच्छा मित्र है। लेखक होने के साथ समाज सेवक भी है।

वे रास्ते में बात करते हुये जा रहे थे। यार राजेश — रमन के पिता की उम्र 90 वर्ष थी ना। पकी उम्र में गये।

–मुझे एक बात समझ में नहीं आती लोग सबसे पहले मरनेवाले की उम्र क्यों पूछते हैं। नब्बे से ऊपर सुनते ही ऐसी मुद्रा बनाते हैं मानों मृतक बेचारा धरती पर रहकर गुनाह कर रहा था। अच्छा हुआ चला गया। ज्यादा जीकर भी क्या करता।

—-राजेश ऐसे सवालों के गणित में उत्तर नहीं दिये जा सकते। मरनेवाला कोई बेहद अपना हो तब भी क्या उनका यही जवाब होगा।

बातों बातों में उन्होंने चार किलोमीटर की दूरी कब तै कर ली पता भी नहीं चला। देखा तो श्मशान घाट सामने था।

रमन के पिता का शव रखा था फूल-मालाओं से सजा हुआ।

कुछ रिश्तेदार और आठ दस पत्रकार /समाज सेवक/ राजनीतिक कार्यकर्ता /लेखक प्रजाति के लोग।

शोक सभा में विलंब था। सब आपस में बतियाने लगे। किसी ने अपने सद्यः प्रकाशित नाटक संग्रह की खासियत बताई। दूसरा कुछ लोगों के कड़क इस्त्रीदार कपड़ों पर टिप्पणी कर रहा था। तीसरा जाति धर्म को लेकर अंत्यविधियों का अंतर बता रहा था। सारे कसमसा रहे थे कि कब कब श्रद्धांजलि सभा खत्म हो और पिंड छूटे।

इतने में नुक्कड़ वाले नेताजी भी आ गये जिनकी प्रतीक्षा हो रही थी।

फोटोग्राफर और माइक का इंतजाम हो चुका था। सभी को फिक्र थी कि कल के अखबार में वे प्रमुखता से नज़र आयें। वर्ना इतनी मशक्कत करके जानलेवा धूप में इतनी दूर आने का क्या फायदा।

वैसे भी दो मिनट खामोश रहकर शोक व्यक्त करना किसी हर्क्युलियन टास्क से कम नहीं लगता।

नेताजी ने बोलना शुरू किया। इतने में एक शव यात्रा श्मशान में प्रकट हुई। बैंड-बाजे के साथ। बैंड-बाजे शोख धुनें बजा रहे थे जैसे किसी शादी में बजाते हैं।

राजेश जी सकपका गये। वे समझ नहीं पाये आखिर माजरा क्या है !

चन्द्रप्रकाश का कहना था – यह मृतक की अंतिम इच्छा रही होगी। या फिर ओशो का अनुगामी रहा होगा।

उधर नेताजी परेशान निगलते बने न उगलते। बैंड बाजे की उग्र तेजतर धुनों के बीच लोगों तक उनकी आवाज नहीं पहुँच पा रही थी। एक तो शोकाकुल चेहरा बनाओ दूसरे सबसे महत्वपूर्ण उनके श्रीवचन अनसुने रह जाने की टीस।

खैर। राजेशजी, रमन से मिले और श्मशान के बाहर निकलते ही चन्द्रप्रकाश से बोले–एक बात का जवाब दोगे ?

–बोलो

— रमन ने पिताजी की मृत्यु की सूचना दी तो fb. पर 400 लोगों ने श्रद्धा सुमन अर्पित किये और श्मशान में केवल आठ ?

