हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-18 – डायरी में कितने नाम कट गये! ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-18 – डायरी में कितने नाम कट गये! ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(प्रत्येक शनिवार प्रस्तुत है – साप्ताहिक स्तम्भ – “मेरी यादों में जालंधर”)

ये यादें भी क्या चीज़ हैं कि किधर से किधर ले जाती हैं, उंगली पकड़कर ! आज याद आ रहे हैं वे युवा महोत्सवों के दिन ! जिनके दो लोग बहुत याद आ रहे हैं ! पहले हैं अशोक प्लेटो  जो बहुत ही प्रभावशाली वक्ता ही नहीं, कवि भी थे ! उनकी एक कविता की कुछ पंक्तियां आज तक नहीं भूलीं, वे सामने वाले का नाम लेकर कहते :

कमलेश ! तुम भेड़ तो नहीं हो

फिर भीड़ में शामिल क्यों हो ?

यानी वे सामने वाले को अलग हटकर अपनी हैसियत व जगह बनाने का आह्वान करते ! वे भाषण प्रतियोगिता में मेरे ध्यान में कभी प्रथम पुरस्कार से कम नहीं आते ! वे हिमाचल के कुछ महाविद्यालयों में प्राचार्य नियुक्त हुए लेकिन जालंधर उन्हें खींच कर  फिर ले आता और वे मोहन राकेश की तरह जैसे जेब में ही त्यागपत्र रखते थे ! आखिरकार वे पंजाब केसरी में उपसंपादक हो गये !  वे संस्कृत की विदुषी और डाॅ कैलाश भारद्वाज की पत्नी डाॅ सरला भारद्वाज के भाई थे। डाॅ सरला भारद्वाज को एक साल हिसार के ब्रहम विद्यालय की ओर से सम्मानित भी किया गया और वे सीधे हमारे ही घर आईं और इस तरह दोआबा की खुशबू जैसे मेरे घर आई, वही दोआबा, जिसकी मिट्टी से मैं बना हूँ ! आह! फिर अशोक प्लेटो न रहे। वे आपातकाल में दोस्तों से मज़ाक में कहते कि आपके घर चुपके से मार्क्स की किताब रख दूंगा और पुलिस को खबर कर दूंगा, फिर पकड़े जाओगे ! असल में वे अभिव्यक्ति के खतरों के प्रति अपनी आवाज को इस तरह पेश करते थे।

दूसरी याद हैं रीटा शर्मा, जो बाद में रीटा शौकीन बनीं ! वे भी हमारे काॅलेज के दिनों में काव्य पाठ प्रतियोगिताओं में एक ही कविता पढ़तीं :

मैं, तुम, हम सब कोढ़ी हैं!

और काव्य पाठ में प्रथम पुरस्कार ले उड़तीं, हम दूसरे प्रतिभागी देखते ही रह जाते ! फिर‌ वे चंडीगढ़ आ गयीं और थियेटर में आईं और एक नाटक तैयार किया-गुडमैन दी लालटेन‌, जिसे भव्य स्तर पर पंजाब के अनेक शहरों में मंचित किया, इनमें हमारा नवांशहर भी एक रहा और यही हमारी अब तक की आखिरी मुलाकात रही! यह नाटक सतलुज सिनेमा में म़चित किया गया !

जीवन के लम्बे सफर में बहुत लोग छूट जाते हैं, जैसे गाड़ी के मुसाफिर अलग अलग स्टेशन पर उतर जाते हैं, वैसे ही कितने परिचित चेहरे हमारी नज़रों से ओझल हो जाते हैं। इस स्थिति को मैंने अपनी एक कविता- डायरी के पन्ने में व्यक्त करने की कोशिश की है। यह कविता ‘पंजाबी ट्रिब्यून’ के संपादक और प्रसिद्ध कवि हरभजन हल्वारवी के निधन की खबर पढ़ते ही लिखी गयी थी ! वे मुझे बहुत मानते थे और कई बार संपादक विजय सहगल के सामने कहते, सहगल जी, जी करता है कि कमलेश को मैं आपसे उधार मांगकर, ट्रांसफर करवा कर पंजाबी ट्रिब्यून में ले लूं‌! उन्होंने मुझसे पंजाबी में भी लिखवाया भी ! जब उनका निधन हुआ तब मैं हिसार में था और उन्हें याद कर एक कविता लिखी,  जो भास्कर की मधुरिमा में प्रकाशित हुई, जब मैंने दैनिक ट्रिब्यून छोड़ दिया था! कुछ अंशों के साथ आज समाप्त करता हूँ अपनी बात :

:कभी ऐसा भी होता है /कि पता चलता है कि /लिखे नाम और पते वाला आदमी /इस दुनिया से विदा हो गया। /तब डायरी पर देर तक /देखता रह जाता हूं,,,/सब याद आने लगता है /कब, कहां मिले थे /कितने हंसे और कितने रोये थे। /आंखें नम होने लगती हैं,,,/बेशक नहीं जा पाता /उसकी अंतिम विदा बेला में /पर लगता है /जीवन का कुछ छूट गया /भीतर ही

भीतर कुछ टूट गया। /कोई अपना चला गया। /डायरी से नाम काटते वक्त

बहुत अजीब लगता है।

आज बस इतना ही! कल फिर कोशिश‌ रहेगी, कुछ नये  अलग लोगों को याद करने की!

क्रमशः…. 

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मेरी डायरी के पन्ने से # 10 – संस्मरण # 4 – एक और गौरा ☆ सुश्री ऋता सिंह ☆

सुश्री ऋता सिंह

(सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुश्री ऋता सिंह जी द्वारा ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपने यात्रा संस्मरणों पर आधारित आलेख श्रृंखला को स्नेह प्रतिसाद के लिए आभार।आज प्रस्तुत है आपकी डायरी के पन्ने से …  – संस्मरण – एक और गौरा)

? मेरी डायरी के पन्ने से # 10 – संस्मरण # 4 – एक और गौरा ?

श्रावणी मासी मोहल्ले भर में प्रसिद्ध थीं। सबके साथ उठना – बैठना, सुख-दुख  में पास आकर सहारा देना उनका स्वभाव था। स्नान के बाद सिर पर एक गमछा बाँधकर वह दिन में एक दो परिवारों का हालचाल ज़रूर  पूछ आतीं  पर एक बात उनकी ख़ास थीं कि वे स्वयं कभी किसी से किसी प्रकार की चर्चा न करतीं,यहाँ का वहाँ न करतीं जिस कारण सभी अपनी पारिवारिक समस्याएँ उनके सामने रखते।

वे किसी से सहायता की अपेक्षा कभी नहीं रखतीं थीं। वे स्वयं सक्षम, समर्थ और साहसी महिला थीं। निरक्षर थीं वे पर अनुभवों का भंडार  थीं। समझदार बुद्धिमती तथा सकारात्मक दृष्टिकोण रखनेवाली स्त्री।

किसी ज़माने में जब हमारा शहर इतना फैला न था तो नारायण मौसाजी ने सस्ते में ज़मीन खरीद ली थी और एक पक्का मकान खड़ा कर लिया था। घर के आगे – पीछे खूब ख़ाली ज़मीन थी। श्रावणी मासी आज भी खूब रोज़मर्रा लगनेवाली सब्ज़ियांँ अपने बंगले के पिछवाड़े वाली उपजाऊ भूमि पर उगाती हैं। उन सब्ज़ियों का स्वाद हम मोहल्लेवाले भी लेते हैं। अपने तीनों बेटों के हर जन्मदिन पर वे पेड़ लगवाती, पर्यावरण से बच्चों को अवगत करातीं। आज उनके जवान बच्चों के साथ वृक्ष भी फलदार हो गए। आम,जामुन,अनार,अमरूद,सीताफल, पपीता , कटहल, कदली , चीकू , सहजन के पेड़ लगे हैं उनके बगीचे में। खूब फल लगते और मोहल्ले में बँटते हैं। आर्गेनिक फल और सब्जियाँ! पीपल, अमलतास , गुलमोहर वट, नीम के भी वृक्ष लगे हैं। हम सबके बच्चों ने पेड़ पर चढ़ना भी यहीं पर तो सीखा है।

अब शहर बड़ा हो गया, चारों ओर ऊँची इमारतें तन गईं, और उनके बीच श्रावणी मासीजी का बंगला पेड़ – पौधों से भरा हुआ खूब अच्छा दिखता है। कई बिल्डरों ने कई प्रलोभन दिए पर मासीजी का मन न ललचाया।

अब तीनों बेटे ब्याहे गए । घर में खूब हलचल है। बेटे भी सब पर्यावरण के क्षेत्र में काम करते हैं। पूरा परिवार प्रसन्न है।

अचानक सुनने में आया कि मासी जी के घर बछड़ा समेत एक सफ़ेद गाय लाई गई। गोठ बनाई गई , उसकी सेवा के लिए एक ग्वाला नियुक्त किया गया। अब हम सबको दही, घी, मट्ठ़े का भी प्रसाद मिलने लगा।

बार – बार सबके पूछने पर कि मासीजी को गाय खरीदने की जरूरत क्यों पड़ी भला! आज के आधुनिक युग में भी भला कोई गाय पालता है! कितनी गंदगी होगी, बुढ़ापे में काम बढ़ेगा कैसे संभालेंगी वे ये सब!

