हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मेरी डायरी के पन्ने से # 18 – भूटान की अद्भुत यात्रा – भाग – 1 ☆ सुश्री ऋता सिंह ☆

सुश्री ऋता सिंह

(सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुश्री ऋता सिंह जी द्वारा ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपने यात्रा संस्मरणों पर आधारित आलेख श्रृंखला को स्नेह प्रतिसाद के लिए आभार। आज प्रस्तुत है आपकी डायरी के पन्ने से …  – संस्मरण – भूटान की अद्भुत यात्रा)

? मेरी डायरी के पन्ने से # 18 – भूटान की अद्भुत यात्रा – भाग – 1 ?

(24 मार्च – 31 मार्च 2024)

हमारा पड़ोसी देश भूटान है और भारत के साथ इस देश का अच्छा स्नेह संबंध भी है।

भारतीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी हाल ही में भूटान जाकर आए थे। थिंप्फू नामक शहर से पारो नामक शहर को पहले से ही रंगीन पताकों से सजाया गया था। थिंप्फू शहर के रास्ते पर भारतीय झंडा और भूटान का झंडा सड़क के बीच लगातार लगाए गए थे तथा इस मैत्री संबंध को बनाए रखते हुए यहाँ के पाँचवे राजा की और मोदी जी की तस्वीरें सब तरफ़ लगाई हुई दिखाई दे रही थी। मन गदगद हो उठा। हमारा सौभाग्य ही है कि हम मोदी जी के यहाँ आने के दो दिन बाद ही भूटान की सैर करने पहुँचे।

हम तीन सहेलियों ने मार्च के महीने में भूटान जाने का निश्चय किया। हम 23 मार्च मध्य रात्रि पुणे से मुंबई के लिए रवाना हुए। 24 की प्रातः फ्लाइट से बागडोगरा पहुँचे। बागडोगरा से भूटान की सीमा तक पहुँचने के लिए टैक्सी बुक की गई थी। इस ट्रिप के दौरान हमने बागडोगरा से जयगाँव नामक शहर तक यात्रा की जो चार घंटे की यात्रा रही।

जयगाँव में पहुँचने पर हमें भूटान लेकर जानेवाला गाइड मिला। हम भारत की सीमांत पर बने भूटान के दफ़्तर से होते हुए अपना वोटर आई डी दिखाकर भूटान की ज़मीन पर पहुँचे। भूटान में प्रवेश करने के लिए पासपोर्ट या वोटर आई डी की आवश्यकता होती है। पाठकों को बता दें यहाँ आधार कार्ड नहीं चलता।

जयगाँव बंगाल का आखरी गाँव है। उसके बाद भूटान की सीमा प्रारंभ होती है। यहाँ कोई बॉर्डर नहीं है केवल भूटान कलाकृति के निशान स्वरूप एक बड़ा – सा प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस प्रवेश द्वार का उपयोग केवल गाड़ियाँ ही कर सकती हैं। यात्रियों को जयगाँव में उतरकर भूटान जाने के लिए एक अलग द्वार से पैदल ही जाना पड़ता है। लौटने के लिए भी यही व्यवस्था है। यह बड़ा अद्भुत अनुभव रहा।

भूटान जाने के लिए जो दफ़्तर बना हुआ है वह भीतर से साफ- सुथरा और हिंदी बोलनेवाले भूटानी तुरंत सेवा प्रदान करते हुए दिखाई दिए। जयगाँव की ओर से जानेवाला मार्ग अत्यंत संकरा और गंदगी से न केवल भरपूर है बल्कि लोकल लोगों की भीड़ भी बहुत रहती है। भूटान का यह एन्ट्री पॉइंट उस तुलना में साफ़ सुथरा लगा।

यह भारत के नज़दीक का पहला शहर है नाम है फुन्टोशोलिंग। स्वच्छ और छोटा – सा शहर है यह। फुन्टोशोलिंग शहर जयगाँव से आने -जानेवाले पर्यटकों की सुविधा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी शहर है।

हम फुन्टोशोलिंग के एक होटल में एक रात ही रहे। होटलका नाम था गा मे गा यह व्यवस्था हमारी थकान उतारने के लिए ही कई गई थी।

हम तीनों बहुत थकी हुई थीं क्योंकि हम 23 की मध्य रात्रि घर से रवाना हुई थीं और 24की शाम हम फुन्टोशोलिंग पहुँचे। हमने जल्दी डिनर कर सोने का निर्णय लिया। दूसरे दिन से हमारी भूटान की यात्रा प्रारंभ होने जा रही थी।

मेरी डायरी के पन्ने से…..

भूटान की अद्भुत यात्रा (25 मार्च 2024)

हमने प्रातः नाश्ता किया। हमारे साथ आठ दिनों तक मार्गदर्शन करनेवाला गाइड अपने साथ आठ दिन रहने वाली गाड़ी और ड्राइवर लेकर समय पर उपस्थित हो गया।

गाइड का नाम था पेमा और चालक का नाम था साँगे। दोनों भूटान के नागरिक थे। हिंदी बोलना जानते थे। पेमा कामचलाऊ अंग्रेज़ी बोल लेता था। वे दोनों ही अपने देश की वेश-भूषा में थे। दोनों ही अत्यंत तरुण, मृदुभाषी तथा व्यवहार कुशल भी थे। हम सीनियर पर्यटकों को साथ लेकर चलते समय सावधानी बरतने वाले अत्यंत सुशील नवयुवक थे। उन दोनों का स्वभाव हमें अच्छा लगा और एक परिवार की तरह हम आठ दिन एक साथ घूमते रहे। पाठकों को बता दें कि जहाँ तक समय का सवाल है भूटान भारत से 30 मिनिट आगे है अतः अपनी कलाई की घड़ी और मोबाइल की घड़ी को इसके अनुसार एडजेस्ट कर लेना आवश्यक है।

हमने सबसे पहले भूटान इमीग्रेशन का फॉर्म भरा जहाँ से हमें पेमा और सांगे के साथ उनकी प्राइवेट कार में 31मार्च तक घूमने की लिखित इजाज़त मिली। यह एक प्रकार का विज़ा है।

हमारी यात्रा प्रारंभ हुई। पहला स्थान जो हम देखने गए उसका नाम था सांगे मिगायुर लिंग ल्हाकांग यह एक ऊँची टावर जैसी इमारत है। इसे लैंड ऑफ़ थंडर ड्रैगन कहा जाता है। और टावर को मिलारेपा कहते हैं। यह फुन्टोशोलिंग में ही स्थित है।

