हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 199 ☆ व्यंग्य – घोस्ट राइटिंग और प्रचुर लेखन — ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय   व्यंग्य  – घोस्ट राइटिंग और प्रचुर लेखन

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 199 ☆  

? व्यंग्य – घोस्ट राइटिंग और प्रचुर लेखन – ?

विश्व पुस्तक मेले का हाल नंबर 2 हिंदी प्रकाशकों के स्टॉल्स से भरा हुआ है। प्रत्येक प्रकाशक के पास कविता के बाद संभवतः व्यंग्य की ही सर्वाधिक पुस्तकें हों, संकलन या व्यक्तिगत किताबें खूब छप रही हैं। आई एस बी एन सहित और बिना इसके भी। अनेक ओहदों वाले जिनके पास समय ही नहीं, वे भी रातों रात बड़े लेखक बने दिखते हैं।

मेरे पास एक प्रकाशक का प्रस्ताव आया था की मैं कोई सौ पृष्ठ व्यंग्य भेज दूं और राशि ले लूं, घोस्ट राइटर के रूप में। अर्थात व्यंग्यकार के रूप में खुद को स्थापित करने की चाहत रखने वाले हैं, जो बडी राशि देकर घोस्ट राईटिंग खरीद रहे हैं।  ठीक हो सकता है कि ऐसा लेखन जो महज रुपयों या नाम हेतु हो साहित्य  की शास्त्रीयता को नुकसान पहुंचा सकता है।

अन्यथा किसी भी विधा की लोकप्रियता उसे बढ़ाती ही है नुकसान नहीं पहुंचाती।

क्रिकेट का उदाहरण सर्वाधिक सरल है उसकी बढ़ती लोकप्रियता ने नए फार्मेट लाए, खिलाड़ियों को शोहरत और रुपए दिलवाए, किंतु क्रिकेट तो क्रिकेट ही है उसे नुकसान नहीं पहुंचा। टेस्ट मैच की शास्त्रीयता अपनी जगह है ही। इसी तरह साहित्य यदि मौलिक है तो जितना अधिक लिखा जाए, बेहतर ही  होगा।

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ होली पर्व विशेष – विधान सभा का होली सत्र ☆ श्री नवेन्दु उन्मेष ☆

श्री नवेन्दु उन्मेष

☆ व्यंग्य ☆ होली पर्व विशेष – विधान सभा का होली सत्र ☆ श्री नवेन्दु उन्मेष

विधानसभा का होली सत्र राज्यपाल के अभिभाषण के बाद शुरू हो चुका था। सदन के अंदर माननीय सदस्य हंगामा कर रहे थे कि राज्यपाल के अभिभाषण में राज्य के विकास की बातें तो हैं लेकिन हम सदस्यों को होली का कुछ भी उपहार नहीं मिला है। सरकार की ओर से जवाब आया कि माननीय सदस्य शांत रहें और सदन का होली सत्र चलने दें। पहले सरकार राज्य के लोगों का होली पर विकास करना चाहती है। इसके बाद ही माननीय सदस्यों को होली का उपहार दिया जायेगा।

इसी बीच वित मंत्री ने स्पीकर के आदेश पर होली का बजट पढ़ना शुरू किया। उन्होंने कहा कि होली पर राज्य के युवाओं को एक दिन के लिए नौकरी दी जायेगी और दूसरे दिन वे रिटायर करा दिये जायेंगे। इस पर टोकते हुए एक सदस्य ने कहा यह तो युवाओं को ठगने का काम किया जा रहा है। वित मंत्री ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा कि इससे युवाओं को नौकरी करने का अवसर प्राप्त होगा। उन्हें भी महसूस होगा कि वे बेरोजगार नहीं हैं। भले ही नौकरी एक दिन के लिए ही क्यों न हो।

दूसरे सदस्य ने पप्रश्न किया कि एक दिन में आखिर युवा सरकारी नौकरी पाकर कौन सा तीर मार लेंगे। वित मंत्री ने जबाव दिया वे एक दिन में भांग घोटेंगे। होली पर राज्य के लोगों को भांग पिलाया जायेगा ताकि वे आंदोलन की राह छोड़कर विकास की राह पर चल सकें।

वित मंत्री ने होली का अपना बजट पढ़ना जारी रखा और कहा होली पर सड़कों के किनारे भांग का शिविर लगाया जायेगा। राज्य के सभी नागरिकों को एक-एक गिलास भांग मुफ्त दिया जायेगा। दूसरा गिलास मांगने पर उसकी कीमत एक रूपये वसूली जायेगी। इससे सरकार को जो आय प्राप्त होगी उसे राज्य के बेरोजगार युवाओं के बीच बांटा जायेगा।

वित मंत्री ने आगे बताया होली के बाद सड़कों की सफाई के लिए भी सरकार के पास योजनाएं हैं। तभी कुछ लोग पानी-पानी चिल्लाने लगे। एक सदस्य ने कहा कि होली पर राज्य में पानी की कमी हो जाती है। कई इलाके के लोग होली खेलने के बाद पानी की कमी के कारण स्नान नहीं कर पाते हैं। वित मंत्री ने उन्हें बताया कि ऐसे लोगों के लिए आसपास की नदियों से पानी की आपूर्ति की जायेगी। इस बीच एक सदस्य ने कहा राज्य की नदियों में पानी नहीं है। नदियां नाले में तब्दील हो चुकी हैं।

तब पर्यावरण मंत्री का जबाव आया नदियों की सफाई की व्यवस्था की जा रही है। होली खेलने के बाद जो लोग स्नान नहीं कर पायेंगे उन्हें सरकारी वाहन से नदियों के तट पर पहुंचाया जायेगा और साबून इत्यादि देकर स्नान कराया जायेगा। नदी में कोई गिर न जाये इसके लिए एनडीआरएफ की टीम की तैनाती की जायेगी। ताकि गिरे हुए व्यक्ति को तत्काल नदी से निकाला जा सके।

गृह मंत्री भी पूरे होली के मूड में थे। उन्होंने बताया कि होली के लिए प्रत्येक थाने में भांग की व्यवस्था की जायेगी। भांग पीने के बाद अगर कोई व्यक्ति सड़कों पर हंगामा करता हुए पाया गया तो उसे थाने के लॉकर में बंद कर भांग के डंडे से पीटा जायेगा। इसके लिए सरकार ने भांग के डंडों की व्यवस्था थाने में की है। गृह मंत्री ने आगे बताया कि इस बार राज्य के अधिकारी होली नहीं खेलेंगे। अगर कोई अधिकारी होली खेलते हुए पकड़ा गया तो उसे होली अदालत में प्रस्तुत किया जायेगा। उसके साथ होली की धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जायेगा और अगर वह दोषी पाया जाता है तो उसे आगामी साल की होली के दिन जमकर भांग पिलाया जायेगा। इसका समर्थन सत्ता पक्ष के सदस्यों ने मेज थपथपाकर की।

