ई-अभिव्यक्ति: संवाद-15 – हेमन्त बावनकर

ई-अभिव्यक्ति:  संवाद–15    मैं ईश्वर का अत्यंत आभारी हूँ जिन्होने मुझे e-abhivyakti के माध्यम कई वरिष्ठ, समवयस्क एवं नवोदित साहित्यकार मित्रों से जोड़ दिया है। कई मित्रों से व्यक्तिगत तौर से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अधिकतर  मित्रों से फोन पर बात हुई और कई मित्रों से ईमेल पर। जीवन भी अजीब पहेली है, अजीब खेल खेलता है। वह हमें जीवन में कई मित्रों से मिलाता है। कई मित्र जिनके नाम से हम परिचित होते हैं किन्तु कभी मिल नहीं पाते। कई मित्र जीवन के किसी भी मोड पर मिल जाते हैं। कई तो अंजाने ही मिल जाते हैं जिसकी हमने कभी कल्पना ही नहीं की थी।  कई मित्र तो हमारे जीवन से इतने जुड़ जाते हैं कि हम यह जान ही नहीं पाते कि वे कब मित्र से परिवार के सदस्य बन गए। कई मित्र तो किसी गलतफहमी का शिकार होकर रूठ भी जाते हैं। कई बहकावे में भी आ जाते हैं। फिर शक का तो कोई इलाज ही नहीं होता।कुछ...
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मराठी साहित्य – मराठी कविता – *उन्हाळी सुट्टी* – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते *उन्हाळी सुट्टी* (प्रस्तुत है  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  द्वारा  रचित e-abhivyakti में प्रथम बाल गीत *उन्हाळी सुट्टी* प्रस्तुत है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी अपनी गर्मियों की छुट्टी याद आ ही जाएगी। इस बालगीत के लिए हम कविराज विजय यशवंत सातपुते जी के हृदय से आभारी हैं।)  झाली परीक्षा आता आहे अभ्यासाशी कट्टी . हवे तसे रे वागू आता सुरू  उन्हाळी सुट्टी. गावी जाऊ मामाच्या नी खेळू मजेचे खेळ आट्यापाट्या, सूरपारंब्या ,जमेल अमुची गट्टी. उशीरा  उठणे, आणि पोहणे,पाणी कापत जाणे . दंगा मस्ती, हाणामारी,  अन् क्षणाक्षणाला कट्टी . आमराईचा आंबा म्हणजे राजेशाही खाणे कच्ची कैरी भेळेमधली, पावभाजीला सुट्टी. पन्हे कैरीचे, कोकम सरबत, कधी ताक नी लस्सी कोकणचा तो रसाळ मेवा,  कोल्ड्रिंकशी कट्टी. आला उन्हाळा, घरी बसा रे , दटावती सारे बैठे खेळ ते बुद्धीबळाचे ,देऊ गेमला सुट्टी. अशी ऊन्हाळी सुट्टी आमच्या होती बालपणात सोडून गेले  शाळू सोबती, आता नाही बट्टी. . . ! © विजय यशवंत सातपुते, यशश्री पुणे.  मोबाईल  9371319798 ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – “निश्चित हो मतदान” – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  निश्चित हो मतदान (प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा  रचित  "लोकतन्त्र के पर्व - मतदान दिवस" पर रचित  प्रत्येक नागरिक को जागरूक करती कविता  'निश्चित हो मतदान'।)   जो कुछ जनहित कर सके, उसकी कर पहचान मतदाता को चाहिये, निश्चित हो मतदान ।   अगर है देश प्यारा तो, सुनो मत डालने वालों सही प्रतिनिधि को चुनने के लिये ही अपना मत डालो।   सही व्यक्ति के गुण समझ, कर पूरी पहचान मतदाताओ तुम करो, सार्थक निज मतदान।   सोच समझ कर, सही का करके इत्मिनान भले आदमी के लिये, करो सदा मतदान।   जो अपने कर्तव्य  का, रखता पूरा ध्यान मतदाता को चाहिये, करे उसे मतदान।   लोकतंत्र की व्यवस्था में, है मतदान प्रधान चुनें उसे जो योग्य हो, समझदार इंसान।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८  ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ भक्ति ☆ – सुश्री विजया देव

