हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-23 – हरियाणा से जुड़ा हिसार के रिपोर्टर से पहले रिश्ता… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग -23 – हरियाणा से जुड़ा हिसार के रिपोर्टर से पहले रिश्ता… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(प्रत्येक शनिवार प्रस्तुत है – साप्ताहिक स्तम्भ – “मेरी यादों में जालंधर”)

फिर एक नया दिन, फिर एक न एक पुरानी याद ! पंजाब विश्विद्यालय की कवरेज के दिनों एक बार छात्रायें अपनी हाॅस्टल की वार्डन के खिलाफ कुलपति कार्यालय के बाहर धरने पर बैठ गयीं। कड़ाके की सर्दी में रजाइयां ओढ़े धरना जारी रखा। मैं लगातार कवरेज करता गया। आखिरकार छात्राओं की जीत हुई और वार्डन को बदल दिया गया। छात्राओं की नेता का नाम था अनिता डागर और बरसों बाद हिसार में जब फतेह सिंह डागर उपायुक्त बने तब ध्यान आया अनिता डागर का। वह बताती थी कि भिवानी की रहने वाली हूं और डागर भी। बस, मन में आया कि हो न हो , उपायुक्त डागर का कोई कनेक्शन हो अनिता के साथ ! मैंने आखिर पूछ ही लिया ! श्री डागर बहुत हंसे और बोले कि अनिता मेरी ही बेटी है और आजकल मुम्बई रहती है और यही नहीं एक एन जी ओ चलाती है ! कमाल ! अनिता! कभी अपने पापा की ऊंची पोस्ट का जिक्र नहीं किया और भिड़ गयी कुलपति से ! जब वार्डन की ट्रांसफर दूसरे हाॅस्टल में हुई तब मुझे संपादक विजय सहगल ने बताया कि तुम जिसके खिलाफ धरने की कवरेज कर रहे थे, वह कोई और नही बल्कि ‘पंजाब केसरी’ के संपादक विजय चोपड़ा की बहन है ! आज ही विजय जी का फोन आया कि तुम्हारे रिपोर्टर ने छात्राओं के धरने की कवरेज कर हमारी बहन की ट्रांसफर करवा दी !

खैर ! जब फतेह सिंह डागर के यहां कोई मांगलिक कार्य था, तब उन्होंने मुझे भिवानी बुलाया तब मैंने पूछा कि अनिता आयेगी ? वे बोले कि भाई की शादी में बहन क्यों नही आयेगी ? इस तरह काफी सालों बाद उस ‘धाकड़ छोरी’ अनिता से मुलाकात हो पाई और उसी दिन उसकी इंटरव्यू नभ छोर में दी। मुझे राकेश मलिक लेकर गये थे ,  जो बीएसएनएल में एस डी ओ हैं ! अनिता से मैंने पूछा कि क्या अब भी लीडरी करती हो? वह हंसी और बोली कि अब लीडरी नहीं बल्कि समाजसेवा करती हूँ, मुम्बई में एनजीओ चला कर ! देखिए, कैसे पंजाब विश्वविद्यालय का कनेक्शन कहाँ हिसार व भिवानी से जुड़ता चला गया !

