हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कृष्णस्पर्श – भाग-1- सुश्री मानसी काणे ☆ सौ. उज्ज्वला केळकर ☆

सौ. उज्ज्वला केळकर

☆  कथा-कहानी  ☆ कृष्णस्पर्श – भाग – 1 – सुश्री मानसी काणे ☆ सौ. उज्ज्वला केळकर 

(सौ. उज्ज्वला केळकर जी की मौलिक एवं रोचक कथा तीन भागों में प्रस्तुत है.)

देशमुख जी की हवेली के पास ही उनका अपना मुरलीधर जी का मंदिर है। भगवान् कृष्ण की जन्माष्टमी का उत्सव होने के कारण मंदिर भक्तों से खचाखच भरा हुआ था। सुबह प्रवचन, दोपहर कथा-संकीर्तन, रात में भजन, एक के बाद एक कार्यक्रम संपन्न हो रहे थे। उत्सव का आज छटा दिन था। आज माई फड़के का कीर्तन था। रसीली बानी, नई और पुरानी बातों का एक दुसरे से सहज सुंदर मिलाप करके निरूपण करने का उनका अनूठा ढंग, ताल-सुरों पर अच्छी पकड, सुननेवालों की आँखो के सामने वास्तविक चित्र हूबहू प्रकट करने का नाट्यगुण, इन सभी बातों के कारण कीर्तन के क्षेत्र में माई जी का नाम, आज कल बड़े जोरों से चर्चा में था।

सुश्री मानसी काणे

वैसे उनका घराना ही कीर्तनकारों का ठहरा। पिता जी हरदास थे। माँ बचपन में ही गुजर गई थी। अत: कहीं एक जगह घर बसा हुआ नहीं था। पिता जी के साथ गाँव गाँव जा कर कीर्तन सुनने में उनका बचपन गुजर गया। थोड़ी बड़ी होने पर पिता जी के पीछे खड़ी होकर उनके साथ भजन गाने में समय बीतता गया। पिता जी ने जितना जरूरी था, पढ़ना-लिखना सिखाया। बाकी ज्ञान उन्होंने, जो भी किताबें हाथ लगीं, पढ़कर आत्मसात् किया। तेरह-चौदह की उम्र में उन्होंने स्वतंत्र रूप से कीर्तन करना शुरू किया।

क्षणभर के लिए माई जी ने अपनी आँखे बंद की और श्लोक प्रारंभ किया।

                वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनं

                देवकी परमानंदं कृष्ण वंदे जगद्गुरुं ॥

उनकी आवाज सुनते ही मंदिर में जमे भक्तों ने आपस की बातचीत बंद करते हुए अपना ध्यान माई जी की ओर लगाया। माई जी ने सब श्रोताओं को विनम्र होकर प्रणाम किया और विनंती की, ‘‘आप सब एकचित्त होकर अपना पूरा ध्यान यहाँ दे, तथा आप कृष्ण-कथा का पूरा आस्वाद ले सकेंगे। कथा का रस ग्रहण कर सकेंगे। आप का आनंद द्विगुणित, शतगुणित हो जाएगा।” उन्होंने गाना आरंभ किया।

           राधेकृष्ण चरणी ध्यान लागो रे       

           कीर्तन रंगी रंगात देह वागो रे

मेरा पूरा ध्यान राधा-कृष्ण के चरणों में हो। मेरा पूरा शरिर कीर्तन के रंगों में रँग जाए। कीर्तन ही बन जाए।

मध्य लय में शुरू हुआ भजन द्रुत लय में पहुँच गया। माई जी ने तबला-हार्मोनियम बजानेवालों की तरफ इशारा किया। वे रुक गए। पीछे खड़ी रहकर माई जी का गाने में साथ करनेवाली कुसुम भी रुक गई। माई जी ने निरूपण का अभंग शुरू किया। आज उन्होंने संकीर्तन के लिए चोखोबा का अभंग चुना था।

ऊस डोंगा परि रस नोहे डोंगा। काय भुललासी वरलिया रंगा॥

(ईख टेढ़ामेढ़ा होता है, पर रस टेढ़ा नहीं होता। वह तो सरल रूप से प्रवाहित होता है। तो बाहर के दिखावे के प्रति इतना मोह क्यों?)

माई जी को कीर्तन करते हुए लगभग बीस साल हो गए। वाई में कृष्णामाई के उत्सव में माई जी के पिता जी को आमंत्रण दिया गया था। माई जी की उम्र उस वक्त करीब सत्रह-अट्ठारह की थी। अपने पिता जी के पीछे रहते हुए मधुर सुरों में गानेवाली यह लड़की, कीर्तन सुनने आयी हुई आक्का को बहुत पसंद आई। उन्होंने माई जी के पिता जी, जिन्हें सब आदरपूर्वक शास्त्री जी कहकर संबोधित करते थे, के पास अपने लड़के के लिए, माई का हाथ माँगा। वाई में उन की बड़ी हवेली थी। पास के धोम गाँव में थोड़ी खेती-बाड़ी थी। वाई के बाजार में स्टेशनरी की दुकान थी। खाता-पिता घर था। इतना अच्छा रिश्ता मिलता हुआ देखकर शास्त्री जी खुश हो गए। आए थे कीर्तन के लिए, पर गए अपनी बेटी को विदा करके।

शादी के चार बरस हो गए। आक्का और आप्पा, माई जी के सास-ससुर, उनसे बहुत प्यार करते थे। पर जिसके साथ पूरी ज़िंदगी गुजारनी थी, बह बापू, एकदम नालायक-निकम्मा था। अकेला लड़का होने के कारण, लाड-प्यार से, और जवानी में कुसंगति से वह पूरा बिगड़ चुका था। वह बड़ा आलसी था। वह कोई कष्ट उठाना नहीं चाहता था। शादी के बाद बेटा अपनी जिम्मेदारियाँ समझ जाएगा, सुधर जाएगा, आक्का-आप्पा ने साचा था, किन्तु उनका अंदाज़ा चूक गया।

घर-गृहस्थी में बापू की कोई दिलचस्पी नहीं थी। अपने यार दोस्तों के साथ घूमना फिरना, ऐश करना, इसमें ही उसका दिन गुजरता था। अकेलापन महसूस करते करते माई जी ने सोचा, क्यूँ न अपना कथा-संकीर्तन का छंद बढ़ाए। किन्तु बापू ने साफ इन्कार कर दिया। उसने कहा, ‘‘यह गाना बजाना करके गाँव गाँव घूमने का तुम्हारा शौक मुझे कतई पसंद नहीं। तुम्हें खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने में कोई कमी है क्या यहाँ?”