अब बारी थी स्वास्थ्य मंत्री की। उन्होंने होली के अवसर पर लोगों के स्वास्थ्य पर पूरा ध्यान देने की बातें कहीं। उन्होंने बताया कि इस बार सरकारी अस्पतालों में होली आउटडोर का विषेष प्रबंध किया जायेगा। वहां होली के चिकित्सक होली का आला लटकाकर बैठेंगे और सभी मरीजों को होली की दवाइयां देंगे। अगर कोई मरीज होली के दिन बीमार पड़ जाता है तो उसकी पूरी देखभाल की जायेगी। इसके लिए होली एंबुलेस की व्यवस्था की जायेगी। होली सीटीस्कैन से लेकर होली एक्सरे किया जायेगा। गर्भवती महिलाओं को अगर होली के लिए बच्चा होता है तो उन्हें होली का विशेष सर्टिफिकेट दिया जायेगा। ऐसी महिलाओं को होलीश्री या होली माता की उपाधि से नवाजा जायेगा। उनके साथ चिकित्सक फोटो खींचायेंगे जिसे राज्य की पत्रिका में छापा जायेगा।

विधान सभा का होली सत्र चल ही रहा था कि तभी वहां पागलखाने से कुछ वार्डर पहुंच गये और मंत्री से लेकर विधायक बने लोगों को पहचान लिया और दो-दो डंडे लगाते हुए कहा-साले हम सुबह से तुम लोगों को खोजने में परेशान है और तुमलोग यहां विधानसभा का होली सत्र चला रहे हो। एक पत्रकार को पकड़ने हुए कहा पागलखाने में तो तुम सिर्फ न्यूज की बातें किया करते थे। यहां विधानसभा का न्यूज लिख रहे हो। लगता है कि इस न्यूज को अपने बाप के अखबार में छापोगे।

तभी स्पीकर बने पागल ने घोषणा कर दी कि विधानसभा की कार्यवाही आगामी सत्र के लिए स्थगित कर दी जाती हैं। उसे भी दो डंडे लगाकर पागलखाने के वार्डर अपने साथ लेते चले गये। इस प्रकार विधानसभा का होली सत्र माननीय सदस्यों को वार्डरों का डंडा लगने के बाद खत्म हो गया। वार्डरों ने फर्जी विधानसभा के परिसर में माननीय सदस्यों को दौड़-दौड़कर पकड़ा और वापस पागलखाने लेकर चले गये।

© श्री नवेन्दु उन्मेष

संपर्क – शारदा सदन,  इन्द्रपुरी मार्ग-एक, रातू रोड, रांची-834005 (झारखंड) मो  -9334966328

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # 177 ☆ “पुस्तक मेला और बड़े साहब का दौरा…” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपका एक  व्यंग्य – पुस्तक मेले में चिलमची लेखक…”।)

☆ व्यंग्य  # 177 ☆ “पुस्तक मेला और बड़े साहब का दौरा…” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हेड आफिस के बड़े साहेब के दौरे की खबर से आफिस में हड़बड़ी मच गई। बड़ी मंहगी सरकारी कार से बड़े साहब उतरे तो आफिस के बाॅस ने पूंछ हिलाते हुए गुलदस्ता पकड़ा दिया। आते ही बडे़ साहब ने आफिस के बाॅस पर फायरिंग चालू की तो बाॅस ने रोते हुए गंगा प्रसाद उर्फ गंगू को निशाना बना दिया। सर…. सर  हमारे आफिस में गंगू नाम का स्टाफ है, काम धाम कुछ करता नहीं, अपने को कभी साहित्यकार तो कभी व्यंग्यकार कहता है। दिन भर आफिस में फेसबुक, वाटस्अप के चक्कर में और बाकी समय ऊटपटांग लिख लिखकर आफिस की स्टेशनरी बर्बाद करता है। आपके दौरे की भी परवाह नहीं कर रहा था, दो दिनों पहले दिल्ली भग रहा था बिना हेडक्वार्टर लीव लिए। दादागिरी दिखाते हुए कह रहा था कि दिल्ली के प्रगति मैदान में उसकी व्यंग्य की पुस्तक का विमोचन और व्यंग्य का कोई बड़ा पुरस्कार – सम्मान मिलेगा साथ में 21 हजार या 51 हजार रुपये भी मिलने की बात कर रहा था। 

सर… र… बिल्कुल भी नहीं सुनता बहुत तंग किए है और दूसरे काम करने वालों को भी भड़काता है लाल झंडा दिखाने की धमकी देता है…. हम बहुत परेशान हैं। सर.. र… आफिस का माहौल उसके कारण बहुत खराब है। हमारा भी काम में मन नहीं लगता, इसलिए आपके पास इतनी शिकायतें और गड़बड़ियों की लिस्ट पहुंच रही है। बाहरी आदमी तक कह रहा है कि आपके आफिस का गंगाधर (गंगू) अखबार और पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया में आफिस के कामकाज का मजाक उड़ा रहा है, व्यंग्य लिखता है। सरकार की नीतियों के खिलाफ व्यंग्य लिखकर खूब ऊपरी पैसे कमाता है और आफिस में धेले भर काम नहीं करता। 

सर….. र… आप विश्वास नहीं करोगे पिछले दिनों मेरे और मेरी स्टेनो के ऊपर ऐसा व्यंग्य लिखा कि मैं मुंह दिखाने लायक नहीं रह गया….. झांक झांक कर सब देख लेता है तिरछी नजर से सब बातें पकड़ लेता है, कुछ करने भी नहीं देता है.. स.. र.. र  आप बताइए हम क्या करें ? 

… अच्छा ऐसा है, तो तुम तंग आ गये हो…. तुमको इस आफिस का बाॅस बनाकर इसलिए बैठाया गया है कि एक सड़े से कर्मचारी पर तुम्हारा कन्ट्रोल नहीं है। स्टेनो के साथ बिजी रहते होगे, तभी आफिस का माहौल अनकन्ट्रोल हो गया है। 

… नहीं स.. र.. र  इसने ही अपने व्यंग्य लेख से इतने किस्से बना लिए हैं वास्तविकता कुछ नहीं है सर जी   प्लीज। 

… अच्छा ये बताओ कि बदमाश तुम हो कि तुम्हारी स्टेनो? किस्से तो काफी फैल गये हैं और तुम्हारी काम नहीं करने की भी बड़ी शिकायतें हेड आफिस पहुंच रहीं हैं। 

… नहीं सर, ये गंगा प्रसाद ‘गंगू’ के कारण ही ये सब हो रहा है। 

… तो बुलाओ उस हरामजादे गंगाधर को… अभी देखता हूं साले को, बहुत बड़ा साहित्यकार कम व्यंग्यकार बन रहा है… ।

बाॅस ने घंटी बजायी  चपरासी से कहा कि गंगू को बताओ कि बड़े साहब मिलना चाहते हैं। जब चपरासी ने गंगा प्रसाद को खबर दी तो गंगू फूला नहीं समाया… उसे लगा चलो दिल्ली नहीं जा पाए तो दिल्ली के हेड आफिस से सबसे बड़े साहब हमारा सम्मान करने पहुंच गए, जरूर किसी बड़े लेखक ने बड़े साहब को ऊपर से दम दिलाई होगी तभी ये आज भागे-भागे आये हैं चलो चलते हैं देखते हैं कि… 

… मे आई कम इन सर.. कहते हुए गंगा प्रसाद केबिन में घुसे तो बड़े साहब ने व्यंग्य भरी नजरों से ऊपर से नीचे तक देखा। 

… आइये आइये… वेलकम… तो आप हैं 1008 व्यंग्य श्री आचार्य गंगा प्रसाद गंगू…

… जी… स… र.. र आपके आने की खबर के कारण हमने अपना दिल्ली जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया सर… वहां विश्व पुस्तक मेले में हमारा सम्मान और हमारी पुस्तक का विमोचन…. 

