हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ नारी अस्मिता प्रश्नों के दायरे में क्यों?? ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  आज प्रस्तुत है  डॉ मुक्ता जी  का विचारोत्तेजक आलेख  “नारी अस्मिता प्रश्नों के दायरे में क्यों ?”।)   🚶🏻‍♀️नारी अस्मिता प्रश्नों के दायरे में क्यों? 🚶🏻‍♀️   यह तो सर्वविदित है कि सृष्टि निर्माण के लिए नियंता ने आदम और हव्वा की कल्पना की तथा दोनों को इसका उत्तरदायित्व सौंपा। हव्वा को उसने प्रजनन क्षमता प्रदान की तथा दैवीय गुणों से संपन्न किया। शायद!इसलिये ही मां बच्चे की प्रथम गुरु कहलायी।  जन्म के पश्चात् उसका अधिक समय मां के सान्निध्य में गुज़रा। सो! मां के संस्कारों का प्रभाव उस पर सर्वाधिक पड़ा। वैसे तो पिता की अवधारणा के बिना बच्चे के जन्म की कल्पना निर्रथक थी। पिता पर परिवार के पालन-पोषण तथा सुरक्षा का दायित्व  था। इसलिए सांस्कृतिक परिवेश उसे विरासत में मिला, जो सदैव पथ-प्रदर्शक के रूप में साथ रहा। प्राचीन काल से स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। परन्तु सभ्यता के विकास के साथ-साथ पितृ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 13 – लघुकथा – एक पुरस्कार समारोह ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार   (आपसे यह  साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  e-abhivyakti के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं । अब हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे।  आज प्रस्तुत है  उनकी  लघुकथा  “एक पुरस्कार समारोह”।  ईमानदारी वास्तव में  नीयत से जुड़ी  है। समाज में व्याप्त ईमानदारी के स्तर को डॉ परिहार जी ने बेहद खूबसूरत अंदाज में प्रस्तुत किया है। हम आप तक ऐसा ही  उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 13 ☆   ☆ लघुकथा – एक पुरस्कार समारोह  ☆ कलेक्टरेट के चपरासी दुखीलाल को दस हजार रुपये से भरा बटुआ एक बेंच के पास पड़ा मिला। उसने उसे खोलकर देखा और सीधे जाकर उसे कलेक्टर साहब की टेबिल पर रखकर छाती तानकर सलाम ठोका। कलेक्टर साहब ने दुखीलाल की बड़ी तारीफ की। दुखीलाल...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ संजय उवाच – #10 – # No Abusing ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से इन्हें पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।” हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की  नौवीं कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # 10 ☆   ☆ # No Abusing ☆ रात चढ़ रही है, पास के मकान में हमेशा की तरह घनघोर कलह जारी है। सास-बहू के ऊँचे कर्कश स्वर गूँज रहे हैं, साथ ही किसी जंगली पशु की तरह...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गंतव्य की ओर ☆ – सुश्री पल्लवी भारती

सुश्री पल्लवी भारती    (प्रकृति अपने प्रत्येक रूप के रंगो- छंदों से केवल एक ही इशारा करती है, कि "आओ, अपने गंतव्य की ओर चलो"... इसी विषय पर आधारित है  सुश्री पल्लवी भारती जी की यह कविता- "गंतव्य की ओर"।)    🌳 गंतव्य की ओर 🌳   प्रात: रश्मि की किरण से, और सांध्य के सघन से; रक्त-वर्णित अंबुधि में, अरूण के आश्रय-सुधि में; सप्ताश्र्व-रथ पे आरूढ़, सदैव से निश्चयी दृढ़। दीप्त भाल विशाल ज्यों क्षितिज के उस छोर। चलें गंतव्य की ओर॥   खग- गणों के कलरवों में, मौन हुए गीतों के स्वर में; एक चिंतन भोज्य-कण, और तिनकों का संरक्षण। अस्थिर गगन और धूलिमय नभ; ध्येय अपना पीछे हुआ कब? शीघ्रतम दिन व्यतीत ज्यों अब हुआ है भोर। चलें गंतव्य की ओर॥   