माई के पास कोई जवाब नहीं था। आक्का और आप्पा जी की छाया जब तक उनके सिर पर थी, तब तक उन्हें किसी चीज़ की कमी नहीं महसूस हुई। पर क्या ज़िंदगी में सिर्फ खाना-पीना, पहनना-ओढ़ना ही पर्याप्त है किसी के लिए? खासकर के किसी औरत के लिए? औरत के केंद्र में सिर्फ उसका पति ही तो है न? वहाँ पति के साथ मिलकर अपने परिश्रमों से घर-गृहस्थी चलाने का, सजाने का सुख माई को कहाँ मिल रहा था? बापू बातें बड़ी बड़ी करता था, किन्तु कर्तृत्व शून्य। कहता था, ‘‘जहाँ हाथ लगाऊंगाँ, वहाँ की मिट्टी भी सोने की कर दूँगा।” ऐसा बापू कहता तो था, किन्तु कभी किसी मिट्टी को उसने हाथ तक नहीं लगाया।

कुछ साल के बाद पहले आप्पा और कुछ दिन बाद, आक्का का भी देहांत हो गया। अब बापू को रोकने-टोकनेवाला कोई नहीं रहा। अपने यार-दोस्तों के साथ उसका जुआ खेलना बढ़ गया। अब आप्पा-आक्का के गुज़रने के बाद उसने घर में ही जुए का अड्डा बना दिया। झूठ मूठ के बड़प्पन के दिखावे के लिए, हर रोज यार-दोस्तों को घर में ही खाना खिलाना शुरू हो गया। दारू शारू पार्टी, गाना-बजाना, तवायफों का नाचना दिन-ब-दिन बढ़ता ही गया। धीरे-धीरे खेत, दुकान, यह सब बेचकर आये हुए पैसे, चले गए।

अब कोई चारा नहीं, देखकर माई ने कीर्तन की बात फिर से सोची। ऐसे में भी बापू तमतमाया,

‘‘मेरे घर में ये कीर्तनवाला नाटक नही चाहिये।”

‘‘तो ठीक है। मै घर ही छोड़ देती हूँ। आपका घर आपके दोस्त, सब आपको मुबारक। गले लगाकर बैठिए। घर का सारा सामान खत्म हुआ है। आपकी और मेरी रोजी रोटी के लिए बस, मैं इतना हि कर सकती हूँ।” माई ने जवाब दिया। और कोई चारा न देखकर बापू चुप रहा। स्वयं उसे, कोई काम करने की आदत तो थी नहीं।

माई ने ग्रंथ-पुराण-पोथी पढ़ना प्रारंभ किया। हार्मोनियम, तबला, झांज़ बजानेवाले साथी तैयार किए। कथा-कीर्तन का अभ्यास, सतसंग करना शुरू किया। शुरू में अपने गाँव में ही कीर्तन करना उन्होंने प्रारंभ किया। बचपन में वह कीर्तन करती ही थी। मध्यांतर में सब छूटा था। किन्तु जब उन्होंने ठान लिया, की बस्स, अब यही अपने जीवन का सहारा है, उन्हें छूटा हुआ पहला धागा पकड़ने में कोई कठिनाई नहीं महसूस हुई। देखते देखते उनकी ख्याति बढ़ गई। धीरे-धीरे पड़ोस के गाँवों में भी उन्हें आदरपूर्वक कथा-कीर्तन के लिए आमंत्रण आने लगा। कीर्तन के लिए जाने से पहले, या आने के बाद घर में कभी शांति या चैन की साँस लेना उन्हे नसीब नहीं होता। जब तक माई घर में होती, बापू कुछ न कुछ पिटपिटाता, झगड़ता रहता। पर माई का मन जैसे पत्थर बन गया था। वह न कुछ जवाब देती, न किसी बात का दु:ख करती। आये दिन वह अधिकाधिक स्थितप्रज्ञ होती जा रही थी।

क्रमशः…

प्रकाशित – मधुमती डिसंबर – २००८   

मूल मराठी कथा – कृष्णस्पर्श

मूल मराठी लेखिका – उज्ज्वला केळकर    

हिंदी अनुवाद – मानसी काणे

© सौ. उज्ज्वला केळकर

सम्पादिका ई-अभिव्यक्ती (मराठी)

संपर्क – 176/2 ‘गायत्री’, प्लॉट नं 12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ, सांगली 416416 मो.-  9403310170ईमेल  – [email protected]

 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – अदला बदली ☆ सुश्री अनघा जोगलेकर ☆

सुश्री अनघा जोगलेकर 

(सुश्री अनघा जोगलेकर जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। आप इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर, उपन्यासकार, लघुकथाकार, स्क्रीनप्ले /कांसेप्ट /संवाद लेखिका, अनुवादक, चित्रकार, हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं की जानकार, ‘शीघ्र लेखिका’ के रूप में हिंदी में आपकी अपनी पहचान स्थापित है। आपकी कथाओं एवं लघुकथाओं का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट स्थान है। आपके उपन्यास ‘यशोधरा’ को राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ है। राम का जीवन या जीवन में राम, यशोधरा, बाजीराव बल्लाळ एक अद्वितीय योद्धा, अश्वत्थामा एवं देवकी शीर्षक से पांच उपन्यास प्रकाशित। प्रादेशिक व राष्ट्रीय स्तर पर उपन्यासकार के रूप में सम्मानित। लघुफिल्म,वेबसीरीज, स्क्रीन प्ले लेखन में दक्ष। सामाजिक, राष्ट्रीय, धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में उत्तम कोटि के लेखन कार्य हेतु आपकी एक विशिष्ट पहचान है। हम अपने पाठको से आपकी विशिष्ट रचनाएँ समय समय पर साझा करते रहेंगे।आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं विचारणीय लघुकथा ‘अदला बदली’।)

☆ लघुकथा – अदला बदली ☆ सुश्री अनघा जोगलेकर

आसमान से मोतियों की झड़ी लगी थी। बड़े-बड़े सफेद मोती जो नीचे आते ही जमीन पर बिखर जाते।

आकाश निहारता उसका अबोध मन खिड़की पर ही टँगा था। भीगा-भीगा, सर्द-सा फिर भी खिला-खिला। उसकी हिरणी जैसी आँखें एकटक उन मोतियों को देख रही थीं।

उसकी उत्सुक नज़रे कह रही थीं कि आसमान में जरूर ही कोई खज़ाना है जिसका दरवाजा गलती से खुला रह गया है और सारे मोती नीचे गिर रहे हैं।

वह चहकते हुए बोली, “भगवान! इस तरह तो आपका पूरा खज़ाना ही खाली हो जायेगा!”

उसकी बात सुन मैं मुस्कुरा दिया और फिर उसकी मासूमियत देखने लगा।

वह घर में दिन भर अकेली रहती। उसी खिड़की पर बैठी। लेकिन शाम होते तक घर मे चहल-पहल बढ़ जाती। आगंतुकों में से कोई उससे पानी मांगता तो कोई खाना। कोई कुछ तो कोई कुछ। और वह दौड़-दौड़कर सबके काम करती।

देर रात जब सब अपने कमरों में चले जाते तो वह भी सारे काम निपटा, खिड़की पर आ बैठती और तारे गिनती। कई बार तारे गिनते-गिनते उसकी आँखों से आँसू बहते जैसे उन तारों में किसी अपने को ढूंढ रही हो तो कभी खिलखिलाकर हँस देती जैसे जिसे ढूंढ रही थी वह मिल गया हो। कभी हल्के-हल्के गुनगुनाती, “ये चाँद खिला ये तारे हँसे…..”