सुश्री विजया देव भक्ति (सुश्री विजया देव जी मराठी साहित्य की वरिष्ठ  साहित्यकार हैं। हिन्दी कविता लेखन में भी उनकी विशेष अभिरुचि है। प्रस्तुत है उनकी हिन्दी कविता 'भक्ति'।) विनम्र भाव से उसे जब-जब याद कराेगे। अपने आप देखना उसको ही पाओगे। आत्मबल काे जागृत  कर सतत काम कर पल पल चंचल मन काे दृढ़ बनाया कर कर्म से ही कर्मफल काे चखते जाओगे। ज्ञान ध्यान में  रमना सत्संग अनुभवना । विश्वरुप विश्वात्मक दृष्टि ही सदा रखना मंगलमय जीवन निर्मल बनाओगे। निराकार ओंकार मे बदल जायेगा। हास्य सुधा मुख पे तेरे बरसायेगा। भवसागर कठिन डगर पार  करायेगा। ©   विजया देव...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – द्वितीय अध्याय (26) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ द्वितीय अध्याय साँख्य योग ( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद ) (सांख्ययोग का विषय)   अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ।।26।। फिर फिर इसको जन्मता ओै मरता भी जान तुम्हीं कहो हे वीर है दुख का कोई ध्यान।।26।।        भावार्थ :   किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है ।।26।।   But, even  if  thou  thinkest  of  It  as  being  constantly  born  and  dying,  even  then,  O mighty-armed, thou shouldst not grieve! ।।26।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।) ...
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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल –Anapana Meditation: Mindfulness of Breathing – Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.) Anapana Meditation: Mindfulness of Breathing Anapana meditation is simple, pure, and pristine. “Prana” means breath. “Ana(prana)” is the breath that comes in and “apana(prana)” is the breath that goes out. Both put together and shortened for convenient usage make “anapana”. Anapanasati is concentration on breath coming in and going out. It is believed that mindfulness of breathing, cultivated and regularly practiced, is of great fruit and great benefit. Two thousand and five hundred years ago, Buddha outlined the method in Anapanasati Sutta – the discourse on mindfulness of breathing. He begins elucidating the method, “A monk, gone to the forest or to the root of a tree or to an empty place, sits down, having folded his legs crosswise, set his body erect, established mindfulness in front of him, ever mindful he breathes in, mindful he breathes out.” The focus is on breath alone. The meditator observes his breath dispassionately. There is no...
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ई-अभिव्यक्ति: संवाद-14 – हेमन्त बावनकर

ई-अभिव्यक्ति:  संवाद–14   साहित्य में नित नए प्रयोग करने के लिए हम कृतसंकल्प हैं। विगत जबलपुर प्रवास के दौरान संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ व्यंग्यकार मित्र श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी से चर्चा के दौरान पता चला कि उन्होने  साहित्य में  एक  प्रयोग करने का प्रयास किया जो कि वास्तव में सफल सिद्ध हुआ। हमें सम्पूर्ण राष्ट्र से विभिन्न वरिष्ठ लेखकों से साहित्य के विभिन्न स्वरूपों एवं विभिन्न विधाओं में 30 से अधिक उत्तर प्राप्त हुए हैं जो अपने आप में मिसाल हैं। जिन्हें हम क्रमानुसार आपसे साझा कर रहे हैं। इस संदर्भ में आप ई-अभिव्यक्ति संवाद-2 का अवलोकन करें।  हम लोग बड़े सौभाग्यशाली हैं की हमारी पीढ़ी के कई साहित्यकारों का  हरीशंकर परसाईं जी से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सरोकार रहा है। उनमें मेरे एक वरिष्ठ साहित्यकार मित्र  श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी भी हैं।  हाल ही में मुझे उनका एक संदेश मिला जो निश्चित ही मेरे मित्रों को भी मिला होगा यह संदेश मैं आपसे साझा करना चाहता हूँ ताकि आप भी उस खेल में सहभागी...
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सफरनामा- * मेरी यात्रा * – श्री राजेन्द्र कुमार भंडारी “राज” 