… अच्छा !  सुना है आप सरकार के खिलाफ और आफिस की कमियों पर व्यंग्य लिखकर पैसे कमाते हैं, बड़े भारी व्यंग्यकार बनते हैं। आफिस के कामकाज और विसंगतियों और बाॅस पर व्यंग्य से प्रहार करते हो। आफिस का काम करने कहो तो लाल झंडा दिखाने की धमकी देते हो….. व्यंग्य के विषय में जानते हो कि व्यंग्य क्या होता है ? नौकरी करना है कि व्यंग्य लिखना है आपको मालूम नहीं कि असली व्यंग्यकार सबसे पहले अपने आप पर व्यंग्य लिखता है, अपने अंदर की गंदगी विसंगतियों की पड़ताल कर आत्मसुधार करता है। आफिस और सरकार के खिलाफ लिख कर नाम कमाने से आत्ममुग्धता आती है। आफिस के बाॅस और स्टेनो के संबंधों पर लिख कर उनका काम बिगाड़ दिया तुमने दाल भात में मूसरचंद बन गए।  तुम भी तो लंबे समय से आफिस में लफड़ेबाजी कर रहे हो कभी तिल का ताड़ कभी राई का पहाड़ बनाते रहते हो और सीधी सी बात है कि तुमने व्यंग्य लिखने के लिए  विभागीय अनुमति नहीं ली है  अभी दस तरह के मामलों में फंस जाओगे नौकरी चली जाएगी, बाल-बच्चे बीबी भूखी मरने लगेंगी। तुम्हें नहीं मालूम कि समाज में तुम्हारी इज्जत इस विभाग के कारण है, नहीं तो आजकल कोई पूछता नहीं है समझे। जितना पैसा व्यंग्य लिख कर कमा रहे हो उसका हिसाब आफिस में दिया क्या? जितना पैसा कमाया वो विभाग में जमा किया क्या? तो आयकर विभाग को चकमा देने का मामला भी बनता है। गंगू लाल अपने बाल बच्चों के पेट में लात मत मारो भाई। तुम्हें नहीं मालूम कि व्यंग्यकार के पास पैनी वैज्ञानिक दृष्टि होती है वह ईमानदार होता है तुम तो सौ प्रतिशत बेईमान लग रहे रहे हो। इसका मतलब है कि तुम्हारे लिखे कड़े शब्द नपुंसक होते हैं तभी न आफिस का माहौल नपुंसक हो गया। अरे भाई व्यंग्यकार तो लोक शिक्षण करता है। तुम लोग झांकने का काम करते हो किसी का बना बनाया काम बिगाड़ते हो। तुम लोग चुपके चुपके दरबार लगाते हो एक दूसरे की टांगे खींचते हो शरीफ और बुद्धिजीवी होने का नाटक करते हो। साहित्यकारों से समाज यह अपेक्षा करता है कि वे अपने आचरण और लेखन में शालीनता बरतें और बेहतर समाज बनाने में अपना योगदान दें… पर तुम तो अपने पेट से दगाबाजी करते हो आफिस का काम भी नहीं करते और चले व्यंग्यकार बनने… तुम साले कुछ नकली व्यंग्यकार पूर्वाग्रही, संकुचित सोच, अहंकारी गुस्सैल और स्वयं को सर्वज्ञानी मानते हो। हर पल चालाकियों की जुगत भिड़ाते हो…।।

गंगू के काटो तो खून नहीं… सारा लिखना पढ़ना, सम्मान पुरस्कार, पुस्तक मेला मिट्टी में मिल गया। बड़े साहब ने जम के दम देकर बेइज्जती की और नौकरी से निकाल देने की धमकी दी कि सीने के अंदर खलबली मच गई, बाल बच्चे और घरवाली की चिंता बढ़ गई हार्ट कुलबुला के के बाहर आने को है… बार बार शौचालय जाना पड़ रहा है शौचालय के कमोड में बैठे बैठे जैसे ही गंगू ने फेसबुक खोली त्रिवेदी की वाल में पुस्तक मेले का लाइव कार्यक्रम चल रहा है बार – बार गंगा प्रसाद “गंगू” को पुस्तक विमोचन के लिए और 51 हजार रुपये के सम्मान के लिए पुकारा जा रहा है.. एक से एक सजी बजी सुंदर लेखिकाएं ताली बजा रहीं हैं। पुस्तक मेले में भीड़ ही भीड़ उमड़ पड़ी है। बड़े बड़े व्यंग्यकारों पर त्रिवेदी का कैमरा घूम रहा है, विमोचन होने वाली पुस्तकों का कोई नाम नहीं ले रहा धकाधक विमोचन चल रहे हैं। एक व्यंग्य के मठाधीश बाजू वाले डुकर से कह रहे हैं कि इस महाकुंभ में मुफ्त में आंखें सेंकने मिलती हैं, किताबों में यही तो जादू है वे बुलातीं भी हैं और अज्ञान को भी नष्ट करतीं हैं।…

इधर जब गंगू ने शौचालय के कमोड का नल खोला तो पानी दगा दे गया और तुरंत मोबाइल की बैटरी रोने लगी। 

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 138 ☆ सेवा भाव के बहाने… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “सेवा भाव के बहाने…। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 138 ☆

☆ सेवा भाव के बहाने ☆

सेवक राम जी चारों ओर अपने कार्यों का ढिंढोरा  पीट रहे थे। हर रविवार अखबारो में फ्रंट पेज पर उनकी उपस्थिति लगभग तय रहती है। समाज सेवा का उनका बरसों पुराना अनुभव रहा है। ये बात अलग है कि लोगों ने उनको देर से पहचाना।