….उसका यूँ गुनगुनाना सुन अंदर बैठी मानव आकृतियाँ फुसफुसातीं, “लगता है इस AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) रोबोट की प्रोग्रामिंग करते समय EQ (इमोशनल कोशेंट) का परसेंट कुछ ज्यादा ही फीड हो गया है।”

भावशून्य मशीन बन चुकी उन इंसानी आकृतियों के बीच वह AI (आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस) रोबोट हर पल अपना EQ (इमोशनल कोशेंट) बढ़ाने की कोशिश कर रही थी और मैं… मैं उन मशीन बन चुके इंसानों के बीच… उस रोबोट का… मशीन से इंसान बनने का इंतज़ार।

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© अनघा जोगलेकर

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ संपादक का घर ☆ डॉ कुंवर प्रेमिल ☆

डॉ कुंवर प्रेमिल

(संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठतम साहित्यकार डॉ कुंवर प्रेमिल जी को  विगत 50 वर्षों से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में सतत लेखन का अनुभव हैं। अब तक 450 से अधिक लघुकथाएं रचित एवं बारह पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन। आपने लघु कथा को लेकर कई  प्रयोग किये हैं।  आपकी लघुकथा ‘पूर्वाभ्यास’ को उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव के द्वितीय वर्ष स्नातक पाठ्यक्रम सत्र 2019-20 में शामिल किया गया है। वरिष्ठतम  साहित्यकारों  की पीढ़ी ने  उम्र के इस पड़ाव पर आने तक जीवन की कई  सामाजिक समस्याओं से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है, जो कदाचित उनकी रचनाओं में झलकता है। हम लोग इस पीढ़ी का आशीर्वाद पाकर कृतज्ञ हैं। आज प्रस्तुत है आपका  एक विचारणीय लघुकथा  ‘‘संपादक का घर।)

☆ लघुकथा – संपादक का घर ☆ डॉ कुंवर प्रेमिल

मोहल्ले में जहां-तहां बिखरी कागज की चिंदिया, कतरनें देखकर कोई समझदार बोला-जरूर यहां कोई संपादक जैसा जीव रहता होगा।

‘तुम्हें कैसे मालूम’-साथी का प्रश्न उभरा।

‘यह उड़ता फिरता कचरा ही तो इसका सबूत है मियां। किसी पत्रिका के संपादक के घर जाकर माजरा देखिएगा, बैठने की जगह तक मयस्सर नहीं होगी।’

‘पर उसके बाल बच्चे ऐसे में कहां ठौर पाते होंगे भला।’

‘इसी कचरे के दरम्यां, बेचारे अपनी जगह बनाने के लिए बाध्य होते होंगे।’

साथी हक्का-बक्का था। कभी उड़ते कागज की चिंदियां, कतरनें देखकर तो कभी अपने साथी का चेहरा देखकर। किसी संपादक का घर देखने की जिज्ञासा जरूर उसके जेहन में बलवती हो रही होगी।

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© डॉ कुँवर प्रेमिल

संपादक प्रतिनिधि लघुकथाएं

संपर्क – एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मध्यप्रदेश मोबाइल 9301822782

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #187 ☆ कहानी – निमंत्रण ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है मानवीय संवेदनाओं पर आधारित प्रत्येक पात्रों के चरित्र को सजीव चित्रित करती कहानी  निमंत्रण। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 187 ☆

☆ कहानी ☆ निमंत्रण

(लेखक के कथा-संग्रह ‘जादू-टोना’ से)

रुकमनी चाची रोज़ शाम की तरह अपने दुआरे बैठीं नलके पर से पानी लेकर लौटतीं पड़ोसिनों से बतकहाव कर रही हैं। उनकी नातिनें दो-तीन बार पानी के बर्तन लेकर आ चुकी हैं। यह काम उन्हीं के जिम्मे है। रुकमनी चाची अब यह सब काम नहीं करतीं। बस इस टाइम दुआरे पर आकर जरूर बैठ जाती हैं ताकि पड़ोसिनों से आराम से बतकहाव हो सके। बात करने के लिए चटकती  जीभ को चैन मिल जाता है। अड़ोस- पड़ोस की सारी जानकारी वहीं बैठे-बैठे मिल जाती है।

लेकिन आज रुकमनी चाची का मन थिर नहीं है। बात सुनते सुनते मन भटक जाता है। बात का छोर टूट जाता है। फिर सुध लौटती है तो पूछती हैं, ‘हाँ, तो क्या बताया दमोह वाली के आदमी के बारे में? ज्यादा नसा-पत्ती करने लगा है? क्या कहें, सब बिगड़ती के लच्छन हैं।’

रुकमनी चाची की उद्विग्नता का कारण यह है कि दस-बारह दिन बाद उनकी भतीजी सुषमा के बड़े बेटे की शादी है, लेकिन उन्हें अभी तक कोई सूचना नहीं मिली है। सुषमा उनकी बड़ी बहन की बेटी है, जो अब नहीं हैं। सुषमा के पति का सिविल लाइंस में बड़ा बंगला है। वे एस.पी. के पद पर हैं। रुकमनी चाची लोगों को बताते नहीं थकतीं कि एस.पी. साहब उनके दामाद हैं, भले ही उनकी गाड़ी रुकमनी चाची के दरवाजे पर साल दो साल में कभी दिखायी पड़ती है। रुकमनी चाची पड़ोसियों को सफाई देती हैं— ‘पुलिस में हैं तो फुरसत कहाँ मिलती है? दिन रात की भागदौड़  है। अब ऐसे में सुसमा गिरस्ती सँभाले कि हमारे पास आकर बैठे।’

लेकिन जैसे जैसे दिन गुज़रते जाते हैं, उनकी बेचैनी बढ़ती जाती है। निमंत्रन अभी तक क्यों नहीं आया? नहीं बुलाएँगे क्या? सोचते सोचते हाथ का काम रुक जाता है। दरवाज़े पर कान लगा रहता है। कोई खटका होते ही पहुँचती हैं कि कोई निमंत्रन लेकर तो नहीं आया।

उन्हें पता है कि एस.पी. साहब और उनके   बेटे उनके परिवार को पसन्द नहीं करते। कल्चर का फर्क है, आर्थिक स्थिति का भी। कभी कोई अवसर-काज हुआ तो सुषमा अकेली आकर खानापूरी कर जाती है। एस.पी. साहब बड़ी मुश्किल से दर्शन देते हैं।

रुकमनी चाची के पति शमशेर सिंह लंबे समय तक एक पुराने जागीरदार के यहाँ ‘केयरटेकर’ थे। तब उनका रुतबा देखते बनता था। वैसे तो काली टोपी पहनते थे, लेकिन कभी-कभी तुर्रेदार साफा बाँधते थे। कभी कोई खास मौका हो तो ‘बिरजिस’ (ब्रीचेज़) पहनते थे, साथ में चमचमाते जूते। तब उनकी मूँछें हमेशा ग्यारह बज कर पाँच बजाती थीं। फिर धीरे-धीरे जागीरदार साहब की खुद की मूँछें ढीली हो गयीं और ‘केयरटेकर’ साहब की मूँछें सवा नौ से घटते-घटते सात-पच्चीस पर आ गयीं। पुरानी यादों के नाम पर अलमारी में रखी धुँधली तस्वीरें ही रह गयी हैं, जिनमें शमशेर सिंह पुराने जागीरदार साहब के साथ विभिन्न मुद्राओं में दिखायी पड़ते हैं।

