हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #133 – बाल कथा – “गुरूमंत्र” ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है एक रोचक एवं प्रेरक बाल कथा गुरूमंत्र)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 133 ☆

☆ बाल कथा ☆ “गुरूमंत्र” ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’   

सुनील का मूड़ खराब था. पापा ने आज का प्रोग्राम निरस्त कर दिया था. उस की दिली तमन्ना थी कि वह चंबल डेम घुम कर आएगा. मगर, पापा को कोई काम आ गया. वे सुनील से नाराज भी थे. उस ने उन का काम नहीं किया था. इसलिए उन्होंने चंबल डेम जाने से मना कर दिया.

तभी मम्मी ने आवाज दी, ‘‘सुनील! इधर आना. दूध खत्म हो गया. बाजार से ले कर आना तो?’’

सुनील चिढ़ा हुआ था, ‘‘मुझे काम है मम्मी. मैं नहीं जाऊंगा. आप रोहित को भेज दीजिए.’’

रोहित के सोमवार को जांच परीक्षा थी. वह पढ़ाई में व्यस्त था.

‘‘तुम्हें पता है रोहित पढ़ रहा है.’’

‘‘मैं भी काम कर रहा हूं मम्मी,’’ सुनील ने कहा तभी राहुल आ गया, ‘‘लाओ मम्मी! मुझे पैसे दो. मैं ले आता हूं.’’

‘‘तू तो पढ़ रहा था,’’ मम्मी ने पैसे देते हुए कहा तो राहुल बोला, ‘‘मम्मी! घर के सभी काम जरूरी होते है, इसे हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा?’’

‘‘शाबाश बेटा.’’ मम्मी ने राहुल की पीठ थपथपा कर कहा, ‘‘सुनील! यह अच्छी बात नहीं है. तुम हर काम मना कर देते हो. इसी वजह से पापा तुम से नाराज रहते है. यदि तुम्हें काम नहीं करना है तो मत किया करो. मगर, बोलने का लहजा थोड़ा बदल लो. यह हम सब के लिए ठीक रहेगा.’’

मम्मी की बात सुन कर सुनील को गुस्सा आ गया, ‘‘मम्मी! आप सब को मैं बुरा लगता हूं. आखिर, राहुल आप का लाड़का बेटा जो है. आप उसी की तरफदारी करोगे.’’

‘‘बात तरफदारी की नहीं है बेटा,’’ मम्मी ने सुनील को समझाना चाहा, ‘‘बेटा! यह बात नहीं है. हम किसी भी बात को दो तरह से कह सकते है. एक, सीधे तौर पर ना कर दे. इस से व्यक्ति को बुरा लग जाता है. दूसरा, अपनी असमर्थता बता कर मना कर सकते हैं.

‘‘पहले तरीके से हम स्वयं गुस्सा होते हैं. क्यों कि हम चिढ़ कर मना करते हैं. सोचते हैं कि हम काम कर रहे है. सामने वाले को दिखता नहीं है. वह हमे परेशान करने के लिए काम बता रहा है. इस से हमारा स्वयं का मूड़ खराब हो जाता है.

‘‘दूसरा व्यक्ति भी नाराज हो जाता है. कैसा लड़का है? जरासा काम बताया, वह भी नहीं कर सका. तुरंत मना कर दिया. ‘मैं यह काम नहीं कर पाऊंगा.’ यानी उसे आज्ञापालन का गुण नहीं है. इसे सीधे शब्दों में कहे तो उसे माता पिता से संस्कार नहीं मिले है.’’

यह सुन कर सुनील चिढ़ पड़ा, ‘‘मम्मी, आप भी ना. सुबहसुबह भाषण देने लगती है. मुझे नहीं सुनना आप का भाषण.’’

‘‘अच्छा बेटा, मैं भाषण् दे रही हूं. मगर, तू नहीं जानता है कि यह भाषण नहीं, जीवन की सच्चाई हैं. जो मैं तुम्हें बता रही हूं. जो व्यक्ति बढ़ चढ़ कर काम करता है वही सब को अच्छी लगता है.’’

मगर, सुनील कुछ सुनने को तैयार नहीं था. वैसे ही उस का मूड़ खराब था. पापा ने उसके प्रोग्राम की बैंड बजा दिया था. उस ने कई दिनों से सोच रखा था कि वह चंबल डेम जाएगा. वहां घूमेगा. मस्ती करेगा. उस बांध की फोटो लेगा.

मगर, नहीं. पापा को अपना काम प्यार है. वे उस की बातें क्यों सुनने लगे. तभी उसके दिमाग में दूसरा विचार आया. क्यों न रोहित से कहूं. वह पापा को मना ले. ताकि वे चंबल डेम जाने को राजी हो जाए. यह बात सुनील ने रोहिल से कही तो वह बोला, ‘‘भैया! मैं आप की बात क्यों मान लूं. मेरी सोमवार को परीक्षा है. मैं क्यों कहूं कि पापा चंबल डेम चलिए.’’