–बस इतना जान लो, अब रिश्ते भी आभासी हो गये हैं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७७ – आलेख – छंद शाला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका ज्ञानवर्धक आलेख – छंद शाला)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७७ ☆

☆ आलेख – छंद शाला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

छंद वाचिक होते हैं। वेदों की रचना कह-सुन-याद रखकर ही हुई। इसलिए वैदिक ज्ञान/ ऋचाएँ सदियों तक श्रुति-स्मृति पर आधारित रहीं।

कंठ से निकलनेवाली ध्वनि को उच्चार कहते हैं।

उच्चार दो तरह के होते हैं।

कम समय में बोले जानेवाले उच्चार को लघु तथा उससे दो गुने समय में बोले जानेवाले उच्चार को दीर्घ/गुरु कहते हैं। छंद रचना के लिए लघु उच्चार को इकाई या १ तथा गुरु उच्चार को २ गिना जाता है।

अपवाद स्वरूप कुछ ध्वनियाँ जैसे ॐ का उच्चार काल ३ होता है।

वैदिक ज्ञान बढ़ जाने पर उसे मौखिक रूप से याद रखना संभव न रहा। तब हर ध्वनि के लिए एक संकेत बनाया गया, इसे अक्षर (जिसका क्षरण न हो) कहा गया।

एकाधिक अक्षर मिलाकर विशिष्ट अर्थ अभिव्यक्त करनेवाले शब्द बने। अक्षर और शब्द आरंभ में वाचिक थे। शब्दों के सम्मिलन से वाक्य बने। अक्षरों व शब्दों के लयबद्ध वाचन से छंद और छंदों के प्रयोग से पद्य/काव्य (पहेली,छंद, गीत आदि) रचना हुई। वाक्यों के संयोजन से गद्य (कहावतों, मुहावरों,वार्ता, कथा, कहानी आदि) का सृजन हुआ। लोक गीत व लोक कथाओं का विकास इसी तरह हुआ। इस काल तक तुरंत रचना करनेवाले आशु कवि/आशु कथाकार ही भाषा और साहित्य का विकास कर रहे थे। लोक गायकों ने लोकगीत तथा लोक कथाकारों ने लोककथा विधाओं का विकास किया।

वनवासी/आदिवासी समूहों की भाषाएँ और साहित्य इसी काल में विकसित हुआ। लोक साहित्य के विकास में महिलाओं तथा पुरुषों की भागीदारी आरंभ से ही बराबर रही। इस दौर में घर, पनघट, खलिहान, चौपाल आदि तथा जन्म-मरण, दैनिक जीवन, ऋतु परिवर्तन। पर्व-त्योहार, मिलना-बिछुड़ना, सुख-दुख,  आदि ऐसे स्थल व कारण थे जहाँ स्वानुभूति सृजन का रूप धारण कर लेती थी।

कालांतर में मानव ने खेती करना सीखा और खेतों के निकट झोपड़ी बनाकर रहने पर ग्राम्य सभ्यता का विकास हुआ। खेतों में फसलों की रक्षा करने के लिए बनाए गए मचानों पर खड़े कृषक बहुधा सवेरे अथवा शाम को प्रकृति दर्शन करते हुए या अपने एकांत को मिटाने के लिए कुछ ध्वनियों का लयबद्ध उच्चारण कर जोर से गाते थे, कहीं दूर कोई दूसरा कृषक उस पंक्ति को सुनकर बार-बार दोहरा कर उसी लय में अपने शब्द रखकर दूसरी पंक्ति गा देता था, फिर कोई तीसरा और चौथा व्यक्ति अपनी पंक्ति जोड़ देता था। ऐसी पंक्तियों में उच्चार क्रम, उच्चार काल तथा पंक्ति के अंत में समान ध्वनियाँ हुआ करती थीं। ऐसी दो पंक्ति की रचना को दोपदी, तीन पंक्ति की रचना को त्रिपदी”, चार पंक्ति की रचना को *चौपदी इत्यादि नाम दिए गए। इस समय तक रचनाकार समझदार किंतु निरक्षर (अक्षर लिखने की कला से अपरिचित) थे, अशिक्षित नहीं। यह परंपरा कबीर, रैदास, घाघ, भड्डरी, मीराबाई आदि तक देखी जा सकती है। भाषा और साहित्य के विकास में योगदान करनेवाले अनेक रचनाकार सीखने-सिखाने में सक्षम अर्थात सुशिक्षित किंतु निरक्षर थे।