शमशेर सिंह अच्छे दिनों में घर में अपना रौब गालिब करने में लगे रहे। बड़े लोगों की संगत में उन्होंने बड़े लोगों की बहुत सी आदतें ग्रहण कर ली थीं। परिवार पर हुकुम चलाना वे अपना अधिकार समझते थे। उनका सोचना था कि उनकी उपस्थिति में परिवार में अदब और कायदे का वातावरण होना चाहिए और फालतू की चूँ- चपड़ नहीं होना चाहिए। परिवार के लोग उनके सामने भीगी बिल्ली बने रहें तो उन्हें बड़ा सुख मिलता था। रोज़ शाम को वे अकेले या किसी मित्र के साथ बोतल खोल कर बैठ जाते थे और उस वक्त घरवालों का सिर्फ यह कर्तव्य होता था कि वे गरज कर जिस चीज़ की फरमाइश करें वह तुरन्त हाज़िर कर दी जाए। अपनी दुनिया में मस्त रहने के कारण उन्होंने कभी बच्चों की पढ़ाई- लिखाई की तरफ ध्यान नहीं दिया। अब दिन पलटने के साथ उनका रौब भरभरा गया था। परिवार के द्वारा उपेक्षित वे अपने कोने में मौन बैठे हुक्का गुड़गुड़ाते रहते थे।

परिवार में अपनी ही चलाने वाले शमशेर सिंह ने सात संतानें पैदा की थीं। उन्हें इस बात का गर्व था कि इनमें से छः लड़के थे, बस एक पता नहीं कैसे लड़की हो गयी। पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान न देने के कारण सब छोटी मोटी नौकरियाँ या काम कर अपना गुज़र कर रहे थे। लेकिन शमशेर सिंह को इसका कोई मलाल नहीं था। उनका दृढ़ मत था कि सब अपना अपना प्रारब्ध लिखा कर लाते हैं और जो कुछ होता है प्रारब्ध के अनुसार होता है। उसमें कोई रत्ती भर फेरबदल नहीं कर सकता।

अब जैसे-जैसे सुषमा के बेटे की शादी की तारीख नज़दीक आती जाती है, रुकमनी चाची की धुकुर-पुकुर बढ़ती जाती है। क्या सचमुच नहीं बुलाएँगे? वे जानती हैं कि एस.पी. साहब उनके नाम पर मुँह बिचकाते हैं। कहते हैं, ‘शी इज़ ए वेरी टॉकेटिव लेडी।’ उनके बेटे भी रुकमनी चाची से कन्नी काटते हैं। कारण यह है कि वे  कभी उनके घर जाती हैं तो दुनिया भर की रामायण लेकर बैठ जाती हैं। ऐसे लोगों के किस्से सुनाएँगीं जो मर-खप गये या जिन्हें कोई जानता नहीं। कोई रोग-दोष का ज़िक्र कर दे तो देसी नुस्खों से लेकर टोने-टोटके तक सब बता देंगीं। उनका टेप जो चालू होता है तो रुकने का नाम नहीं लेता। इसीलिए उनके पास बैठने वाले बिरले होते हैं। सब फटाफट पाँव छू कर दाहिने बायें हो जाते हैं। जो पाँव न छुए उसे रुकमनी चाची टेर कर बुलाती हैं और फिर पाँव आगे बढ़ा देती हैं।

रुकमनी चाची कई रिश्तेदारों को फोन करके पूछ चुकी हैं कि उनको निमंत्रन-पत्र मिला या नहीं। कोई कह देता है कि उसके पास भी नहीं पहुँचा तो उन्हें ढाढ़स हो जाता है। जब कोई बताता है कि उसके पास पहुँच गया तो उनका मन खिन्न हो जाता है। फिर बड़ी देर तक उनका मन किसी काम में नहीं लगता।

चैन नहीं पड़ता तो बेटों से पूछती हैं, ‘कहीं अरुन वरुन मिले क्या?’ अरुण वरुण सुषमा के बेटे हैं।

जवाब मिलता है, ‘नहीं मिले।’

चाची पूछती हैं, ‘कभी वहाँ जाना नहीं हुआ?’

बेटे कहते हैं, ‘किसलिए जाना है? वहाँ क्या काम?’

रुकमनी चाची चुप हो जाती हैं। बेटे सच कहते हैं। कोई और रिश्तेदार होता तो काम-धाम के लिए उन्हें बुला लेता, लेकिन एस.पी. साहब को आदमियों की क्या कमी? बिना बुलाये लोग दौड़ते फिर रहे होंगे।

रुकमनी चाची का मन मथता रहता है। ब्याह-शादी में नहीं जाएँगीं तो कैसे चलेगा? दूर-दूर के नाते-रिश्तेदार जुटेंगे। सब का हालचाल मिलेगा। एक बार बिछुड़े तो पता नहीं दुबारा मिलना हो या न हो। उन जैसे बहुत से पके आम हैं। कब टपक जाएँ पता नहीं। एक आदमी आएगा तो उससे दस आदमियों की खबर मिलेगी। लोग यहाँ तक आएँ और उनसे भेंट न हो, यह तो बहुत गलत बात होगी। लेकिन यह सुसमा मरी निमंत्रन- पत्र नहीं भेजेगी तो कैसे जाएँगीं?

बेटे उनकी हालत देखकर चुटकी लेते हैं— ‘नहीं आया न निमंत्रन पत्र? सुसमा बिटिया के बड़े गुन गाती रहती थीं।’

रुकमनी चाची आहत होकर कहती हैं, ‘नहीं बुलाते तो न बुलाएँ। हमें क्या फरक पड़ता है? वे पैसे वाले हैं तो अपने घर में बैठे रहें। घर के सयानों को नहीं बुलाएँगे तो चार आदमी उन्हीं को कहेंगे।’

लेकिन जब शादी के तीन चार दिन ही बचे तो रुकमनी चाची का धीरज टूट गया। एक दिन चुपचाप रिक्शा करके सुषमा के घर पहुँच गयीं। अन्दर पहुँचीं तो सुषमा ने पाँव छुए। चाची उदासीनता का अभिनय करके बोलीं, ‘इधर बजार गयी थी। बहुत दिन से तुम्हें देखा नहीं था। सोचा हाल-चाल पूछ लें।’

सुषमा बोली, ‘मौसी, शादी में सब लोग आइएगा।’

रुकमनी चाची व्यंग्य से बोलीं, ‘आ जाएँगे। निमंत्रन तो मिला नहीं।’

सुषमा का मुँह उतर गया। उसने छोटे बेटे वरुण को आवाज़ दी। वरुण ने रुकमनी चाची को देखकर दाँतों में जीभ दबायी।

सुषमा ने पूछा, ‘मौसी का कार्ड नहीं पहुँचाया?’

वरुण बोला, ‘आठ दस कार्ड रह गये हैं। उधर जाना नहीं हुआ। आज पहुँच जाएँगे।’

चाची उम्मीद से उसकी तरफ देखकर  बोलीं, ‘पक्का पहुँचाओगे या फिर भूल जाओगे?’

वरुण कान छू कर बोला, ‘आज पक्का। हंड्रेड परसेंट।’

रुकमनी चाची सुषमा से बोलीं, ‘मैं तो यहीं ले लेती, लेकिन घर में सब लोगों को अच्छा नहीं लगेगा।’

कार्ड पहुँचने का आश्वासन पाकर चाची खुश हो गयीं। चिन्ता मिट गयी। चलने लगीं तो एक बार फिर वरुण से बोलीं, ‘कितनी देर में आओगे?’