यह विश्वास है कि एक संत तिब्बत से भूटान आए थे। दुश्मनों से बदला लेने के लिए वे काला जादू सीख लिए थे और उसका उपयोग भी करते थे। उनके गुरु मार्पा थे। उन्हें जब काला जादू वाली बात ज्ञात हुई तो उन्होंने अपने शिष्य को अकेले हाथ मिट्टी से नौ मंजिली इमारत बनाने का हुक्म दिया। (चित्र संलग्न है ) गुरु को ज्ञात था कि शिष्य के भीतर बदले की भावना और बुराइयाँ भरी हुई है। इसी कारण इमारत को तोड़कर अन्यत्र बनाने का फ़रमान जारी किया। ऐसा कई बार हुआ अंततः शिष्य साधना के लिए चला गया और अपने भीतर की सारी हीन भावनाओं को समाप्त करने में सफल हुआ। इस इमारत में मेलारेपा की बड़ी मूर्ति स्थित है। आज भूटानी अपने मन से इस मंदिर का दर्शन करते हैं जो गुरु के मार्गदर्शन का प्रतीक भी है। इसकी नौ मंजिली इमारत के सामने बुद्ध मंदिर भी स्थित है। आस-पास कुछ भिक्षुक भी रहते हैं। परिसर अत्यंत स्वच्छ और सुंदर बना हुआ है। वातावरण शांतिमय है।

अब हम आगे की ओर प्रस्थान करते रहे। हमारा पहला पड़ाव था थिंम्फू। यह संपूर्ण पहाड़ी इलाका है। 10, 000फीट की ऊँचाई पर स्थित सुंदर, स्वच्छ शहर है। यह भूटान का सबसे बड़ा शहर है तथा भूटान राज्य की राजधानी भी है।

हमें भूटान इमीग्रेशन से रवाना होते -होते बारह बज गए थे। थिंप्फू पहुँचने में पाँच बज गए। वैसे यह यात्रा चार घंटे की ही होती है पर रास्ते में जैसै -जैसे हम ऊपर की ओर बढ़ने लगे हमें तेज़ वर्षा का सामना करना पड़ा। गाड़ी की रफ़्तार कम होती गई। साथ ही सड़क पर भयंकर कोहरा छाया रहा। भीषण शीत और कोहरे के कारण गाड़ी में हीटर चलाने की आवश्यकता हुई। पर यात्रा में कोई कष्ट न हुआ।

चालक अत्यंत अनुभवी और सतर्क रहा।

सड़क चौड़ी थी और दो लेन की थी। एक तरफ़ खड़ा ऊँचा पहाड़ और दूसरी ओर तराई थी। चालक सुपारी अवश्य खाते हैं पर कहीं भी न गंदगी फैलाते हैं न सुपारी का पैकेट फेंकते हैं। जिस कारण शहर स्वच्छ ही दिखाई देता है। जो हमारे लिए एक आनंद का विषय था।

हम पाँच बजे के करीब थिंप्फू के होटल में पहुँचे। हमारे रहने की व्यवस्था बहुत ही उत्तम थी। विशाल कमरे में तीनों सहेलियों के रहने की अत्यंत सुविधाजनक व आराम दायक व्यवस्था रही। अब तापमान 2° सेल्सियस था। कमरे में हीटर लगा होने की वजह से कोई तकलीफ़ महसूस न हुई। हम सबने गरम -गरम पानी से हाथ मुँह धोया ताकि थकावट दूर हो। और चाय पीकर गपशप में लग गए। उस रात तीव्र गति से वर्षा की झड़ी लगी रही।

हम जब थिंम्फ़ू की ओर जा रहे थे तो रास्ते में मोदी जी के आगमन के लिए की गई सजावट का दर्शन भी मिला। पहाड़ों पर और तराईवाले हिस्सों पर चौकोर, रंगीन चौड़े -चौड़े तथा बड़े- बड़े पताके लगाए गए थे। ये पताके लाल, हरे, पीले, नीले और सफ़ेद रंग के थे। किसी महान व्यक्ति के आगमन से पूर्व इस तरह के पताके लगाए जाने की भूटान में प्रथा है। यह सिल्क जैसा कपड़ा होता है और बीच -बीच में थोड़ा कटा सा होता है ताकि हवा लगने पर वे खूब लहराते रहे। लंबी रस्सी में ऐसे कई पताके लगाए जाते हैं। हवा चलते ही ये फड़फड़ाने लगते हैं। हवा कए साथ उसकी फड़फब़ाने की ध्वनि सुमधुर लगती है। दृश्य सुंदर और आँखों को सुकून दे रहे थे।

त्रिकोण सफेद तथा रंगीन पताकों पर मंत्र लिखे हुए पताके लगे हुए भी दिखे। भूटान निवासी बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। इस धर्म के अनुसार अपने पहाड़, पर्वत, नदी, जंगल आदि को सुरक्षित रखने तथा देश के नागरिकों को सुरक्षित रखने हेतु ये रंगीन त्रिकोणी पताके लगाए जाते हैं। इन पर सर्व कल्याण के मंत्र प्रिंट किए हुए होते हैं। जन साधारण का प्रकृति के प्रति प्रेम तथा सम्मान देखकर मन प्रफुल्लित हुआ।

इसके अलावा सफ़ेद रंग के बड़े – बड़े कई झंडे भी एक ऊँचे स्थान पर एक साथ लगाए हुए दिखाई दिए। उन पर भी मंत्र लिखे हुए होते हैं। ये सफ़ेद झंडे शांति के प्रतीक होते हैं। घर के मृत रिश्तेदार को मोक्ष मिले इसके लिए प्रार्थना के साथ ऊँचे बाँस में ये झंडे लगाए जाते हैं। जितनी ऊँचाई पर ये पताके लगाए जाएँगे उतना ही वे फड़फड़ाएँगे और यही ऊँचाई पर लगाए रखने का मूल कारण है। समस्त प्रकृति में झंडे पर लिखित मंत्र हवा के साथ फड़फड़ाते हुए प्रसरित होते रहेंगे यह उनका विश्वास है। कुछ हद तक शायद यह सच भी है। लोग धर्म को मानकर चलते हैं। एक दूसरे के प्रति सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते हैं। शोर मचाना या जोर से बोलना उनकी प्रकृति नहीं है। मूल रूप से वे अत्यंत शांति प्रिय लोग हैं। कहीं झगड़े -फ़साद या ऊँची आवाज़ में बात करते हुए हमें लोग न दिखे। पेमा ने हमें बताया कि उनके देश में पश्चात्य देशों से विशेषकर युरोप से बड़ी संख्या में लोग आते हैं। कानूनन छोटे वस्त्र पहनना, अंग प्रदर्शन करना, स्त्री- पुरुष का गलबाँही कर चलना या पब्लिक प्लेस पर चुंबन लेना दंडनीय अपरापध माना जाता है।

वे निरंतर प्रार्थना बोलते रहते हैं। कुछ लोग माला फेरते हुए भी दिखाई देते हैं।

शहर के सभी लोग, विद्यार्थी, शिक्षक, मज़दूर सभी राष्ट्रीय वेशभूषा में दिखाई देते हैं। शर्ट -पैंट में पुरुष नहीं दिखे। उनके वस्त्र चौकोर डिज़ाइन के कपड़े से बने होते हैं। पुरुषों के वस्त्र घुटने तक पहने जाते हैं और घुटने तक मोजे पहनते हैं। स्त्रियों के वस्त्र ऊपर से नीचे तक पूरा शरीर ढाककर पहने जाते हैं। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि उनके वस्त्र का कपड़ा हमारे देश के अमृतसर में बुना जाता है परंतु भारत में उसकी बिक्री नहीं की जाने का दोनों देशों के बीच कॉन्ट्रेक्ट है। दो देशों के बीच यह स्नेहसंबंध देख मन गदगद हो उठा। बाँगलादेश में आज भी हमारे देश में बनी सूती की साड़ियाँ बड़ी मात्रा में बिकती है। इस प्रकार के व्यापार से पड़ोसी देशों से संबंध पुख़्ता होते हैं।

