English Literature – Poetry – ☆ It’s not an eye-donation….  It is an eye-offering ☆ – Hemant Bawankar

Hemant Bawankar   (Inspired by the news published in a newspaper in which a mother donated her eyes with an unborn child before dowry-death.  This poem has been cited from my book “The Variegated Life of Emotional Hearts”.)    ☆ It’s not an eye-donation....  It is an eye-offering  ☆    Listen these eyes are not only eyes but, these eyes are like melted and purified gold in the life’s altar.   I have seen. No ….No these eyes have seen a river of fire warmth in the mother's lap and inflammation of puberty.   Wedding pavilion sacrificial altar and seven rounds around the fire.   The first night’s soft and warm flower bed and ….  and various forms of fire.   My beautiful body, I was proud of which has been scorched in the fire of dowry.   Where is ‘he’? Where? Who has held my hands by making fire as witness. Now given the fire of dowry; and …… he will give the fire of the funeral.   But, Mom! Why are you crying? And brother, you too?   You are drowned in debt by raising funds for dowry.   How have you been broken in life? Alas! Dad is no more today. Else, in your place he could have offered his shoulder to you in support to cry with you!   My goodbye tears are still in...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं – #5 निःशब्द ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

सुश्री सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’   (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी  की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  उनकी  एक भावुक एवं मार्मिक  लघुकथा  “निःशब्द ”। )   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 5 ☆   ☆ निःशब्द ☆ दामोदर एक साधारण व्यक्ति। कद काठी सामान्य । थुलथला बदन और पान के शौकीन। मुंह से चारों तरफ से पान गिरना। गरीबी के कारण बुढापा जल्दी आ गया था। 50-52 साल के परन्तु लगते 70 साल के। प्लंबर का काम, घर घर जाकर काम करना जो उन्हें बुला ले। बेटे के नालायक निकल जाने के कारण दामोदर टूट चुके थे। पत्नी और बिना ब्याही बिटिया घर पर। रोजी से जो कुछ भी मिलता अपनी पत्नी को पूरा का पूरा ले जाकर दे देना। अपने लिए कभी किसी से मांगने नहीं जाते। खुशी से दे दे तो गदगद हो जाना और यदि मेहनताना कम मिले तो कुछ कहना ही नहीं बस चलते बनना। उनके इस...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जीवनदायी – जीवनदायिनी ☆– श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश”

श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश”   ☆ जीवनदायी - जीवनदायिनी ☆    सुनो ऐ-हिन्दुस्तानियों, पूरा जोर लगा के कहता हूँ, शास्त्रों का हवाला देता हूँ।   वो .......? नही रुकेगा पास तुम्हारे, जिसका न करोगे तुम सम्मान, जरूरत पड़ने पर भी।   वो ........? न होगा साथ तुम्हारे, जानो महत्व उसका।   वो.......? है पारदर्शी जीवन दायी, अब भी न संभले भाई, समझो मृत्यु तुम्हें है आई।   वो.......? दिखता, कल-कल कर चलता, अब, कम गिरता, जीवन उसके लिए है तरसता। रोक सको तो रोक लो, संभव है जितना कम से कम उतना ही भर लो।   न समझे अब भी, न फिर संभलोगे कभी, सुन लो ऐ हिन्दुस्तानी छोटी सी पानी की है यह कहानी........ न संभले तो न रहेगी तुम्हारी निशानी.......   © माधव राव माण्डोले “दिनेश”, भोपाल  (श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश”, दि न्यू इंडिया एश्योरंस कंपनी, भोपाल में सहायक प्रबन्धक हैं।)  ...
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मराठी साहित्य – मराठी कविता – ♥ प्रेमवेडा पाऊस ♥  – सौ .योगिता किरण पाखले