‘‘तू मेरा प्यारा भाई है,’’ सुनील ने उसे पटाने की कोशिशि की. इस पर रोहित ने जवाब दिया, ‘‘भैया सुनील. आप मुझे पढ़ने दे. हां, यदि सुनील भैया चाहे तो पापा को मना सकते हैं. वे उन्हें मना नहीं करेंगे. फिर दूसरी बात पापा को सरकारी काम है. वह ज्याद जरूरी है. हमारा घूमना ज्यादा जरूरी नहीं है. इसलिए पहले उन्हें काम करने दे. हम बाद में कभी घूम आएंगे.’’

‘‘तू तो मुझे भाषण देने लगा.’’ कहते हुए सुनील रोहित के कमरे से बाहर आ गया.

उसे समझ नहीं आ रहा था कि पापा मम्मी उस की बातें क्यों नहीं मानते हैं. जब कि वे सभी का बराबर ख्याल रखते थे. सभी को एक जैसा खाना और कपड़े देते थे. स्कूल की फीस हो या हर चीज किसी में भेदभाव नहीं करते थे. फिर क्या कारण है कि कोई फरमाईश हो तो राहुल भैया की बातें झट मान ली जाती थी. उस की नहीं.

सुनील ने बहुत सोचा. मगर, उसे कुछ समझ में नहीं आया. उसे रोहित पर भी गुस्सा आ रहा था. उस ने अपने बड़े भाई यानी उस की बात नहीं मानी थी. यदि वह पापा को चंबल डेम जाने के लिए कह देता तो पापा झट मान जाते. मगर, रोहित ने भी टका सा जवाब दे दिया, ‘‘पापा को काम है.’’

छोटा भाई हो कर मेरी एक बात नहीं मान सका. सुनील यही विचार कर रहा था कि उसे राहुल आता हुआ दिखाई  दिया.

‘‘भैया! एक बात बताइए.’’ सुनील के दिमाग में एक प्रश्न उभर कर आया था, ‘‘आप घर में सब के लाड़ले क्यों हैं?’’

सुन कर राहुल हंसा, ‘‘मैं सब से ज्यादा लाड़ला हूं. मुझे तो आज ही पता चला. मगर, तुम यह क्यों पूछ रहे हो?’’

‘‘मैं इसलिए पूछ रहा हूं कि यदि मैं लाड़ला होता तो आज पापा मेरी बता मान लेते. आज हम चंबल डेम घुमने जाते.’’

‘‘तो यह बात है, इसलिए जनाब का मूड़ उखड़ा हुआ है,’’ राहुल ने सुनील को अपने पास बैठा कर कहा, ‘‘पहले यह बताओ. तुम अपने छोटे भाई से क्या चाहते हो?’’

‘‘उस का नाम मत लो. उस ने मेरी एक बात नहीं मानी. मैं ने उस से कहा था कि पापा से कह दो, हमें चंबल डेम घुमा लाए. मगर, उस ने मेरी बात सुनने से मना कर दिया. वह बहुत खराब है.’’

‘‘यानी वह इसलिए खराब है कि उस ने तुम्हारी बात नहीं मानी.’’

‘‘हां.’’ सुनील बोला, ‘‘वह छोटा है. उसे बड़ों की बात माननी चाहिए.’’

‘‘यही बात है.’’

‘‘क्या बात है,’’ सुनील चौंका.

‘‘हर व्यक्ति चाहता है कि छोटा व्यक्ति उस की बात माने. उस का हुक्म बजा कर लाए. इसलिए जो बड़ों को काम झटपट करता है. वह बड़ों का लाड़ला हो जाता है. जैसा तुम चाहते हो कि छोटा भाई रोहित तुम्हारी बात माने, वैसे ही पापा मम्मी चाहते हैं कि तुम उन की बात मानो.

‘‘सुबह अगर, तुम पापा की बात मान कर उन के ऑफिस फाइल पहुंचा आते तो पापा को ऑफिस नहीं जाना पड़ता. फिर वे वहां काम में व्यस्त नहीं होते. तब हमारा चंबल डेम जाने का प्रोग्राम कैंसिल नहीं होता.’’

‘‘तो आप कह रहे है कि चंबल डेम जाने का प्रोग्राम मेरी वजह से ही निरस्त हुआ है.’’

‘‘हां.’’

‘‘वाकई. मैं ने इस तरह तो सोचा ही नही था.’’ सुनील को अपनी गलती को अहसास हो गया, ‘‘आप ठीक कहते हैं भैया, जैसा हम दूसरों से अपेक्षा रखते हैं वैसा ही व्यवहार हमें दूसरों के साथ करना चाहिए. यानी हम चाहते हैं कि छोटे हमारा काम करें तो हमें भी चाहिए कि हम बड़ों का काम तत्परता से करे.’’

सुनील ने यह कहा था कि तभी ड्राइवर आ कर बोला, ‘‘रोहित बाबा! साहब ने गाड़ी भेजी है. चंबल डेम जाने के लिए. आप सब तैयार हो जाइए.’’

यह सुन कर सुनील खुश हो गया. ‘‘हुरर्र रे! आज तो दोदो खुशियाँ मिल गई .’’

‘‘कौन कौन सी?’’ मम्मी गाड़ी में सामान रख कर पूछा तो सुनील बोला, ‘‘एक तो भैया ने गुरूमंत्र दिया उस की और दूसरा चंबल डेम जाने की.’’