एक दिन श्रावणी मासी जी ने यह कहकर सबका मुँह बंद करवा दिया कि, अब तक आप सब आर्गेनिक सब्ज़ियों और फलों का आनंद लेते रहे । अब अपनी आनेवाली अगली पीढ़ी को भी शुद्ध दूध-दही,छाछ- मट्ठ़ा और घी- मक्खन खाकर पालेंगी।

आल आर्गेनिक थिंग्स। दूध भी आर्गेनिक,। हम सब मासीजी की बात पर हँस पड़े।

वे बोलीं, मेरी दो बहुएँ गर्भ से हैं। ये व्यवस्था उनके लिए है।आनेवाली पीढ़ी शुद्ध वस्तुओं के सेवन से स्वस्थ, ताकतवर बनेगी। इसकी शुरुआत मैं अब आनेवाले मेरे पोते-पोतियों से करती हूँ। श्रावणी मासी जी की दूरदृष्टि को सलाम।

मुझे महादेवी वर्मा जी की ‘ गौरा ‘ याद आ गई। जो किसी की ईर्ष्या का शिकार हो गई थी और तड़पकर मृत्यु मुखी हुई। और यहाँ आज एक गाय अपने बछड़े समेत खूब देख- भाल और सेवा पा  रही है। बछड़े का भी भविष्य उज्जवल है और आनेवाली पीढ़ी का भी। दोनों तंदरुस्त होंगे।

© सुश्री ऋता सिंह

फोन नं 9822188517

ईमेल आई डी – ritanani[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १२ ☆ डॉ. रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व डॉ. रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत”के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)

आप गत अंकों में प्रकाशित विभूतियों की जानकारियों के बारे में निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं –

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १ ☆ कहाँ गए वे लोग – “पंडित भवानी प्रसाद तिवारी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २ ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३ ☆ यादों में सुमित्र जी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४ ☆ गुरुभक्त: कालीबाई ☆ सुश्री बसन्ती पवांर ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५ ☆ व्यंग्यकार श्रीबाल पाण्डेय ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ६ ☆ “जन संत : विद्यासागर” ☆ श्री अभिमन्यु जैन ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ७ ☆ “स्व गणेश प्रसाद नायक” – लेखक – श्री मनोहर नायक ☆ प्रस्तुति  – श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ८ ☆ “बुंदेली की पाठशाला- डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ९ ☆ “आदर्श पत्रकार व चिंतक थे अजित वर्मा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ११ – “स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव उर्फ़ ऊँट बिलहरीवी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

☆ कहाँ गए वे लोग # १२ ☆

☆ डॉ. रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

डॉ. रामदयाल कोष्टा साधना से बने “श्रीकांत”

डॉ.रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत” के नामोल्लेख के साथ ही एक श्याम रंग का सुदर्शन व हंसमुख व्यक्तित्व आंखों के सामने आ जाता है। जब मेरा उनसे परिचय हुआ तब मैं कक्षा चौथी का छात्र था और वे हितकारिणी सिटी कालेज से एम. ए. कर रहे थे। वे मेरे पिता स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव के प्रिय छात्र थे। अब डॉ. श्रीकांत हमारे बीच नहीं हैं और जब उन पर कुछ कहने अथवा लिखने का विचार आया तो दुविधा खड़ी हो गई। उस बहुआयामी व्यक्तित्व के किस रूप पर, किस गुण पर, किस कार्य पर लिखूं ? स्कूल – कालेज के विद्वान विनोदी व लोकप्रिय शिक्षक कोष्टा जी पर, अपने गुरुओं के प्रिय शिष्य कोष्टा जी पर, अनोखी स्मरण शक्ति के धनी, ज्ञान पिपासु, हिंदी साहित्य के एम. ए. “गोल्ड मेडलिस्ट”, मानस मर्मज्ञ डॉ. रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत” पर, वर्तमान धरातल पर मानस के सहज व्याख्याकार प्रखर वक्ता डॉ. श्रीकांत पर, सुयोग्य पत्रकार – संपादक डॉ. श्रीकांत पर, कोष्टा समाज को विकास की धारा से जोड़ने व सदा उनके मार्गदर्शन को उत्सुक रहने वाले डॉ. कोष्टा पर, पंडित रामकिंकर के प्रिय शिष्य, बनारस की व्यास गद्दी प्राप्त प्रथम गैर ब्राह्मण डॉ. कोष्टा पर जिसने अवसर आने पर भी अपने हितों के लिए अपने सिद्धांत, निष्ठाएं और मित्रों को नहीं छोड़ा उस डॉ. कोष्टा पर, माता – पिता के अच्छे पुत्र, एक अच्छे भाई, अच्छे पति, अच्छे पिता कोष्टा पर या विद्यार्थी एवं युवाकाल में दंगल जीतकर ढोल और प्रशंसकों के साथ माला पहने हुए घर लौटने वाले रामदयाल कोष्टा पर। कोष्टा जी का जीवन विविध रंगों – प्रसंगों से भरा रहा, वे हरफन मौला थे। उन्होंने जीवन के हर रंग व प्रसंग के साथ पूरा न्याय किया, उसे पूरी तरह से जिया। कभी – कभी उनकी जीवनी शक्ति व कार्य करने की अद्भुत क्षमता पर आश्चर्य होता है की वे कैसे एक ही जीवन काल में इतना सब कर सके ! उन्हें मैं भाई साहब कहता था, जब उनकी याद आती है तो ऐसा लगता है कि वे बहुत जल्दी चले गए। उनका बहुत कुछ करना शेष रह गया।

जब डॉ. कोष्टा के रूप में प्रथम बार किसी गैर ब्राह्मण मानस विद्वान को बनारस की व्यास गद्दी प्राप्त हुई और उन्होंने इस उपलब्धि पर अपने गुरु याने मेरे पिता डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव के चरण स्पर्श किए तो मेरे पिता ने जो आशीर्वचन कहे, मुझे अभी तक याद हैं। “कोष्टा, गुरु का मूल्यांकन उसके शिष्यों से होता है, मुझे तुम्हारे जैसे बुद्धिमान और योग्य शिष्य पर गर्व है। ये छोटी – छोटी उपलब्धियां और सम्मान तुम्हारी मंजिल नहीं पड़ाव हैं। ” वास्तव में कोष्टा जी के ज्ञानार्जन एवं व्यक्तित्व विकास में कभी भी ठहराव नहीं आया। उन्होंने डी. एन. जैन महाविद्यालय के प्रोफेसर के रूप में सेवानिवृत्ति प्राप्त कर स्वतः के संपादकत्व में धार्मिक – आध्यात्मिक पत्रिका “रामायणम्” का प्रकाशन प्रारंभ किया। उनके संपादन में प्रकाशित “रामायणम्” के अंक राम कथा – आध्यात्म की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने जबलपुर नगर से प्रकाशित “हितवाद” एवं  “ज्ञानयुग प्रभात” समाचार पत्रों में भी समाचार संपादन का कार्य कर यश प्राप्त किया।

डॉ. रामदयाल कोष्टा ने रामचरित मानस का अर्थ सही मायने में समझा और अन्य व्याख्याकारों के मुकाबले अधिक सरसता, सहजता के साथ ग्राह्य बना कर प्रस्तुत कर सके। उन्होंने पंडित रामकिंकर जी के प्रवचनों की अनेक पुस्तकें एवं आडियो कैसेट्स भी अपने नेतृत्व व संपादन में तैयार करवाए और उन्हें जन – जन को सुलभ कराया। उनकी अध्यापन शैली विनोदपूर्ण और ऐसी चमत्कारिक थी कि छात्र मंत्र मुग्ध होकर उनके व्याख्यान सुनते थे। डॉ. कोष्टा अपने अंतरंगों के बीच विशिष्ट अवसरों पर बहुत मधुर स्वर में लोकगीतों का गायन भी करते थे। उनमें सुनी अथवा पढ़ी बातों को याद रखने की अद्भुत क्षमता थी। किसी संस्मरण को वे इस तरह प्रस्तुत करना जानते थे कि श्रोताओं के सामने उस प्रसंग का जीवंत दृश्य व वातावरण ही उपस्थित हो जाता था।

बैठकों – सभाओं अथवा परिचितों के बीच जहां भी डॉ. कोष्टा होते वहां का वातावरण उनकी उपस्थिति से जीवंत हो उठता, वहां बीच बीच में प्रसंग वश उनके ठहाके अवश्य गूंजते। मैंने उन्हें बड़ी से बड़ी परेशानियों और विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य खोते नहीं देखा। उनकी जिज्ञासा, ज्ञान पिपासा, अध्ययन, लोगों के प्रति विश्वसनीयता, कर्तव्य के प्रति समर्पण, गुरु भक्ति, ईश्वर पर आस्था, निश्छल और मधुर व्यवहार, कर्मठता तथा विश्वास भरी वाणी ने उनके व्यक्तित्व में सम्मोहन पैदा कर दिया था। संभवतः इन्हीं गुणों के प्रतिफल ने उन्हें आम आदमी से अलग “श्रीकांत” बना दिया। अनेक साहित्यिक व सामाजिक संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया। 10 अप्रैल 1933 को जबलपुर में जन्में डॉ. कोष्टा 16 दिसंबर 1998 को चिर निद्रा में लीन हो गए। उनके कार्य नई पीढ़ी का पथ प्रदर्शन करते रहेंगे।

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संकलन –  जय प्रकाश पाण्डेय

संपर्क – 416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-17 – क्या मोहन राकेश ही कालिदास तो नहीं थे? ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-17 – क्या मोहन राकेश ही कालिदास तो नहीं थे? ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(प्रत्येक शनिवार प्रस्तुत है – साप्ताहिक स्तम्भ – “मेरी यादों में जालंधर”)

पता नहीं, किधर से किधर , यादों की गलियों में निकल जाता हूँ और बहुत बार यादों में खोया-खोया, किसी एक में पूरी तरह खो जाता हूँ। आज जालंधर के बहाने पंजाब के ही नहीं, देश के प्रसिद्ध नाटककार मोहन राकेश की ओर वापस आ रहा हूँ। उनके ठहाके आज भी जालंधर के पुराने लेखकों को याद हैं, उन ठहाकों के पीछे का दर्द कम ही लोग जानते हैं! जगजीत सिंह की गायी ग़ज़ल जैसी हालत है :

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या गम है, जिसको छुपा रहे हो!.