हम लंबी यात्रा से थक गए थे और तापमान में भी बहुत अंतर पड़ गया था तो उस रात हमने आराम किया।

क्रमशः…

© सुश्री ऋता सिंह

फोन नं 9822188517

ईमेल आई डी – ritanani[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २१ – “ज्ञान और साधना की आभा से चमकता चेहरा – स्व. डॉ कृष्णकांत चतुर्वेदी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

(ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “ज्ञान और साधना की आभा से चमकता चेहरा – स्व. डॉ कृष्णकांत चतुर्वेदी” के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)

आप गत अंकों में प्रकाशित विभूतियों की जानकारियों के बारे में निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं –

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १ ☆ कहाँ गए वे लोग – “पंडित भवानी प्रसाद तिवारी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २ ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३ ☆ यादों में सुमित्र जी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४ ☆ गुरुभक्त: कालीबाई ☆ सुश्री बसन्ती पवांर ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५ ☆ व्यंग्यकार श्रीबाल पाण्डेय ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ६ ☆ “जन संत : विद्यासागर” ☆ श्री अभिमन्यु जैन ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ७ ☆ “स्व गणेश प्रसाद नायक” – लेखक – श्री मनोहर नायक ☆ प्रस्तुति  – श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ८ ☆ “बुंदेली की पाठशाला- डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ९ ☆ “आदर्श पत्रकार व चिंतक थे अजित वर्मा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ११ – “स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव उर्फ़ ऊँट बिलहरीवी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १२ ☆ डॉ. रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆   

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १३ ☆ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, लोकप्रिय नेता – नाट्य शिल्पी सेठ गोविन्द दास ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १४ ☆ “गुंजन” के संस्थापक ओंकार श्रीवास्तव “संत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १५ ☆ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कविवर – पंडित गोविंद प्रसाद तिवारी ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १६ – “औघड़ स्वाभाव वाले प्यारे भगवती प्रसाद पाठक” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆ 

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १७ – “डॉ. श्री राम ठाकुर दादा- समाज सुधारक” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १८ – “राजकुमार सुमित्र : मित्रता का सगुण स्वरुप” – लेखक : श्री राजेंद्र चन्द्रकान्त राय ☆ साभार – श्री जय प्रकाश पाण्डेय☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १९ – “गेंड़ी नृत्य से दुनिया भर में पहचान – बनाने वाले पद्मश्री शेख गुलाब” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २० – “सच्चे मानव थे हरिशंकर परसाई जी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

स्व. डॉ कृष्णकांत चतुर्वेदी

☆ कहाँ गए वे लोग # २१ ☆

☆ ज्ञान और साधना की आभा से चमकता चेहरा – स्व. डॉ कृष्णकांत चतुर्वेदी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

ज्ञान और साधना की आभा से चमकता चेहरा, आत्म विश्वास भारी स्नेह सिक्त प्रभावशाली वाणी, जो उनसे मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति का सकारात्मक दिशा दर्शन करती थीं । सदा आशीष और मंगलकामनाओं के लिए उठते हाँथ । जी हां, मुझे तो हमेशा ऐसे ही नजर आए डॉ. कृष्णकांत चतुर्वेदी जी । संस्कारधानी जबलपुर को उनकी जन्म स्थली कहलाने का गौरव प्राप्त है । उन्होंने जबलपुर, वृन्दावन एवं वाराणसी से शिक्षा प्राप्त की थी । वे संस्कृत एवं पालि-प्राकृत में एम.ए., साहित्याचार्य, पी.एच-डी. थे । उन्होंने वेद-पुराणों सहित संस्कृत के समृद्ध साहित्य का गहन अध्ययन किया था । आपको डी-लिट्.की मानद उपाधि भी प्राप्त हुई, किन्तु ज्ञान पिपासा ऐसी कि कभी शांत नहीं हुई ।

डॉ. कृष्णकांत चतुर्वेदी रादुविवि जबलपुर के आचार्य एवं अध्यक्ष संस्कृत, पालि-प्राकृत, स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध विभाग तथा निदेशक राजशेखर अकादमी, निदेशक कालिदास अकादमी उज्जैन, कुलगुरु राजशेखर पीठ संस्कृति विभाग म.प्र. शासन रहे हैं । आप केंद्रीय संस्कृत बोर्ड भारत सरकार के लगातार 6 वर्षों तक सदस्य रहे । आपने योजना समिति वि वि अनुदान आयोग दिल्ली एवं अखिल भारतीय कालिदास समारोह समिति में सदस्य के रूप में महत्वपूर्ण कार्य किये साथ ही संस्कृति परिषद, म.प्र.संस्कृति विभाग, आल इंडिया ओरिएण्टल पूना, एमेरिट्स वि वि अनुदान आयोग दिल्ली व प्रदेश एवं देश के लगभग 50 विश्वविद्यालयों की विभिन्न समितियों में महत्वपूर्ण पद पर अथवा सदस्य रहते हुए  अपने अनुभवों का लाभ दिया ।

विविध विषयों पर आपके व्याख्यान, भाषण-संभाषण अत्यंत जानकारीपूर्ण व प्रभावशाली होते थे । आपकी वाक कला श्रोता-दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर देती थी । आपके मुखारबिंद से प्रस्तुत भागवत कथा सहित अन्य कथाएं श्रोताओं के मन-मस्तिष्क में वर्णित घटनाओं-परिस्थितियों का दृश्यांकन करते हुए उन्हें उस काल में पहुँचा कर रस विभोर कर देती थीं ।

अकातो ब्रह्म जिज्ञासा, द्वैत-वेदांत तत्व समीक्षा, आगत का स्वागत, विवेक मकरंदम, पिबत भागवतम, जयतीर्थ स्तुति काव्य, ब्रज-गंधा (ब्रज भाषा में), आपके द्वारा रचित-प्रकाशित महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं । इसके साथ ही आपने डॉ. प्रभुदयाल अग्निहोत्री, श्री रामचन्द्र दास शास्त्री के स्मृति ग्रंथ एवं स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि अभिनंदन ग्रंथ का संपादन भी किया । विशिष्ट विषयों पर दो दर्जन शोध निबंधों का प्रकाशन भी हुआ । आपके मार्गदर्शन में 40 छात्रों ने पी-एच-डी. एवं तीन छात्रों ने डी. लिट्. की उपाधि प्राप्त की है ।

शिक्षा जगत एवं समाज को महत्वपूर्ण योगदान के लिए आपको राष्ट्रपति सम्मान पत्र से, डी.लिट्. की मानद उपाधि से तथा जगतगुरु शंकराचार्य पीठ प्रयाग द्वारा सम्मानित किया गया । अखिल भारतीय स्वामी अखंडानंद सरस्वती सम्मान, अखिल भारतीय रामानंद सम्मान, अखिल भारतीय पद्मभूषण पंडित रामकिंकर सम्मान से भी आप अलंकृत हुए । इतनी उपलब्धियों के बाद भी आपके चिंतन-मनन,  ज्ञानार्जन और साधना की आजीवन जारी अविराम यात्रा को व समाज को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करने आपकी व्याकुलता को हम सदा स्मरण करते हुए नमन करते रहेंगे । सादर नमन ।