यह सुन कर सभी मुस्करा दिए और गाड़ी चंबल डेम की ओर चल दी.

—0000—

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

18-10-2021 

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – [email protected]

मोबाइल – 9424079675

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #167 – लघुकथा – कम्बल… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा  रात  का चौकीदार”  महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9वीं की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक अप्रतिम लघुकथा  “कम्बल…”)

☆  तन्मय साहित्य  #167 ☆

☆ लघुकथा – कम्बल

जनवरी की कड़कड़ाती ठंड और ऊपर से बेमौसम की बरसात। आँधी-पानी और ओलों के हाड़ कँपाने वाले मौसम में चाय की चुस्कियाँ लेते हुए घर के पीछे निर्माणाधीन अधूरे मकान में आसरा लिए कुछ मजदूरों के बारे में मैं चिंतित हो रहा था।

ये मजदूर जो बिना खिड़की-दरवाजों के इस मकान में नीचे सीमेंट की बोरियाँ बिछाये सोते हैं, इस ठंड को कैसे सह पाएंगे। इन परिवारों से यदा-कदा एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज भी सुनाई पड़ती है।

ये सभी लोग एन सुबह थोड़ी दूरी पर बन रहे मकान पर काम करने चले जाते हैं और शाम को आसपास से लकड़ियाँ बीनते हुए अपने इस आसरे में लौट आते हैं। अधिकतर शाम को ही इनकी आवाजें सुनाई पड़ती है।

स्वावभाववश  मैं उस मजदूर बच्चे के बारे में सोच-सोच कर बेचैन हो रहा था, इस मौसम को कैसे झेल पायेगा वह नन्हा बच्चा!

शाम को बेटे के ऑफिस से लौटने पर मैंने उसे पीछे रह रहे मजदूरों को घर में पड़े कम्बल व हमसे अनुपयोगी हो चुके कुछ गरम कपड़े देने की बात कही।

“कोई जरूरत नहीं है कुछ देने की” पता नहीं किस मानसिकता में उसने मुझे यह रूखा सा जवाब दे दिया।

आहत मन लिए मैं बहु को रात का खाना नहीं खाने का कह कर अपने कमरे में आ गया। न जाने कब बिना कुछ ओढ़े, सोचते-सोचते बिस्तर पर कब नींद के आगोश में पहुँच गया पता ही नहीं चला।

सुबह नींद खुली तो अपने को रजाई और कम्बल ओढ़े पाया। बहु से चाय की प्याली लेते हुए पूछा-

“बेटा उठ गया क्या?”

उसने बताया- हाँ उठ गए हैं और कुछ  कम्बल व कपड़े लेकर पीछे मजदूरों को देने गए हैं, साथ ही मुझे कह गए हैं कि, पिताजी को बता देना की समय से खाना जरूर खा लें और सोते समय कम्बल-रजाई जरूर ओढ़ लिया करें।

यह सुनकर आज की चाय की मिठास के साथ उसके स्वाद का आनंद कुछ अधिक ही बढ़ गया।

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – “पुरस्कार का हश्र” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “पुरस्कार का हश्र” ☆ श्री कमलेश भारतीय

(तुम्हें याद हो कि न हो याद हो …)

मित्रो । जिंदगी के पहले पुरस्कार का हश्र क्या हुआ ? बताता हूं । पंजाब के एक समाचार पत्र ने सन् 1972 में लघुकथा प्रतियोगिता की घोषणा की । मैने अपनी रचना आज का रांझा भेज दी । पुरस्कारों की घोषणा हुई । मेरी लघुकथा को प्रथम पुरस्कार मिला और एक टिपण्णी प्रशंसा भरी ।

मैं समाचार पत्र के कार्यालय गया । पहली बार संपादक महोदय के दर्शन हुए । उन्होंने प्रेमपूर्वक पूछा कि पुरस्कार की राशि मिली ? मैने कहा कि नहीं।

वे मुझे मालिक के ऑफिस में ले गये और परिचय करवाया । फिर बोले कि अकाउंटेंट से पुरस्कार राशि दिलवा दूं ? मालिक ने स्वीकृति दे दी ।

अकाउंटेंट से राशि लेकर एक पुलक सी महसूस की । मैने साहित्य संपादक महोदय से कहा कि आइए, चाय का कप । सेलिब्रेट कर लेते हैं । बोले : इतनी गर्मी है युवा कथाकार । बीयर लेते हैं।

दफ्तर के सामने ही होटल था । अंदर गये । बीयर का ऑर्डर । आमलेट । छोटे छोटे घूंट के बीच कहा : युवा कथाकार अभी और प्रतियोगिताएं होंगी । रचनाएं भेजते रहना । समझ रहे हो न ?

बिल आया । मैने पुरस्कार राशि रख दी । तीन रुपये वापस आये । बैरे को टिप के रूप में देकर मैं बाहर आ गया ।

पुरस्कार के लिए फिर मेरा कोई रचना भेजने का मन नहीं हुआ ।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लिखना-पढ़ना ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 माँ सरस्वती साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी से हम आपको शीघ्र ही अवगत कराएँगे। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

? संजय दृष्टि – लिखना-पढ़ना ??