मानव द्वारा रेत पर अँगुलियों से बिंदु, रेखा, वृत्त आदि अंकित करने पर लिपि का विकास आरंभ हुआ। रेत पर बनाई आकृति मिटने का समाधान पेड़ों की पत्तियों के रह को टहनियों के माध्यम से पत्थरों पर अंकित करने की विधि से किया गया जिसका परिणाम शैल चित्रों/शिलालेखों के रूप में आज भी उपलब्ध है। अक्षरों तथा अक्षरों के अर्थ युक्त सम्मिलन से बने शब्दों को पत्थरों पर अंकित करना लिपि के विकास का महत्वपूर्ण चरण है। कालांतर में शब्दों को लंबे समय तक न सड़नेवाले पत्तों पर भी लिखा गया। हमें प्राचीन ग्रंथ ताड़ पत्रों तथा भोज पत्रों पर लिखे हुए मिलते हैं।

स्मरण रहे कि लिपि के विकास के बहुत पहले वाचिक (बोल-चाल की) भाषा तथा छंद लोक में प्रचलित हो चुके थे।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७६ ⇒ जलकुकड़ी/जल मुर्गी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जलकुकड़ी/जल मुर्गी ।)

?अभी अभी # ९७६ ⇒ आलेख – जलकुकड़ी/जल मुर्गी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारा बचपन गोकुल की कुंज गलियों में नहीं, शहर के गली मोहल्लों में गुजरा !

पनघट ना होते हुए भी गुलैल से निशाना साधकर मटकी की जगह, फलदार वृक्षों से आम, इमली तोड़ना हमारे बाएं हाथ का खेल था। लड़ने झगड़ने और छेड़छाड़ के लिए हमें कभी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।

लड़ने की यही विशेषता बड़े होकर चुनाव लड़ने में हमारे बहुत काम आई।

आज पक्की दोस्ती, तो कल बोलचाल बन्द। तू चुगलखोर तो तू जलकुक्कड़। कट्टी तो कट्टी, साबुन की बट्टी। ला मेरे पैसे, जा अपने घर। लेकिन आज अगर वही कोई बचपन का दोस्त मिल जाए, तो ये लगता है, कि जहां, मिल गया।।

हम आज भी आपस में एक दूसरे को देखकर कभी खुश होते हैं, तो कभी जल भुन जाते हैं। महिलाओं की किटी पार्टियों की खबरें उड़ती उड़ती आखिर हम तक भी पहुंच ही जाती है। मत पूछो, मिसेज डॉली के बारे में, वह तो बड़ी जल कुकड़ी है। बहुत दिनों बाद जब यह शब्द सुना, तो शब्दकोश याद आया। अरे, यह तो एक पक्षी है, White brested Hen, यानी जल मुर्गी।

अगर मछली जल की रानी है, तो हमारी मुर्गी भी तो महारानी है। अगर मुर्गे को (cock) कॉक कहते हैं तो मुर्गी को Hen कहते हैं। अंग्रेजी के अक्षर ज्ञान में हमने पढ़ा है। The Cock is crowing.

मुर्गा ही बांग देता है, मुर्गी तो बस, पक पक, किया करती है। बड़ी विचित्र है यह अंग्रेजी भाषा। अगर cock के आगे pea लग जाए तो वह peacock, यानी मोर हो जाता है। Crow से याद आया, कौए को भी crow ही कहते हैं, लेकिन वह बांग नहीं देता, सिर्फ कांव कांव किया करता है।।

कुछ लोग गाय पालते हैं तो कुछ कुत्ता ही पाल लेते हैं। गोशाला और अश्व शाला तो ठीक, कुत्ते के लिए तो उसके मालिक का घर ही उसकी पाठशाला है। पालन पोषण पुण्य का काम है। लेकिन पापी पेट के लिए इंसान को मत्स्य पालन और कुक्कुट पालन भी करना पड़ता है। गाय को चारा और मछलियों को चारे में जमीन आसमान का ना सही, जल और थल का अंतर तो है ही। इस पर हम ज्यादा नहीं लिखेंगे क्योंकि जीव: जीवस्य भोजनं और वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति।

बड़ा अजीब है, यह जल शब्द भी। इसी जल से ही तो जीवन है। गर्मी में जहां यह शीतल जल अमृत है, वहीं जब सीने में जलन होती है तो आंखों में तूफान सा आ जाता है। जलते हैं जिसके लिए, तेरी आंखों के दिये।।