श्री प्रतुल श्रीवास्तव

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संकलन –  जय प्रकाश पाण्डेय

संपर्क – 416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-26 – रमेश बतरा- कभी अलविदा न कहना ! ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग -26 – रमेश बतरा- कभी अलविदा न कहना !… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(प्रत्येक शनिवार प्रस्तुत है – साप्ताहिक स्तम्भ – “मेरी यादों में जालंधर”)

क्या चंडीगढ़ की यादों को समेट लूं ? क्या अभी कुछ बच रहा है ? हां, बहुत कुछ बच रहा है। रमेश बतरा के बारे में टिक कर नही लिखा। जितना उसका योगदान मेरे लेखन में है, उतना कम ही लोगों का है। वह करनाल में जाॅब कर रहा था जब मेरा सम्पर्क उससे हुआ। संभवतः मैं पंजाब से पहला लेखक रहा होऊंगा जिससे उसका पत्र व्यवहार शुरू हुआ। यह बाद की बात है कि पता चला कि उसका जन्म ही जालंधर का है। करनाल में जाॅब करते समय रमेश ने अपनी पत्रिका ‘ बढ़ते कदम’ का प्रकाशन शुरू किया, तब प्यार का पहला खत आया कि अपनी रचना भेजो और इस तरह प्रवेशांक में ही मेरी रचना आ गयी। कुछ समय बाद रमेश की ट्रांसफर चंडीगढ़ हो गयी, फिर जो साथ बना, वह जीवन भर का साथ हो गया। मेरी सबसे ज्यादा यादें रमेश के साथ हैं और चंडीगढ़ में अगर कहीं किसी घर में मेरा ठिकाना हुआ तो रमेश के घर सबसे ज्यादा ! सेक्टर बाइस के पीछे था वह घर। बस से उतरते ही रमेश के ऑफिस पहुंचता, फिर शाम को इकट्ठे घर जाते ! रमेश ही था जिसने पंजाब बुक सेंटर, जो पहले बस स्टैंड के बिल्कुल सामने था, जहाँ खड़े होकर मार्क्स की पुस्तिका थमाई थी। आपातकाल का पहला दिन था यानी 25 जून, 1975, इस तरह उसने मुझे वामपंथ से अनजाने ही जोड़ दिया था। वहीं  बुक सेंटर के इंचार्ज थे जालंधर के प्रताप, जो खुद घनघोर पाठक थे और जो भी पुस्तक उन्हे पसंद आती , वे उसे खरीदने और पढ़ने का आग्रह करते। इन पुस्तकों में चेखव , टालस्टाय और मैक्सिम गोर्की ही नहीं रसूल हमजातोव भी शामिल रहे। प्रताप की बात नहीं भूलती कि मध्यवर्गीय लोगों के जीवन में पुस्तक खरीदना बजट की अंतिम पायदान पर होता है बल्कि बजट होता ही नहीं ! चंडीगढ़ में उन दिनों सेक्टर बाइस में भी अच्छी किताबों की दुकान थी, जहाँ से मैंने निर्मल वर्मा की किताबें समय समय पर खरीदीं ! एक किताब की भूमिका की यह पंक्ति कभी नहीं भूली कि हमारे मध्यवर्गीय समाज के लोगों के मकान धूप में तपे रहते हैं, इनका तापमान कभी कभार ही ठंडा होता है। इनका बुखार कभी नहीं उतरता !

खैर, मैं भी कहां से कहां पहुँच जाता हूँ। फिर रमेश ने मित्र शाम लाल मेहंदीरत्ता प्रचंड की पत्रिका ‘ साहित्य निर्झर’ का एक प्रकार से संपादक का भार अपने कंधों पर ले लिया। उसके संपादन को निकट से देखने का अवसर मिला कि कैसे वह रचना ही नहीं, एक एक फोटो और मेकअप का ध्यान रखता था। एक बार ‘निर्झर’ का लघुकथा विशेषांक आना था। मेरी कोई रचना न थी। हम प्रेस में ही खड़े थे कि रमेश ने कहा – यार केशी ! एक लघुकथा अभी लिख दो ! तेरी लघुकथा के बिना अंक जाये, यह अच्छा नही लग रहा ! मैंने वहीं प्रेस की एक टीन की ट्रे उठाई और रफ पेपर उठाया ! लघुकथा लिखी – कायर ! जिसे पढ़ते ही रमेश उछल पड़ा खुशी से ! अरे केशी ! यह ऐसी लघुकथा है, जो प्रेम कथाओं में पढ़कर आज आनंद आ गया ! मैं जहा जहाँ भी संपादन करूँगा, वहीं वहीं इसे बार बार प्रकाशित करता जाऊंगा और उसने मुझे हर जगह जहाँ जहाँ संपादन मिला, वहीं वहीं कथाएं मंगवा मंगवा कर प्रकाशित कीं। फिर चाहे वह ‘सारिका’ में रहा या फिर ‘ संडे मेल’ में या फिर कुछ समय ‘ नवभारत टाइम्स’ में, उसके सहयोग से मेरा साहित्यिक सफर चलता रहा ! पहले मुम्बई गया और फिर दिल्ली आया। जहाँ मेरा आना जाना बढ़ गया। हर दस पंद्रह दिन बाद, दस दरियागंज टाइम्स के ऑफिस पहुँच जाता। ‌वहाँ देखा कि लोकल बस में सफर करते भी वह ऑफिस से थैले में लाई रचनाओं को पढ़ता रहता ! इतना जुनून ! इतना लगाव ! नये से नये रचनाकार को खत लिखना और अंत में जय जय ! उसका पहला संग्रह दिल्ली से ही आया। फिर तो वह प्रकाशकों का चहेता लेखक बन गया, यहाँ भी उसने अपने से ज्यादा दूसरों के संग्रह निकलवाने का प्रयोग किया। एक ऐसा शख्स, जो हर समय दूसरों के बारे में सोचता रहा ! जया रावत और‌ रमेश के बीच बढ़ते प्यार के दिन भी याद हैं और सहारनपुर में वह शादी का ढोल ढमक्का भी याद है। बेटे नोशी का आना भी यादों में है और बेटी का भी। फिर कहाँ किससे चूक हुई और किस तरह चूक हुई कि रमेश घर छोड़कर ही चलता बना, नशे में खुद को डुबो दिया ! बुरी हालत में देखा छोटे भाई खुश के घर‌ ! जैसे आषाढ़ का एक दिन का कालिदास लौटा था, लुटा पिटा ! मेरा नायक और इस हाल में ! फिर इलाज भी करवा दिया खुश ने लेकिन छूटी नहीं मुंह को लगी हुई, जिसने आखिरकार उसकी जान लेकर ही छोड़ी ! यहाँ भी रमेश जाते जाते सबक दे गया कि पीने पिलाने से बचे रहना चाहिए ! जया भाभी को उत्तराखंड की होने के चलते वह उसका घर ‘लंगूर पट्टी छे’ बताता कर हंसाता रहता। ‌उसी जया भाभी से दो साल पहले गाजियाबाद में मुलाकात हुई।