मोहन राकेश के हाथों में शादी की सही लकीर नहीं थी! तीन तीन शादियों के बावजूद वे ठहाकों के पीछे अपना दर्द छिपाते रहे! पर उनके नाटकों की ओर आता हूँ।

मोहन राकेश ने जीवन में तीन नाटक लिखे-आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और‌ आधे अधूरे। चौथा नाटक  पूरा नहीं कर पाये, जिसे बाद में उनके कथाकार  त्रयी में से एक मित्र कमलेश्वर ने ‘पैर तले की ज़मीन’ के रूप में पूरा किया। ‘आषाढ़ का एक दिन’ से ‘आधे अधूरे’ तक तीनों नाटक खूब पढ़े ही नहीं देश भर में खूब मंचित किये जा रहे हैं ! आषाढ़ का एक दिन पंजाब विश्वविद्यालय के थियेटर विभाग में दैनिक ट्रिब्यून के शुरुआती दिनों में देखा था ओर संयोग देखिये कि मल्लिका के रूप में भावपूर्ण अभिनय करने वाली छात्रा को आज भी जानता हूँ ओर वे हैं वंदना राजीव भाटिया! हिसार के ही ऱगकर्मी राजीव भाटिया की पत्नी। इस नाटक में कालिदास की प्रेमिका की भूमिका बहुत ही भावनाओ में बहकर निभाने वाली वंदना को कैसे भूल सकता हूँ! वह भी राजीव भाटिया के साथ मुम्बई रहती हैं और कुछेक विज्ञापनों में अचानक देखा है वंदना को! मुम्बई सबकी कला का सही इस्तेमाल कहाँ करती है! यह बात प्रसिद्ध अभिनेत्री दीप्ति नवल ने मेरे साथ फोन पर हुई इंटरव्यू में कही थी कि मैं बाकायदा कत्थक नृत्य प्रशिक्षित थी लेकिन किसी भी निर्देशक ने किसी भी फिल्म में मेरी इस कला का कोई उपयोग नहीं किया! मुझे यह खुशी है कि दीप्ति नवल के पिता हमारे नवांशहर के ही थे और‌ दीप्ति नवल कभी भी नवांशहर आ सकती हैं, अपने पिता के शोरियां मोहल्ले में! खैर, हम बात कर रहे थे, मोहन राकेश के नाटकों की ! आषाढ़ का एक दिन का आखिरी संवाद है कि क्योंकि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता ! कालिदास राजा के आमंत्रण पर राज दरबार में जाना नहीं चाहता लेकिन मल्लिका जैसे कैसै मना कर कालिदास को भेजती है लेकिन उसकी माँ कहती है कि वह तुम्हें साथ क्यों नहीं लेकर गया तब मल्लिका कहती है कि भावनाओं को आप नही समझोगी, मां! मैने भावना में भावना का वरन किया है और मल्लिका कालिदास से खामोश प्यार करती रहती है जबकि उसकी शादी विलोम से हो जाती है। जब सब कुछ गंवा कर कालिदास वापस मल्लिका के पास आता है तब मल्लिका उसे भोजपत्रों का पुलिंदा यह कहकर सौ़पती है कि सोचा था, यह आपको दूंगी ताकि इस पर कोई ग्रंथ लिख सको! कालिदास उन भोजपत्रों को यह कह कर लौटा देता है कि इन पर तो पहले ही एक ग्र्ंथ की रचना हो चुकी है यानी उन पन्नों पर मल्लिका के कालिदास के वियोग के बहाये आंसू दिखते हैं ! यह नाटक एन एस डी से लेकर न जाने देश के किस किस कोने में मंचित नहीं किया गया! यही हाल लहरों के राज हंस का रहा और आधे अधूरे का भी! लहरों के राजहंस में संवाद देखिये जो ऩंद की पत्नी कहती है कि नारी का आकर्षण पुरुष को पुरुष बनाता है तो नारी का अपकर्षण उसे महात्मा बुद्ध बना देता है ! आखिर मे़ ऩंद लहरों के राज़हंस की तरह पत्नी सु़दरी को कहता है कि मैं जाकर बुद्ध से पूछूँगा कि उसने मेरे बालों का क्या किया? यह है इंसान‌ जो लहरों के राजहंसो़ की तरह अपने ही फैसले बदलता रहता है !

अंतिम नाटक आधे अधूरे आज के समाज को आइना दिखाने के लिए काफी है कि हम सब आधी अधूरी ख्वाहिशों के साथ जीते हैं! इस नाटक का आइडिया मोहन राकेश को उनकी पत्नी अनिता राकेश ने ही दिया था और इसकी भावभूमि उनकी ससुराल ही थी!

आज काफी हो गया! कल फिर मिलते हैं! कभी कभी बता दिया कीजिये कुछ तो!

क्रमशः…. 

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मेरी डायरी के पन्ने से # 9 – संस्मरण#3 – ☆ सुश्री ऋता सिंह ☆

सुश्री ऋता सिंह

(सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुश्री ऋता सिंह जी द्वारा ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपने यात्रा संस्मरणों पर आधारित आलेख श्रृंखला को स्नेह प्रतिसाद के लिए आभार।आज प्रस्तुत है आपकी डायरी के पन्ने से …  – संस्मरण)

? मेरी डायरी के पन्ने से # 9 – संस्मरण#3 ?

हमारी पीढ़ी ने अवश्य ही सख्त डाँट, मार खाई है और समय पड़ने पर जमकर कुटाई भी हमारी हुई है। संभव है इसमें लड़कियों की संख्या कम ही रही हो पर इस क्षेत्र के इतिहास में हमारा नाम स्वर्णाक्षरों में निश्चित ही लिखा गया है।

मैं अपने माता -पिता की चौथी संतान हूँ। मुझसे पहले दो बेटियों और एक बेटे को माँ जन्म दे चुकी थीं। मैं जब गर्भ में थी तो माँ ने संभवतः फिर बेटे की आस रखी होगी। माँ अक्सर कहती थीं कि मैं अगर लड़का होती तो वे मुझे आर्मी में भेज देतीं। तो निश्चित है गर्भावस्था में सपने भी बेटे को लेकर ही बुनी होंगी। पर दुर्भाग्य ही था कि मेरे रूप में पुत्री ने जन्म लिया। पर पुत्री स्वभाव और बर्ताव से पुत्र समान थी।

ख़ैर कुछ घटनाएँ जीवन में ऐसी घटी कि कूट-पीटकर मुझे सत्तू बना दिया गया पर हर पिटाई ने मेरे चरित्र और व्यक्तित्व को भी सँवार दिया।

घटना है 1960 की। मेरी उम्र थी चार वर्ष। हम कालिंगपॉग या कालिपुंग में रहते थे। यह पश्चिम बंगाल का पहाड़ी क्षेत्र है। बाबा रिसर्च साइंटिस्ट थे। बाबा अक्सर दार्जीलिंग और नाथुला पास अपने काम के सिलसिले में जाया करते थे।

उस दिन भी बाबा दार्जीलिंग गए हुए थे। कालिपुंग पहाड़ी शहर होने के कारण ठंड के दिनों में चार बजे के करीब वहाँ अँधेरा होने लगता है। बाबा घर लौट आए, देखा सब उदास बैठे हैं और माँ रो रही है। तीन बजे से मैं गायब थी। पड़ोसी मुझे ढूँढ़ने निकले थे। बाबा तुरंत कुछ और लोगों के साथ लाठी और बड़ा, लंबा टॉर्च लेकर बेचैनी से मुझे ढूँढ़ने निकले। हमारे घर से थोड़ी दूरी पर तिस्ता नदी बहती थी। दिन भर उसकी आवाज़ घर तक सुनाई देती थी। मैं उस दिन उसी आवाज़ के पीछे निकल गई थी।

बीच में एक घना जंगल था खास बड़ा नहीं था पर वहाँ अजगर और लकड़बग्घे काफी मात्रा में रहते थे। सबको इसी बात की चिंता और भय था कि अँधेरा हो जाने पर कहीं लकड़बग्घे मुझे उठा न ले जाए। तक़रीबन पौने पाँच के करीब हमारे पड़ोसी छिरपेंदा के पिता बहादुर काका मुझे गोद में उठाए घर ले आए।

मुझे माँ ने झट गोद में भर लिया होगा। खूब चूमा होगा, वात्सल्य ने आँसू बहाए होंगे। मैं तो अभी चार ही साल की थी तो घटना स्मरण नहीं। पर बाबा जब लौटे तो चार वर्ष की उस अबोध बालिका पर ऐसे बरसे मानो तिस्ता पर बना पुल टूटा हो और पानी सारा शहर में घुस आया हो! खूब मार पड़ी, बाबा कहते रहे, ” आर जाबी कखूनो तिस्ता नोदीर धारे?”