यही जल कहीं आग है, तो कहीं पानी है। जो आग दिल में जली हुई है, वही तो मंजिल की रोशनी है। लेकिन जब यही आग, यही जलन ईर्ष्या, द्वेष और नफरत की होती है तो जिंदगी में तूफान आ जाता है। किसी की खुशी से, उन्नति से, सफलता से जलना, अच्छी बात नहीं है। जल कुकड़ी बनें तो जल मुर्गी की तरह। और अगर आप जलकुक्कड़ हैं, तो भले ही आप पर घड़ों ठंडा पानी डाल दिया जाए, आप एक जल मुर्गी नहीं बन सकते।

अगर जलाएं तो अपना दिल नहीं, दिल का दीया जलाएं, जिससे आपका घर भी रोशन हो, और रोशन हो ये जहान, जिसमें हम रहते हैं यहां।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ – महाकवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जयंती पर अंतर्राष्ट्रीय विमर्श संपन्न – ☆  साभार – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹– महाकवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जयंती पर अंतर्राष्ट्रीय विमर्श संपन्न – ☆ साभार – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ –🌹

भारत-ऑस्ट्रेलिया साहित्य सेतु थिएटर ऑन डिमांड के तत्वावधान में १५ अप्रैल २०२६ को हिंदी साहित्य के शलाका पुरुष साहित्य रत्न, महाकवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जयंती के मांगलिक अवसर पर चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय साहित्य विमर्श एवं कवि सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया।

इस सारस्वत अनुष्ठान का संयोजन हरिऔध जी की प्रपौत्री तनया अपर्णा वत्स ने किया। इस अनुष्ठान का श्री गणेश सरस्वती वंदना पश्चात्  हरिऔध जी की ९४ वर्षीया प्रपौत्री आशा वत्स जी द्वारा आशीर्वचन व अतिथि स्वागत से हुआ। इस अंतर्राष्ट्रीय काव्य सम्मेलन में ४० कवियों ने हिस्सा लिया।

भारत के मध्य प्रदेश की संस्कारधानी ऐतिहासिक नगरी जबलपुर से जुड़े मुख्य अतिथि आचार्य इंजी. संजीव वर्मा “सलिल” जी । ५०० से अधिक ने छंदों का आविष्कार कर हिंदी पिंगल को समृद्ध करने वाले सलिल जी ने “हरिऔध” के उपनाम को उनके नाम का पर्याय बताते हुए कहा कि अयोध्या के सिंह तथा औध अर्थात अवध के हरि श्री राम एक ही हैं। साहित्य की सम सामयिक उपादेयता व प्रासंगिकता के निकष पर हरिऔध साहित्य को खरा बताते हुए आचार्य सलिल जी ने रचनाधर्मियों से आग्रह किया कि वे भाषिक शुद्धता पर लोकोपयोगी कथ्य को वरीयता देते हुए वह लिखें जो भावी पीढ़ी के लिए उपयोगी हो। विद्वान वक्ता ने हिंदी को विश्ववाणी बनाने के लिए हर विषय-विधा और विज्ञान की तकनीकी जानकारियों युक्त पुस्तकों और हिंदी में शिक्षण को हरिऔध जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि बताते हुए मध्य प्रदेश की तरह अन्यत्र भी इंजीनियरिंग-मेडिकल व अन्य विज्ञान विषय हिंदी में पढ़ाए जाने पर बल दिया।

आयोजन के अध्यक्ष श्रेष्ठ-ज्येष्ठ हिंदी साहित्यकार भगवान सिंह जी ने हिंदी को वर्तमान रूप में लाने के लिए हरिऔध जी के प्रयासों को सराहते हुए आम जन में प्रचलित भाषा का प्रयोग करने, लोकोक्तियों व मुहावरों का प्रयोग करने, भाषा में नए शब्द-प्रयोग करने को भाषिक विकास हेतु आवश्यक बताया।

उपाध्यक्ष की आसंदी से संबोधित करते हुए साहित्य भूषण डॉ. रामसनेही लाल शर्मा “यायावर” ने हरिऔध जी को मुक्तक (चौपदे) विधा का उन्नायक बताया।