जब रमेश ने यह जहान छोड़ा तब मैं हिसार ट्रांसफर होकर आ चुका था जब संपादक विजय सहगल का फोन आया कि तेरा दोस्त रमेश नहीं रहा। अब इस रविवार तुम ही लिखोगे उस पर ! मैं सन्न‌ रह गया और सोचता रहा कि कैसे लिख पाऊंगा? हर डाॅक्टर भी अपने प्रियजनों के आप्रेशन भी खुद नहीं करते, दूसरों से करवाते हैं और यह क्या जिम्मेदारी दे दी मुझे ? आखिरकार मैंने लिखा और लिखने के बीच और लिखने के बाद जी भर कर रोता ही चला गया ! कमरे में सिर्फ मेरी सिसकियाँ थीं या वे फड़फड़ाते पन्ने !

रमेश के बाद वैसा टूटकर चाहने वाला दोस्त न मिला। खुश के पास एक बार गया था मोहाली तब रमेश की अनेक पुरानी फोटोज देखीं‌‌ और सेक्टर बाइस के बरामदे और दिल्ली का टाइम्स ऑफिस! अब रमेश कहीं नहीं मिलता‌ ! कहीं नहीं रहता ! वह सिर्फ और सिर्फ अब यादों में रहता है और यही प्यारा सा गाना गाते कहता है :

कभी अलविदा न कहना

चलते चलते मेरे

ये गीत याद रखना

कभी अलविदा न कहना !

दोस्तो अब आगे तो लिखा नहीं जायेगा। कल मिलूंगा आपसे। आज की जय जय!

क्रमशः…. 

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २० – “सच्चे मानव थे हरिशंकर परसाई जी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।

ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है एक नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  – “सच्चे मानव थे हरिशंकर परसाई जी)

आप गत अंकों में प्रकाशित विभूतियों की जानकारियों के बारे में निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं –

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २ ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३ ☆ यादों में सुमित्र जी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४ ☆ गुरुभक्त: कालीबाई ☆ सुश्री बसन्ती पवांर ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५ ☆ व्यंग्यकार श्रीबाल पाण्डेय ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ६ ☆ “जन संत : विद्यासागर” ☆ श्री अभिमन्यु जैन ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ७ ☆ “स्व गणेश प्रसाद नायक” – लेखक – श्री मनोहर नायक ☆ प्रस्तुति  – श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ८ ☆ “बुंदेली की पाठशाला- डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ९ ☆ “आदर्श पत्रकार व चिंतक थे अजित वर्मा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ११ – “स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव उर्फ़ ऊँट बिलहरीवी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १२ ☆ डॉ. रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆   

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १३ ☆ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, लोकप्रिय नेता – नाट्य शिल्पी सेठ गोविन्द दास ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १४ ☆ “गुंजन” के संस्थापक ओंकार श्रीवास्तव “संत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १५ ☆ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कविवर – पंडित गोविंद प्रसाद तिवारी ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १६ – “औघड़ स्वाभाव वाले प्यारे भगवती प्रसाद पाठक” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆ 

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १७ – “डॉ. श्री राम ठाकुर दादा- समाज सुधारक” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १८ – “राजकुमार सुमित्र : मित्रता का सगुण स्वरुप” – लेखक : श्री राजेंद्र चन्द्रकान्त राय ☆ साभार – श्री जय प्रकाश पाण्डेय☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १९ – “गेंड़ी नृत्य से दुनिया भर में पहचान – बनाने वाले पद्मश्री शेख गुलाब” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

स्व. हरिशंकर परसाई

☆ कहाँ गए वे लोग # २० ☆

☆ “सच्चे मानव थे हरिशंकर परसाई जी☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(अगस्त  2023 – अगस्त 2024 हिंदी के महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का जन्मशती वर्ष है।)

देशभर के कोने कोने उनके जन्मशती वर्ष पर परसाई पर केंद्रित लगातार आयोजन हो रहे हैं। हिंदी साहित्य में हरिशंकर परसाई जैसा दूसरा व्यक्ति नहीं हुआ। परसाई के तीखे व्यंग्य बाणों ने सत्ता के अन्तर्विरोधों की पोल खोल दी और अपने युग की राजनीतिक सामाजिक विडंबनाओं को तीखे ढंग से पेश किया। हिन्दी साहित्य में परसाई ही एकमात्र ऐसे लेखक हैं जो प्रेमचंद के बाद सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखक माने जाते हैं। आजादी के बाद आज तक वे व्यंग्य के सिरमौर बने हुए हैं, 1947 से 1995 के बीच परसाई जी की कलम ने घटनाओं के भीतर छिपे संबंधों को उजागर किया है, एक वैज्ञानिक की तरह उसके कार्यकारण संबंधों का विश्लेषण किया है और एक कुशल चिकित्सक की तरह उस नासूर का आपरेशन भी किया। वे साहित्यकार के सामाजिक दायित्व के प्रति हमेशा सजग रहेे और अपनी रचनाओं से जन जन के बीच लोकशिक्षण का काम किया।परसाई जी जीवन के अंतिम समय तक पीड़ा ही झेलते रहे, यह व्यक्तिगत पीड़ा भी थी, पारिवारिक पीड़ा भी थी, समाज और राष्ट्र की पीड़ा भी थी, इसी पीड़ा ने व्यंग्यकार को जीवन दिया। उनका व्यंग्य कोई हंसने हंसाने, हंसी – ठिठोली वाला व्यंग्य नहीं, वह आम जनमानस में गहरे पैठ कर मर्मांतक चोट करता है, वह उत्पीड़ित समाज में नई चेतना का संचार करता है, उन्हें कुरीतियों, अज्ञान के खिलाफ जेहाद छेड़ने बाध्य करता है, वह सरकारी अमले को दिशानिर्देश देता प्रतीत होता है, यह साहस हर कोई नहीं जुटा सकता। समाज से, सरकार से, मान्य परंपराओं के विरोध करने में जो चुनौती का सामना करना होता है उससे सभी कतराते हैं, पर यह पीड़ा परसाई जी ने उठाई थी । व्यंग्य को लोकोपकारी स्वरूप प्रदान करने में उनके भागीरथी प्रयत्न की लम्बी गाथा है।अब उनके व्यंग्य की परिधि आम आदमी से घूमते घूमते राष्ट्रीय सीमा लांघ अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित हो चुकी है। दिनों दिन बढ़ती उनकी लोकप्रियता, चकित करने वाली उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता, उनके चाहने वालों की बढ़ती संख्या से अहसास होता है कि कबीर इस धरती पर दूसरा जन्म लेकर हरिशंकर परसाई बनकर आए थे।

जो परसाई की “पारसाई” को जानता है, वही परसाई जी को असल में जानता है, उनके लिखे ‘गर्दिश के दिन’ पढ कर हर आंख नम हो जाती है, हर व्यक्ति के अंदर करूणा की गंगा बह जाती है। ‘गर्दिश के दिन’ पढ़कर एक युवा लेखक ने परसाई के नाम पत्र लिखा, जो उस समय गंगा पत्रिका में छपा था….. 