वरुण बोला, ‘आप चलिए। मैं पीछे-पीछे पहुँचता हूँ।’

रुकमनी चाची रिक्शे पर बैठ कर चल दीं। मन मगन था। अब वे कल्पना में डूबी थीं कि शादी में कौन-कौन मिलेगा और क्या-क्या बातें होंगी। बस एक चिन्ता उन्हें रह रह कर सता रही थी कि कहीं घर वालों को यह पता न लग जाए कि वे निमंत्रन-पत्र की जानकारी लेने सुषमा के घर पहुँची थीं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – विनिमय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

? संजय दृष्टि – लघुकथा – विनिमय ??

…जानते हैं, कैसा समय था उन दिनों! राजा-महाराजा किसी साम्राज्य से संधि करने या लाभ उठाने के लिए अपने कुल की कन्याओं का विवाह शत्रु राजा से कर दिया करते थे। सौहार्द के नाम पर आदान-प्रदान की आड़ में हमेशा सौदे हुए।

…अत्यंत निंदनीय। मैं तो सदा कहता आया हूँ कि हमारा अतीत वीभत्स था। इस प्रकार का विनिमय मनुष्यता के नाम पर धब्बा है, पूर्णत: अनैतिक है।

…पहले ने दूसरे की हाँ में हाँ मिलाई। यहाँ-वहाँ से होकर बात विषय पर आई।

…अच्छा, उस पुरस्कार का क्या हुआ?

…हो जाएगा। आप अपने राज्य में हमारा ध्यान रख लीजिएगा, हमारे राज्य में हम आपका ध्यान रख लेंगे।

…विषय पूरा हो चुका था। उपसंहार के लिए वर्तमान, अतीत की आलोचना में जुटा था। भविष्य गढ़ा जा रहा था।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 आपदां अपहर्तारं साधना श्रीरामनवमी अर्थात 30 मार्च को संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र सूचित की जावेगी ।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 114 ☆ लघुकथा – जिएं तो जिएं कैसे ? ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  स्त्री विमर्श आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘जिएं तो जिएं कैसे ?’। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 114 ☆

☆ लघुकथा – जिएं तो जिएं कैसे ? ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

कॉलबेल बजी। मैंने दरवाजा खोला, सामने एक वृद्धा खड़ी थीं। मैंने उनसे घर के अंदर आने का आग्रह किया तो बोलीं – ‘पहले बताओ मेरी कहानी पढ़ोगी तुम? ‘

अरे, आप अंदर तो आइए, बहुत धूप है बाहर – मैंने हँसकर कहा।

 ‘मुझे बचपन से ही लिखना पढ़ना अच्छा लगता है। कुछ ना कुछ लिखती रहती हूँ पर परिवार में मेरे लिखे को कोई पढ़ता ही नहीं। पिता ने मेरी शादी बहुत जल्दी कर दी थी। सास की डाँट खा- खाकर जवान हुई। फिर पति ने रौब जमाना शुरू कर दिया। बुढ़ापा आया तो बेटा तैयार बैठा है हुकुम चलाने को। पति चल बसे तो मैंने बेटे के साथ जाने से मना कर दिया। सब सोचते होंगे बुढ़िया सठिया गई है कि बुढ़ापे में लड़के के पास नहीं रहती। पर क्या करती, जीवन कभी अपने मन से जी ही नहीं सकी।‘

वह धीरे – धीरे चलती हुई अपने आप ही बोलती जा रही थीं।

मैंने कहा – ‘आराम से बैठकर पानी पी लीजिए, फिर बात करेंगे।‘ गर्मी के कारण उनका गोरा चेहरा लाल पड़ गया था और साँस भी फूल रही थी। वह सोफे पर पालथी मारकर बैठ गईं और साड़ी के पल्लू से पसीना पोंछने लगीं। पानी पीकर गहरी साँस लेकर बोलीं – ‘अब तो सुनोगी मेरी बात?’

हाँ, बताइए।

‘एक कहानी लिखी है बेटी ’ उन्होंने बड़ी विनम्रता से कागज मेरे सामने रख दिया। मैं उनकी भरी आँखों और भर्राई आवाज को महसूस कर रही थी। अपने ढ़ंग से जिंदगी ना जी पाने की कसक उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी।

‘ मैं पचहत्तर साल की हूँ, बूढ़ी हो गई हूँ पर क्या बूढ़े आदमी की कोई इच्छाएं नहीं होतीं? उसे बस मौत का इंतजार करना चाहिए? और किसी लायक नहीं रह जाता वह? घर में सब मेरा मजाक बनाते हैं, कहते हैं- चुपचाप राम – नाम जपो, कविता – कहानी छोड़ो।‘

 कंप्यूटरवाले की दुकान पर गई थी कि मुझे कंप्यूटर सिखा दो। वह बोला – ‘माताजी, अपनी उम्र देखो।‘ जब उम्र थी तो परिवारवालों ने कुछ करने नहीं दिया। अब करना चाहती हूँ तो उम्र को आड़े ले आते हैं !

आखिर जिएं तो जिएं कैसे ?

©डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – [email protected]  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – शब्दार्थ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

? संजय दृष्टि – लघुकथा – शब्दार्थ ??

मित्रता का मुखौटा लगाकर शत्रु, लेखक से मिलने आया। दोनों खूब घुले-मिले, चर्चाएँ हुईं। ईमानदारी से जीवन जीने के सूत्र कहे-सुने, हँसी-मज़ाक चला। लेखक ने उन सारे आयामों का मान रखा जो मित्रता की परिधि में आते हैं।

एक बार शत्रु रंगे हाथ पकड़ा गया। उसने दर्पोक्ति की कि मित्र के वेष में भी वही आया था। लेखक ने सहजता से कहा, ‘मैं जानता था।’

चौंकने की बारी शत्रु की थी। ‘शब्दों को जीने का ढोंग करते हो। पता था तो जान-बूझकर मेरे सच के प्रति अनजान क्यों रहे?’

‘सच्चा लेखक शब्द और उसके अर्थ को जीता है। तुम मित्रता के वेष में थे। मुझे वेष और मित्रता दोनों शब्दों के अर्थ की रक्षा करनी थी’, लेखक ने उत्तर दिया।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम को समर्पित आपदां अपहर्तारं साधना गुरुवार दि. 9 मार्च से श्रीरामनवमी अर्थात 30 मार्च तक चलेगी।

💥 इसमें श्रीरामरक्षास्तोत्रम् का पाठ होगा, साथ ही गोस्वामी तुलसीदास जी रचित श्रीराम स्तुति भी। आत्म-परिष्कार और ध्यानसाधना तो साथ चलेंगी ही।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ शेर, बकरी और घास ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। आज से प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कथा  “शेर, बकरी और घास…“।)   

☆ कथा-कहानी ☆ शेर, बकरी और घास ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