पुष्प तरूवर वाटिका, चाहे लतिका वन-कंटिका; तृण-शिशु और पल्लवित पर, सहला रहे हैं मारूत्य-कर। फल फूल मुखरित कंठ से, सेवा आगाध आकंठ से। नव-शाख पुलकित हरिताभ पट-धर और पुष्पित डोर। चलें गंतव्य की ओर॥   उन्माद गिरि का निर्झर है, उल्लास नदी का प्रखर है; संसृति कूल-किनारें सिंचित, नानाविधि जीवन संरक्षित। पथ दुर्गमों को कर पार, लहरें हैं नाची बारंबार। जीवन प्रदत्त अस्थिर चपलता द्रुत गति अघोर। चलें गंतव्य की ओर॥   दिन-रैन संग में सन्निहित, काल-भाल पट्टिका पर...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – 🍁 मी_माझी – #17 – पाचोळा… 🍁 – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते   (प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की   सत्रहवीं कड़ी  पाचोळा...।  सुश्री आरूशी जी  के आलेख मानवीय रिश्तों  को भावनात्मक रूप से जोड़ते  हैं।  सुश्री आरुशी के आलेख पढ़ते-पढ़ते उनके पात्रों को  हम अनायास ही अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं और उनमें खो जाते हैं। एक पान  के पत्ते से  नवजीवन की परिकल्पना को जोड़ना एवं अंत में दी हुई कविता दोनों ही अद्भुत हैं। सुश्रीआरुशी जी के  संक्षिप्त एवं सार्थकआलेखों  तथा काव्याभिव्यक्ति का कोई सानी नहीं।  उनकी लेखनी को नमन। इस शृंखला की कड़ियाँ आप आगामी प्रत्येक रविवार को पढ़  सकेंगे।)     साप्ताहिक स्तम्भ – मी_माझी – #17    ☆ पाचोळा... ☆   पाचोळा, पानांचा... पानगळ... निष्पर्ण... एका सुरुवातीचा शेवट? कदाचित शेवट... म्हणून भकास? कदाचित? की नव्याची सुरुवात? अनेक विचार आपल्यालाच डाचत राहतात... पण पाचोळा कोणालाच नको असतो हे नक्की... पायदळी तुडवले जाण्याची शक्यताच जास्त असते... दुर्लक्षित होणे, ह्या सारखी भावना सुखावह नक्कीच नाही... पण मग अजून एक विचार मनात येतो... पाचोळा ही पूर्णत्वाची स्थिती तर नाही? समर्पणाची तयारी तर...
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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – ☆ वाह! क्या दृश्य है? ☆ – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक    (डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा प्रस्तुत यह सामयिक लघुकथा  "वाह! क्या दृश्य है?"अत्यंत हृदयस्पर्शी है ।  वर्तमान में देश के विभिन्न राज्यों में भारी बारिश की वजह से बाढ़ की स्थिति बनी हुई है । यह लघुकथा उन्होने लगभग 12 वर्ष पूर्व बाढ़ की विभीषिका पर लिखी थी।)   😭 वाह! क्या दृश्य है ? 😭   रमुआ पीपल के पेड़ की सबसे ऊंची डाल पर बैठा अपने चारों ओर दूर-दूर तक फैली अथाह जल राशि को देख रहा था । गांव के नजदीक बने बांध के भारी वर्षा से टूट जाने के कारण अचानक आई बाढ़ से पूरे गाँव में पानी भर जाने से कच्चे मकान ढह गये थे और गाँव के लोगों के साथ ही ढोर जानवर भी बहने  लगे थे । बाढ़ के पानी में बहते हुए उसके हाथों  में पीपल की डाल आ गई थी, जिसे उसने मजबूती से पकड़ उस पर चढ़कर अपने आप को किसी तरह बहने से बचा लिया था । पेड़ पर बैठे हुए आधा दिन...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (13) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पंचम अध्याय (सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय)  (ज्ञानयोग का विषय)   सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्‌।।13।।   सदा संयमी पुरूष रख मन में कर्म सन्यास नौ द्वारों की पुरी में करता सुख से वास।।