जनाब परसाई जी, 

मैं नया जवान हूं। कुछ साल पहले मैंने लिखना शुरू किया था। मेरी महत्वाकांक्षा थी कि मैं हरिशंकर परसाई बनूंगा पर आपका लिखा “गर्दिश के दिन” पढ़कर और आपके द्वारा भोगे गये घोर कष्टों का वर्णन पढ़कर मैंने यह विचार त्याग दिया है। मैं हरिशंकर परसाई अब नहीं बनूंगा। हरिशंकर परसाई बनना आपको ही मुबारक हो। मैं हमदर्दी भेजता हूं।

****

परसाई दुनिया के ऐसे अकेले लेखक हैं जिनके जीते जी उनकी “रचनावली” प्रकाशित हुई थी, उनकी रचनाओं में धारदार हथियार करूणा के रस में डूबा रहता था,  उनकी रचनाओं में ऐसा धारदार सच होता है, एक बार उनकी रचना पढकर कुछ लोगों ने उनको इतना पीटा और उनकी दोनों टांग तोड दी, पर वे टूटी टांग लिए जीवन भर लिखते रहे। आजादी के बाद सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लोकप्रिय लेखक श्री हरिशंकर परसाई ने अपनी रचनाओं के मार्फत सामाजिक सुधार में अपनी बड़ी भूमिका निभाई है, उनकी रचनाओं को पढ़कर भ्रष्टाचारियों ने भ्रष्टाचार छोड़ा,गिरगिट की तरह रंग बदलने वाली मनोवृत्ति वालों ने अपना स्वाभाव बदला, पुलिस वाले सुधरे, सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था और व्यवहार में कुछ हद तक सुधार हुआ और होता जा रहा है, लाखों लोग उनकी रचनाओं से प्रेरणा लेकर समाज सुधार में लगे हैं। वास्तव में ऐसे समाज सुधारक लोकप्रिय,लोक शिक्षक लेखक भारत रत्न के हकदार होते हैं। परसाई अपने आसपास बिखरे साधारण से विषय को अपनी कलम से असाधारण बना देते थे, उनकी रचनाएं पाठक को अंत तक पकड़े रहतीं हैं। हाईस्कूल के पंडित जी तो सबको मुहावरे और सुभाषित पढ़ाते हैं पर उनकी गहराई में जाकर परसाई जी हंसाते हुए आम आदमी की प्रवृत्तियों को उजागर करते हैं। ऐसी सहज सरल भाषा में जो आमतौर पर सब तरफ हर कान में सुनाई देती है। राजनीति परसाई जी को मुख्य विषय रहा है, राजनैतिक बदलाव की इतनी सारी स्थिति के बाद भी उनकी रचनाएं आज भी सबसे ताजा लगतीं हैं, उनकी घटना प्रधान रचनाएं कहीं से भी बासी नहीं लगती। वाह परसाई,गजब परसाई, हां परसाई …. तेरी गजब पारसाई।

परसाई जी की पहली रचना 1947 में ‘प्रहरी’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी, और परसाई जी ने अपने सम्पादन में पहली पत्रिका वसुधा 1956 में निकाली थी। कालेज के दिनों से हम परसाई जी के सम्पर्क में रहे और उनका विराट रूप देखा, उनकी रचनाएँ पढ़ी, “गर्दिश के दिन” में भोगे घोर कष्टों का वर्णन पढ़ा, उनसे हमने लम्बा साक्षात्कार लिया जो बाद में हंस, जनसत्ता,वसुधा में प्रकाशित हुआ। नेपथ्य में चुपचाप हम थोड़ा बहुत रचनात्मक कामों में लगे रहे, पढ़ते रहे लिखते रहे, उन्हें बहुत करीब से जाना समझा।

इस लेख के साथ उसका संक्षिप्त परिचय देना आवश्यक लगता है ताकि नयी पीढ़ी परसाई जी को जान सके।

हरिशंकर परसाईं का जन्म 22 अगस्त¸ 1924 को जमानी¸ होशंगाबाद¸ मध्य प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा  दिलाया और उसे हल्के–फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा है। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी पैदा नहीं करतीं¸ बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने–सामने खड़ा करती हैं¸ जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असंभव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढ़िवादी जीवन–मूल्यों की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान–सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा–शैली में खास किस्म का अपनापा है¸ जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सामने ही बैठा है। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. किया| उन्होंने 18 वर्ष की उम्र में जंगल विभाग में नौकरी भी की। खण्डवा में 6 महीने अध्यापक रहे। दो वर्ष (1941–43) जबलपुर में स्पेस ट्रेनिंग कालिज में शिक्षण कार्य का अध्ययन किया। 1943 से वहीं माडल हाई स्कूल में अध्यापक रहे। 1952 में यह सरकारी नौकरी छोड़ी। 1953 से 1957 तक प्राइवेट स्कूलों में नौकरी की। 1957 में नौकरी छोड़कर स्वतन्त्र लेखन की शुरूआत की। जबलपुर से ‘वसुधा’ नाम की साहित्यिक मासिकी निकाली¸ नई दुनिया में ‘सुनो भइ साधो’¸ नयी कहानियों में ‘पाँचवाँ कालम’¸ और ‘उलझी–उलझी’ तथा कल्पना में ‘और अन्त में’ इत्यादि का लेखन किया। कहानियाँ¸ उपन्यास एवं निबन्ध–लेखन के बावजूद मुख्यत: हरिशंकर परसाईं व्यंग्यकार के रूप में अधिक विख्यात रहे| परसाई जी जबलपुर रायपुर से निकलने वाले अखबार देशबंधु में पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देते थे। स्तम्भ का नाम था-पूछिये परसाई से। पहले हल्के इश्किया और फिल्मी सवाल पूछे जाते थे । धीरे-धीरे परसाईजी ने लोगों को गम्भीर सामाजिक-राजनैतिक प्रश्नों की ओर प्रवृत्त किया। दायरा अंतर्राष्ट्रीय हो गया। यह सहज जन शिक्षा थी। लोग उनके सवाल-जवाब पढ़ने के लिये अखबार का इंतजार तक करते थे।

हरिशंकर परसाईं जी का सन 1995 में देहावसान हो गया।

कहानी–संग्रह: हँसते हैं रोते हैं¸ जैसे उनके दिन फिरे।

उपन्यास: रानी नागफनी की कहानी¸ तट की खोज, ज्वाला और जल।

संस्मरण: तिरछी रेखाएँ , के अलावा और बहुत सी संग्रह।

लेख संग्रह: तब की बात और थी¸ भूत के पाँव पीछे¸ बेइमानी की परत¸ अपनी अपनी बीमारी, प्रेमचन्द के फटे जूते, माटी कहे कुम्हार से, काग भगोड़ा, आवारा भीड़ के खतरे, ऐसा भी सोचा जाता है, वैष्णव की फिसलन¸ पगडण्डियों का जमाना¸ शिकायत मुझे भी है¸ सदाचार का ताबीज¸ विकलांग श्रद्धा का दौर¸ तुलसीदास चंदन घिसैं¸ हम एक उम्र से वाकिफ हैं।