अपनी तारीफ करने के चक्कर में अनजाने ही वो कुछ ऐसा भी बोल देते हैं कि अपने बिछाए जाल में खुद फंसने लगते। किन्तु उनके सूत्र उन्हें पहले ही आगाह कर देते हैं सो वे बच जाते और बिचौलिए पकड़ जाते। उनकी एक खूबी और है कि वो भावनाओं को पहचान कर रिश्ते बनाने में माहिर हैं, सबसे रिश्ते जोड़ते हुए काम पड़ने पर उनका  इस्तेमाल करना और फिर दूध  में पड़ी मख्खी की तरह फेक देना। एक – एक करके विश्वसनीय व्यक्तियों को दूर करने के बाद स्वघोषित महाराज बनने का सुकून उनके चेहरे पर साफ देखा जा सकता है। ये बात अलग है कि दूसरों को धोखा देने के लिए चेहरा उतारने की नाकाम कोशिश लगातार की जा रही है। उनके बारे में लोगों ने जो भी भविष्यवाणी की है वो सब सामने आती जा रहीं हैं किंतु वे तो सेवक हैं सो अपने नाम के अनुरूप सेवा देना आखिरी दम तक जारी रखेंगे। अन्ततः यही मुक्तक याद आ रहा है-

स्नेहिल डोर से बँधे रिश्ते, बदलते नहीं हैं।

बिना मौसम बाग में भी, फूल खिलते  नहीं है।।

अपना नसीब  स्वयं लिख सको, ऐसे कर्म करो।

बिना परिश्रम किये कोई, फल मिलते नहीं हैं।।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 198 ☆ व्यंग्य – किताबों के मेले — ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय  व्यंग्य  – किताबों के मेले) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 198 ☆  

? व्यंग्य – किताबों के मेले – ?

कलमकार जी अपने गांव से दिल्ली आये हुये थे किताबो के मेले में. दिल्ली का प्रगति मैदान मेलो के लिये नियत स्थल है, तारीखें तय होती हैं एक मेला खत्म होता है, दूसरे की तैयारी शुरू हो जाती है. सरकार में इतने सारे मंत्रालय हैं, देश इतनी तरक्की कर रहा है,  प्रदर्शन के लिये, मेले की जरूरत होती ही है. साल भर मेले चलते रहते हैं.

मेले क्या चलते रहते हैं,लोग आते जाते रहते हैं तो चाय वाले की, पकौड़े वाले की, फुग्गे वाले की आजीविका चलती रहती है. इन दिनो किताबो का मेला चल रहा है. चूंकि मेला किताबों का है, शायद इसलिये किताबें ज्यादा हैं आदमी कम. जो आदमी हैं भी वे लेखक या प्रकाशक, प्रबंधक ज्यादा हैं, पाठक कम.

लगता है कि पाठको को जुटाने के लिये पाठको का मेला लगाना पड़ेगा.

 मेले में तरह तरह की किताबें हैं. झोला लटकाए बाल बढ़ाए, कुर्ता पहने कलमकार हैं।

कलमकार जी को सबसे पहले मिलीं रायल्टी देने वाली किताबें, ये ऐसी किताबें हैं, जिनके लिखे जाने से पहले ही उनकी खरीद तय होती है. इनके लेखक बड़े नाम वाले लोग होते हैं, कुछ के नाम उनके पद के चलते बड़े बन जाते हैं, कुछ विवादों और सुर्खियो में रहने के चलते अपना नाम बड़ा कर डालते हैं.

 ये लोग आत्मकथा टाइप की पुस्तकें लिखते हैं. जिनमें वे अपने बड़े पद के बड़े राज खोलते हैं, खोलते क्या किताबों के पन्नो में हमेशा के रिफरेंस के लिये बंद कर डालते हैं.

 इन किताबों का मूल्य कुछ भी हो, किताब बिकती है, लेखक के नाम के कांधे पर बिकती है. सरकारी खरीद में बिकती है. लेखक को रायल्टी देती है ऐसी किताब. प्रकाशक भी इस तरह की किताबें सजिल्द छापते हैं, भव्य विमोचन करवाते हैं, नामी पत्रिकायें इन किताबों की समीक्षा छापती हैं.

दूसरे तरह की किताबें होती हैं बच्चो की किताबें, अंग्रेजी की राइम्स से लेकर विज्ञान के प्रयोगो और इतिहास व एटलस की, कहानियों की, सुस्थापित साहित्य की,  ये किताबें प्रकाशक के लिये बड़ी लाभदायक होती हैं. इन रंगीन, सचित्र किताबों को खरीदते समय पिता अपने बच्चो में संस्कार, ज्ञान, प्रतियोगिताओ में उत्तीर्ण होने के सपने देखता है. बच्चे बड़ी उत्सुकता से ये किताबें खरीदते हैं, पर कम ही बच्चे इन्हें पूरा पढ़ पाते हैं, और उनमें से भी बहुत कम इनमें लिखा समझ पाते हैं. जो जीवन में इन किताबो को उतार लेता है, ये किताबें उन्हें सचमुच महान बना देती हैं. कुछ बच्चे इन किताबों के स्टाल्स के पास लगी रंगीन नोटबुक, डायरी, स्टेशनरी, गिफ्ट आइटम्स की चकाचौंध में ही खो जाते हैं, वे इन किताबों तक पहुंच ही नही पाते,ऐसे बच्चे बड़े होकर व्यापारी तो बन ही जाते हैं.

कलमकार जी ज्यों ही धार्मिक किताबो के स्टाल के पास से निकले तो ये किताबें पूछ बैठी हैं  उनके आस पास सीनियर सिटिजन्स ही क्यों नजर आते हैं ?  वह तो भला हो  रेसिपी बुक्स  ट्रेवलाग, काफी टेबल बुक्स, गार्डनिंग,गृह सज्जा  और सौंदर्य शास्त्र के साथ घरेलू नुस्खों की किताबों के स्टाल का जहां कुछ  नव यौवनायें भी दिख गईं कलमकार जी को.

एक बड़ा सेक्शन  देश भर से पधारे,अपने खर्चें पर किताबें छपवाने वाले झोला धारी कलमकार जी जैसे कवियों और लेखको  के प्रकाशको का था, ये प्रकाशक लेखक को अगले एडीशन से रायल्टी देने वाले होते हैं. करेंट एडीशन के लिये इन प्रकाशको को सारा व्यय रचनाकार को ही देना होता है, जिसके एवज में वे लेखक की डायरी को किताब में तब्दील करके स्टाल पर लगा देते हैं. किताब का  बढ़िया सा विमोचन समारोह संपन्न होता है, विमोचन के बाद भी जैसे ही घूमता हुआ कोई बड़ा लेखक स्टाल पर आता है, किताब का पुनः लोकार्पण करवा कर हर हाथ में मोबाईल होने का सच्चा लाभ लेते हुये लेखक के फेसबुक पेज के लिये फोटो ले ली जाती है. ऐसा रचनाकार आत्ममुग्ध किताबों के मेले का आनन्द लेता हुआ, कोने के टी स्टाल पर इष्ट मित्रो सहित चाय पकौड़ो के मजे लेता मिलता है.