ऐसा ही मज़ेदार कनेक्शन जुड़ा हरियाणा में कांग्रेस की बड़ी नेत्री सैलजा से, जिसे हरियाणा में ‘बहन जी’ के रूप में जाना जाता है। ‌मुझे पजाब विश्वविद्यालय की कवरेज करते कुछ ही समय हुआ था कि केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री सुश्री सैलजा का सम्मान डी एस डब्ल्यू डाॅ अनिरूद्ध जोशी ने विश्विद्यालय की ओर से रखा ! वीआईपी गेस्ट हाउस के पास के मैदान में ! उन्होंने बताया कि सैलजा एम ए अंग्रेज़ी के प्रथम वर्ष की छात्रा रही लेकिन एम ए पूरी न कर सकी क्योंकि उनके पिता व कांग्रेस नेता चौ दलबीर सिंह का निधन हो गया और उन्हें पिता की राजनीतिक जिम्मेदारी व विरासत संभालनी पड़ी। हमें यह खुशी है कि हमारी छात्रा अपने शिक्षकों से भी ऊपर पहुंच गयी है। ‌यही शिक्षक की सबसे बड़ी खुशी होती है कि उसके छात्र उससे ऊंचे उठें ! सच, आज तक याद रही यह बात ! फिर सैलजा आईं मंच पर और कहा कि वे हाॅस्टल में रहती थीं ऊपर की मंजिल पर और आज तक याद है कि कैसे किसी परिवारजन के मिलने आने पर महिला सेवादार ऊंची आवाज़ लगातीं कि हिसार वाली सैलजा नीचे आ जाओ, घर से मिलने आए हैं, जैसे कोर्ट में आवाज़ लगती है कि जल्दी पेश हो जाओ ! उन दिनों मुझे पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड मेरे बकाया पैसे नहीं दे रहा था ! मैं खटकड़ कलां के गवर्नमेंट आदर्श सीनियर स्कूल के प्रिंसिपल के पद से रिजाइन देकर ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में आया था। मैंने समारोह में बैठे बैठे ही सैलजा के नाम एप्लिकेशन लिख ली और जैसे ही हमें इंटरव्यू के लिए इनके पास बुलाया तो बातचीत के बाद मैंने अपनी अर्ज़ी भी सौ़ंप दी ! करिश्मा देखिये ! कुछ दिन बाद पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड के अकाउंट विभाग से दफ्तर में फोन आया कि आपने तो हमारी शिकायत केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री सैलजा से कर दी , अब आप आकर अपनी बकाया राशि का चैक ले जाओ ! इस तरह यह मेरी सैलजा से पहली मुलाकात थी और मैंने कभी सोचा भी न था, कि कभी हरियाणा के हिसार में मैं रिपोर्टर बन कर आऊंगा और मुझे किराये का मकान बिल्कुल सुश्री सैलजा के पड़ोस में मिलेगा ! बाद में वही मकान मैंने खरीद लिया और इस तरह सुश्री सैलजा का पक्का पड़ोसी बन गया ! अब जो कोई मुझ से मेरे घर का पता पूछता है तो मैं बताता हूँ कि सैलजा का घर देखा है? बस, वहीं आकर मुझे फोन कर देना, मैं वहीं लेने आ जाऊंगा!

आज यहीं विराम, कल फिर सुनाऊंगा यादें!

क्रमशः…. 

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ डॉ. वनीता की मूल पंजाबी सात कविताएँ  ☆  भावानुवाद – डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक  ☆

डॉ जसप्रीत कौर फ़लक

☆ कविता ☆ डॉ. वनीता की मूल पंजाबी सात कविताएँ  ☆  भावानुवाद – डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक 

डॉ. वनीता

(साहित्य शिरोमणि पुरस्कार विजेता डॉ. वनीता पंजाबी भाषा की सशक्त हस्ताक्षर  हैं। उनकी हृदय-स्पर्शी कविताएँ पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं और कुछ नया सोचने के लिए विवश करती हैं।

उनकी कविताओं में संवेदनशीलता और गहरी सोच की झलक, नारी सशक्तिकरण, प्रेम की अनुभूतियाँ और मानवीय मूल्यों का स्पष्ट प्रतिबिंब देखा जा सकता है।)

1. बर्फ़

पहले-पहल की दिवाली, क्रिसमस

नए वर्ष के कार्ड

लाता था डाकिया,

बर्फ़ों को रौंदता हुआ

गर्मी-सर्दी झेलता हुआ

धीरे-धीरे पिघल गईं बर्फ़

बह गईं बर्फ़े

किन्तु, आश्चर्य यह है कि

बर्फ़ के नीचे पहाड़ दबे

न बर्फ़

न पर्बत

न कार्ड

न डाकिया

फिर भला

कौन से कार्डों के बीच

शब्दों का करो इन्तज़ार ?