सम्मान: ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित। अनेकों पुरस्कार/ सम्मानों से सम्मानित।

सन् 1985 में प्रकाशित परसाई रचनावली में स्वयं परसाई द्वारा लिखे गये निवेदन का एक अंश…

35 साल अपने विश्वास को मजबूती से पकड़कर, बिना समझौते के, मैंने जो सही समझा, लिखा है। जो कुछ मानव विरोधी है, उस पर निर्मम प्रहार किया है। नतीजे भोगे हैं, अभी भोग रहा हूँ, आगे भी भोगता जाउॅंगा। पर मैं लगातार उसी स्फूर्ति, शक्ति ओर विश्वास से लिखता जा रहा हूँ।

मेरा लिखा हुआ कुल इतना नहीं है, जो इस रचनावली में है। अभी बहुत कुछ शेष है जो आगे प्रकाशित होगा। फिर मैं मरा नहीं हूँ। जिन्दा हूँ और लिख रहा हूँ।

पुराने मित्रों में मैं ‘स्वामीजी’ कहलाता हूँ। परम्परा है कि संन्यासी अपना श्राद्ध स्वयं करके मरता है। तो रचनावली मेरा अपना श्राद्ध कर्म है, जो कर के दे रहा हॅू। वैसे मैं अभी जवान हूँ, मगर श्राद्ध अभी कर दे रहा हूँ।

श्री जय प्रकाश पाण्डेय 

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-25 – पेंटर आर्टिस्ट से कार्टूनिस्ट तक संदीप जोशी… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग -25 – पेंटर आर्टिस्ट से कार्टूनिस्ट तक संदीप जोशी… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(प्रत्येक शनिवार प्रस्तुत है – साप्ताहिक स्तम्भ – “मेरी यादों में जालंधर”)

चंडीगढ़ की यादों में गुलाब की तरह महकती एक याद हैं – संदीप जोशी ! वही संदीप जोशी, जिसके बनाये कार्टून आप देखते हैं, सुबह सुबह ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में ताऊ बोल्या’ व ‘द ट्रिब्यून’ में ‘ इन पासिंग’ के रूप में ! जी हां, आज उसी की बात होगी, जो‌ उत्तरी भारत के प्रमुख कार्टूनिस्टों में से एक है।

मेरी पहली पहली मुलाकात करवाई थी, खटकड़ कलां के गवर्नमेंट आदर्श सीनियर सेकेंडरी स्कूल के सहयोगी डाॅ सुरेंद्र मंथन ने ! जरा यह भी बताता चलूँ कि डाॅ सुरेंद्र मंथन ‘द ट्रिब्यून’ के चंडीगढ़ के स्टाफ रिपोर्टर श्याम खोसला के छोटे भाई थे। तो एक बार जिन दिनों डाॅ वीरेंद्र मेहंदीरत्ता पंजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे तब उन्होंने दो दिवसीय कहानी कार्यशाला आयोजित की थी, जिसमें डाॅ महीप सिंह मुख्यातिथि थे और पहले दिन सबसे पहले मेरी ही कहानी ‘ अगला शिकार ‘ का पाठ करवाया गया।

पहले दिन का सत्र समाप्त होते ही एक  छोटा सा लड़का डाॅ मंथन को मिलने आया। वह संदीप जोशी था। चर्चित कथाकार बलराज जोशी का बेटा ! बलराज जोशी से मेरी मुलाकात फूलचंद‌ मानव ने ही करवाई थी और चंडीगढ़ के सेक्टर बाइस स्थित काॅफी हाउस में काॅफी की चुस्कियों के बीच मैं अनाड़ी, अनजान सा कथाकार कहानी लिखने का ककहरा सीख रहा था ! फिर बलराज जोशी असमय ही चले गये दुनिया से, पीछे एक बेटा और पत्नी को संघर्ष के लिए जूझने के लिए ! जोशी की पत्नी को पति की जगह अनुकम्पा आधार पर जाॅब भी मिल गयी और सरकारी आवास भी सिर ढंकने के लिए ! वहीं संदीप जोशी से मेरा परिचय करवाया डाॅ मंथन ने और बड़े आग्रह से कहा कि संदीप बहुत ही शानदार पेंटिंग्स बनाता है, क्यों न एक फीचर संदीप पर लिख दूँ ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में ! मैंने कहा कि क्या ऐसे अचानक मुलाकात के बाद खड़े खड़े फीचर लिखा जाता है ! मुझे स़दीप की पेंटिंग्स देखनी पड़ेंगी ! उस दिन रहने का इंतज़ाम विश्वविद्यालय में ही था लेकिन डाॅ मंथन ने सुझाव दिया कि आप संदीप के साथ इसके घर आज रह लीजिए, और देख लीजिए इसकी पेंटिंग्स ! सुझाव अच्छा लगा और मैं अपना बैग लिए संदीप जोशी की साइकिल के पीछे बैठकर इनके सरकारी आवास पर पहुँच गया। वहाँ इनकी मम्मी ने बड़ा अच्छा दाल भात बनाया और जब हम दोनों फ्री हुए खाने पीने से तब मैंने कहा कि अब दिखाओ अपनी पेंटिंग्स ! एक कमरे में संदीप की पेंटिंग्स खाकी कवर्ज में लपेटीं बड़े करीने से रखी थीं। वह एक एक कर कवर उतार कर पेंटिंग्स दिखाता गया और एक पेंटिंग जो मुझे पसंद आई उसकी फोटोकॉपी डाक से भेजने की कहकर मैं नवांशहर लौट आया। कुछ दिनों बाद डाक में फोटोकॉपी मिल गयी जो ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में फीचर के साथ प्रकाशित भी हो गयी। मैं नवांशहर से ‘दैनिक ट्रिब्यून’  का अंशकालिक रिपोर्टर था और जब भी चंडीगढ़ जाता तब ‘दैनिक ट्रिब्यून’ कार्यालय जरूर जाता। संदीप जोशी पर लिखे फीचर के बाद जब ऑफिस गया तब समाचार संपादक व मेरे पत्रकारिता के गुरु सत्यानंद शाकिर ने संकेत से अपनी ओर बुलाया। वे मुझे मेरे प्रकाशित समाचारों पर टिप्स देते रहते, कभी डांट देते तो कभी सराहते ! उस दिन सराहना मिली कि संदीप जोशी पर लिखकर बहुत अच्छा किया, मैं भी बलराज जोशी का मित्र रहा हूँ और मैं इस परिवार की मदद करना चाहता हूँ लेकिन मेरे पास इनकी कोई जानकारी नहीं थी। तुम एक उपकार और कर दो, उनके बेटे संदीप को मिला दो ! मैंने कहा कि आज ही मिलवाता हूँ और मैं लोकल बस में सेक्टर बाइस स्थित संदीप के घर पहुँच गया। जब सारी बात बताई तब संदीप ने अपनी साइकिल उठाई और मुझे पीछे बिठाकर सेक्टर 29 तक ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के ऑफिस तक ले गया ! सत्यानंद शाकिर के सामने संदीप को ले जाकर खड़ा कर दिया। उनके मन में पहले से ही कुछ चल रहा था। वे संदीप जोशी और मुझे संपादक राधेश्याम शर्मा के पास ले गये और संदीप पर प्रकाशित मेरा फीचर दिखाकर संदीप के बारे में कुछ प्लान करने की कही और कुछ दिन बाद ‘दैनिक ट्रिब्यून ट्रिब्यून’ में ‘ताऊ बोल्या’ कार्टून के साथ संदीप जोशी का कायाकल्प एक कार्टूनिस्ट के रूप में हो चुका था ! फिर सन् 1990 में मैं ‘दैनिक ट्रिब्यून में उप संपादक के तौर पर आ गया। संदीप तब तक अपनी पढ़ाई पूरी कर चंडीगढ़ प्रशासन में अच्छी नौकरी पा चुका था और अब उसके पास चमचमाता स्कूटर था। उसका कार्टून कोना अब भी बरकरार था। एक दिन संदीप मेरे पास सलाह लेने आया कि उसे ‘जनसत्ता’ के प्रमोद कौंसवाल यह ऑफर दे रहे हैं कि ‘जनसत्ता’ में कार्टून बनाने का काम शुरू करवा देता हूं, जो अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी नौकरी के रूप में होगा ! संदीप मेरे से सलाह मांगने आया था कि यह पेशकश स्वीकार कर‌ लूं या नहीं ?