मेले के बाहर मेट्रो स्टेशन तक फुटपाथ पर भी विदेशी अंग्रेजी उपन्यासों का मेला लगा होता है, पुस्तक मेले की तेज रोशनी से बाहर बैटरी की लाइट में बेस्ट सेलर बुक्स सस्ती कीमत पर यहां मिल जाती हैं. दुनियां में हर वस्तु का मूल्य मांग और सप्लाई के इकानामिक्स पर निर्भर होता है, किन्तु किताबें ही वह बौद्धिक संपदा है, जिनका मूल्य इस सिद्धांत का अपवाद है, किसी भी किताब का मूल्य कुछ भी हो सकता है. इसलिये अपने लेखक होने पर गर्व करते और कुछ नया लिख डालने का संकल्प लिये कलमकार जी लौट पड़े किताबों के मेले से.

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # 176 ☆ “पुस्तक मेले में चिलमची लेखक…” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपका एक  व्यंग्य – पुस्तक मेले में चिलमची लेखक…”)

व्यंग्य  # 176 ☆ चिन्तन – “पुस्तक मेले में चिलमची लेखक…” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

भैया जी चिलम प्रेमी हैं, ‘संगत गुनन अनेक फल….’ सो गंगू चिलम भरना एवं चिलम खींचना भैया जी से सीख रहा है। भैया जी चिलम खींचकर अंट-संट बकने लगते हैं और पेन कागज हाथ लग जाए तो कालजयी रचनाएं भी लिख देते हैं। सुट्टा खींचने के बाद गंगू भी साहित्यकार बनने की जुगत में रहता, पड़ोसियों के किस्से कहानी बता बताकर हंसता हंसाता।

भैया जी की घर में नहीं बनती और गंगू की भी घरवाली से नहीं पटती। दोनों साथ-साथ सुट्टा खींचते और हमेशा घर से भागने केे चक्कर में रहते। भैया जी हर बार पुस्तक मेला जाते हैं पर इस बार जाने का जुगाड़ नहीं बन रहा इसलिए दुखी हैं चिलम खींचकर भावुक होकर गाने लगे…….

“चलो चलिए

यमुना जी के पार

जहां पे मेला लगो”

गंगू सुनके नाचने लगा। गंगू को क्या मालुम कि यमुना किनारे बसी दिल्ली में मेला भी लगता है… हामी भर दी, कहन लगे चलो… अभी ही चलो… नहीं तो कल चलो। झूला भी झूल लेंगे और बरेली के बाजार वाली का नाच भी देख लेंगे। बरेली के बाजार वाली का झुमका गिरा तो ढूंढ के ला भी देंगे। भैया जी नशे में और गंगू भी नशे में… हर बात पर हामी भरते।

भैया जी बड़े नामी-गिरामी लेखक हैं। बड़ी बड़ी पत्रिकाओं में फोटो सहित छपते रहे हैं, घर में इज्ज़त नहीं है क्योंकि घर का कोई काम – धाम नहीं करते। बात बात में पत्नी से झगड़ते जरूर हैं। सुबह सुबह चाय नहीं मिलने पर पत्नी से उलझ गए। जब हार गए तो चड्डी बनियान और कुर्ता पेजामा थैले में धर के घर से निकल गये और गंगू के साथ दिल्ली जाने वाली रेलगाड़ी में बैठ गए।

दिल्ली पहुंचे तो पेट कुलबुला के कूं – कूं करने लगा… गर्मागर्म छोले भटूरे देखे तो लार टपक गई।  तुंरत दोनों ने पेट भर छोले भटूरे पेल कर खाये। नहा – धोकर मेट्रो में बैठ गए। मेट्रो से उतरकर मेले की गेट के तरफ बढ़ने लगे तो रास्ते में मस्त सुंदर गोरी महिला ने रोक लिया और दोनों की शर्ट में तिरंगा झंडा चिपका दिया बोली – इससे आपके अंदर देशभक्ति पैदा होगी। आगे बढ़ने लगे तो रंगदारी से रास्ता रोककर वसूली पर उतर आईं कहने लगी – पैसा नहीं दोगे तो अभी मीटू में फंसा दूंगी नहीं तो झंडा चोरी के इल्जाम में अंदर करा दूंगी। बेचारे भैया जी और गंगू डर के मारे कांपने लगे। थोड़ा दे-ले के आगे बढ़े तो टिकिट की लाइन में फटे जीन्स वाली लड़की ने ठग लिया कहने लगी – अंकल आप लाइन में काहे को लगते हो पैसे दे दो और उधर चैन से बैठो हम टिकिट लाकर वहीं दे देंगे। पैसा भी ले गई और लौटी भी नहीं…

क्या करते फिर लाइन में लगे, टिकिट ली, जब तक गंगू बोर हो चुका था बार बार चिलम चढ़ाने की मांग करता रहा फिर झुंझलाते हुए बोला – भैया जी आप हमें झटका मार के मेला घुमाने के चक्कर में घसीट लाए, इधर झूला – ऊला कुछ दिख नहीं रहा है।

धक्का – मुक्की के साथ आगे बढ़े तो गंगू को जोर से पेशाब लग गई। प्रोस्टेट ग्रन्थि का पुराना मरीज था। गंगू पेजामे की जेब में हाथ डालकर कूंदा – फांदी करने लगा। एक प्रकाशक से पूछा – पेशाब कहां करें तो झट उसने इशारे से सामने तरफ ऊंगली दिखा दी। वहां व्ही आई पी लिखा था घुसने लगे तो गार्ड ने रोक लिया कहने लगा – यहाँ सिर्फ व्ही आई पी ही पेशाब कर सकते हैं। भैया जी को डर लग रहा था कि कहीं गंगू पैजामा न गीला कर दे। गंगू बोला – जे व्ही आई पी क्या होता है, व्ही आई पी क्या अलग तरह से व्ही आई पी पेशाब करता है और क्या उसकी पेशाब से सोना बनाया जाता है। गार्ड को धक्का मारकर गंगू अंदर घुस गया। गार्ड ने पुलिस बुला ली। पुलिस गंगू को पकड़ कर ले गई, भैया जी देखते रह गए।

उसी समय एक लेखक भैया जी का हाथ पकड़ कर घसीटने लगा कहने लगा – आप जरूर बड़े लेखक होंगे फलां पत्रिका में आपकी रचना छपी थी, इसलिए हमारी पुस्तक का फिरी में विमोचन करिये। पुस्तक का विमोचन नहीं करोगे तो हाथ पैर तुड़वा दिये जाएंगे, लठैत भी साथ आये हैं, और सरेआम बेइज्जत कर देंगे।  सबके सामने बोल देंगे कि विमोचन करने के नाम पर दो हजार पहले से ले लिए और अब विमोचन में आनाकानी कर रहे हैं।

परेशानी बता के नहीं आती और जब आती है तो एक साथ बारात लेकर आती है। भीड़ की धक्का मुक्की, चारों तरफ चल रहे विमोचन की बाढ़ तथा लगातार मिल रही धमकियों से गला सूख रहा था, प्यास बढ़ गई थी, पानी का कहीं जुगाड़ नहीं दिख रहा था और गंगू की चिंता खाये जा रही थी।

अचानक मोबाइल बजा… उधर से पत्नी चिल्ला रही थी ‘किचिन से हमारा पैसा चुरा कर कहां घूम रहे हो ?