सौ .योगिता किरण पाखले (आदरणीया सौ .योगिता किरण पाखले जी का e-abhivyakti में हार्दिक स्वागत है। सौ.योगिता जी मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की  सशक्त हस्ताक्षर हैं। आप कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी रचनाएँ स्तरीय पत्र पत्रिकाओं / चैनलों में प्रकाशित/प्रसारित हुई हैं। आज प्रस्तुत है आपकी वर्षा ऋतु पर आधारित शृंगारिक कविता "प्रेमवेड़ा पाऊस"। हम भविष्य में आपकी और चुनिन्दा रचनाओं को प्रकाशित करने की अपेक्षा करते हैं।)      ♥ प्रेमवेडा पाऊस ♥   आठवतो मला आजही तो पाऊस आपल्या प्रेमाची पूरवायचा हौस ...... धृ   सरीवर सरी किती धुंद करायच्या भावनांच्या ओलाव्यात चिंब चिंब भिजवायच्या डोळ्यांनीच सांगून जायचा,नको ना गं जाऊस आठवतो मला..... १   ओथंबलेले घन अन भिजले मन थांबवायचे कसे काही शब्दातच सारे गाणे बसवायचे कसे माहित होत त्याला म्हणूनच सांगायचा, नको ना गं गाऊस आठवतो मला..... २   कधी खोडकर कधी हळवा होऊन बरसायचा डोळ्यातील अश्रूंना उगाचच पावसात भिजवायचा मी बोलायच्या आतच म्हणायचा, नको ना गं पाहूस आठवतो मला....... ३   भर पावसात मुद्दामच छत्री विसरायचा एका छत्रीत( छताखाली) येण्याचा बहाणा शोधायचा मी बोलण्या आधीच कटू सत्य म्हणायचा, नको ना गं दृष्ट लावूस आठवतो मला..... ४   © सौ. योगिता किरण पाखले, पुणे  ...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #5 – उडताही नाही आले ☆ – श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे   (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है ।  साप्ताहिक स्तम्भ  अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक कवि  हृदय की कल्पना और कल्पना की सीमाओं में बंधी कविता “उडताही नाही आले”।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 5  ☆ उडताही नाही आले   बाहेर मला घरट्याच्या पडताही नाही आले पंखाना धाक असा की उडताही नाही आले   हे बांध घातले त्यांनी हुंदके अडवले होते डोळ्यात झरे असतांना रडताही नाही आले या काळ्या बुरख्या मागे मी किती दडवले अश्रू पुरुषांची मक्तेदारी नडताही नाही आले   धर्माचे छप्पर होते जातींच्या विशाल भिंती मज सागरात प्रीतीच्या बुडताही नाही आले   या गोर्‍या वर्णाचीही मज भिती वाटते आता त्या अंधाराच्या मागे दडताही नाही आले वरदान मला सृजनाचे नाकार कितीही वेड्या खुडण्याचे धाडस केले खुडताही नाही आले     © अशोक श्रीपाद भांबुरे धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८ ashokbhambure123@gmail.com...
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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Laughter Yoga Learning Video for the Beginners ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer,  Author, Blogger, Educator and Speaker.) ☆ Laughter Yoga Learning Video for the Beginners ☆ This is a laughter yoga learning video for those who would like to lead laughter yoga sessions on their own. Especially those who have attended a session or two of Laughter Yoga and are fascinated by the concept. This video will give them all the basics in the right perspective and enable them to be good Laughter Yoga anchors/ leaders/ teachers. It is one of the most beautiful and simple videos on the topic and has been watched widely the world over. Many Laughter Yoga leaders/ teachers have learned and benefited from it. LINK TO THE VIDEO: Probationary/ Trainee Officers from all over India come to State Bank Foundation Institute (Chetana), Indore on a regular basis for their initial grooming. All of them have a brief tryst with Laughter Yoga during their stay here. Some days ago, Shiva Prasad K and...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – चतुर्थ अध्याय (1) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ चतुर्थ अध्याय ( सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय )   श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ।।1।। भगवान बोले- मैने पहले अमर योग यह विवस्वान को बतलाया विवस्वान ने मनु को ,मनु ने इक्ष्वाकु को समझाया।।1।।        भावार्थ :  श्री भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा।।1।।   I taught this imperishable Yoga to Vivasvan; he told it to Manu; Manu proclaimed it to Ikshvaku. ।।1।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८   (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)  ...
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रंगमंच – नाटक – ☆विश्व इतिहास की पहली महिला योद्धा  ..वीरांगना रानी दुर्गावती ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