…कैसा चल रहा है लिखना-पढ़ना?

…कुछ अपना लिखता हूँ, बहुत कुछ अपना बाँचता हूँ।

…अपना लिखना अच्छी बात है पर अपना ही लिखा बाँचना…?

आज नयी कविता या कथा लिखता हूँ, मित्रों के साथ साझा करता हूँ। अगले दिन से मित्रों के लेखन में अपनी ही रचना के अलग-अलग संस्करण बाँचता हूँ।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – भाग कोरोना भाग ☆ डॉ कुंवर प्रेमिल ☆

डॉ कुंवर प्रेमिल

(संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठतम साहित्यकार डॉ कुंवर प्रेमिल जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में सतत लेखन का अनुभव हैं। अब तक 350 से अधिक लघुकथाएं रचित एवं ग्यारह  पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन।  आपकी लघुकथा ‘पूर्वाभ्यास’ को उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव के द्वितीय वर्ष स्नातक पाठ्यक्रम सत्र 2019-20 में शामिल किया गया है। वरिष्ठतम  साहित्यकारों  की पीढ़ी ने  उम्र के इस पड़ाव पर आने तक जीवन की कई  सामाजिक समस्याओं से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है,जो कदाचित उनकी रचनाओं में झलकता है। हम लोग इस पीढ़ी का आशीर्वाद पाकर कृतज्ञ हैं।  आपने लघु कथा को लेकर कई  प्रयोग किये हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक लघुकथा ‘‘भाग कोरोना भाग’’)

☆ लघुकथा – भाग कोरोना भाग ☆ डॉ. कुंवर प्रेमिल 

सुबह-सुबह पार्क पहुंचा तो हतप्रभ रह गया। पार्क पूरी तरह जनशून्य था, भुतहा लग रहा था। मैं सिर पर पैर रखकर भाग खड़ा हुआ।

बाजार की तरफ रुख किया तो बाजार बंद मिला। पुलिस वाले डंडा ठोक रहे थे। एक पुलिस वाला बोला-चल भाग यहां से, मरना है क्या?

मैं सीधा घर आकर रुका।

जनशून्य सड़कें भयावहता पैदा कर रही थी। मुर्धनी सी छाई हुई थी। मौत का तांडव चल रहा था। कब कहां रुकेगा पता नहीं था।

बुरा समय दरवाजे पर दस्तक दे रहा था। जान बचाने की उम्मीद कम बिल्कुल कम प्रतीत हो रही थी।

मेरी निराशा में इजाफा होता चला गया। मुझे लगा कि कोरोना मेरे गले से लिपट गया है। मर्मान्तक पीड़ा हो रही है।

बाहर से घंटा घड़ियाल की आवाजें आ रही थी, शंख बज रहे थे। बूढ़े बच्चे स्त्रियां सभी मिलकर कोरोना को भगाने का प्रयत्न कर रहे थे।

यह दृश्य चौकानेवाला था। मुझे उन पर हंसी आ रही थी। मैं अपना डर भूल चुका था और जोर-जोर से हंसने लगा था।

© डॉ कुँवर प्रेमिल

संपादक प्रतिनिधि लघुकथाएं

संपर्क – एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मध्यप्रदेश मोबाइल 9301822782

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – “यह घर किसका है ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “यह घर किसका है ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय

(जिस लघुकथा को पढ़कर मित्र डॉ रामकुमार घोटड़ ने पूरा लघुकथा संग्रह संपादित कर डाला – विभाजन को लघुकथाएं, वही लघुकथा – यह घर किसका है ? – कमलेश भारतीय)

अपनी धरती , अपने लोग थे । यहां तक कि बरसों पहले छूटा हुआ घर भी वही था । वह औरत बड़ी हसरत से अपने पुरखों के मकान को देख रही थी । ईंट ईंट को , ज़र्रे ज़र्रे को आंखों ही आंखों में चूम रही थी । दुआएं मांग रही थी कि पुरखों का घर इसी तरह सीना ताने , सिर उठाये , शान से खड़ा रहे ।

उसके ज़हन में घर का नक्शा एक प्रकार से खुदा हुआ था । बरसों की धूल भी उस नक्शे पर जम नहीं पाई थी । कदम कदम रखते रखते जैसे वह बरसों पहले के हालात में पहुंच गयी । यहां बच्चे किलकारियां भरते थे । किलकारियों की आवाज साफ सुनाई देने लगीं । वह भी मुस्करा दी । फिर एकाएक चीख पुकार मच उठी । जन्नत जैसा घर जहन्नुम में बदल गया ।परेशान हाल औरत ने अपने कानों पर हाथ धर लिए और आसमान की ओर मुंह उठा कर बोली-या अल्लाह रहम कर । साथ खडी घर की औरत ने सहम कर पूछा-क्या हुआ ?