(अर्थात फिर जाओगी कभी तिस्ता नदी किनारे) मैं तो भारी मार खाकर रो- रो कर सिसकती हुई सो हो गई। रात को अचानक मैं नींद में ही बाबा की छाती पर बैठ गई और उन्हें खूब मारा और कहती रही ” आर जाबी कखूनो तिस्ता नोदीर धारे?” मैं तो नींद में थी पर बाबा समझ गए कि मेरे कोमल हृदय पर उनकी मार का गहरा सदमा था। माँ कहती थीं कि बाबा रात भर मुझे अपनी छाती पर चिपकाकर सिसकते रहे। मुझे तो घटना स्मरण नहीं पर हाँ यह घटना कईबार हमारे घर में चर्चा का विषय रहा और मैं टारगेट।

उस घटना की बारंबार चर्चा ने मेरे मन पर एक अमिट बात की छाप छोड़ी है और वह है मैं आज भी बिना बताए कहीं नहीं जाती हूँ। घर में सबको पता होता है कि माँ इस वक्त कहाँ है। हमारी बेटियों को भी यही आदत है और नाती और नतिन भी सीख गए।

दूसरी बार मेरा भुर्ता बनाया गया था जब मैं नौ-दस दस वर्ष की थी। उन दिनों गुलैल मारना सीख ही रही थी कि दादा के मित्रों के कहने पर गुलैल मारकर पड़ोसी आजोबा के घर आँवले तोड़ने निकली थी और उनके घर के झरोखे का काँच तोड़ दिया था। आजोबा ने बाबा से शिकायत की तो जो मार पड़ी उसे याद कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शायद रुई भी उस तरह से नहीं धुनें जाते!

आजकल बलबीर के साथ जब टीवी पर WWE का खेल देखती हूँ तो मन-ही-मन प्रसन्न भी होती हूँ कि उस छोटी- सी उम्र में मेरे भीतर मार खाने की प्रचंड क्षमता भी थी। मार सहन करना भी बड़ी ताकत की बात है!यह सबके लिए संभव नहीं। इसके लिए अदम्य साहस, शक्ति, मनोबल की आवश्यकता होती है।

उस घटना के बाद मैं किसी के कहने में नहीं आती। जब तक मैं बात को परख न लूँ, जाँच न लूँ, मैं कन्विंस न हो जाऊँ तब तक मैं किसी बात को स्वीकार नहीं करती। इसके कारण एनालाइज करने की क्षमता बढ़ गई। कहते हैं न मुँह का जला छाछ भी फूँक-फूंँककर पीता है। साथ ही मैं मित्रता और उससे घनिष्ठता भी खूब परखकर ही करती हूँ।

एक और घटना स्मरण हो आया 1974 की। मैं फर्ग्यूसन कॉलेज में बी.ए पढ़ रही थी। गणेशखिंड रोड पर माता आनंदमयी का आश्रम है, मैं वहीं से बस पकड़ती थी। पिताजी के एक कलीग सुबह 6.30 बजे सैर करने निकलते थे। उन्हें मैं नहीं पहचानती थी। वे रोज़ मुझसे बातें करते, इधर – उधर की बातें! मैं अभी सत्रह वर्ष की ही थी। माँ का आदेश था किसी अनजान व्यक्ति से बातचीत नहीं करना। पर ये सज्जन तो कुछ ज्यादा ही स्नेह बरसाने लगे। दूसरे दिन मैं एन.सी.सी.के गणवेश में थी। रविवार था, मैं परेड के लिए जा रही थी। सज्जन फिर आए और बात करने की कोशिश करने लगे। जब मैं न बोली तो पूछे नाराज़ हो! मुझे आया गुस्सा, मैंने तपाक से कहा कि, मैं अपरिचित व्यक्ति से बात नहीं करती। तो वे रोज की मुलाकात की बात कहने लगे। मैंने भी कड़क आवाज़ में कहा कि, ” आप शायद रोज़ मेरी जुड़वाँ बहन से मिलते हैं। मैं आपको नहीं जानती। ” उस दिन तो छुटकारा मिल गया।

दो दिन बाद बाबा रौद्र रूप धरकर दफ्तर से घर आए और मुझसे सवाल करने लगे कि मैंने जुड़वाँ बहन की बात उनके कलीग श्री हेगड़े से क्यों कही। झूठ बोलने के कारण दो चार थप्पड़ पड़े, खूब डाँट पड़ी। फिर माँ ने बाबा को मेरे झूठ बोलने की बाध्यता का कारण समझाया कि मैं उस व्यक्ति का रोज़ बस स्टॉप पर मिलने आने से तंग आकर छुटकारा पाना चाहती थी। तो बाबा ने मुझे बुलाकर प्यार किया और सॉरी भी कहा। (जीवन में आगे चलकर मेरी धुनाई करनेवाले मेरे बाबा मेरे सबसे अच्छे दोस्त साबित हुए। जरावस्था में वे हेरी ही सलाह लिया करते थे। )

इस उम्र में सेल्फडिफेंस की अक्ल आ गई थी। साथ मार खाकर कभी झूठ न बोलने का प्रण भी किया। बाबा के सॉरी कहने पर, दूसरों से क्षमा माँगना भी सीख लिया।

1977 में जब बलबीर मेरा हाथ माँगने घर आए ( वे मेरे बाल सखा हैं) तो बाबा ने उनसे कहा था, ” तलवार की धार है यह, संभाल सकोगे?” बलबीर ने कहा था, ” ढाल बना लूँगा मैं इसे, आप देख लेना। “

फिर विवाह के बाद ढाल बनकर परिवार की देखरेख में मैं पूरी तरह तैनात हो गई। ससुराल में खूब सम्मान और स्नेह मिला। ढाल बनते – बनते मेरा व्यक्तित्व ही बदल गया। शरारतें जिंदगी की न जाने किस झरोखे से काफ़ुर हो गईं। सहन शक्ति, मुसीबतों का सामना करने की क्षमता, न लड़ने – झगड़ने की वृत्ति, असत्य से घृणा आदि सब कुछ न जाने व्यक्तित्व में कहाँ से समा गए।

आज लिखने बैठी तो ध्यान आ रहा है कि वह मार, वह कुटाई, वह डाँट सब भलाई के लिए ही तो थे। जीवन अनुशासित और मूल्यों से भर गया।

यह भी सच है कि अपने अतीत के उन पलों को याद कर सच्चाई बयान करने के लिए भी साहस चाहिए जो बाबा ने कूट-कूट कर मुझ में भर दिया था।

© सुश्री ऋता सिंह

फोन नं 9822188517

ईमेल आई डी – ritanani[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ११ – “स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव उर्फ़ ऊँट बिलहरीवी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।

ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है एक नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है हिंदी – उर्दू के नामचीन वरिष्ठ साहित्यकार  – “स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव उर्फ़ ऊँट बिलहरीवी”)

आप गत अंकों में प्रकाशित विभूतियों की जानकारियों के बारे में निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं –

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १ ☆ कहाँ गए वे लोग – “पंडित भवानी प्रसाद तिवारी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २ ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३ ☆ यादों में सुमित्र जी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४ ☆ गुरुभक्त: कालीबाई ☆ सुश्री बसन्ती पवांर ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५ ☆ व्यंग्यकार श्रीबाल पाण्डेय ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ६ ☆ “जन संत : विद्यासागर” ☆ श्री अभिमन्यु जैन ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ७ ☆ “स्व गणेश प्रसाद नायक” – लेखक – श्री मनोहर नायक ☆ प्रस्तुति  – श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ८ ☆ “बुंदेली की पाठशाला- डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ९ ☆ “आदर्श पत्रकार व चिंतक थे अजित वर्मा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १० ☆ “स्व. खलीफा गनेश प्रसाद जायसवाल” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

☆ कहाँ गए वे लोग # ११ ☆

“स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव उर्फ़ ऊँट बिलहरीवी☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

जब हम छोटे थे और राइट टाउन में नरसिंह बिल्डिग में रहते थे तब पैदल-पैदल महाराष्ट्र स्कूल वाले रोड से माडल स्कूल पढ़ने जाते थे रास्ते में सत्कार होटल के बाजू में बने हवेलीनुमा मकान में अक्सर नजर जाती थी,बाद में पता चला था कि ये बिलहरी वाले ऊंट जी की हवेली है। उसी समय की बात है लोरमी बिलासपुर से हमारे चचेरे भाई नारायण पाण्डेय फोटोग्राफी सीखने जबलपुर आए थे और मालवीय चौक पर उपाध्याय जी के फोटो स्टूडियो में वे फोटोग्राफी सीख रहे थे और उनको ये कला सिखा रहे थे ऊंट जी के दामाद उपाध्याय जी। (उपाध्याय जी श्रीमती साधना उपाध्याय जी के पति)। अपन स्कूल से लौटते हुए उपाध्याय जी के स्टूडियो में रुकते थे, वहां साहित्यकार, फोटोग्राफर, आर्टिस्ट का पुख्ता ठीहा था। शायद वहीं से’जज्बाते ऊंट’ व्यंग्य पुस्तक अपन चुरा लाए थे। 