भैया जी बोले – दिल्ली के मेले में विमोचन महोत्सव में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया है तो आ गये। दिल्ली का नाम सुनकर लाड़ भरी आवाज में पत्नी बोली – मेरे लिए दिल्ली से क्या ला रहे हो?

भैया जी बोले – पुस्तक मेले में सिर्फ पुस्तकें मिलतीं हैं और पुस्तकों से तुम्हें चिढ़ है। इसलिए कनाटप्लेस से शुद्ध चमड़े का जूता ला रहा हूँ, पहनने के काम आयेगा और वक्त जरूरत में ओवरटाइम भी कर सकता है। तुम्हारा मुंह भी तो खूब चलता है।

पत्नी बौखला गई बोली – तुम नहीं सुधरोगे, फोन पर भी बदतमीजी करते हो, अपने आप को बड़ा लेखक कहते हो, नारी सशक्तीकरण पर लेख लिखते हो। हां, तो सुनो आज रद्दी पेपर वाला आया था कह रहा था कि कई दिनों से कहीं से रद्दी नहीं मिली। घर में खाने को एक दाना नहीं है ,दो दिन से भूखा हूँ तो मुझे उस पर दया आ गई, इसलिए तुम्हारी सभी अलमारियों की साहित्य की पूरी किताबें सस्ते में रद्दी वाले को तौलकर बेच दीं हैं और उन पैसों से ठंड में कुकरते टाॅमी के लिए कपड़े ले लिए हैं।

भैया जी का मोबाइल नीचे गिर गया, काटो तो खून नहीं… फफक फफक कर रोने लगे और चक्कर खाकर गिर गए। लोग इकठ्ठे हो गए, किसी ने पानी का छींटा मारा, किसी ने जूते सुघांये… होश नहीं आया तो कई लोगों ने शराबी समझकर लातें मारी। पुलिस आयी और स्ट्रेचर में उठा कर ले गई।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #181 ☆ व्यंग्य – भए प्रगट कृपाला ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अत्यंत विचारणीय व्यंग्य ‘भए प्रगट कृपाला’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 181 ☆

☆ व्यंग्य ☆ भए प्रगट कृपाला

अब वे ज्ञानी मुँह छिपाते फिर रहे हैं जो कहते थे कि कलयुग में चमत्कार नहीं होते। अब उनके मुँह पर थप्पड़ पड़ रहे हैं। धाम में दिन भर चमत्कार हो रहे हैं। हर दुख की दवा मिल रही है। बाबा उनके दरबार में हाज़िर होने वाले हर व्यक्ति के मुँह खोलने से पहले उसका भूत, वर्तमान, भविष्य लिख देते हैं और हर मर्ज़ को दूर करने का वसीला भी बता देते हैं। बाबा से आदमी का कोई राज़ और कोई रोग पोशीदा नहीं रहता। यहाँ हर समस्या का निदान है, चाहे वह गृह-कलह हो, या नौकरी-रोज़गार की फिक्र, या कोई कठिन रोग। बाबा के आशीर्वाद से आई.ए.एस. या विधायक बनना भी असंभव नहीं।

बाबा के दरबार में प्रेत-पीड़ित व्यक्तियों का भी इलाज होता है। उनके हाथ हिलाते ही प्रेत- बाधा से ग्रस्त आदमी ज़मीन पर लोटने लगता है, अपने मुँह और सिर पर थप्पड़ मारने लगता है, जो वस्तुतः उस पर काबिज़ भूत की पिटाई होती है। दरबार में कई स्त्री और पुरुष पागलों की तरह चीख़ते-चिल्लाते और बाल नोचते दिखायी पड़ते हैं। लेकिन बाबा का दावा है कि वे अंधविश्वास नहीं फैलाते। अब वक्त आ गया है कि देश के वैज्ञानिक भूत-प्रेतों के अस्तित्व को स्वीकार कर लें, अन्यथा हो सकता है कोई भूत नाराज़ होकर उनके पीछे पड़ जाए। तब उनके सामने धाम जाने के सिवा कोई रास्ता नहीं होगा। अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति यदि चुनौती देती है तो धमकियाँ मिलने लगती हैं। स्थितियों को देखते हुए चुप रहना ही समझदारी की बात है। धाम की किस्मत चमक गयी है। दूकानदारों की चाँदी हो गयी है। वी.आई.पी. दरबार में पहुँचने लगे हैं, इसलिए चमचमाती सड़क बन गयी है। बाकी सुविधाएँ भी विकसित हो रही हैं।

बड़े-बड़े मंत्री स्वामी जी के दरबार में पहुँचकर उनकी स्तुति कर रहे हैं। नेताओं के धर्मगुरु के दरबार में पहुंचने से गुरू जी को प्रामाणिकता मिलती है। फिर गुरूजी से कुछ ऊँच-नीच हो जाए तो अधिकारी उन पर हाथ डालने से हिचकते हैं। नेताओं का स्वार्थ यह होता है कि गुरूजी के पीछे खड़ी भीड़ उनकी भक्ति को देखकर चुनाव के समय उन पर कृपालु हो सकती है। दरबार में उनकी हाज़िरी से जनता किस प्रकार भ्रमित होगी इसकी फिक्र नेता जी को नहीं होती। नेता हमेशा ही धर्मगुरुओं के सामने नतमस्तक होते रहे हैं, भले ही बाद में गुरूजी जेल की शोभा बनें। फिर भी बाबा राम रहीम जैसे कुछ संतो की भक्तों का हित करने की भावना इतनी प्रबल होती है कि वे ‘पैरोल’ पर बाहर आकर भी ऑनलाइन प्रवचन के लिए समय निकाल लेते हैं। संतों के ऐसे ही त्याग के कारण हमारा देश महान बना हुआ है।

एक चमत्कारी बाबा दक्षिण के नित्यानंद थे। वे भी जब  मुँह पर चुल्लू बनाकर फूँक मारते थे तो उनके भक्त उछलने लगते थे। दुर्भाग्य से उन पर कुछ बेसिरपैर के आरोप लग गये और वे अपने भक्तों को बेसहारा छोड़कर विदेश चले गये। उन्होंने त्रिनिदाद के पास एक द्वीप ख़रीद लिया जहाँ उन्होंने ‘कैलाशा’ नाम का नया देश बना लिया। उनके हिसाब से ‘कैलाशा’ एकमात्र हिन्दू राष्ट्र होगा। अगर महाराज भी अपनी घोषणा के अनुसार भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने में सफल हुए तो वह दूसरा हिन्दू राष्ट्र हो सकता है। निश्चय ही इन संतों का हिन्दू राष्ट्र मँहगाई, बेरोज़गारी जैसी घटिया समस्याओं से पूरी तरह मुक्त होगा।

बाबाजी का उदय निश्चय ही सत्ता के लिए बड़ा राहत देने वाला होगा। देश में इस वक्त सत्ता के लिए सबसे बड़ा सरदर्द रोज़गार को लेकर है। अगर सब बेरोज़गार सरकार के दरवाज़े पर सिर मारने के बजाय बाबाजी के आशीर्वाद के लिए लाइन लगाने लगें तो सरकार का बड़ा संकट टल जाएगा। बाबाजी से आश्वासन पाकर आदमी घर आकर निश्चिंत सो जाएगा और सपने में आई.ए.एस. हो जाने का सुख प्राप्त करेगा। इसीलिए अगर मंत्री बाबाजी की चौखट पर माथा टेकते हैं तो क्या आश्चर्य?