– कुछ नहीं।

– कुछ तो है। आप फरमाइए।

– इस घर से बंटवारे की बदबू फिर उठ रही है। कहीं फिर नफरत की आग सुलग रही है। अफवाहों का धुआं छाया हुआ है। कभी यह घर मेरा था। एक मुसलमान औरत का। आज तुम्हारा है। कल… कल यह घर किसका होगा ? इस घर में कभी हिंदू रहते हैं तो कभी मुसलमान। अंधेर साईं का, कहर खुदा का।  इस घर में इंसान कब बसेंगे???

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – रोटी ☆ डॉ कुंवर प्रेमिल ☆

डॉ कुंवर प्रेमिल

(संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठतम साहित्यकार डॉ कुंवर प्रेमिल जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में सतत लेखन का अनुभव हैं। अब तक 350 से अधिक लघुकथाएं रचित एवं ग्यारह  पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन।  आपकी लघुकथा ‘पूर्वाभ्यास’ को उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव के द्वितीय वर्ष स्नातक पाठ्यक्रम सत्र 2019-20 में शामिल किया गया है। वरिष्ठतम  साहित्यकारों  की पीढ़ी ने  उम्र के इस पड़ाव पर आने तक जीवन की कई  सामाजिक समस्याओं से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है,जो कदाचित उनकी रचनाओं में झलकता है। हम लोग इस पीढ़ी का आशीर्वाद पाकर कृतज्ञ हैं।  आपने लघु कथा को लेकर कई  प्रयोग किये हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक लघुकथा ‘‘रोटी’’)

☆ लघुकथा – रोटी ☆ डॉ. कुंवर प्रेमिल 

एक पेड़ के नीचे बैठकर कुछ लोग रोटी चालीसा पढ़ रहे थे। पास ही में एक मलंग अपनी ढपली पर अपना राग सुना रहा था।

एक व्यक्ति बोला – जब से रोटी बनी है तब से वह अपने ही मूल स्वरूप में है, आकार प्रकार, लंबाई चौड़ाई, व्यास त्रिज्या, लगभग वही, थोड़ी बहुत ज्यादा थोड़ी बहुत कम।

दूसरा व्यक्ति बोला – स्पष्ट है कि उस लघु आकार रोटी में भूख है, वहशीपन, दरिंदगी है ,पागलपन गहरे बहुत गहरे तक छुपा है।

तीसरा व्यक्ति बोला-वही रोटी जब पेट में चली जाती है तब उमंग, सरलता, सौजन्यता, बुद्धि चातुर्य, साहित्य, कला, आनंद उत्सव ले आती है। रोटी जीवन है यार, इस असार संसार में रोटी वह नाव है जिससे जीवन नैया पार लगती है।

चौथा बोला – हां भाइयों, कितने रूप स्वरूप है रोटी के, जिसके भाग्य में जैसा रूप हासिल हो जाए, बड़ी कातिल होती है रोटी, इसने राजा हरिश्चंद्र को भी डोम की नौकरी करा दी थी।

सबकी बातें सुनकर मलंग बोला – बच्चों जरा मेरी और देखो, मेरे पास कुछ नहीं है। बिल्कुल फक्कड़ हूं, पर मुझे रोटी की कमी नहीं है। उस तरफ देखो एक महिला पत्तल में रोटी दाल लिए चली आ रही है।

उन लोगों को रोटी का गणित समझ के परे था।

© डॉ कुँवर प्रेमिल

संपर्क – एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मध्यप्रदेश मोबाइल 9301822782

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #132 – लघुकथा – “चोर !” ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा  “चोर !”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 132 ☆

☆ लघुकथा – “चोर !” ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

नए शिक्षक ने शाला प्रांगण में मोटरसाइकिल घुसाईं, तभी साथ चल रहे पुराने शिक्षक ने बाथरूम के ऊपर बैठे लड़के की ओर इशारा किया, “सरजी! यह रोज ही शाला भवन पर चढ़ जाता है।”

“आप उसे उतारते नहीं है?”

“इसे कुछ बोलो तो हमारे माथे आता है, यह शासकीय बिल्डिंग है आपकी नहीं।” कहते हुए वे बाथरूम के पास पहुंच गए।

“क्यों भाई, ऊपर चढ़ने का अभ्यास कर रहे हो?” नए शिक्षक ने मोटरसाइकिल रोकते हुए लड़के से कहा। जिसे सुनकर वह अचकचा गया,”क्या!” वह धीरे से इतना ही बोल पाया।

“यही कि दूसरों के भवन पर चढ़ने-उतरने का अभ्यास कर रहे हो। अच्छा है यह भविष्य में बहुत काम आएगा।”

यह सुन कर एकटक देखता रहा।

“बढ़िया है। अभ्यास करते रहो। कमाना-खाने नहीं जाना पड़ेगा।”

“क्या कहा सरजी?” वह सीधा बैठते हुए बोला।

“यही कि रात-बिरात दूसरों के घर में घुसने के लिए यह अभ्यास काम आएगा।”

यह सुनते ही लड़का नीचे उतर गया। सीधा मैदान के बाहर जाते हुए बोला, “सॉरी सर!”

