आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (13) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पंचम अध्याय (सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय)  (ज्ञानयोग का विषय)   सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्‌।।13।।   सदा संयमी पुरूष रख मन में कर्म सन्यास नौ द्वारों की पुरी में करता सुख से वास।।13।।   भावार्थ :  अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है।।13।।   Mentally renouncing all actions and self-controlled, the embodied one rests happily in the nine-gated city, neither acting nor causing others (body and senses) to act. ।।13।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (12) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पंचम अध्याय (सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय) ( सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा )   युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्‌। अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ।।12।।   योगी पाते शांति सुख सहज कर्म फल त्याग बंध जाते है अन्य जन, फल से रख अनुराग।।12।।   भावार्थ :  कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूप शान्ति को प्राप्त होता है और सकामपुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँधता है।।12।।   The united one (the well poised or the harmonised), having abandoned the fruit of action, attains to the eternal peace; the non-united only (the unsteady or the unbalanced), impelled by desire and attached to the fruit, is bound ।।12।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (11) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पंचम अध्याय (सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय) ( सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा )   कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्त्वात्मशुद्धये ।।11।।   तन से,मन से,बुद्धि से,या इंद्रिय से मात्र योगी करते कर्म सब लिप्ति त्याग शुद्धार्थ।।11।।        भावार्थ :  कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।।11।।   Yogis, having abandoned attachment, perform actions only by the body, mind, intellect and also by the senses, for the purification of the self. ।।11।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (10) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पंचम अध्याय (सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय) ( सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा )   ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ।।10।।   फलासक्ति तज,धार जो ब्रम्ह समर्पण भाव तो कर्मो से जल कमल सा रहता अलगाव।।10।।   भावार्थ :  जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता ।।10।।   He who performs actions, offering them to Brahman and abandoning attachment, is not tainted by sin as a lotus leaf by water. ।।10।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (8-9) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पंचम अध्याय (सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय) ( सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा )   नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌। पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌।।8।।   प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ॥ इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌।।9।।   स्वयं इंद्रियां कर्मरत,करता यह अनुमान चलते,सुनते,देखते ऐसा करता भान।।8।।   सोते,हँसते,बोलते,करते कुछ भी काम भिन्न मानता इंद्रियाँ भिन्न आत्मा राम।।9।।   भावार्थ :  तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं- इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा मानें कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।।8-9।।   “I do nothing at all”-thus will the harmonised knower of Truth think-seeing, hearing, touching, smelling, eating, going, sleeping, breathing, ।।8।।   Speaking, letting go, seizing, opening and closing the eyes-convinced that the senses move among the sense-objects. ।।9।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (7) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पंचम अध्याय (सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय) ( सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा )   योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ।।7।।   जो योगी रखता स्वयं इंद्रियों पर अधिकार सब कुछ करते हुये भी कोई न उस पर भार।।7।।        भावार्थ :  जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।।7।।   He who is devoted to the path of action, whose mind is quite pure, who has conquered the self, who has subdued his senses and who has realised his Self as the Self in all beings, though acting, he is not tainted. ।।7।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (6) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पंचम अध्याय (सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय)   सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ।।6।।   कर्मयोग बिन पर सदा है सन्यास असाध्य कर्म योगी मुनि को सहज ब्रम्ह सुलभ औ" साध्य।।6।।   भावार्थ :  परन्तु हे अर्जुन! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात्‌मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।।6।।   But renunciation,  O  mighty-armed  Arjuna,  is  hard  to  attain  without  Yoga;  the Yoga-harmonised sage proceeds quickly to Brahman!  ।।6।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (5) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पंचम अध्याय (सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय)   यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते । एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ।।5।।   ज्ञानी कहते साँख्य औ" कर्म हैं एक समान जिसमें जिसकी रूचि वही उसको है आसान।।5।।        भावार्थ :  ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है  ।।5।।   That place which is reached by the Sankhyas or the gyanis is reached by the (Karma) Yogis. He sees who sees knowledge and the performance of action (Karma Yoga) as one. ।।5।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (4) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पंचम अध्याय (सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय)   साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌।।4।।   अज्ञानी ही मानते इन्हें पृथक दो मार्ग दोनों देते फल वही दोनो ही संमार्ग।।4।।   भावार्थ :  उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्ख लोग पृथक्‌ पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक्‌प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है।।4।।   Children, not the wise, speak of knowledge and the Yoga of action or the performance of action as though they are distinct and different; he who is truly established in one obtains the fruits of both. ।।4।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (3) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पंचम अध्याय (सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय)   ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्‍क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ।।3।।   राग-द्वेष से रहित जो वह सन्यासी तात द्वंद रहित जीवन सदा सुख संयम की बात।।3।।   भावार्थ :  हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है।।3।।   He should be known as a perpetual Sannyasin who neither hates nor desires; for, free from the pairs of opposites, O mighty-armed Arjuna, he is easily set free from bondage! ।।3।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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