2.हस्तक्षेप

कहते हैं

किसी का किया हुआ व्यवहार

भुला नहीं देना चाहिए

*

हाँ,  मान्यवर

नहीं भूलूँगी

तेरा किया मेरे साथ

संदेह, वहिम, नफ़रतें

ला-परवाहियाँ, माथे की तिऊड़ियाँ,

यातनाएँ, ग़लत-फ़हमियाँ

*

तेरा हस्तक्षेप

मेरे जीवन में लगातार

एक कशमकश है।

3. मछली

मछली की सीमा पानी

पानी की सागर

मछली सागर में रहते हुए भी

आँख में कल्पना करती

ऊपर आती

आसमान को आँख में भरती

आँख में बने आसमान को

सागर में ले जाती है।

4.तेरा नाम

मैं हार रही होती हूँ

क्षण-क्षण टूट रही होती हूँ

अपवाद सह रही होती हूँ

तीर हृदय में चुभ रहे होते हैं

साज़िशें रची जा रही होती हैं

परन्तु, ख़ुशी-ख़ुशी

सभी आँधियों को पार कर आती हूँ

सिर्फ़ तेरी नज़र के सदक़े

हार में भी लज़्ज़त आने लगती

टूटना-जुड़ना लगने लगता

*

असत्य में से कहानियाँ गढ़ने लगती

हृदय में चुभे तीरों के साथ

ऐसा लगता

ख़ून स्याही बन गया

अपने विरुद्ध रची साजिशों को

दे कर क़लम का रूप

चुनौतियों को पार कर

फिर लिखने लगती हूँ

तेरा नाम।

5.सम्भाल

लुटाती हूँ

      आसमान

सँभालती हूँ

     एक झोंका

लुटाती हूँ

      धरती

सँभालती हूँ

      एक बीज

लुटाती हूँ

      समन्दर

सँभालती हूँ

      एक बूँद

लुटाती हूँ

       उम्र

सँभालती हूँ

     बस याद।

6.स्वंय

वह एक जुगनूँ  बनाता है

उसमें

जगमग जैसी रौशनी भरता है

पंख लगाता है

आसमाँ में उड़ाता है

*

स्वंय

ओझल होकर

देखने लगता है लीला

जुगनूँ की

रौशनी की

अन्धेरे की।

7.मुहब्बत

अपनी मुहब्बत का

दा’वा कोई नहीं

परन्तु,

नैनों में उमड़ती

लहरों के स्पर्श का

ज़रूर है अहसास

भिगोती हैं जो मेरे

अहसासों को

*

खड़ी रहती हूँ

सूखे किनारों पर

ले जाती हैं उठती लहरें

अपने साथ मेरा अस्तित्व

और वजूद

कोसता रहता

मेरा अस्तित्व

तेरे में विलीन होता।

कवयित्रीडॉ. वनीता

भावानुवाद –  डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक

संपर्क – मकान न.-11 सैक्टर 1-A गुरू ग्यान विहार, डुगरी, लुधियाना, पंजाब – 141003 फोन नं –  9646863733 ई मेल- [email protected]

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पी – 14 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पी – 14 ? ?

(लघु कविता संग्रह – चुप्पियाँ से)

तुम चुप रहो

तो मैं कुछ कहूँ..,

इसके बाद

वह निरंतर

बोलता रहा

मेरी चुप्पी पर..,

अपनी चुप्पी की

सदाहरी कोख पर

आश्चर्यचकित हूँ!

© संजय भारद्वाज  

(प्रातः 8:23 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 💥 श्री हनुमान साधना सम्पन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जाएगी। 💥 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आतिश का तरकश #242 – 127 – “कुछ  रिश्तों  के  पोखर सूखे…” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’ ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। श्री सुरेश पटवा जी  ‘आतिश’ उपनाम से गज़लें भी लिखते हैं ।प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ आतिश का तरकशआज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण ग़ज़ल “कुछ  रिश्तों  के  पोखर सूखे…” ।)

? ग़ज़ल # 127 – “कुछ  रिश्तों  के  पोखर सूखे…” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’ ?