थोड़े से बड़े हुए तो परसाई जी की संगत पकड़ी तो ऊंट जी की दोनों बेटियां  श्रीमती साधना उपाध्याय और श्रीमती अनामिका तिवारी जी से विभिन्न आयोजनों में भेंट होने लगी, अनामिका जी तो एक दो बार हम लोगों की व्यंग्यम गोष्ठी में भी व्यंग्य पाठ करने आयीं। फिर बाद में मुझे प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था कादम्बरी ने  व्यंग्य विधा का “रामानुज लाल श्रीवास्तव ‘ऊंट’ सम्मान” से सम्मानित किया था, तब से उन्हें और करीब से जानने की लगातार इच्छा बनी रहती थी, जब मैं कटनी में स्टेट बैंक में डिस्ट्रिक्ट लीड बैंक मेनेजर था तो कई बार बिलहरी गांव भी जाना हुआ, कटनी से 15 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम बिलहरी के मूल निवासी रामानुज लाल श्रीवास्तव (ऊँट बिल्हरीवी) हिंदी – उर्दू के नामचीन वरिष्ठ साहित्यकार माने जाते हैं । उन्होंने हास्य व्यंग्य में अपना ऊँचा स्थान बनाया था । आपके चार काव्य संकलन , चार गद्य संकलन प्रकाशित हुए। इसके अलावा महाकवि ग़ालिब, अनीस एवम जफर  के दीवान पर आपकी टीकाएँ भी प्रकाशित हुई हैं । वरिष्ठ साहित्यकार हरिशंकर परसाई के संपादन में आपकी ‘प्रतिनिधि रचनाएं ‘  शीर्षक से एक संचयन मध्यप्रदेश साहित्य परिषद भोपाल द्वारा 1972 में प्रकाशित किया गया था। उल्लेखनीय है कि ऊंट जी ने जबलपुर से ‘प्रेमा’ पत्रिका का प्रकाशन 1929 में ही आरंभ कर दिया था। 

अपने गांव बिलहरी से  उनका इतना लगाव  था कि आरंभिक दिनों आप  ‘ऊँट बिल्हरीवी ‘ के नाम से ही जबलपुर में स्तंभ लिखते रहे । तथा अपनी व्यंग्य कृति ‘ जज्बाते ऊँट ‘ ऊँट बिल्हरीवी के नाम से ही प्रकाशित कराई थी, साथ ही वे उर्दू में ऊंट नाम से व्यंग्य लिखा करते थे। उन्होंने प्रेमा प्रकाशन के माध्यम से जबलपुर में साहित्यिक वातावरण के निर्माण में अमूल्य योगदान दिया। ‘प्रेमा’ की अपने समय में साहित्यिक पत्रिकाओं में बडी प्रतिष्ठा रही है। ‘प्रेमा’ के माध्यम से अनेक प्रतिभाएं उभरीं।  सौम्य किन्तु अत्यंत गरिमामय व्यक्तित्व के धनी, प्रखर व्यंग कवि लेखक व संपादक ऊंट जी से हमें मिलने का अवसर तो नहीं मिला,पर पता चला था कि प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन जी की कविता को भी अपनी साहित्यिक पत्रिका “प्रेमा” में छपने के प्रथम अवसर इन्होंने ही दिया था। ऊंट जी मस्तमौला तबियत के मालिक थे। उनका नाम तो था रामानुज लाल श्रीवास्तव पर खुद का नामाकरण कर लिया था, ‘ऊँट बिलहरीवी’ , क्योंकि वे अपने गांव बिलहरी की मिट्टी से हमेशा जुड़े रहना चाहते थे। 

एक जगह वे लिखते हैं….

न समझो के फ्कत ठूँठ हूँ मैं, मये-मंसूर के दो घूंट हूँ मैं।

जिस पर ‘लैला’ हुई सौ बार सवार,हलिफया कहता हूँ वो ‘ऊँट’ हूँ मैं।

यहां यह बताना जरूरी लगता है कि हरिवंशराय बच्चन जी की पहली कविता प्रेमा पत्रिका में ही प्रकाशित हुई थी और उमर खैयाम की रूबाइत का अनुवाद कर अमर हो जाने वाले जबलपुर के कवि केशव पाठक की इस अनुदित रचना को प्रेमा ने ही प्रकाशित किया था। लोग बताते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम के समय  जब सुभद्रा कुमारी चौहान जेल जाने लगीं थीं तो ऊंट जी ने उनके बच्चों का पालन-पोषण किया था।

ऐसे विराट हृदय  वाले सहज सरल व्यक्तित्व के धनी रामानुज लाल जी 1976 में  धरती छोड़कर पता नहीं कहां चले गए। जाते जाते कह गए…

जब यश ढूँढा तब रस न मिला,

जब रस ढूँढा तब यश न मिला।

पर यह भी विकट खिलाड़ी था,

पथ पर से तिल भर भी न हिला।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-16 – दिल को छू लेती है आज भी मासूम हंसी! ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-16 – दिल को छू लेती है आज भी मासूम हंसी! ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(प्रत्येक शनिवार प्रस्तुत है – साप्ताहिक स्तम्भ – “मेरी यादों में जालंधर”)

यादों का यह सिलसिला जालंधर से शुरू होकर, न जाने किस तरफ अपने आप ही मोड़ ले लेता है और मित्रो मैं कोई नोट्स लेकर किसी तयशुदा मंजिल की ओर नहीं चल रहा । आज सोचता हूँ कि राजीव भाटिया और वंदना भाटिया के बहाने चंडीगढ़ के कुछ और रंगकर्मियों को याद करूँ पर उससे पहले पंजाब के अभी तक छूट रहे रंगकर्मी ललित बहल को याद कर लूँ! ललित बहल का मैं फैन हो गया था उनकी दूरदर्शन के लिए बनाई फिल्म, शायद उसका नाम ‘चिड़ियां दा चम्बा’ ही था, जिसमें एक ही दामाद ससुराल की बाकी लडकियों के साथ भी संबंध ही नहीं बनाता बल्कि सबको नर्क जैसा जीवन देता है। ‌ललित की पत्नी नवनिंद्र कौर बहल ने भी इसमें भूमिका निभाई थी! इसके साथ ही ललित बहल का लिखा ‘कुमारस्वामी’ नाटक न जाने कितनी बार यूथ फेस्टिवल में देख चुका हूँ। ‌अब बता दूँ  कि ललित बहल भी कपूरथला से संबंध रखते थे। मेरी इनसे एक ही मुलाकात हुई और वह भी यमुनानगर के यूथ फेस्टिवल में, जिसमें हम दोनों नाटक विधा के निर्णायक थे! उस रात हमें एक गन्ना मिल के बढ़िया गेस्ट हाउस में अतिथि बनाया गया। ‌जैसे ही खाना खाया तब हम दोनों सैर के लिए निकले! मैंने पूछा कि ललित! आखिर ‘कुमारस्वामी’ लिखने का आइडिया कहां से और कैसे आया?

पहले यह बता दूं कि ललित बहल ने इसकी पहली प्रस्तुति चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में दी थी , जिसमें राजीव भाटिया ने भी एक भूमिका निभाई थी और सभी चरित्र निभाने वालों को अपने सिर बिल्कुल सफाचट करवाने पड़े थे और‌ इन सबका एक फोटो एकसाथ ‘ट्रिब्यून’ में आया था, जो आज तक याद है! यह साम्प्रदायिक दंगों को केंद्र में रखकर लिखा गया है, जिसमें दो सम्प्रदाय आपस में अपने सम्प्रदाय को बड़ा मानते हुए लड़ मरते हैं और जबरदस्ती एक संत को अनशन पर बिठा दिया जाता है जबकि उसके ही बड़े महंत उसकी रात के समय हत्या करवा कर दूसरे सम्प्रदाय पर सारा दोष मढ़ देते हैं और‌ ये हत्या होती है ‘कुमारस्वामी’ की जो धर्म का मर्म सीखने आया है!