मुख्य वक्ता विवेक अग्रवाल जी ने हरिऔध कालीन हिंदी की अब तक की विकास यात्रा पर प्रकाश डालते हुए सटीक शब्द चयन को हरिऔध जी की विशेषता बताया।

विशिष्ट अतिथि रामकिशोर उपाध्याय ने हरिऔध जी की कविताओं को मुर्दे में प्राण फूँकनेवाला बताया।

विशिष्ट अतिथि हिमांशु राय एच. रावल ने अनुष्ठान को पूर्वज पूजन निरूपित करते हुए अन्य साहित्यकारों पर भी ऐसे आयोजन किए जाने का आह्वान किया तथा कहा-

 माँ के चश्मे से जब जहाँ देखा।

कोई न हिंदू न मुसलमां देखा।”

सारस्वत अतिथि डॉ. संगीता भारद्वाज “मैत्री” भोपाल ने वत्स परिवार द्वारा अपने पूर्वजों की अनमोल साहित्यिक विरासत को संँभालने व आगे बढ़ाने की सराहना की। उन्होंने अनेकता में एकता पर दोहे प्रस्तुत किए-

“नव किरणें नवचेतना, खुशियाँ आईं आज।

नया साल स्वागत करे,सफल सभी हों काज।।”

डॉ. नीलिमा रंजन भोपाल ने खुद की रचना पढ़ने का लोभ संवर्त करते हुए हरिऔध जी की “हिंदी भाषा” शीर्षक लंबी रचना के चयनित अंश का पाठ कर शब्द सुमन अर्पित किए।

कार्यक्रम का सुचारु संचालन अपर्णा वत्स जी ने तथा वक्ता परिचय  सुप्रसिद्ध पटकथा लेखक पवन सेठी जी मुंबई ने दिया। अपर्णा वत्स ने धरती तथा भारत का वंदन किया-

मेरी पावन धरा को प्रणाम।

धरती के कण-कण को प्रणाम।।

नमन देश के सपूतों को प्रणाम।

भारत के गौरव को प्रणाम।।”

चिंतक-विचारक पवन सेठी जी  गर्भित रहा।

आदरणीय पवन सेठी जी ने कहा कि “प्रिय प्रवास” में हरिऔध जी ने राधा और श्रीकृष्ण की अनूठी रूपछटा दिखाई है। उन्होंने “ज्योति कलश” रचना का पाठ किया।विनय विक्रम जी ने “मन भ्रमर की मंजरी तुम/तार सप्तक गा रहा हूँ” प्रस्तुत कर सराहना पाई।

सुभाष जी, मेलबॉर्न ने कहा कि आज एक योद्धा का जन्मदिन है। अवसर है, कि हम चिंतन करें, विचार करें कि हम हिंदी में लिखें। आपने कहा- “इंग्लिश आई शहर में होकर आज सवार। गाँव में सोती रही हिंदी पैर पसार।।”

डॉ. अलका अग्रवाल के अनुसार प्रिय प्रवास में प्रकृति की सुंदरता का सुंदर वर्णन किया गया है। उन्होंने हरिऔध जी की पंक्तियाँ

 “नहीं बदलने देंगे हम

हरियाली को पतझड़ में “

प्रस्तुत की।

आदरणीय कुसुम जी ने कहा-

देवनागरी लिपि है जिसकी।

उस हिंदी का है अभिनंदन।।

कवि प्रदीप श्रीवास्तव भोपाल ने कहा- “हिंदी माथे की बिंदी, हम अपना फर्ज निभाते हैं /हिंदी में है नहीं त्रासदी, सब सुखांत कथाओं में।

श्री सुरेश पटवा जी भोपाल ने कहा “प्रिय प्रवास” सिर्फ काव्य नहीं, एक अनुभूति है, विरह का एक भाव जिस पर हरिऔध जी ने महाकाव्य लिख दिया, जो हिंदी जगत के लिए बहुत बड़ी देन है।