एक साल धरा पर  बीत गया,

दिल हार गया मन जीत गया।

*

सधता कब सब कुछ जीवन में,

कुछ सुलझा कुछ विपरीत गया।

*

कुछ  रिश्तों  के  पोखर सूखे,

मन झरने  से  संगीत  गया।

*

बीता  साल  उमंग  भरा था,

समय गुज़रते वो  रीत गया।

*

महत्व   पाने  की  इच्छा  में,

व्यर्थ  जीवन   व्यतीत  गया।

*

यमदूत  सधा  काल नियम से,

मेरा  मन तो  भयभीत  गया।

*

बिछड़ कर वह रहा दिल में ही,

आतिश का पर  मनमीत गया।

© श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 398 ⇒ स्वप्न से निवृत्ति… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “स्वप्न से निवृत्ति।)

?अभी अभी # 398 ⇒ स्वप्न से निवृत्ति? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारी प्रवृत्ति के लिए हमारी वृत्ति जिम्मेदार है। क्या वृत्ति का हमारी स्मृति से भी कुछ लेना देना है। वैसे वृत्ति का संबंध अक्सर चित्त से जोड़ा गया है। जोड़ने को ही योग भी कहते हैं। योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः यानी चित्त वृत्ति के निरोध को ही योग कहा गया है। अगर प्रवृत्ति संग्रह है तो निवृत्ति असंग्रह। निरोध ही निवृत्ति का मार्ग है।

चेतना के चार स्तर माने गए हैं, जिन्हें हम अवस्थाएं भी कह सकते हैं, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीयावस्था।

सुषुप्ति अवस्था : गहरी नींद को सु‍षुप्ति कहते हैं। इस अवस्था में पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां सहित चेतना (हम स्वयं) विश्राम करते हैं। पांच ज्ञानेंद्रियां- चक्षु, श्रोत्र, रसना, घ्राण और त्वचा। पांच कर्मेंन्द्रियां- वाक्, हस्त, पैर, उपस्थ और पायु। अगर गहरी नींद ना हो, तो हमारे शरीर और मन को आराम नहीं मिल सकता।

आठ घंटे की स्वस्थ नींद में हम कितनी गहरी नींद सोते हैं, कितनी नींद कच्ची होती है, और कब स्वप्न देखते हैं इसका लेखा जोखा इतना आसान भी नहीं। लेकिन गहरी नींद एक स्वस्थ मन की निशानी है और कच्ची नींद और स्वप्न एक चंचल मन की अवस्था है। स्वप्नावस्था में अवचेतन मन नहीं सोता।

चित्त के संचित संस्कार, और स्मृति के साथ साथ हर्ष, शोक और भय के संस्कार भी स्वप्न में प्रकट होते रहते हैं।।

अच्छे स्वप्न हमें एक चलचित्र की तरह मनोरंजक लगते हैं तो बुरे सपने हमें नींद में ड्रैकुला की तरह डराने का काम करते हैं। अवचेतन का भय और दबी हुई इच्छाएं

स्वप्न के रास्ते मन में प्रवेश करती हैं। परीक्षा का भय भी कई वर्षों तक मन में बैठा रहता है और व्यक्ति स्वप्न में ही बार बार परीक्षा दिया करता है।

योग द्वारा चित्त वृत्ति का निरोध हमारे चेतन और अवचेतन दोनों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। हमारा शरीर केवल पांच तत्वों से ही नहीं बना, इसमें सात चक्र भी है और पांच महाकोश भी।

षट्चक्र भेदन से शक्ति मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि और आज्ञा चक्र से होती हुई सहस्रार तक पहुंच सकती है।।

अन्नं प्राणो मनो बुद्धिर्– आनन्दश्चेति पञ्च ते। कोशास्तैरावृत्तः स्वात्मा, विस्मृत्या संसृतिं व्रजेत्।