श्री राजेन्द्र कुमार भंडारी "राज"   * मेरी यात्रा * (श्री राजेन्द्र कुमार भण्डारी "राज" जी  का e-abhivyakti में स्वागत है। श्री राजेन्द्र कुमार जी बैंक में अधिकारी हैं एवं इनकी लेखन में विशेष रुचि है। आपकी प्रकाशित पुस्तक "दिल की बात (गजल संग्रह) का विशिष्ट स्थान है। यह यात्रा  संस्मरण  "मेरी यात्रा" में  श्री राजेन्द्र कुमार भण्डारी "राज" जी ने  गुजरात, महाराष्ट्र एवं गोवा के विशिष्ट स्थानों की  यात्रा का सजीव चित्रण किया है। )  मैंने अपनी यात्रा द्वारका दिल्ली से 15 अक्तूबर 2018 को पौने तीन बजे दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन से प्रारम्भ की जो अहमदाबाद तक थी। मैं अहमदाबाद सुबह नौ  बजकर पचपन मिनट पर पहुँचा। इसके बाद जबलपुर से सोमनाथ जाने वाली ट्रेन पकड़ी, क्योंकि सबसे पहले मुझे सोमनाथ बाबा के दर्शानाथ हेतु सोमनाथ जाना था। जबलपुर-सोमनाथ एक्स्प्रेस रूक-रुक कर चल रही थी, क्योंकि यह ट्रेन अपने समय से पहले ही दो घंटे विलंब से थी और अहमदाबाद से यह ग्यारह बजकर बाईस मिनट पर चली थी। अतः यह हर...
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मराठी साहित्य – मराठी कविता – ☆  आक्रोश  ☆ – डॉ. रवींद्र वेदपाठक

डॉ. रवींद्र वेदपाठक ☆  आक्रोश  ☆ (प्रस्तुत है डॉ रवीन्द्र वेदपाठक जी की एक आक्रोशात्मक अभिव्यक्ति इस मराठी कविता  "आक्रोश" में।)  आता नकोय मला ती अश्रुंची किनार चंडी होवुन आक्रोशाचा मीच करणार आहे संहार....!! १ !! अशोकवनातील सीता जरी संयमाने बांधली होती आक्रोशाचा बांध फुटताच सारी धरती फाटली होती.....!! २ !! मोहमयी सत्तेच्या गांधारीला आंधळेपणाने जरी बांधले होते द्रौपदीचे केस सुध्दा दुशा:सनाचे रक्त प्यायले होते.....!! ३ !! दिसत असली शांती तरी हि युध्दाची नांदी समजावी आमच्या गळणाऱ्या आक्रोशातुन ज्वालामुखीची ठिणगी भडकावी.....!! ४ !! आता मी सहन करणार नाही ते अपमानाचे विखारी घोट आता मी विझणार नाही बनुन नुसतेच राखेचे गरम लोट.......!! ५ !! आता मी फोडणार आहे ज्वालामुखी माझ्या अंतरातील ज्यातुन उसळुन येतील लाव्हा होवुन अश्रु माझ्या डोळ्यातील....!! ६ !! आता नकोय मला ती अश्रुंची किनार चंडी होवुन आक्रोशाचा मीच करणार आहे संहार....!! १ !! © डॉ. रवींद्र वेदपाठक *तळेगाव* ...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – द्वितीय अध्याय (25) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ द्वितीय अध्याय साँख्य योग ( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद ) (सांख्ययोग का विषय) अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि।।25।। अविकारी,अव्यक्त है,तथा अचिन्त्य अपार इससे इसके शोक का नहीं कोई आधार।।25।।   भावार्थ :   यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं  है अर्थात्‌तुझे शोक करना उचित नहीं है।।25।।   This (Self)  is  said  to  be  unmanifested,  unthinkable  and  unchangeable.  Therefore, knowing This to be such, thou shouldst not grieve. ।।25।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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