श्री गोकुल सोनी भोपाल ने  देशभक्ति परक सुंदर कविता प्रस्तुत की-

वक्त आ गया निकलो घर से, लेकर आज तिरंगा।

जय जय हिंदुस्तान, जय जय देश महान।।”

कवि बी के श्रीवास्तव भोपाल ने कहा कि जो पूर्णता से कार्य करे वही श्रेष्ठ है।

हरिऔध जी का हर सृजन हर रचना सर्वश्रेष्ठ है।

कवि मनोज गुप्ता जी भोपाल ने अमावस की काली रात पर  कहा- “मैंने तुमको तम से प्रति क्षण दूर रखा।”

कवयित्री सरला वर्मा जी भोपाल की पंक्तियाँ थीं-

जो चक्षु चर्म न देख सके, वह कर्म तुम्हें दिखलाते हैं।

स्वर्णिम जीवन के अक्षर तो, पुण्यों से रोपे जाते हैं।।”

सोनम झा जी ने रचना पढ़ी-

एक तिनका बहुत है तेरे लिए।।”

सुमन जैन जी ने अनेकता में एकता पर अपनी कविता प्रस्तुत की-

“मैं तो मन की स्याही हूँ,

जो माँ शारदे की कलम में घुसकर ,

उसकी पोथी में फैल जाती है।।

कवि पुरुषोत्तम तिवारी “सत्यार्थी” भोपाल ने पढ़ा-

देह में है प्राण जब तक,

द्वंद से लड़ता रहूँगा।

मैं अंधेरों का विरोधी,

सूर्य नित गढ़ता रहूँगा।

आयोजन की श्रीवृद्धि करते हुए कालजयी कवि श्री कुँवर बेचैन जी के पुत्र तथा पुत्र वधू भावना कुँवर ने सहभागिता की। भावना कुँवर जी की निम्न पंक्तियाँ सराही गईं-

अपने दिल से प्यार का पैगाम ही भेजा गया।

और वह बस नफरतों के बीज ही बोता गया।।

कवि प्रगीत कुँवर जी ने स्वरबद्ध अपनी पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं-

न जाने क्या हुआ चेहरे में हर दिन ।

बदलते ही रहा शीशे में हर दिन।।

चुभाया तीर जो बातों का उसने ।

वही चुभता रहा सीने में हर दिन।।”

कवयित्री नीलम भटनागर जी ने कहा कि हरिऔध जी का प्रिय प्रवास पढ़कर और पढ़ाकर ही हम हिंदी में स्थान बना पाए हैं।

हिंदी हमारी पहचान है।

हमारी आन बान शान है।।”

इस भव्य कार्यक्रम का समापन करते हुए आशा वत्स जी की बड़ी पुत्री श्रीमती अंगिरा वत्स जी ने इस कार्यक्रम से जुड़े सभी विद्वत जनों वरिष्ठ, कनिष्ठ साहित्यकारों का हृदय से आभार ज्ञापित किया तथा हरिऔध जी की पाँचवी पीढ़ी में ईशानी वत्स के हरिऔध-साहित्य से लगाव व जुड़ाव का उल्लेख किया।

०००

 साभार – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, जबलपुर 

≈संस्थापक संपादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

 जयश्री राम। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री हनुमान चालीसा जी की आज की चौपाई है:-

जुग सहस्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

 श्री हनुमान चालीसा की इन चौपाईयों के बार-बार संपुट पाठ करने से सूर्यकृपा विद्या, ज्ञान और प्रतिष्ठा मिलती है।

नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब हम आपको इस सप्ताह, ग्रहों के विचरण की जानकारी देते हैं।

इस सप्ताह सूर्य मेष राशि में, मंगल, बुध और शनि मीन राशि में, गुरु मिथुन राशि में, शुक्र वृष राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। मेष राशि में सूर्य उच्च के होते हैं अतः उनके असर के कारण परिणाम बेहद चौंकाने वाले होंगे।

आइये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अत्यंत अच्छा रहेगा। स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा। क्रोध की मात्रा में थोड़ी वृद्धि हो सकती है। इस समय सूर्य उच्च का होकर आपके लग्न भाव में बैठा है जिससे आपके कई कष्ट कट सकते हैं। आपको उनके लिए केवल थोड़ा प्रयास करना है। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतने पर सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कोई विशेष मदद प्राप्त नहीं होगा। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 अप्रैल कार्यों की सफलता के लिए शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