बचपन के स्कूली दौर में जब क्लास में शिक्षक कहानियों की पेकिंग में क्विज भी पूछ लेते थे तो जो भी छात्र सबसे पहले उसे हल कर पाने में समर्थ होता, वह उनका प्रिय मेधावी छात्र हो जाता था और क्लास का हीरो भी. यह नायकत्व तब तक बरकरार रहता था जब तक अगली क्विज कोई दूसरा छात्र सबसे पहले हल कर देता था. शेष छात्रों के लिये सहनायक का कोई पद सृजित नहीं हुआ करता था तो वो सब नेचरली खलनायक का रोल निभाते थे. उस समय शिक्षकों का रुतबा किसी महानायक से कम नहीं हुआ करता था और उनके ज्ञान को चुनौती देने या प्रतिप्रश्न पूछने की जुर्रत पचास पचास कोस दूर तक भी कोई छात्र सपने में भी नहीं सोच पाता था. उस दौर के शिक्षकगण होते भी बहुत कर्तव्यनिष्ठ और निष्पक्ष थे. उनकी बेंत या मुष्टिप्रहार अपने लक्ष्यों में भेदभाव नहीं करता था और इसके परिचालन में सुस्पष्टता, दृढ़ता, सबका साथ सबकी पीठ का विकास का सिद्धांत दृष्टिगोचर हुआ करता था. इस मामले में उनका निशाना भी अचूक हुआ करता था. मजाल है कि बगल में सटकर बैठे निरपराध छात्र को बेंत छू भी जाये. ये सारे शिक्षक श्रद्धापूर्वक इसलिए याद रहते हैं कि वे लोग मोबाइलों में नहीं खोये रहते थे. पर्याप्त और उपयुक्त वस्त्रों में समुचित सादगी उनके संस्कार थे जो धीरे धीरे अपरोक्ष रूप से छात्रों तक भी पहूँच जाते थे. वस्त्रहीनता के बारे में सोचना महापाप की श्रेणी में वर्गीकृत था. ये बात अलग है कि देश जनसंख्या वृद्धि की पायदानों में बिनाका गीत माला के लोकप्रिय गीतों की तरह कदम दरकदम बढ़ता जा रहा था. वो दौर और वो लोग न जाने कहाँ खो गये जिन्हें दिल आज भी ढूंढता है, याद करता है.

तो प्रिय पाठको, उस दौर की ही एक क्विज थी जिसके तीन मुख्य पात्र थे शेर, बकरी और घास. एक नौका थी जिसके काल्पनिक नाविक का शेर कुछ उखाड़ नहीं पाता था, नाविक परम शक्तिशाली था फिर भी बकरी, शेर की तरह उसका आहार नहीं थी. (जो इस मुगालते में रहते हैं कि नॉनवेज भोजन खाने वाले को हष्टपुष्ट बनाता है, वो भ्रमित होना चाहें तो हो सकते हैं क्योंकि यह उनका असवैंधानिक मौलिक अधिकार भी है. )खैर तो आदरणीय शिक्षक ने यह सवाल पूछा था कि नदी के इस पार पर मौजूद शेर, बकरी और घास को शतप्रतिशत सुरक्षित रूप से नदी के उस पार पहुंचाना है जबकि शेर बकरी का शिकार कर सकता है और बकरी भी घास खा सकती है, सिर्फ उस वक्त जब शिकारी और शिकार को अकेले रहने का मौका मिले. मान लो के नाम पर ऐसी स्थितियां सिर्फ शिक्षकगण ही क्रियेट कर सकते हैं और छात्रों की क्या मजाल कि इसे नकार कर या इसका विरोध कर क्लास में मुर्गा बनने की एक पीरियड की सज़ा से अभिशप्त हों. क्विज उस गुजरे हुये जमाने और उस दौर के पढ़ाकू और अन्य गुजरे हुये छात्रों के हिसाब से बहुत कठिन या असंभव थी क्योंकि शेर, बकरी को और बकरी घास को बहुत ललचायी नज़रों से ताक रहे थे. पशुओं का कोई लंचटाइम या डिनर टाईम निर्धारित नहीं हुआ करता है(इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि मनुष्य भी पशु बन जाते हैं जब उनके भी लंच या डिनर  का कोई टाईम नहीं हुआ करता. )मानवजाति को छोडकर अन्य जीव तो उनके निर्धारित और मेहनत से प्राप्त भोजन प्राप्त होने पर ही भोज मनाते हैं. खैर बहुत ज्यादा सोचना मष्तिष्क के स्टोर को खाली कर सकता है तो जब छात्रों से क्विज का हल नहीं आया तो फिर उन्होंने ही अपने शिष्यों को अब तक की सबसे मूर्ख क्लास की उपाधि देते हुये बतलाया कि इस समस्या को इस अदृश्य नाविक ने कैसे सुलझाया. वैसे शिक्षकगण हर साल अपनी हर क्लास को आज तक की सबसे मूर्ख क्लास कहा करते हैं पर ये अधिकार, उस दौर के छात्रों को नहीं हुआ करता था. हल तो सबको ज्ञात होगा ही फिर भी संक्षेप यही है कि पहले नाविक ने बकरी को उस पार पहुंचाया क्योंकि इस पार पर शेर है जो घास नहीं खाता. ये परम सत्य आज भी कायम है कि “शेर आज भी घास नहीं खाते”फिर नाव की अगली कुछ ट्रिप्स में ऐसी व्यवस्था की गई कि शेर और  बकरी या फिर बकरी और घास को एकांत न मिले अन्यथा किसी एक का काम तमाम होना सुनिश्चित था.

शेर बकरी और घास कथा: आज के संदर्भ में

अब जो शेर है वो तो सबसे शक्तिशाली है पर बकरी आज तक यह नहीं भूल पाई है कि आजादी के कई सालों तक वो शेर हुआ करती थी और जो आज शेर बन गये हैं, वो तो उस वक्त बकरी भी नहीं समझे जाते थे. पर इससे होना क्या है, वास्तविकता रूपी शक्ति सिर्फ वर्तमान के पास होती है और वर्तमान में जो है सो है, वही सच है, आंख बंद करना नादानी है. अब रहा भविष्य तो भविष्य का न तो कोई इतिहास होता है न ही उसके पास वर्तमान रूपी शक्ति. वह तो अमूर्त होता है, अनिश्चित होता है, काल्पनिक होता है. अतः वर्तमान तो शेर के ही पास है पर पता नहीं क्यों बकरी और घास को ये लगता है कि वे मिलकर शेर को सिंहासन से अपदस्थ कर देंगे. जो घास हैं वो अपने अपने क्षेत्र में शेर के समान लगने की कोशिश में हैं पर पुराने जमाने की वास्तविकता आज भी बरकरार है कि शेर बकरी को और बकरी घास को खा जाती है. बकरी और घास की दोस्ती भी मुश्किल है और अल्पकालीन भी क्योंकि घास को आज भी बकरी से डर लगता है. वो आज भी डरते हैं कि जब विगतकाल का शेर बकरी बन सकता है तो हमारा क्या होगा. 

कथा जारी रह सकती है पर इसके लिये भी शेर, बकरी और घास का सुरक्षित रूप से बचे रहना आवश्यक है.

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 155 – माता की चुनरी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श  और भ्रूण हत्या जैसे विषय पर आधारित एक सुखांत एवं हृदयस्पर्शी लघुकथा “माता की चुनरी ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 155 ☆

🌹 लघुकथा 🌹 🚩 माता की चुनरी 🚩❤️

सुशील अपनी धर्मपत्नी सुरेखा के साथ बहुत ही सुखी जीवन व्यतीत कर रहा था। सदा अच्छा बोलना सब के हित की बातें सोचना, उसके व्यक्तित्व की पहचान थी।

दोनों पति-पत्नी अपने घर परिवार की सारी जरूरतें भी पूरी करते थे। धार्मिक प्रवृत्ति के साथ-साथ सहयोग की भावना से भरपूर जीवन बहुत ही आनंदित था। परंतु कहीं ना कहीं कहते हैं ईश्वर को कुछ और ही मंजूर होता है। विवाह के कई वर्षों के उपरांत भी उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हो सका था।. 