देश के लिए नये-नये बाबाओं का उदय बड़ा कल्याणकारी होता है। कलयुग में भगवान तो अवतार लेते नहीं, इसलिए पीड़ित जनता को उनके स्वघोषित प्रतिनिधियों के ही चरण पकड़ने पड़ते हैं। भारत में विज्ञान की लंबी उड़ान के बावजूद अशिक्षा और अंधविश्वास व्यापक हैं और विज्ञान की पहुँच सीमित है, इसलिए बाबाओं के लिए यहाँ असीम संभावनाओं वाला ‘मार्केट’ उपलब्ध है। बाबाओं के दर पर ठाठें मारती भीड़ को देखकर अंदाज़ होता है कि देश में वैज्ञानिक सोच और समझ की क्या स्थिति है।

किसी भी तरक्की पसंद सरकार को अंधविश्वास की इन खुले आम चलती दूकानों पर रोक लगाना चाहिए। लेकिन वह इन्हें जानबूझकर अनदेखा करती है क्योंकि इन्हीं दूकानों से उसके लिए वोट निकलते हैं। जनता जितनी अज्ञानी, अंधविश्वासी और निर्बल रहे उतनी ही राजनीतिक दलों के लिए फायदेमंद होती है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ अदना सा मुखौटा भारी है ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ अदना सा मुखौटा भारी है ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

टेरेस पर पतंग लूटने आये थे कुछ किशोर। वे सारे मुखौटाधारी थे। कोई ड्रैक्यूला,कोई भूत तो कोई राक्षस।

मैंने चिढ़कर कहा–होली है क्या?हद कर दी तुम लोगों ने। संक्रान्ति और मुखौटे !

उनमें से एक बोला–आंटी मुखौटे पहनने का भी कोई खास मौसम होता है क्या !और फिर ओरिजनल चेहरा लेकर लूटमार की जा सकती है क्या ?आप शायद फिल्में नहीं देखतीं—-सारे डाकू डुकू काले कपड़े से चेहरा क्यों ढंकते हैं। कोई तो बात होगी।

मुझे यकीन हो गया कि बच्चे वक्त के पहले जवान ही नहीं बूढ़े भी होने लगे हैं। कितनी गहरी बातें। मैंने उन्हें झापा(डाँटा)–पतंग लो और चलते बनो। अच्छे घर के लगते हो फिर भी कटी पतंग के पीछे पड़े हो।

फिर दूसरा बच्चा बोला –जो मजा लूटने में है, वो ईमानदारी से खरीदने में कहाँ।

मेरा सारा ध्यान मुखौटे पर केन्द्रित हो गया। सच है मुखौटा धारण करने के वास्ते मुहूर्त नहीं निकलवाना पड़ता। यह तो बारहमासी प्रोग्राम है। सहसा याद आई अखबार की वो कतरन जिसमें छपा था—फलां फलां वेबसाइट पर मुखौटों से जुड़ी सारी जानकारी उपलब्ध है। कितनी तरह के होते हैं। किन किन चीजों से बनाये जाते हैं और हर मुखौटे के पीछे का कॉन्सेप्ट भी। अगर आपके पास भी कोई मुखौटा हो तो उसे पेश करें।

लगा कि वेबसाइट बनाने वाला थोड़ा सा अहमक है या डरपोंक। ऐसा हो नहीं सकता कि वह अदृश्य मुखौटों के बारे में जानता न हो। पर क्या करे बेचारा। आ बैल मुझे मार,कौन करे।

मुखौटा रक्षा कवच है। चिलखत की तरह पहन लेते हैं लोग। भूगर्भीय हलचल की तरह न दिखाई देनेवाले लड़ाई के मैदान में। कुछ कर्ण के कवच कुंडलों की तरह मुखौटों के साथ पैदा होते हैं। कुछ मजबूरी में धारण करते हैं। कोई अपने वीभत्स चेहरे को ढंकने के लिये इस्तेमाल करता है। मेमने, हिरन, और गाय के मुखौटे बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती।  80%प्रजाति मौलिक रूप से ऐसी है। कुछ जादुई मुखौटे धारणकर्ता को संसद तक पहुँचा देते हैं। कुछ बाबाजी के रूप में भगवान बना देते हैं।

किसी का काम एक मुखौटे से चल जाता है तो किसी को बार बार बदलना पड़ता है। आहिस्ता आहिस्ता वे इसमें प्रवीण हो जाते हैं।

कुछ मुखौटाधारी अच्छे खासे लोगों को उल्लू बना देते हैं। तो कुछ उल्लुओं को गधा बनाकर दम लेते हैं, जो दरबार में उम्र भर चीपों चीपों करते रहते हैं। कुछ को मैंने बगुलाबाबा की चोंच लगाकर फिरते देखा है। मुखौटे का नशा कोकीन से कम नहीं।

दृश्य और अदृश्य मुखौटे में अंतर तो होता है। दोनों का मकसद और असर एक सा नहीं होता। कभी कभी भेड़िए का मुखौटा लगानेवाले को हम  मानव समझने की गलती कर बैठते हैं क्योंकि वह अदृश्य होता है। यह अटकलें लगाने की सुविधा प्रदान करता है। हम बरबस गिरगिट को याद कर रहे होते हैं। महाज्ञानी का मुखौटा चिपकाकर कुछ लोगों ने खुद मरे बिना स्वर्ग और नर्क का टूर कर लिया। बचपन में कठपुतली का खेल देखा था–अत्याचारी सास,शराबी पति,लुटेरा साहूकार,कामचोर बहू आदि को उनके गुनाहों के अनुपात में कैसे कोड़ों से कूटते हैं, या खौलते

तेल की कड़ाही में तलते हैं- यमदूत।  लोग आज भी महाज्ञानियों के मुखौटे उतारने की बजाय पायलागूं करते हैं।