अविवाहित जातकों के लिए अच्छी खबर है। उनके विवाह के अच्छे-अच्छे प्रस्ताव आएंगे। पुराने प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी। नए संबंध भी बन सकते हैं। कचहरी के कार्यों में सफलता का योग है परंतु उसके लिए विशेष और सावधानी पूर्वक प्रयास करने होंगे। धन आने का भी योग है, परंतु बुद्धिमानी पूर्वक धन का निवेश करना होगा। कर्मचारियों और अधिकारियों को अपने कार्यालय में तथा अपने अधिकारियों से शांत रहकर ही वार्तालाप करना होगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से विशेष सहयोग प्राप्त नहीं होगा। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 अप्रैल किसी भी कार्य मैं सफलता प्रदान करने वाली है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह कचहरी के कार्यों में सफलता का योग है। परंतु इस सफलता के लिए आपको सावधानी से कार्य करना होगा। धन प्राप्त होने का बहुत अच्छा समय है। आपके थोड़े से प्रयास से अच्छे धन की प्राप्ति हो सकती है। कार्यालय में आपकी स्थिति ठीक रहेगी। आपको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। भाग्य से इस सप्ताह आप किसी तरह की उम्मीद ना करें बल्कि आपको अपने परिश्रम और अपने बुद्धि पर यकीन कर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 अप्रैल उपयोगी हैं। 20 और 21 अप्रैल को कार्यों को सचेत रहकर करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपको बड़े-बड़े कार्यो से धन प्राप्त होने की उम्मीद है। कार्यालय में आपको सफलता मिलेगी। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाग्य से इस बार आपको कभी सहयोग मिलेगा और कभी नहीं मिल पाएगा। इसलिए आपको चाहिए कि आप अपने कर्म पर ज्यादा विश्वास करें। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। आपके माता जी को कष्ट हो सकता है। उनकी दवा में के प्रति आपको विशेष ध्यान देना चाहिए। परिवार के बाकी सदस्यों का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपको पेट में थोड़ी सी तकलीफ होने की संभावना है। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 अप्रैल कार्यों को करने में मददगार हैं। 22 और 23 अप्रैल को आपको सावधानी पूर्वक कोई भी कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें तथा शनिवार में शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। कार्यालय में उनको अपने साथियों से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाग्य से इस सप्ताह आपको अच्छी मदद मिलने की उम्मीद है। आपके जो भी कार्य भाग्य के कारण रुक रहे हो उनको इस सप्ताह करने का प्रयास करें। दुर्घटनाओं से थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। परंतु अगर कोई दुर्घटना होती है तो आपको ज्यादा चोट नहीं आएगी। आपको अपने और अपने जीवन साथी के स्वास्थ्य के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 अप्रैल विभिन्न प्रकार से लाभदायक है। 24 और 25 तारीख को आपको जागरूक रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपका भाग्य पूरी तरह से आपका साथ देगा। आपके कई कार्य अच्छे भाग्य के कारण आराम से हो जाएंगे। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा है। उनको व्यापार में अच्छा लाभ मिल सकता है। अधिकारीयों और कर्मचारियों को अपने सहयोगियों और अधिकारियों से सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। आपके स्वास्थ्य में मामूली परेशानी आ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 अप्रैल कार्यों को करने के लिए फलदायक है। 26 अप्रैल को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। 24 और 25 अप्रैल को आपके पास धन आने का योग है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिवपंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए अति महत्वपूर्ण है। इस सप्ताह उनको अपने प्रत्येक प्रयास में सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कोई विशेष सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। भाई बहनों के साथ इस सप्ताह आपके संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। माता और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा या पहले जैसा ही रहेगा। शत्रुओं को आप इस सप्ताह बड़े आसानी से पराजित कर सकेंगे। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। अपने कर्म पर विश्वास करें। दुर्भाग्य और सौभाग्य पर बिल्कुल ही विश्वास ना करें। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 अप्रैल परिणाम दायक है। 20 और 21 अप्रैल को आपको होशियार रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह उत्साह भरा है। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों को भी गति मिलेगी। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग मिल सकता है। शत्रुओं को आप इस सप्ताह आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह कोई भी शत्रु आपका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता है। पिताजी या माताजी के स्वास्थ्य पर थोड़ा आपको सतर्क रहना चाहिए। दुर्घटनाओं के प्रति इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। आपको पेट का कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 तारीख लाभप्रद हैं। 22 और 23 अप्रैल को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। आपके संतान के लिए सप्ताह सफलताओं से भरा हुआ है। वे जिस चीज में भी प्रयास करेंगे उनको सफलता प्राप्त होगी। छात्रों के लिए भी यह सप्ताह उत्तम है। उनको अपने परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। भाई बहनों के साथ संबंध में आपको तनाव हो सकता है। आपके जीवन साथी को थोड़ा कष्ट हो सकता है। आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 अप्रैल परिणाम मूलक हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपको जन समुदाय के बीच में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। इस कारण से यह सप्ताह जनप्रतिनिधियों के लिए उत्तम है। भाई बहनों के साथ आपके संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। गलत रास्ते से धन आने का योग है। आपके संतान के लिए भी यह सप्ताह उत्तम है। छात्र-छात्राओं को इस सप्ताह परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। आपके पेट में थोड़ी तकलीफ हो सकती है। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह पराजित कर सकते हैं। भाग्य से इस सप्ताह आपको कभी लाभ होगा और कभी नहीं हो पाएगा। अतः आपको अपने कर्मों पर ज्यादा विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। 22, 23 और 26 तारीख को आपको सावधानी से कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। व्यापारी इस सप्ताह थोड़ा सतर्क रहें। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। आपके भाई बहनों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। ‌आपको विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। जन समुदाय के बीच में आपकी इज्जत का इजाफा होगा। छात्र-छात्राओं के लिए यह सप्ताह थोड़ा परेशानी भरा हो सकता है। आपको अपने संतान से इस सप्ताह सहयोग नहीं मिल पाएगा। आपका या आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य छोड़ा थोड़ा कम ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 अप्रैल विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उत्तम है। 24 और 25 अप्रैल को आपको अपने कार्यों के प्रति जागरूक रहना पड़ेगा, अन्यथा आपके कार्य सफल नहीं हो पाएंगे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मीन राशि