ललित बहल ने बताया कि आपको संत सेवा दास की याद है? मैंने कहा कि हां, अच्छी तरह! कहने लगे कि हमारे कपूरथला के दो चार युवा नेता चाहते थे कि हाईकमान के आगे उनका नाम हो जाये, तो उन्होंने संत सेवा दास को आमरण अनशन के लिए तैयार कर लिया ! अब आमरण अनशन पर उन‌ दिनों मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने सीआईडी तैनात कर दी कि संत सिवाय पानी के कोई चीज़ चोरी चुपके  से भी न खा सके! तीसरे दिन तक सेवा दास की टैं बोल गयी और उन्होंने युवा नेताओं को कहा कि मैं तो यह आमरण अनशन नहीं कर पाऊंगा लेकिन वे नहीं माने और‌ आखिरकार‌ सेवा दास रात के समय चुपके से अनशन तोड़ कर भाग निकला ! दूसरे संत फेरुमान रहे, जिन्होंने आमरण अनशन नहीं छोड़ा और प्राण त्याग दिये ! इन दोनो को मिला कर ‘कुमारस्वामी’ लिखा गया! अब मैं यूथ फेस्टिवल में लगातार चौदह वर्ष तक थियेटर की विधाओं में निर्णायक बनाये जाने वाले रंगकर्मी व कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक विभाग के निदेशक अनूप लाठर को याद कर रहा हूँ । उन्होंने हरियाणवी की आज तक सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्म ‘ चंद्रावल’ में चंदरिया का रोल निभाया था और उन्होंने मुम्बई न जाकर दूसरे तरीके से हरियाणवी का विस्तार किया ! विश्वविद्यालय के निदेशक होने के चलते ‘रत्नावली’ जैसा उत्सव दिया जिसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी है कि हर साल नवम्बर में कलाकार इसकी प्रतीक्षा करते हैं! बूढ़े बुजुर्ग भी देर रात तक सांग प्रतियोगिता देखने कम्बल ओढ़ कर बैठे रहते हैं और अनूप हर वर्ष एक न एक नयी विधा इसमें जोड़ते चले गये! ‘हरियाणवी आर्केस्ट्रा’ अनूप लाठर की ही देन है। इसके पीछे उनकी सोच यह रही कि हरियाणवी साजिंदों को काम मिले! खुद अनूप लाठर ने नाटक और संगीत पर पुस्तकें लिखीं हैं। ‌मेरी कहानी ‘ जादूगरनी’ इतनी पसंद आई कि उस पर नाटक बनाने की सोची! इसी तरह पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के मोहन महर्षि ने भी डाॅ वीरेंद्र मेहंदीरता के घर आयोजित ‘ अभिव्यक्ति’ की गोष्ठी में मेरी इस कहानी को सुनकर नाटक बनाने की सोची थी कि मेरी ट्रांसफर हिसार हो जाने पर यह मामला बीच मंझधार में ही रह गया! इसी तरह अनूप लाठर की रिहर्सल के दौरान जादूगरनी का रोल‌ निभाने वाली महिमा व जौड़े के मामा के बेटे का रोल‌ निभाने वाले कैंडी का सचमुच आपस में प्यार हो गया और कैंडी रोज़ी रोटी के लिए नोएडा चला गया। ‌दोनों को मेरी कहानी ने मिला दिया और‌ मैं आज भी महिमा को जादू ही कहता हूँ और‌ कैंडी मेरे मित्र व हरियाणा के चर्चित लेखक दिनेश दधीचि का बेटा है और अच्छा संगीतकार है। ‌अनूप लाठर ने साहित्यिक कार्यशाला भी शुरू कीं जो आज तक चल रही हैं और इसके माधयम से भी रोहित सरदाना जैसा तेज़ तर्रार एंकर निकला और अफसोस कि कोरोना ने उसे लील गया! आजकल अनूप लाठर दिल्ली विश्वविद्यालय में पी आर का काम देखते हैं और पिछले वर्ष पुस्तक मेले पर इनकी संगीत पर लिखी किताब के विमोचन पर प्यारी सी मुलाकात हुई और‌ वे वैसी ही निर्मल हंसी के साथ मिले कि दिल को छू गये! फिर भी एक मलाल है उन्हें कि हरियाणा की किसी सरकार ने सम्मानित नहीं किया!

आज बस इतना ही! क्या क्या आगे लिखूंगा आज की तरह कल भी नहीं जानता!

क्रमशः…. 

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मेरी डायरी के पन्ने से # 8 – संस्मरण#2 – ☆ सुश्री ऋता सिंह ☆

सुश्री ऋता सिंह

(सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुश्री ऋता सिंह जी द्वारा ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपने यात्रा संस्मरणों पर आधारित आलेख श्रृंखला को स्नेह प्रतिसाद के लिए आभार।आज प्रस्तुत है आपकी डायरी के पन्ने से …  – संस्मरण)

? मेरी डायरी के पन्ने से # 8 – संस्मरण#2 ?

दिल्ली में पूसा कॉलोनी में अपने बचपन का कुछ हिस्सा हमने बिताया था। सब परिचित थे। कई परिवारों के साथ रोज़ाना उठना – बैठना था। सभी आई.ए.आर. आई. में कर्मरत थे। अधिकतर रिसर्च साइंटिस्ट थे।

वे बाबा -माँ के दोस्त हमारे काका काकी या जेठू -जेठी थे। बँगला भाषा में जेठू पिता के बड़े भाई और जेठिमा उनकी पत्नी कहलाती हैं।

उनके बड़े बच्चे हमारे दादा और दीदी हुआ करते थे।

सबके घर आँगन एक दूसरे से सटे हुए थे। सरकारी एक मंज़िला मकान थे। एक विशाल मैदान के तीनों तरफ सारे मकान अर्ध गोलाई में बने हुए थे। सामने मुख्य सड़क और कॉलोनी को अलग करती हुई पीले फूलों की झाड़ी वाली हेज लगी हुई थी। बीच की खुली जगह बच्चों के खेलने का मैदान था।

गर्मी के मौसम में घर के पीछे वाले बगीचे में बैठते तो पड़ोस की दीदी सिर में तेल लगाकर देतीं। आँगन में बैठकर माँ – मासियाँ, काकी चाची जेठियाँ उड़द दाल पीसकर बड़ियाँ बनातीं। शीतकाल में स्वेटर बुनतीं। पुरानी सूती साड़ियों की थिगली या पैबंध लगाकर गुदड़ियाँ सिलतीं।

कॉलोनी के सारे दादा मोहल्ले के पेड़ों पर लगे कच्चे आम काटकर नमक के साथ हम बच्चों को खिलाते, दीदी पके काम काटकर सब बच्चों में फाँकिया बाँटतीं। फालसा का, जामुन का, लीची का सब मिलकर स्वाद लेते।

ठंड के दिनों में दृश्य वही रहता पर वस्तुएँ बदल जातीं। संतरे छीलकर फाँकियाँ सबमें बाँटी जातीं। कच्चे -पके अमरूद मिलते। रेवड़ियाँ, भूनी मूँगफलियाँ, भुर्रे गजख का स्वाद मिलता। हरे चने जिसे बूट कहते हैं, उसे सब बच्चे मिलकर छील-छीलकर खाते। पके बेर मिलते।

जीवन सरल और सरस था। स्व की भावना पूर्ण रूप से लुप्त थी। जिसके घर में जो आता वह अपने पड़ोस के बच्चों के साथ बाँटकर ही खाता। कभी नापकर न किसी के घर सब्ज़ियाँ बनाई जाती थीं न गिनकर रोटियाँ। किसके बच्चे दिन के समय खेलते हुए किसके घर खाकर सो जाते इसका पता ही न रहता।

ठंड के दिनों में मुहल्ले की घास पर लाल रंग के खूबसूरत मखमली कीड़े दिखाई देते थे। इन्हें इंद्रवधू, बीरबहूटी या बूढ़ी माई के नाम से भी जाना जाता है। हम बच्चे उन कीड़ों को हाथ से पकड़कर दियासलाई की डिबिया में बंद करके रखते थे। कभी किसी ने टोका नहीं, रोका नहीं और हम हत्यारे बनकर उन निर्दोष निरीह कीड़ों को डिबिया में पकड़कर बंद कर देते। उनके शरीर का ऊपरी हिस्सा लाल मखमली होता और हमें उन्हें छूने में आनंद आता। कई डिब्बे जमा हो जाते और प्राणवायु के अभाव में वे कब मर जाते हमें पता ही न चलता। हम उन्हें घर के पिछवाड़े गड्ढा खोदकर एक साथ गाड़ देते। पता नहीं क्यों उस वक्त संवेदनाएँ इतनी तीव्र क्यों नहीं थी।

आज हमारा जीवन उसी दियासलाई के बक्से में बंद प्राणवायु के अभाव में घुटते मखमली कीड़ों की तरह ही है। हम सुंदर सजीले घर में रहते हैं। पर हमारे घर अब पड़ोसी नहीं आते।

हम गिनकर फुलके पकाते हैं अब किसी के बच्चे हमारे घर भोजन खाकर सोने नहीं आते।

हर मौसम में कई फल घर लाते हैं पर किसी के साथ साझा कर खाने की वृत्ति समाप्त हो गई।

रेवड़ियाँ, गजख, गुड़धनी, अचार, पापड़ बड़ियाँ सब ऊँचे दाम देकर ऑनलाइन मँगवाते हैं। अब किसीके साथ बाँटने का मन धन और कीमत के साथ जुड़ गया।

आजकल लोगों के पास सब कुछ है बड़े घर, नौकर चाकर, गाड़ी सुख -सुविधाएँ बस लुप्त हो गया अगर कुछ तो वह है साझा करने की वृत्ति। अब सब कुछ स्व में सिमटकर रह गया।

बच्चों के लिए कई बार माता-पिता भी पराए हो जाते हैं। मैं और मेरे बच्चों के बाहर की दुनिया से अब खास कोई परिचय नहीं न सरोकार है।

आज की पीढ़ी इकलौती संतान वाली पीढ़ी है फिर उन्हें किसीके साथ बाँटकर खाने या देने की वृत्ति कहाँ से आएगी!