योग की धारणा के अनुसार मानव का अस्तित्व पांच भागों में बंटा हुआ है। इन्हें हम पंचकोश कहते हैं। इन पंचकोश में पहला अन्नमय कोश, दूसरा प्राणमय कोश, तीसरा मनोमय कोश, चौथा विज्ञानमय कोश और पांचवा व अंतिम आनंदमय कोश है।

योग केवल धारणा का विषय नहीं, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का विषय भी है। इससे ना केवल स्वप्न से निवृत्ति संभव है, काम, क्रोध, लोभ, और मोह के संस्कारों पर भी अंकुश लगाया जा सकता है। जाग्रत अवस्था टोटल अवेयरनेस का नाम है जिसमें स्वप्न का कोई स्थान नहीं है।

अध्यात्म के सभी मार्गों में चित्त शुद्धि पर जोर दिया गया है। निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा। निग्रह ही निवृत्ति का मार्ग है। सपनों की खोखली दुनिया से ईश्वर के सुनहरे संसार में आग्रह, पूर्वाग्रह और दुराग्रह का मार्ग त्याग अनासक्त प्रेम और अनासक्त कर्तव्य कर्म का मार्ग ही श्रेयस्कर है। महामानव तो बहुत दूर की बात है, फिलहाल तो हमें मानवता की तलाश है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # 120 ☆ ।।मुक्तक।। ☆ ।। योग भगाए रोग ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # 120 ☆

।।मुक्तक।। ☆ ।। योग भगाए रोग ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

।।विश्व योग दिवस।। – (21 – 06 – 2024)

[1]

योग से   बनता    है   मानव

शरीर   स्वस्थ  आकार।

योग एक  है   जीवन      की

पद्धति स्वास्थ्य आधार।।

योग से निर्मित होता तन मन

और  मस्तिष्क   सुदृढ़।

तभी तो   हम कर   सकते  हैं

हर जीवन स्वप्न साकार।।

[2]

भोग नहीं योग आज  की बन

गया   एक   जरूरत  है।  

रोग प्रतिरोधक क्षमता  से  ही

जीवन बचने की सूरत है।।

दस   वर्ष पूर्व सम्पूर्ण विश्व को

भारत ने दिखाया  रास्ता।

आज तो पूरी  दुनिया में भारत

बन गया योग की मूरत है।।

[3]

नित प्रतिदिन   व्यायाम  ही तो

योग का एक  रूप    है।

व्यवस्थित हो  जाती  दिनचर्या

बदलता    स्वरूप     है।।

निरोगी काया आर्थिक  स्थिति

भी होती योग  से सुदृढ़।

योग तो सारांश में तन मन की

सुंदरता का प्रतिरूप है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेलीईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 181 ☆ ‘अनुगुंजन’ से – दुख से घबरा न मन ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित एक भावप्रवण रचना  – “अभी भी बहुत शेष है। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।) 

☆ काव्य धारा # 181 ☆ ‘अनुगुंजन’ से – दुख से घबरा न मन ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

दुख से घबरा न मन, कर न गीले नयन,

दुख तो मानव के जीवन का सिंगार है ।

इससे मिलता है बल, दिखती दुनियां सकल

आगे बढ़ने का ये सबल आधार है ।।۹ ۱۱

*

सुख में डूबा है जो, मन में फूला है जो,

समझो यह-राह भटका है, भूला है वो ।

दुख ही साथी है जो साथ चल राह में

रखता साथी को हरदम खबरदार है ।। २ ।।

*

सुख औ’ दुख धूप-छाया हैं बरसात की

उड़ती बदली शरद-चाँदनी रात की ।

सुख की साधे ललक, दुख की पाके झलक

जो भी डरता है वो कम समझदार है ।। ३ ।।

*

कर्म-निष्ठा से नित करते रहना करम भूलकर

सारे भ्रम आदमी का धरम फल तो देता है

खुद कर्म हर एक किया फल पै

कोई किसी का न अधिकार है ।। ४ ।।

*

जो भी चलते हैं पथ पै समझ-बूझकर

उन्हें सुख-दुख बराबर, नहीं कोई डर ।

उनकी मंजिल उन्हें देती अपना पता

सहना है जिंदगी – ये ही संसार है ।। ५ ।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दोहा – योग भगाये रोग ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ दोहा – योग भगाये रोग ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

(अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस विशेष)

योग भगाता रोग है, काया हो आदित्य।

स्वास्थ्य रहे हरदम खरा, मिले ताज़गी नित्य।।

*

योग कला है, ज्ञान है, रिषियों का संदेश।

तन-मन की हर पीर को, करे दूर, हर क्लेश।।

*

योग साधना मानकर, पाते हम बल-वेग।

गति-मति में हो श्रेष्ठता, मिले खुशी का नेग।।

*

दीर्घ आयु मिलती सदा, अपनाते जो ध्यान।

योग करो, ताक़त गहो, पाओ नित सम्मान।।

*

योग कह रहा नित्य यह, लेना शाकाहार।

तभी मिलेगा हर कदम, जीवन में उजियार।।

*

भारत चिंतन में प्रखर, देता उर-आलोक।

योग-ध्यान से बंधुवर, पास न आता शोक।।

*

योग दिवस मंगल रचे, अखिल विश्व में मान।

योगासन हर मुद्रा, पाती है यशगान।।

*

योग साधना दिव्य है, रामदेव जी संत।

जिन ने भारत से किया, सकल रुग्णता अंत।।

*

योग नया विश्वास है, चोखी है इक आस।

जो जीवन-आनंद दे, रचे नया मधुमास।।

*

योग-ध्यान से नेह कर, गाओ जीवन गीत।

तन-मन को बलवान कर, पाओ हरदम जीत।।

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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सूचना/Information ☆ सम्पादकीय निवेदन – सौ जयश्री पाटील – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सौ जयश्री पाटील

🏆🏆 अभिनंदन 🏆🏆

आपल्या समुहातील कवयित्री सौ जयश्री पाटील  यांच्या बालजगत’ या कवितासंग्रहाने, अ.भा.शब्दमंथन साहित्य समुह, स्वदेशी भारत सन्मान  पुरस्कार, प्रज्ञा बहुउद्देशीय  संस्था पुरस्कार, तितिक्षा इंटरनॅशनल  आणि अमरेंद्र भास्कर बालकुमार साहित्य संस्था पुणे यांचा पुरस्कार  असे पाच पुरस्कार प्राप्त  केले आहेत.सौ. जयश्री पाटील यांच्या या यशाबद्दल  त्यांचे ई-अभिव्यक्ती समुहाकडून  मनःपूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा.!

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ कण… ☆ प्रा डॉ जी आर प्रवीण जोशी ☆

प्रा डॉ जी आर प्रवीण जोशी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ कण… ☆ प्रा डॉ जी आर प्रवीण जोशी 

दुःख दिसलं सुपभर

सुख मिळालं कणभर

डोंगर होता भरल्या काट्यानी

करवंद बसली जाळीवर

*

आवळा बसला झाडावर

भोपळा दिसला वेलीवर

देवा तुझं ईपरीत काहीं

आंबा लोम्बतो वाऱ्यावर

*

सुखातला दुःखाचा बिब्बा

नदीकाठी काळी घागर

अंधारातील खेळ जगाचा

जीवनाचा होतो मग जागर

*

 येळकोट येळकोट घेताना

 म्हाळसाचा होतो विसर

 संबळ डंबळ वाजवताना

  पिवळा भडक होई नांगर

*

 पिकली शेती रांधली चूल

 काळ्या मातीचा होतो चाकर

 चटके हाताला बसताना

 पोटात जाई कोर भाकर

© प्रो डॉ प्रवीण उर्फ जी आर जोशी

ज्येष्ठ कवी लेखक

मुपो नसलापुर ता रायबाग, अंकली, जिल्हा बेळगाव कर्नाटक, भ्रमण ध्वनी – 9164557779 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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