व्यापारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। उनके व्यापार में वृद्धि होगी। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। माता जी को थोड़ी सी तकलीफ हो सकती है। इस सप्ताह जनप्रतिनिधियों को अपने प्रतिष्ठा के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। धन आने का उत्तम योग है परंतु इसके लिए आपको प्रयास भी करने पड़ेंगे। कचहरी के कार्यों में थोड़ा सतर्क रहें। दुर्घटनाओं के प्रति इस सप्ताह आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 तारीख लाभदायक है। 26 तारीख को आपको होशियार होकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए की आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ सा ब ण ! ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक  

? कवितेचा उत्सव ?

😅सा ब ण !🤣🙏 श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

(वेगळ्याच विषयावर कविता करण्याचा प्रयत्न !🙏)

मी आकर्षक वेष्टनात

कायम बंदिस्त असतो,

ते होता मजवरून दूर

मी परिमळ पसरवितो !

 *

मला कोणी तयार करती

वापरून आयुर्वेदाचे शास्त्र,

पण खप वाढवण्या माझा

उत्तम जाहिरात हेच अस्त्र !

 *

जाहिरात करती माझी

चित्रपट तारे अन् तारका,

पण स्वतः वापरती कां

मनी मज शंका बरं का !

 *

सुगंध कृत्रिम नानाविध

असती माझीया अंगाला,

निवडा तुम्ही कोणताही

जो वाटे तुम्हा चांगला !

 *

मळ काढण्या शरीराचा

करती माझा प्रसार प्रचार,

दूर करण्या तुम्ही मनाचा

करा कायम सुविचार !

करा कायम सुविचार !

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) 400610 

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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