हर समय मित्रों का वह जो आना- जाना था सो कम हुआ फिर धीरे -धीरे बंद हुआ। मोबाइल फोन ने हमारी गतिविधियों को इममोबाइल कर दिया। संतानें घर से दूर हो गईं। एक शहर में रहकर भी उनका आना – जाना न के बराबर ही है।

और हमारी पीढ़ी ? वह तो मखमली कीड़ों को पकड़ने और प्राणवायु के अभाव में मारने की सज़ा भुगत रही है। ब्रह्माण्ड से परे कुछ नहीं है। समय लौटकर आता है। सबक सिखाता है और करनी का फल देता है। हम केवल सुखद स्मृतियों को, अपने अतीत को निरंतर वर्तमान बनाकर जीवित रहने का प्रयास करते चल रहे हैं। ईश्वर की असीम कृपा ही समझे कि हमारे पास स्मृतियों की सुखद संपदा है वरना जीवन का यह अंतिम पड़ाव कितना कष्टप्रद हो उठता।

© सुश्री ऋता सिंह

20/12/23, 2.30am

फोन नं 9822188517

ईमेल आई डी – ritanani[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-15 – थियेटर की दुनिया के खुबसूरत मोड़ ! ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-15 – थियेटर की दुनिया के खुबसूरत मोड़ ! ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(प्रत्येक शनिवार प्रस्तुत है – साप्ताहिक स्तम्भ – “मेरी यादों में जालंधर”)

हाँ, तो मैं कल बात कर रहा था, जालंधर के थियेटर, रंगकर्म और‌ रंगकर्मियों के बारे में ! गुरुशरण भाजी के साथ लम्बा साथ रहा और‌ बहुत सी बातें हैं, यादें हैं! वे वामपंथियों को झिंझोड़ते कहते थे कि एक कामरेड हर बात पे कहता है कि आपको पता नहीं कि हम लोगों के बीच में से आये हैं ! इस पर भाजी का जवाब बड़ा मज़ेदार और चुटीला था- कामरेड! यही तो दुख है कि आप लोगों में से निकल आये हो और अब आप इनकी नब्ज़ नहीं समझ पा रहे  ! फिर‌ वे युवाओं को कहते कि गाने के बोल हैं कि

पिच्छे पिच्छे आईं

मेरी तोर बेहदां आईं

इत्थे नीं मेरा लौंग गवाचा!

बताओ भई ! युवा पीढ़ी का यही काम रह गया कि मुटियारों की नाक का कोका ही खोजते ज़िंदगी बिता दें? हमारे संपादक श्री विजय सहगल को भी गुरुशरण पाजी से दोस्ती का पता था। एक बार वे दिल्ली से अकादमी पुरस्कार लेकर देर शाम लौटे उस दिन मेरी नाइट ड्यूटी थी! अचानक रात के ग्यारह बजे सहगल जी का फोन आया कि आपकी दोस्ती आज आजमानी है कि इसी समय उनका फोन पर इंटरव्यू लो! उसी समय फोन लगाया और उनकी पत्नी ने उठाया और बोलीं कि वे तो थक कर सो गये हैं, मैंने कहा कि किसी भी तरह उनको जगा दीजिए ! भाजी आंखें मलते उठे होंगे पर मुझे अपने पुरस्कार पर इंटरव्यू दे दिया ! ज़रा बुरा नही माना ! वे ‘ समता प्रकाशन” भी चलाते थे और  हर नाटक के बाद वे अपने प्रकाशन की पुस्तकें लहरा कर कहते कि ये पुस्तकें लीजिए ! बहुत कम कीमत और‌ बहुत ही गहरी किताबें ! यह बात मैंने भाजी से सीखी कि किताब आम आदमी तक कैसे बिना किसी संकोच के लागत मूल्य पर पहुँचाई जा सकती है और मैं अपनी किताबें आज भी सीधे मित्रों तक पहुंचा कर लागत मूल्य मांगने से कोई संकोच महसूस नहीं करता ! इसके गवाह मेरे अनेक मित्र हैं !

खैर! भाजी के किस्से अनंत और‌ उनकी गाथा अनंत! अफसोस! एक बार जब वे अपनी टीम के साथ कहीं से नाटक मंचन कर देर रात लौट रहे थे, तब उनकी बैन किसी जगह उल्ट गयी और‌ वे घायल हो गये । हालांकि पाजी ने हिम्मत न हारी, फिर भी वे फिर‌ लम्बे समय तक नहीं रहे हमारे बीच ! इस तरह हमारे पास उनकी यादें ही यादें रह गयीं पर उनका थियेटर के लिए जुनून एक मिसाल है आज तक !

अमृतसर से ही थियेटर करने मेंं नाम कमाने वाले दो और रंगकर्मी हैं,  जिनसे मेरी थोड़ी थोड़ी मुलकातेंं हैं । ‌पहले केवल धालीवाल, जिनसे मेरी एक ही मुलाकात है और वह है प्रसिद्ध लेखक स्वदेश दीपक के घर‌ अम्बाला छावनी में ! तब मैं स्वदेश दीपक का इंटरव्यू लेने गया था और‌ केवल धालीवाल ‘कोर्ट मार्शल’ को पंजाबी में मंचित करने की अनुमति लेने पहुंचे हुए थे ! पाजी के बाद केवल धालीवाल ने भी खूब काम किया और नाटक को ऊंची पायदान पर पहुंचाने में योगदान दिया ! अमृतसर से ही नीलम मान सिंह भी आईं थियेटर में ! वे पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के थियेटर विभाग की अध्यक्ष भी रहीं और‌ ‘कंपनी’ नाम से अपना थियेटर ग्रुप भी बनाया, उन्होंने विदेशों तक पंजाबी थियेटर को पहुंचाया ! उन्होंने राॅक गार्डन में भी धियेटर किया !

बरसों बाद अचानक एक अस्पताल से बाहर आते मैंने इन्हें इनकी चमकतीं आंखों के चलते पहचाना ! मेरा छोटा भाई तरसेम वहां एक्सीडेंट के बाद दाखिल‌ था और‌ मैं उसकी कुशल मंगल पूछने आया था ! अचानक वे दिखीं और‌ मैं इनकी कार तक गया और मेरे मुंह से नीलम मान सिंह की बजाय सोनल मान सिंह निकल गया और वे नाराज़ होकर बोलीं-नो और कार स्टार्ट की लेकिन शायद उन्हें भी कुछ याद आई और वे कार से उतर कर आईं और‌ बोलीं – आई एम नीलम मान सिंह! पर आपने क्यों पूछा? मैंने “क़पनी’ का जिक्र करते बताया कि मैं उन दिनों आपके परिचय में आया था जिन दिनों आप राॅक गार्डन में थियेटर का एक्सपेरिमेंट कर रही थीं ! उन्हें भी मेरी हल्की सी याद आई और पूछा कि आज यहा कैसे? मैंने कहा कि आप यह बात छोड़िये ! आजकल मैं हिसार‌ रहता हूँ और वहाँ एक सांध्य दैनिक में कलाकारों के इ़टरव्यू छापता हूँ। ‌आप अपना नम्बर दे दीजिए, किसी दिन फोन पर ही इंटरव्यू कर लूंगा ! आखिर एक दिन उनकी इ़टरव्यू हुई और‌ उन्होंने अपना थियेटर का सफर बताया ! उनकी हीरोइन जो मोहाली रहती थी, रमनदीप की याद दिलाई और बताया कि आजकल वह कोलकाता में रहती है और उसका इंटरव्यू भी कर चुका हूँ । यहीं मैंने एक बार पंजाब के प्रसिद्ध नाटक ‘ लोहा कुट्ट ‘ के रचनाकार बलवंत गार्गी से नवांशहर की कलाकार बीबा कुलवंत के साथ उनके सेक्टर 28 स्थित आवास पर मिला था! बीबा कुलवंत ने ही इस नाटक की हीरोइन का रोल‌ निभाया था, जिसे खटकड़ कलां में ही नहीं पंजाब भर में जसवंत खटकड़ ने पहुंचाया! मैंने बलवंत गार्गी से मज़ाक में कहा कि आप पंजाब में बस लोहा ही कूटते रहे और कूटते कूटते इसे स्टील बना दिया। वे बहुत हंसे और कहि कि एक पैग इसी बात पर‌!

इस तरह मैं चंडीगढ़ में भी थियेटर के लोगों से मिलता रहा ! यहीं थियेटर विभाग में छात्र थे राजीव भाटिया और हिमाचल के धर्मशाला की वंदना, जो बाद में आपस में जीवन साथी बने और स़ंयोग देखिये कि जब हिसार ट्रांसफर हुई तब मैंने जो घर किराये पर  लिया वह राजीव भाटिया की गली में मिला ! इस तरह बरसों बाद देखा कि राजीव भाटिया हरियाणवी फिल्मों में योगदान दे रहे हैं और इसकी फिल्म – पगड़ी द ऑनर’ को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला ! हालांकि राजीव भाटिया और‌ वंदना मुम्बई रहते हैं लेकिन जब जब हिसार आते हैं, तब तब खूब महफिल जमती है हमारी ! खैर! मित्रो! मैं कहां से कहां पहुंच गया । खाली और रिटायर आदमी के पास समय बिताने के लिए, सिवाय किस्सों के कुछ नहीं होता !

आज का किस्सा इतना ही, कल मिलते हैं! यह कहते हुए कि – 

जो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन

उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर‌ भूलना अच्छा!

आज की जय जय!

क्रमशः…. 

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मेरी डायरी के पन्ने से # 7 – संस्मरण#1 – ☆ सुश्री ऋता सिंह ☆

सुश्री ऋता सिंह

(सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुश्री ऋता सिंह जी द्वारा ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपने यात्रा संस्मरणों पर आधारित आलेख श्रृंखला को स्नेह प्रतिसाद के लिए आभार।आज प्रस्तुत है आपकी डायरी के पन्ने से … संस्मरण)

? मेरी डायरी के पन्ने से # 7 – संस्मरण ?