रानी दुर्गावती बलिदान पर विशेष श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’    (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी द्वारा रानी दुर्गावती बलिदान दिवस पर विशेष रूप  से लिखित नाटक। यह नाटक  बच्चों से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक के लिए शिक्षाप्रद गीत, कविता एवं साक्षात्कार  का मिला जुला स्वरूप है जो अपने आप में एक प्रयोग से कम नहीं है। साथ ही यह नाटक हमें इतिहास के कई अनछुए पहलुओं से रूबरू करता है। )   ☆ नाटक - विश्व इतिहास की पहली महिला योद्धा  ..वीरांगना रानी दुर्गावती☆   पात्र- 0 गायन मंडली 1 पुरूष स्वर (1)    -    पापा 2 बालिका  - चीना 3 बालक    -  चीकू 4 खंडहर की आवाजे - (अनुगूंज में महिला स्वर) 5 पुरूष स्वर (2) 6 साक्षात्कार कर्ता   जिनसे साक्षात्कार लेना है - ०     रानी दुर्गावती  विश्वविद्यालय के कुलपति १.    कलेक्टर जबलपुर २.   संग्रहालय अध्यक्ष- जबलपुर रानी दुर्गावती संग्रहालय ३.    संग्रहालय अध्यक्ष-  मंडला ४.   संग्रहालय अध्यक्ष ..दमोह ५.   मदन महल , वीरांगना दुर्गावती की समाधि के आम पर्यटक एवं उस परिसर के दुकानदार आदि   चीना- चीकू । मैने तुमसे कोई कहानियो की किताब लाने को...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य #2 – कहाँ गया बचपन ☆ – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय   (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । उन्होने यह साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य” प्रारम्भ करने का आग्रह स्वीकार किए इसके लिए हम हृदय से आभारी हैं। प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की प्रथम कड़ी में उनकी एक कविता  “तुम्हें सलाम”। अब आप प्रत्येक सोमवार उनकी साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचना पढ़ सकेंगे।) ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य #1 ☆   ☆ कहां गया बचपन ☆   खबरदार होशियार खुशनसीब बचपन। ये जहर उगलते मीडिया में बचपन।   ऊंगलियों में कैद हो गया है बचपन। हताशा और निराशा में लिपटा है बचपन।   गिल्ली न डण्डा न कन्चे का बचपन। फेसबुक की आंधी में डूबा है बचपन।   वाटसअप ने उल्लू बनाया रे बचपन। चीन...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सामाजिक चेतना – #3 ☆ बेटी की मजबूरी ☆ सुश्री निशा नंदिनी भारतीय

सुश्री निशा नंदिनी भारतीय    (सुदूर उत्तर -पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना की तीसरी कड़ी में प्रस्तुत है उनकी  भावप्रवण कहानी/ संस्मरण  “बेटी की मजबूरी ”। अब आप प्रत्येक सोमवार  सुश्री  निशा नंदिनी  जी के साहित्य से रूबरू हो सकते हैं।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना – #3 ☆   ☆ बेटी की मजबूरी ☆   महीने के अंतिम रविवार को अक्सर मैं मोरान के शिवालिक वृद्धाश्रम में जाती हूँ और वहां रह रहे माता-पिता के साथ बात करके उन्हें लेशमात्र प्यार- अपनत्व देकर मुझे बहुत संतुष्टि होती है। आज भी महीने का अंतिम रविवार था। मैं अपने सभी दैनिक कार्यों को समाप्त कर कुछ खाने पीने की सामग्री तथा कुछ अन्य सामान लेकर शिवालिक की तरफ चल दी। कुछ मिनटों की यात्रा के उपरांत मैं शिवालिक वृद्धाश्रम के सामने थी। मेरे घर से कैब द्वारा शिवालिक की दूरी 20-25 मिनट की है। अंदर जाकर में वार्डन से मिली। उन्हें सब सामान देकर कक्ष की ओर चल दी। बड़े-बड़े एक एक हॉल में दस-दस लोगों...
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