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

18-10-2021 

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – [email protected]

मोबाइल – 9424079675

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अविराम ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

मकर संक्रांति रविवार 15 जनवरी को है। इस दिन सूर्योपासना अवश्य करें। साथ ही यथासंभव दान भी करें।

💥 माँ सरस्वती साधना 💥

 बीज मंत्र है,

।। ॐ सरस्वत्यै नम:।।

यह साधना गुरुवार 26 जनवरी तक चलेगी। इस साधना के साथ साधक प्रतिदिन कम से कम एक बार शारदा वंदना भी करें। यह इस प्रकार है,

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

? संजय दृष्टि – अविराम ??

सुनो, बहुत हो गया यह लिखना-लिखाना। मन उचट-सा गया है। यों भी पढ़ता कौन है आजकल?….अब कुछ दिनों के लिए विराम। इस दौरान कलम को छूऊँगा भी नहीं।

फिर…?

कुछ अलग करते हैं। कहीं लाँग ड्राइव पर निकलते हैं। जी भरके प्रकृति को निहारेंगे। शाम को पंडित जी का सुगम संगीत का कार्यक्रम है। लौटते हुए उसे भी सुनने चलेंगे।

उस रात उसने प्रकृति के वर्णन और सुगम संगीत के श्रवण पर दो संस्मरण लिखे।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कुंठा ☆ सुश्री अनीता श्रीवास्तव

सुश्री अनीता श्रीवास्तव

☆ कथा-कहानी ☆ कुंठा ☆ सुश्री अनीता श्रीवास्तव ☆

(पर्यावरण – प्रदूषण एवं उसके दूरगामी परिणामों पर आधारित एक विचारोत्तेजक कथा।) 

अमर को इस शहर में आए दो माह हो गए थे । ट्रांसफ़र के बाद हुए  डिस्टर्बेंस से अब निजात मिलने लगी थी। जीवन धीरे-धीरे व्यवस्थित हो चला था। बच्चों का स्कूल चालू हो गया था। मिनी और पिंटू क्रमशः आठ और ग्यारह साल के दो बच्चे थे आम बच्चों की ही तरह थोड़े नटखट, थोड़े होशियार । राखी उन्हें अपनी पलकों की छाँव में रखती ।  उनके हर क्रियाकलाप पर नज़र रखती। यूँ तो बाजार से कुछ भी लाना होता तो वह अमर को फोन कर देती थी। अगर वह फोन न भी करे और बच्चों की कोई मांग न भी हो तो भी अमर कभी ऑफिस से खाली हाथ नहीं आता था । एक पिता को शाम को खाली हाथ घर नहीं जाना चाहिए, खास कर जब घर में छोटे बच्चे हों। इस बात का अमर को एहसास था । नन्हीं मिनी तो पापा के चक्कर लगाने लगती थी। शायद पीछे कुछ छुपाया हो।  पिंटू भी प्रश्नवाचक निगाहों से उसे देखता। अमर को इस सब की इतनीं आदत हो गई थी कि वह शाम को घर पहुँचता तो एक पॉलिथीन का कैरीबैग हमेशा उसके हाथ में होता जिसमें कभी आइसक्रीम, कभी चिप्स – बिस्किट तो कभी फल या कुछ और होता । आज भी यही होने वाला था, लेकिन घटनाक्रम कुछ बदल गया। पिछले एक साल से वह मंगलवार को व्रत रखने लगा था। लंच ब्रेक में सिर्फ चाय पीता । आज उसने चाय पीते हुए एक पत्रिका हाथ मे ले ली। सभी साथी इधर-उधर निकल चुके थे। उपवास के कारण थोड़ी ऊर्जा कम लग रही थी इसलिए वह बाहर नहीं गया। चाय की चुस्कियाँ लेते हुए उसकी आँखें पृष्ठ पर बाएं से दाएं फिसलने लगीं । ।एक तस्वीर देख कर वे ठहर गईं  ..जैसे कि बहती नदी के बीच कोई चट्टान आ जाए। चित्र में समुद्र के बीच एक द्वीप दिख रहा था  जो रंग बिरंगा था। जितने टॉफी, बिस्किट, आइसक्रीम और चिप्स आदि के पैकिट उसने अब तक खरीदे थे उन सबके रंगीन आकर्षक लाल, नीले, काले रैपरों और पन्नियों से बना  यह द्वीप जहाज़ की तरह पानी की सतह पर बहा जाता था। । इस चित्र में वह इस तरह खो गया कि चित्र, चित्र न रहा चलचित्र हो गया … नीचे लिखी इबारत पढ़ कर उसके कान खड़े हो गए। प्रतिदिन सैकड़ों लोग समुद्र किनारे…बीच पर सैर-सपाटा करने जाते हैं। वहीं खाते-पीते हैं और पॉलिथीन के खाली पैकिट वहीं छोड़ आते हैं। समुद्र में जब ज्वार आता है तो ये सारा कचरा लहरों के साथ समुद्र में चला जाता है।  इस तरह की पन्नियों का यह कचरा एक साथ एक जगह पर  द्वीप की शक्ल में समंदर की सतह पर तैरते रहता है।  रंग बिरंगी पन्नियों से बना द्वीप…..क्या हैरानी की बात है! ये मुंबई वासी भी कितने लापरवाह हैं।अभी पिछली बारिश में बाढ़ की विभीषिका भुगत चुके हैं । जबकि बारिश थोड़ी ही हुई थी लेकिन इतने में ही शहर पानी-पानी हो गया था। महानगर का जल निकासी तंत्र अर्थात ड्रेनेज सिस्टम , जगह-जगह पॉलिथीन फंसी होने से  बाधित हो गया था।