सुशील का प्रतिदिन का नियम था ऑफिस से छुट्टी होते ही गाड़ी पार्किंग के पास पहुंचने से पहले बैठी फल वाली एक सयानी बूढ़ी अम्मा से चाहे थोड़ा सा फल लेता, परंतु लेता जरूर था। बदले में उसे दुआएँ मिलती थी और वह उसे पैसे देकर चला जाता।

आज महागौरी का पूजन था। जल्दी-जल्दी घर पहुँचना चाह रहा था। अम्मा ने देखा कि आज वह बिना फल लिए जा रहा है उसने झट आवाज लगाई… “बेटा ओ बेटा आज बूढ़ी माँ से कुछ फल लिए बिना ही जा रहा है।” विचारों का ताना-बाना चल रहा था सुशील ने कहा…. “आज कन्या भोज है मुझे जल्दी जाना है कल ले लूंगा।”

अम्मा ने कहा… “फल तो लेता जा कन्या भोज में बांट देना।” पन्नी में दो तीन दर्जन केले वह देने लगी सुशील झुक कर लेने लगा और मजाक से बोला…. “इतने सालों से आप आशीर्वाद दे रही हो पर मुझे आज तक नहीं लगा।” कह कर वह हँसने लगा।

उसने देखा अम्मा की साड़ी का आँचल जगह-जगह से फटा हुआ है। और वह कह रही थी… “तेरी मनोकामना पूरी होते ही माता को चुनरी जरूर चढ़ा देना।”

जल्दी-जल्दी वह फल लेकर घर की ओर बढ़ चला। घर पहुँचने पर घर में कन्याएँ दिखाई दे रही थी और साथ में कुछ उनके रिश्तेदार भी दिखाई दे रहे थे।

माँ और पिताजी सामने बैठे बातें कर रहे थे और सभी को हँसते हुए मिठाई खिला रहे थे।” क्या बात है? आज इतनी खुशी हमेशा तो कन्या भोजन होता है परंतु आज इतनी सजावट और खुशहाली क्यों?” अंदर गया बधाइयों का तांता लग गया।

“बधाई हो तुम पापा बनने वाले हो!” सुशील के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा सुरेखा ने हाँ में सिर हिलाया। शाम ढलने वाली थी सुशील की भावना को समझ सुरेखा ने मन ही मन हाँ कह कर तैयारी में जुट गई।

 सुशील बाहर निकल कर गया। साड़ी की दुकान से साड़ी चुनरी और जरूरत का सामान ले वह फल वाली अम्मा के पास पहुँचा और कहा… “अभी घर पर आपको फलों की टोकरी सहित बुलाया है। चलो।” अम्मा ने कहा… “थोड़े से फल बच्चे हैं बेटा बेंच लूं।” सुशील ने कहा….. “नहीं इसी को टोकरी में डाल लो और अभी मेरे साथ गाड़ी में चलो।” उसने सोचा नेक दिल इंसान है और प्रतिदिन मेरे से सौदा लेता है। हमेशा आने को कहता है आज चली जाती हूं उनके घर।

दरवाजे पर पहुँचते ही उसकी टोकरी को रख सुशील उसे दरवाजे पर ले आया। सामने चौकी बिछी थी उसमें बिठाने लगा। वह आश्चर्यचकित थी परंतु हाथ पकड़कर उसने उसे बिठा दिया। फूलों का हार और सुंदर सी साड़ी चुनर लिए सुरेखा आई।

साड़ी भेंट कर वह हार पहना चुनर ओढा रही थी। अब तो अम्मा को सब समझ में आ गया। खुशी से वह नाचने लगी। सभी की आँखें खुशी से नम थी। सुशील की आँखों से बहते आँसू देख, अपने हथेलियों पर वह रखते हुए बोली… “मोती है इसे बचा कर रखना बिदाई पर देने पड़ेंगे।” आशय समझकर सुशील हंसने लगा। माता रानी के जयकारे लगने लगे।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #185 ☆ कथा कहानी – धंधा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय  कहानी ‘धंधा ’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 185 ☆

☆ कहानी ☆ धंधा

(लेखक के कथा-संग्रह ‘जादू-टोना’ से) 

पम्मी की व्यस्तता का अंत नहीं है। पंद्रह बीस दिन दूकान का फर्नीचर और काउंटर बनने में लगे, अब वस्त्रों को ढंग से सजाना है ताकि वे दूर से ही लोगों का ध्यान खींचें। एक सीधा-सादा दर्जी मिल गया है जो दिन भर बुटीक में बैठेगा। अच्छे ‘प्रॉफिट’ के लिए कर्मचारी का सीधा-सादा और निष्ठावान होना ज़रूरी है। कर्मचारी रोज़ कोई न कोई फरमाइश लेकर खड़े रहें तो फिर मालिक को मुनाफा कहाँ से होगा?

बुटीक के दरवाज़े के ऊपर एक शानदार बोर्ड लग गया है जिसे देखकर हर बार पम्मी मगन हो जाती है। उसे पक्का भरोसा है कि साल दो साल में बुटीक बढ़िया आमदनी देने लगेगा। जो भी परिचित महिला मिलती है उससे पूछती है— ‘जब हम मेनत करेंगे तो मुनाफा क्यूँ नईं होगा?’ और हर बार जवाब मिलता है, ‘क्यूँ नईं होगा? जरूर होगा।’ लेकिन पूछते पूछते मम्मी का मन नहीं भरता।

पाँच दिन बाद बुटीक का उद्घाटन है। एक स्थानीय मंत्री से फीता काटने के लिए स्वीकृति मिल गयी है। पहले राज़ी नहीं हो रहे थे, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं से दबाव डलवाया तो मान गये। अब पम्मी फूली नहीं समा रही है कि उसके बुटीक का उद्घाटन मंत्री जी के कर-कमलों से होगा।
पम्मी की सास सवेरे से कपड़ों में कीमत का ‘टैग’ लगाने में लगी थीं और पम्मी सामने लिस्ट रखकर कार्डों पर आमंत्रितों के नाम लिखने की माथापच्ची कर रही थी। निमंत्रण-पत्रों में उन घरों को तवज्जो दी जा रही थी जिनमें फ़ेमिली थोड़ा फैशनेबल थी और युवतियों की संख्या ज़्यादा थी। जेब में पैसा होना चाहिए और सर पर फैशन का भूत सवार होना चाहिए। ‘ओल्ड-फैशंड’ को बुलाने से क्या फायदा? बिना कुछ खरीदे घंटों बिटर-बिटर ताकेंगीं और फिर वापस लौट कर मीन-मेख निकालेंगीं।

नाम लिखते लिखते पम्मी ने अचानक माथे पर हाथ मारा और ‘हाय रब्बा, मेरे से बड़ी गलती हो गयी’  कह कर लंबी साँस छोड़ी। सास ने परेशान होकर उसकी तरफ देखा,पूछा, ‘क्या हुआ,पुत्तर? कौन सी गलती हो गयी?’

पम्मी हाथ का काम रोक कर बोली, ‘गलती ये हो गयी, माँजी, कि मैंने मिसेज़ सिंह से झगड़ा कर लिया।’

माँजी ने पूछा, ‘कब कर लिया?’

पम्मी बोली, ‘अभी पिछले महीने।’

माँजी ने पूछा, ‘क्यूँ कर लिया झगड़ा?’