13।।   भावार्थ :  अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है।।13।।   Mentally renouncing all actions and self-controlled, the embodied one rests happily in the nine-gated city, neither acting nor causing others (body and senses) to act. ।।13।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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हिन्दी साहित्य – अटल स्मृति – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि –  ‘अ’ से अटल ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )  🍁 संजय दृष्टि  – 'अ' से अटल 🍁 (अटल जी की प्रथम पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि। गतवर्ष उनके महाप्रयाण पर उद्भूत भावनाएँ साझा कर रहा हूँ।)   अंततः अटल जी महाप्रयाण पर निकल गये। अटल व्यक्तित्व, अमोघ वाणी, कलम और कर्म से मिला अमरत्व! लगभग 15 वर्षों से सार्वजनिक जीवन से दूर, अनेक वर्षों से वाणी की अवरुद्धता, 93 वर्ष की आयु में देहावसान और  तब भी अंतिम दर्शन के लिए जुटा विशेषकर युवा जनसागर। ऋषि व्यक्तित्व का प्रभाव पीढ़ियों की सीमाओं से परे होता है। हमारी पीढ़ी गांधीजी को देखने से...
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हिन्दी साहित्य – अटल स्मृति – कविता -☆ श्रद्धांजलि ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”   (आज प्रस्तुत है श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी द्वारा  पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी की प्रथम पुण्यतिथिपर श्रद्धांजलि अर्पित करती हुई कविता  “श्रद्धांजलि”।)   ☆ अटल स्मृति - श्रद्धांजलि ☆   हे राजनीति के भीष्म पितामह! हे कवि हृदय, हे कवि अटल! हे  शांति मसीहा प्रेम पुजारी! जन महानायक अविकल। हे राष्ट्र धर्म की मर्यादा, हे चरित महा उज्जवल। नया लक्ष्य ले दृढ़प्रतिज्ञ, आगे बढ़े चले अटल। हे अजातशत्रु जन नायक ॥1॥   आई थी अपार बाधाएं, मुठ्ठी खोले बाहे फैलाये। चाहे सम्मुख तूफान खड़ा हो, चाहे  प्रलयंकर घिरे घटाएँ। राह तुम्हारी रोक सकें ना , चाहे अग्नि अंबर बरसाएँ। स्पृहा रहित निष्काम भाव, जो डटा रहे वो अटल। हे अजातशत्रु जन नायक ॥2॥   थी राह कठिन पर रुके न तुम, सह ली पीड़ा पर झुके न तुम, ईमान से अपने डिगे न तुम, परवाह किसी की किए न तुम, धूमकेतु बन अम्बर में एक बार चमके  थे तुम। फिर आऊंगा कह कर के, करने से कूच न डरे थे तुम। हे अजातशत्रु जन नायक ॥3॥   काल के कपाल पर, खुद लिखा खुद ही मिटाया। बनकर प्रतीक शौर्य का, हर बार गीत नया गाया। लिख दिया अध्याय नूतन, ना कोई अपना पराया । सत्कर्म से अपने सभी...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 3 ☆ अरबी के पत्तों का  पानी ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे (सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की  ऐसी ही एक संवेदनात्मक भावप्रवण कविता  ‘नजरें पार कर’।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 3 ☆ ☆ अरबी के पत्तों का  पानी ☆   प्रिये, तुम नक्षत्रों से चमकती हो, मैं अदना सा टिमटिमाता हुआ तारा हूँ ।   तुम बवंड़र सी चलती आँधी हो, मैं पुरवाई की मंद बहती हवा हूँ ।   तुम कोहरे से लिपटी हुई सुबह हो मैं दूब पर रहती की ओस की बूँद हूँ ।   तुम शंख में रहनेवाला मोती हो मैं अरबी के पत्तों का चमकता पानी हूँ ।   © सुजाता काळे … पंचगनी, महाराष्ट्र। 9975577684...
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