कुछ घटनाएँ, कुछ दृश्य और कुछ पढ़ी -सुनी बातें चिर स्मरणीय होती हैं। उस पर समय की कई परतें चढ़ जाती हैं और वह मन-मस्तिष्क के किसी कोने में सुप्त पड़ी रहती हैं। फिर कुछ घटनाएँ घटती हैं तो सुप्त स्मृतियाँ झंकृत हो उठती हैं।

कल अपनी एक सखी के घर भोजन करते समय बचपन की एक ऐसी ही घटना स्मरण हो आई जो सुप्त रूप से मानसपटल पर कुंडली मारकर बैठी थी।

घटना 1965 की है। हमें पुणे आकर तीन ही महीने हुए थे। हम चतुर्शृंगी मंदिर के पास रहते थे और यहाँ निवास करनेवाले सभी ब्राह्मण थे। हमारी सहेलियाँ भी उन्हीं परिवारों की ही थीं। सबका रहन -सहन अत्यंत साधारण ही था। यह बंगलों की कॉलोनी है। आज तीसरी पीढ़ी उन्हीं घरों में रहती है। सभी घर पत्थर के बने हुए हैं। यह सब कुछ हमारे लिए नया-नया ही था।

गणपति के उत्सव के दौरान एक दिन गौरी गणपति की स्थापना होती है और गणपति की दोनों पत्नियों की पूजा की जाती है। देवस्थान को खूब सजाते हैं, गौरी की मूर्ति का शृंगार करते हैं सुंदर सिल्क की साड़ी पहनाते हैं। गजरा और फूलों से मूर्तियाँ सजाई जाती हैं।

हमारी सहेली विद्या और संजीवनी के घर पर हम लड़कियों को दस बजे के समय भोजन के लिए आमंत्रित किया गया था। हमारी माताएँ शाम को हल्दी कुमकुम के लिए आमंत्रित थीं।

रसोईघर में अंग्रेज़ी के L के आकार में दरी बिछाई गई थी। सामने चौकियाँ थीं उस पर बड़ा – सा एक थाल रखा हुआ था, बाईं ओर लोटा और पेला पानी से भरकर रखा गया था।

(उन दिनों गिलास से पानी पीने की प्रथा महाराष्ट्रीय ब्राह्मण या ज़मीदार परिवारों में नहीं थी।) चौकी के हर पैर के नीचे रंगोली सजाई गई थी। हम सात सहेलियाँ ही आमंत्रित थीं। हमें अभी मासिक धर्म न होने के कारण हम कन्या पूजा की श्रेणी में थीं। घर में घुसते ही हमें मोगरे के गजरे दिए गए।

भोजन परोसना प्रारंभ हुआ। अब सारी तस्वीरें मानसपटल पर स्पष्ट उभर रही हैं मानो कल की ही बात हो। दाईं ओर से परोसना प्रारंभ हुआ।

पहले थोड़ा सा नमक रखा गया, फिर एक नींबू का आठवाँ टुकड़ा, फिर धनियापत्ती की चटनी, थोड़ा सा आम का अचार, फिर चूरा किया गया कुरडी -पापड़, थोड़ी सी कोशिंबिर फिर अरबी के पत्ते से बनी आडू वडी वह भी एक, फिर उबले आलू की सूखी सब्ज़ी, एक चम्मच भर, कटोरी में भरवे छोटे बैंगन की सब्ज़ी, और फिर एक तरी वाली सब्ज़ी- आज स्मरण नहीं किस चीज़ की सब्ज़ी थी पर उसके ऊपर तरलता तेल आज भी आँखों में बसा है।

फिर आया एक छोटी सी कटोरी में दबाकर भरा सुगंधित गोल – गोल चावल का भात, (जिसे अंबेमोर कहते हैं। उन दिनों उच्च स्तरीय महाराष्ट्रीय यही खाते थे।) उस पर आया बिना छौंक की दाल जिसे मराठी में वरण कहते हैं और उस पर आया चम्मच भर घी ! संजीवनी -विद्या की माँ ने जिन्हें हम काकू पुकारते थे, हम सबके पैरों पर थोड़ा पानी डाला, अपने आँचल से पोंछा और हमें प्रणाम किया।

हम दोनों बहनें हतप्रभ सी थीं। कल तक हम ही झुक – झुककर हर अपने से बड़े को प्रणाम करती आ रही थीं आज कोई हमारी पूजा कर रहा है? आठ – नौ वर्ष की उम्र में हमारे लिए सब कुछ नया था। हम दिल्ली से आए थे जहाँ की संस्कृति भिन्न थी और बँगालियों की और भी अलग रीति -रिवाज़ हैं। (मैं बँगला भाषी हूँ)

हम दोनों बहनें आपस में बँगला में चर्चा करने लगीं कि कहाँ से शुरू करें, मैं तो थी ही बदमाश मैंने उससे कहा था -पक्षी के बीट की तरह इतनी – इतनी सी चीज़ें दीं। क्या कंजूस है काकू। छोड़दी (बँगला भाषा में छोटी दीदी) ने मेरी जाँघ पर चिमटी ली थी और बोली -चुप करके खा। फिर जैसे सबने खाया हमने भी खाया। फिर बारी आई रोटी की। रोटियाँ तोड़कर उसके चार टुकड़े किए गए और एक चौथाई टुकड़ा हमारी थाली पर डाली गईं। हम दोनों बहनों ने किसी तरह खाना खाया और दौड़कर रोते हुए घर आए।

छोटे थे, भाषा नहीं आती थी, माँ ने दोनों को बाहों में भर लिया। हम रो-रोकर जब सिसकियाँ भरने लगीं तो माँ ने पूछा क्या हुआ?

छोड़दी का मन बड़ा साफ़ था उसने हमारे चरण धोने, की बात पहले बताई। पर मुझे तो जल्दी थी अपनी कथा सुनाने की। सिसकियों से बँधी आवाज़ में मैंने कहना शुरू किया। वह कुछ बोलने गई तो मैंने अपनी बाईं हथेली से उसका मुँह बंद कर दिया और माँ से कहा- चिड़िया की बीट की तरह इतनी सी चटनी अचार दिए, नींबू का बहुत छोटा टुकड़ा थाली में रखा। जानती हो माँ पापड़ भी चूरा करके दिया और रोटियाँ फाड़कर टुकड़े में दिए। हम क्या भिखारी हैं या कुत्ते हैं जो इस तरह हमें खाना परोसा?  हम खूब रोए और सो गए।

उन दिनों महाराष्ट्र में लोग नाश्ता नहीं करते थे। दस बजे पूरा भोजन लेने की प्रथा थी। इसलिए शायद मराठी स्कूल ग्यारह या बारह बजे प्रारंभ होते थे।

बाबा दफ़्तर से भोजन के लिए घर आते थे। माँ ने हमारी व्यथा कथा सुनाई और साथ में कहा कि बच्चियाँ बहुत अपमानित महसूस कर गईं आप बात कीजिए।

शाम को बाबा ने महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति पर प्रकाश डाला, समझाया कि यह पठारी इलाका है, यहाँ के लोगों का भोजन हमसे अलग है। उनकी रोटियाँ बहुत बड़ी और पतली होती है, इसे वे घडी ची पोळी कहते हैं। तुम लोग एक रोटी न खा पाते इसलिए तोड़कर दी है। आज यहाँ के लोग गेहूँ की चपाती खा रहै हैं पर उनका मूल भोजन बाजरी और ज्वारी की रोटी है। जो पतली नर्म और बड़ी -बड़ी होती है। स्नेह और सम्मान के साथ इन बड़ी रोटियों के चार टुकड़े कर वे परोसी जाती हैं।

और कुरडई तोड़कर दिया क्योंकि पूरा पकड़कर खाने पर सब तरफ टुकड़े गिरते, बरबाद होता। उन्होंने तो तुम दोनों का सम्मान किया, स्नेह से भोजन कराया। जो और माँगते तो काकू फिर देतीं।

छोड़दी तुरंत बोली -हाँ हाँ काकू बार – बार वाढ़ू का, वाढ़ू का बोल रही थीं पर हम नहीं समझे।

इस घटना के बाद शाम को माँ के साथ हम फिर उनके घर गए। माँ ने हमारी गलत फ़हमी की बात काकू से कही। काकू ने हमें गले लगाया प्यार किया और हमने उन्हें झुककर प्रणाम किया। शायद सॉरी कहने की उन दिनों यही प्रथा रही थी।

किसी भी स्थान के भोजन के तौर -तरीकों से पहले उसकी जानकारी ले लेना आवश्यक है यह हमने अपने अनुभव से सीखा।

हम छोटे थे, नए -नए पुणे आए थे यहाँ की भाषा, लोग, पहनावा (महिलाएँ नौवारी साड़ी पहना करती थीं।) प्रथाएँ, त्योहार, इतिहास सबसे अपरिचित थे।

आज हमें 58 वर्ष हो गए यहाँ आकर। यहाँ का भोजन, भाषा, साहित्य पूजापाठ की परिपाटी से हम न केवल परिचित हुए बल्कि आज हमारी बेटियाँ गणपति जी का दस दिन घर में पूजा करती हैं। गौरी लाई जाती हैं हल्दी कुमकुम का आयोजन होता है।

कोशिंबिर, कुरडई हमारे भोजन की थाली का अंश है। हम वरण, आमटी, पोरण पोळी भी बनाकर चाव से खाते हैं। यहाँ तक कि हमारी तीसरी पीढ़ी आज मराठी भाषा ही बोलती है।

आज हम फिर एक बार पंगत में बैठकर वाढ़ू का सुनने की प्रतीक्षा करते हैं। अब तो वह संस्कृति और प्रचलन समाज से बाहर ही हो गए। प्रथा ही खत्म हो गई। उसमें आतिथ्य का भाव हुआ करता था। भोजन बर्बाद होने की संभावना कम रहती थी।

© सुश्री ऋता सिंह

22/5/23

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