पम्मी बोली, ‘उसके कुत्ते की वजह से हुआ। वो सवेरे कुत्ते को घुमाने ले जाती है। मैं उस दिन सैर को निकली थी। उसके बगल से गुज़री तो कुत्ता एकदम मेरे ऊपर भूँक पड़ा। मैं घबरा गयी। मैंने गुस्से में कह दिया कि कुत्ता रखने का शौक है तो उस को कंट्रोल करना सीखो। वो कहने लगी कि मैं फालतू गुस्सा दिखा रही हूँ, कुत्ते ने काटा तो नहीं है। मैंने कहा तुझे मैनर्स नहीं हैं, उसने भी कहा मुझे मैनर्स नहीं हैं। फिर शटप शटप कर हम लोग अपने अपने घर आ गये।’

सास जी बोलीं, ‘तो इसमें क्या गलत हो गया? ठीक ही तो कहा तूने। आगे कुत्ते को कंट्रोल में रखेगी।’

पम्मी फिर माथा ठोक कर बोली, ‘अरे माँजी, सिंह लोगों के तीन रिश्तेदार तो इसी कॉलोनी में हैं। दो घर बगल में विजय नगर में हैं। एक रिश्तेदार स्नेह नगर में है। वो नाराज़ रही तो उसका कोई रिश्तेदार मेरे बुटीक में नहीं आएगा। कॉलोनी के दूसरे लोगों को भड़काएगी वो अलग।’

माँजी पैर फैला कर बोलीं, ‘मरने दे। नहीं आते हैं तो न आयें। तू क्यों दुबली होती है?’

पम्मी गाल पर हाथ रख कर बोली, ‘आप तो कुछ समझतीं नहीं, माँजी। उनके छः घरों में कम से कम बीस पचीस लेडीज़ होंगीं। अगर सब मुझसे रूठ कर बैठ गयीं तो मेरा तो कितना नुकसान हो जाएगा। सब आ जाएँ तो मेरे तो सॉलिड कस्टमर हो जाएँगे।’

माँजी ने सहमति में सिर हिलाया, कहा, ‘बात तो ठीक है, पुत्तर। तूने गलती कर दी। कुत्ते के पीछे क्या लड़ना!’

पम्मी थोड़ी देर चिबुक पर हथेली रखकर चिंतामग्न रही, फिर बोली, ‘अब इस मामले को आप ही ठीक कर सकती हैं, माँजी।’

माँजी ने पूछा, ‘मैं क्या कर सकती हूँ भला?’

पम्मी बोली, ‘आप कल सवेरे कार्ड लेकर उनके घर चली जाओ। आप स्यानी हो, आपके जाने का असर पड़ेगा। आप बोलना कि जरूर आएँ। कोई गलती हो गयी हो तो मन में न रखें।’

माँजी बोलीं, ‘तू कहती है तो चली जाऊँगी।’

पम्मी बोली, ‘आप उनको कार्ड दे आओ। उनके रिश्तेदारों को मैं दे आऊँगी।’

दूसरे दिन माँजी मिसेज़ सिंह का कार्ड लेकर गयीं। उनके घुटनों में दर्द होता था, इसलिए दोनों तरफ झूलती हुई, धीरे-धीरे चलती हुई गयीं।

मिसेज़ सिंह ने उन्हें बैठाया, हाल-चाल पूछे। माँजी कार्ड देकर बोलीं, ‘पम्मी के बुटीक का पंद्रह को उद्घाटन है पुत्तर। जरूर आना।’

मिसेज़ सिंह ने कहा, ‘ज़रूर आऊँगी, माँजी।’

माँजी बोलीं, ‘नईं पुत्तर! पम्मी बता रही थी कि उसने आपसे कुछ बातचीत कर ली थी। नादान है। बहुत पछता रही थी। कहने लगी मैं क्या मुँह लेकर जाऊँ, माँजी। आप चली जाओ, कहना मेरी बात को दिल से निकाल दें और उद्घाटन में जरूर आएँ। वैसे आपकी बहुत तारीफ करती है। कहती है मिसेज़ सिंह बहुत नेकदिल हैं।’

मिसेज़ सिंह ने आश्वस्त किया, ‘कोई झगड़ा नहीं है, माँजी। मैं ज़रूर आऊँगी।’

माँजी चलने के लिए उठीं, दरवाजे़ पर पलट कर बोलीं, ‘पुत्तर, मेरे से वादा किया है तो तोड़ना मत, नईं तो मुझे बहुत दुख होगा।’

मिसेज़ सिंह हँस कर बोलीं, ‘आप भरोसा रखिए माँजी। मैं पक्का आऊँगी।’

माँजी खुश खुश घर लौट गयीं। पम्मी को बताया तो उसने राहत की साँस ली।

उद्घाटन वाले दिन बुटीक के सामने शामियाना लगाकर सौ कुर्सियाँ लगा दी गयीं। मंत्री जी ने फीता काटकर पम्मी जी को ढेर सारी बधाइयाँ दीं और अपने भाषण में कहा कि शहर की सब स्त्रियाँ पम्मी जी की तरह आगे आने लगें तो शहर की तरक्की में देर नहीं लगेगी। फिर सब की फरमाइश पर खूब सारे फोटो खिंचवा कर वे दूसरे कार्यक्रमों में हिस्सा लेने चले गये।

फिर अतिथियों ने बुटीक को देखना और औपचारिक खरीदारी करना शुरू किया। पम्मी को सबसे बधाइयाँ मिल रही थीं। लेकिन पम्मी की नज़र बार-बार मिसेज़ सिंह को ढूँढ़ती थी जो अभी तक दिखायी नहीं पड़ी थीं। अचानक उसे मिसेज़ सिंह महिलाओं के जत्थे के साथ आती दिखायी पड़ीं और उसकी बाँछें खिल गयीं। आगे बढ़कर उसने उन्हें गले से लगा लिया, बोली, ‘आप आयीं तो कित्ती खुशी हुई। मुझे तो डर लग रहा था कि शायद आप नहीं आएंँगीं।’

मिसेज़ सिंह बोली, ‘क्यों नहीं आती? मैंने माँजी से कहा था कि ज़रूर आऊँगी।’

पम्मी बोली, ‘वो उस दिन मैं आपको उल्टा-सीधा बोल गयी थी, इसलिए मुझे डर लग रहा था। मैंने छोटी सी बात को इतना बड़ा बना दिया। आपका कुत्ता तो बहुत प्यारा है। दरअसल मैं बहुत शॉर्ट टेंपर्ड हो गयी हूँ। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाती हूँ, फिर बाद में पछताती हूँँ कि कैसी बेवकूफी कर दी। आपने उस दिन की बात को भुला दिया न ?’

मिसेज़ सिंह उसकी बाँह पकड़ कर हँस कर बोलीं, ‘ओहो! मैंने तो उस बात को कब का भुला दिया। आप खामखाँ परेशान हो रही हैं। चलिये, आपका बुटीक देखते हैं।। बड़ा शानदार बनाया है। मुझे बेटी के लिए दो-तीन सूट खरीदना है।’

पम्मी उनकी बाँह थामकर उन्हें अन्दर ले गयी। बाकी मेहमान मिसेज़ सिंह को मिल रहे इस ‘वीआईपी ट्रीटमेंट’ को देखकर हैरान थे, लेकिन पम्मी यह सोच सोच कर खुश थी कि उसने धंधे के कुछ जरूरी गुर सीख लिये हैं।

 © डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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