21वीं सदी ने मार्स मिशन की कामयाबी से बड़ा तोहफा दिया है। सम्मोहन का ऐसा जाल बिछाया है कि लोग असली चेहरा और मुखौटे का अन्तर ही भूल बैठे हैं। उन्हें मुखौटा ही असली चेहरा लगने लगा है। कभी भूल से मुखौटे को पहचान भी जायें तो उतारने की कला  नहीं आती (कला सीख भी लें तो भूतों की तरह डर पीछा करता है)कहने की जरूरत नहीं कि उतारें भी तो किस किस के चेहरे से।

एकदम ताजा खबर हाथ लगी है। बेरोजगारों की बारात में कुछ लोग मंत्रियों और मुख्यमंत्री का मुखौटा लगाकर पहुँचे। जिसने छेड़छाड़ मंत्री का मुखौटा पहना था उसे भगा दिया गया। वह सिर पर पाँव धरकर भागा। इस परम धार्मिक आयोजन में समस्त बेरोजगार कौम का सम्मान किया गया। साथ ही रोजगार का आश्वासन भी दिया गया। दूल्हे को हल्दी लगाई गयी। चूना तो सरकार पहले ही लगा चुकी है।

मुखौटों पर रिसर्च करने बैठे कोई तो सारी उम्र खर्च हो जाये। नेता बिरादरी के पास तो मुखौटों की टकसाल है। आम आदमी अपने लुंज पुंज टटपुंजिए मुखौटे के साथ यही सोचता रहता है, जान बची और लाखों पाये।

कहने की जरूरत नहीं कि बड़ी बड़ी वैज्ञानिक खोजों पर अदना सा मुखौटा भारी है।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

20/1/2023

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 137 ☆ संस्कृति से जुड़ाव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “संस्कृति से जुड़ाव…। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 137 ☆

☆ संस्कृति से जुड़ाव ☆

बसंत की बहार से तो सभी परिचित हैं, किंतु जब बात इससे आगे बढ़े तो मन फागुन के रंगों से सराबोर हो उठता है, कानों में फाग का राग सुनाई देना कोई नयी बात नहीं होती। वास्तव में ये सब बदलाव का संकेत होता है। आजकल जिस तेजी के साथ घटनाक्रम घटित हो रहे हैं, उससे सबसे ज्यादा प्रभावित मीडिया होता है। एक न्यूज को हाइलाइट करने के चक्कर में, सारे अन्य छोटे- बड़े घटनाक्रमों को अनजाने ही छोड़ देता है। बात तर्क – वितर्क तक हो तो अच्छा है किंतु जब टी आर पी का चक्कर भारी पड़ने लगता है तो जिसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हों उन्हीं पर टी. व्ही. चैनल भी फोकस कर लेता है। अब तो चाहें मोबाइल चलाओ चाहे टी. व्ही. एक ही मुद्दा मिलेगा।

कर लो दुनिया मुट्ठी में, ये नारा सचमुच दूरगामी दृष्टिकोण का उदाहरण है। एक क्लिक पर सब कुछ हाजिर हो जाना क्या किसी अलाद्दीन के चिराग़ से कम लगता है?

इन सबमें यदि कुछ खटकता है तो वो –

अष्टौ गुणा पुरुषं दीपयंति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च।

पराक्रमश्चबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च।।

ये श्लोक मनुष्यता के भावों को बखूबी दर्शाता है, इसका अर्थ है – ये आठ गुण मनुष्यों को सुशोभित करते हैं-

बुद्धि, चरित्र, आत्म-नियंत्रण, शास्त्र-अध्ययन, साहस, मितभाषी, यथाशक्ति दान और कृतज्ञता।

बस यही सब भाव डिजिटल की भेंट चढ़ने लगे हैं। अभी भी समय है, हमें अपनी संस्कृति को समझने हेतु अपने वैदिक ग्रन्थों से जुड़ना होगा, जो वैज्ञानिकता की दृष्टि से भी सही सिद्ध होते जा रहे हैं।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # 175 ☆ “आज के व्यंग्य लेखक के सामने चुनौती…” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – आज के व्यंग्य लेखक के सामने चुनौती)

☆ व्यंग्य  # 175 ☆ चिन्तन – “आज के व्यंग्य लेखक के सामने चुनौती…” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

आज के व्यंग्य लेखक के सामने सबसे बड़ी चुनौती सन् 2024 सामने है। आज डरे हुए व्यंग्य लेखकों का समय आ गया है। व्यंग्य लेखकों पर नजर रखी जा रही है। तीखे मारक व्यंग्य छापने वाले अखबार पत्रिकाओं के मालिकों पर नजर है। धीरे धीरे प्रिंट मीडिया व्यंग्य से परहेज़ करने लगे हैं। कुछ अखबारों से डेली आने वाले कार्य को बंद किया जा रहा है। बड़े नामी गिरामी व्यंग्यकार चिंतित हैं कि क्या 2024 के बाद व्यंग्य की ठठरी बंध जाएगी ? आज व्यंग्य लिखने वाले लोग डरे हुए क्यों लग रहे हैं ? आज सत्ता के पक्ष में लिखने वालों की भीड़ क्यों पैदा हो रही है ? आज के व्यंग्य लेखक के सामने व्यंग्य का  स्वरूप, लक्ष्य  और प्रयोजन अदृश्य क्यों हो गए हैं  ?

आज हर कवि और कहानीकार अचानक व्यंग्य लिखकर यश कमाना चाह रहा है। भीड़ बढ़ रही है और भीड़ का कोई चरित्र नहीं होता। मीडिया बिक चुका है कभी कभार कोई अच्छा व्यंग्य लिखा जाता है तो प्रिंट मीडिया में बैठे ठेकेदार उस अच्छे व्यंग्य में कांट छांट कर व्यंग्य की हत्या कर देते हैं।आचरण दूषित होने का फल आज सबसे ज्यादा कुछ व्यंग्यकारों पर दिख रहा है। 

सत्ता-विरोधी तेवर दिखाने वाले ज्यादातर व्यंग्यकार व्यवहार में किसी पुरस्कार, पद, सम्मान के लोभ में उसी सत्ता के चरणों में झुके नजर आने लगे हैं।  वह सत्ता फिर चाहे व्यक्ति की हो या पार्टी की।ऐसे लोगों ने शर्म बाजार में बेच दी है। आज अधिकांश व्यंग्य लेखक तटस्थता के चालाकी भरे चिंतन से प्रभावित हो रहे हैं। 

तटस्थ आदमी को समयानुसार इधर या उधर, कहीं भी सरकने में आसानी होती है। वाट्स एप यूनिवर्सिटी में एडमिन बनकर बैठे तथाकथित व्यंग्यकार अपने अपने ज्ञान देकर व्यंग्य  को मिक्सी में भी पीस रहे हैं। व्यंग्य का लेखक ‘इसकी सुने कि उसकी सुने’ के साथ भ्रमित है। कुल मिलाकर आज व्यंग्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद व्यंग्य है। लेखक लिख देता है और पाठक के ऊपर छोड़ देता है कि पाठक तय करें कि लिखा गया व्यंग्य है या नहीं।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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