अमर ने मेज़ पर मुक्का मरते हुए कहा ये पन्नियाँ हमें बर्बाद कर देंगीं । लेकिन किया भी क्या जाए ?  ये इतनीं सुविधाजनक जो हैं। हर जगह उपलब्ध हैं।

उसने आराम करने की गरज से कुर्सी के टिकने वाले हिस्से पर दोनों हाथ रखे फिर उन पर सिर टिका लिया। सहज ही ऊपर दृष्टि ऊपर की ओर चली गई और दीवार पर लगी एक पेंटिंग पर जा कर स्थिर हो गई। पेंटिंग में किसी आदर्श ग्रामीण परिवेश को चित्रित किया गया था । अमर उस सुरम्य ग्राम में मानसिक प्रवेश कर गया । वाह! वे  भी क्या दिन थे । सामान लेने के उद्देश्य से घर से निकलो तो  थैला हाथ में लो। पुरानी पेंट के बने थैले , जो अम्मां के हाथों के कौशल से मजबूत और डिजाइनदार बन जाते थे।  वैसे बाबू जी जूट या सूती कपड़े से बने थैले भी बाजार से लाते ही थे । पहले इत्मिनान से सामान की सूची बनती। अम्मां रसोई का सामान लिखवातीं, फिर हम बच्चे अपनी आवश्यकताएँ गिनाते। अधिक समान होने पर एक से अधिक थैले ले जाने पड़ते। तब एक थैले में बाकी थैलों को तहा कर रख लिया जाता।।तेल – घी के लिये खाली डिब्बा या कैन ले जाना होता। अम्माँ की बाबू जी को, खास हिदायत होती आंखें बंद कर के मत उठा लाना , सब सामान देख-भाल कर लाना । बाबू जी हाथ पर मल कर ,फिर सूंघ कर देखते कि घी नकली है या असली। ।आसपास के गांव से छोटे किसान और पशुपालक अपना घी व्यापारियों को बेच जाते थे। यह घी दुकानों से फिर घरों तक पहुंचता था।  अब तो हमें पता ही नही होता हम जो रैपर में सजा हुआ खाद्य पदार्थ घर ले कर जा रहे हैं उसका कच्चा माल किस गाँव से आया होगा।  सिर्फ उत्पादक की निर्माता कंपनी या ब्रांड का नाम ही पढ़ने में आता है।

“हा हा हा एक किलो भिंडी होती ही कितनी है शर्मा जी । ख़ाँमख़ाँ भाभी जी को परेशान करते हो , आप ही लेते जाना।” ये मनोहर जी थे जो अमर के सहकर्मी थे और एक दूसरे साथी परेश कुमार शर्मा जी को अपनी बेशकीमती सलाह दे रहे थे।

“लेकिन मैं सब्जी के लिए थैला-वैला कुछ नहीं लाया घर से।“ परेश बाबू ने अपनी मजबूरी बताई। उनके स्कूटर की डिग्गी में एक थैला हमेशा पड़ा रहता था।

“पॉलीथीन के कैरीबैग में  लेते जाइये। शर्मा जी ! ज़माना कहीं का कहीं पहुँच गया और आप अभी तक थैले-थैलियों में ही अटके हैं।” मनोहर जी , शर्मा जी का मज़ाक उड़ा रहे थे।

बातचीत के इस शोर ने अमर को वास्तविकता के धरातल पर लाने का काम किया। तस्वीर से उतर कर उसकी दृष्टि पुनः पत्रिका के चित्र पर ठहर गई जो कि अब पहले से भी ज्यादा भयानक लग रहा था। शाम को जब अमर घर पहुंच तो उसके हाथ मे थोड़े से फल थे बच्चे फल खाने में उतनी रुचि नहीं दिख रहे थे जितनी चिप्स खाने में दिखाते हैं। इसीलिए बेमन से मिनी रसोई में जा कर माँ के पास खड़ी हो गई। मञ लौकी छिल रही थीं । छिलके और कुछ बचा हुआ भोजन माँ ने एक पॉलीथिन में डाला और बोलीं, “मिनी ज़रा इसे डस्टबिन में डाल आओ।”

मिनी ठुनक कर बोली, “मुझ से कचरा फिंकवाती हो?”

माँ ने बड़े प्यार से कहा,” नहीं मेरी प्यारी गुड़िया, इसमें कचरा नहीं है।ये तो छिलके हैं और थोड़ा तुम्हारे टिफिन का बचा हुआ खाना है।”

मिनी ने देखा डस्टबिन के चारों ओर कचरा फैला हुआ था।लोग दूर से ही कचरा फैंका करते जो थोड़ा बहुत बाहर भी गिर जाता था।मिनी को भी पास जाने में घिन आ रही थी ।उसने भी दूर से ही पन्नी फेंकी । मगर वह डस्टबिन में न जा कर बाहर ही गिर गई।अमर बालकनी में खड़ा ये दृश्य देख रहा था। वह तुरन्त राखी पर चिल्लाया, “ बच्ची को कचरा फैंकने मत भेजा करो।”

राखी ने फिर उसी तरह सफाई दी, “कचरा नहीं है, छिलके और कुछ बचा हुआ खाना है ।बस।”

अमर के मन में आज एक नई चेतना उमंग रही थी । उसने और तेज़ हो कर कहा, “ये तुमने क्या किया? खाने – पीने की चीज़ तो पन्नी में डाल कर नहीं फिकवाना थी।”

“तुमको लगता है गाय पन्नी सहित खाना निगल जाएगी?”

“तो क्या गांठ खोल कर खाना निकालेगी फिर खाएगी?”

“ऐसा कुछ नहीं होगा।मैंने पन्नी में सिर्फ एक अंटा लगाया है जो फेंकते ही खुल गया होगा। वैसे भी यहां गाय कम ही आती है।” राखी ने अमर को आश्वस्त करने की कोशिश की।

अमर ने पुनः गर्दन घुमाई तो देखा मिनी नाक दबा कर वहाँ से भागी आ रही है। अगले दिन रविवार था।हफ्ते भर की थकान मिटा कर सोमवार को जब अमर ऑफिस के लिए तैयार हुआ तो एकदम तरोताज़ा था। दोनों बच्चे स्कूल जा चुके थे। राखी ने चम्मच प्लेट की खटपट के बीच मेज़ पर नष्ट लगाया और दोनों खाने बैठ गए।

अमर, “मैंने एक प्रण किया है, यानी रिसोल्यूशन.””

राखी, “ कैसा रिसोल्यूशन?”

अमर, “ यही की आज से हम लोग बाजार से पॉलिथीन के बने कैरीबैग में कुछ भी नहीं लाएँगे।”

राखी की हंसी निकल गई। मुख से निवाला गिरते- गिराए बचा। बोली, “ तो कैसे लाएँगे।”

“ घर से थैला ले कर निकलेंगे।

“ और अगर अचानक याद आए कि कुछ लेना है तो?”

“ उसका भी तोड़ है । मैं हमेशा गाड़ी की डिग्गी में एक थैला रखूँगा । तुम ऐसा करने में मेरी मदद करोगी।”

राखी को अमर की आंखों में भावुकता नज़र आई । उसका लहज़ा ऐसा था कि हाँ कहना पड़ा ।  इन्हीं बातों के साथ अमर ने नष्ट खत्म किया और ऑफिस के निकल पड़ा। अभी कुछ ही दूर निकला था कि लोगों का झुंड दिखाई दिया। अमर गाड़ी छोड़, वहां पहुंच गया।  उसने देखा एक गाय मरी पड़ी थी । उसका पेट फूला हुआ था । मुंह से झाग निकल रहा था।  गर्दन और शरीर  अकड़ा हुआ था मानो असहनीय पीड़ा भोग कर मरी हो । लोग सवाल-जवाब में उलझे थे ।

“ ये यहाँ आई कैसे?”

“मौत ले आई !”

“ठीक कहते हो भाई । यहीं कचरे के आस;पास डोलते देखा था मैंने इसे।”

“ भूखी होगी।”

“ ऐसे निर्दयी लोग हैं । मवेशियों के खाना-खुराक का ध्यान नहीं रखते बस दुहना जानते हैं ।”

“ हो न हो जूठन- छिलका आदि के साथ-साथ गाय पन्नी भी खा गई। पन्नी इसकी आँतों में  फंस कर रह गई होगी । पेट दर्द से तड़पी होगी। देखो…. इसकी देह पर कितनी धूल- मिट्टी चिपकी है ।”

“नगरनिगम वालों को फोन करो।”

“ हाँ हाँ फोन करो, आ कर उठा ले जाएं ।”

अमर अब घर की ओर लौट रहा था। लुटा हुआ सा।उदास….आत्मग्लानि से भरा हुआ … जैसे गाय को उसीने मार डाला हो। जाने क्यों उसे लग रहा था गाय ने वही पॉलिथीन खाई होगी जो उस दिन मिनी ने लौकी के छिलके और टिफिन का बचा हुआ खाना रख कर फेंकी थी….और जिसमें राखी ने सिर्फ एक अंटा लगाया …. और जो फेंकते ही खुल जानी थी मगर मिनी ने बजाय फैंकने के उसे सड़क पर ही छोड़ दिया। हाँ…. शायद… नहीं- नहीं पक्का….ये वही पॉलीथिन है।

तो क्या उसे गऊ-हत्या का पाप लगेगा? उनको नहीं लगेगा जो पन्नी में समान बेचते हैं? इनको भी नहीं जो पॉलीथिन बनाते हैं? विचारों की यह श्रृंखला जन्म ही न लेती अगर वह आज फिर पन्नी में फल न लाया होता। वह स्वयं को एक हत्यारा मानने लगा …इतना बड़ा पातक! बचना कितना आसान। पॉलिथीन का बहिष्कार।

© सुश्री अनीता श्रीवास्तव

मऊचुंगी, टीकमगढ़ म प्र

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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