मैंने कहा- संदीप कार्टून के कैरीकैचर रोज़ रोज़ लोकप्रिय नहीं होते ! इसी ‘ताऊ बोल्या’ ने तुम्हें चौ देवीलाल से पांच हज़ार रुपये का इनाम दिलवाया और नये कार्टून को लोकप्रिय होने में समय लगेगा और यह जरूरी नहीं कि लोगों को पसंद आये या न आये ! इस तरह मेरी राय संदीप को सही लगी और उसकी लम्बी पारी आज तक जारी है।

इसके बाद मैंने ‘द ट्रिब्यून’ के सहायक संपादक कमलेश्वर सिन्हा को जानकारी दी कि संदीप को कैसी ऑफर आ रही है। इसके बारे में कुछ सोचिए ! अब आगे क्या हुआ या कैसे हुआ, मैं नही जानता लेकिन संदीप जोशी ‘ट्रिब्यून’ में स्थायी तौर पर आ गया और इस तरह कार्टूनिस्ट के तौर पर हम उसे आज तक देख रहे हैं। उसके बनाये दो कार्टूनों का आनंद लीजिए ! पहला जब चौ बंसीलाल को केंद्र से हटाकर हरियाणा का मुख्यमंत्री बनाया गया था और उन्हें बगल में फाइलें दबाये दिखा कर नीचे कैप्शन‌ थी – इबकि बार मैं इमरजेंसी लगाने नहीं आया ! यह ह्यूमर नहीं भूला। इसी तरह दूसरा कार्टून याद है। ‌मैं हिसार आ चुका था। ‌कार्टून था चौ भजनलाल पर ! गोलमेज़ के एक तरफ कांग्रेस हाईकमान सोनिया गाँधी बैठी हैं और सामने चौ भजनलाल !

नीचे कैप्शन थी – यो कैसी मीटिंग होवे? एक को हिंदी को न आवै और दूजे को अंग्रेज़ी ! उस दिन चौ भजनलाल हिसार में ही थे और मीडिया को बुला रखा था। मैं ‘दैनिक ट्रिब्यून’ साथ ही ले गया और चौ भजनलाल को वह कार्टून दिखाया। वे बहुत हंसे और बोले- इतनी अंग्रेज़ी तो आवै सै !

तीसरी बार संदीप ने फिर सलाह मांगी, जिन दिनों मैं ‘दैनिक ट्रिब्यून’ से इस्तीफा देकर हरियाणा ग्रंथ अकादमी का उपाध्यक्ष हो गया था। ‌संदीप को हरियाणा साहित्य अकादमी पुरस्कृत करने जा रही थी और वह असमंजस में था कि पुरस्कार ग्रहण करे या नहीं ? मैने सलाह दी कि यह तुम्हारी अपनी प्रतिभा का सम्मान है, ले लो और वह पुरस्कार लेने समारोह में आया। एक बार वह हिसार के बड़े स्कूल  विद्या देवी ज़िंदल स्कूल की आर्टिस्ट कार्यशाला में आया, तब मुझे इतनी खुशी हुई कि उसे अपने घर बुलाया और मीडिया के मित्रों को भी बुला लिया ! इस तरह अनजाने ही मैं संदीप जोशी की ज़िंदगी के महत्त्वपूर्ण मोड़ों पर मैं शायद उसके साथ रहा ! अब वह रिटायरमेंट के निकट है और सोच रहा है कि फिर से कार्टूनिस्ट से पेंटर आर्टिस्ट बन‌ जाये और अपने कथाकार पिता बलराज जोशी पर किताब प्रकाशित करने की योजना भी है !

मेरे अंदर से आवाज़ आती है कि कहीं मुझसे कोई भूल‌ तो नहीं हुई, एक प्रतिभाशाली पेंटर आर्टिस्ट को कार्टूनिस्ट बनने की ओर‌ सहयोग करके?

शायद आज इतना ही काफी! कल फिर मिलते हैं!

क्रमशः…. 

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मेरी डायरी के पन्ने से # 18 – संस्मरण # 12 – – बिखरता कुनबा ☆ सुश्री ऋता सिंह ☆

सुश्री ऋता सिंह

(सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुश्री ऋता सिंह जी द्वारा ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपने यात्रा संस्मरणों पर आधारित आलेख श्रृंखला को स्नेह प्रतिसाद के लिए आभार।आज प्रस्तुत है आपकी डायरी के पन्ने से …  – संस्मरण बिखरता कुनबा)

? मेरी डायरी के पन्ने से # 18 – संस्मरण # 12 – बिखरता कुनबा ?

गाँव छोड़े मुझे काफी समय बीत गया। बाबूजी ने खेतों के बीचोबीच एक बड़ा – सा घर बनाया था। घर में प्रवेश से पहले लिपा पुता आँगन, तुलसी मंच और एक कुआँ हमारा स्वागत करता।

फिर आती एक सीढ़ी, जिसे चढ़कर तीन तरफ से खुला बरामदा हुआ करता था। यहाँ कपड़े और लकड़ी की सहायता से बनी एक आराम कुर्सी रखी रहती जिस पर बाबूजी अक्सर बैठे हुक्का गुड़गुड़ाया करते थे। कौन आया कौन गया, हाथ पैर धोए या नहीं, पैरी पौना (प्रणाम) किया या नहीं इन सब बातों की ओर उनका पूरा ध्यान रहता था। हाँ, उनके हाथ में एक जापमाला भी हुआ करती थी और वह दिवा – रात्रि उँगलियों में उसे फेरा करते थे।

बाबूजी जब अस्सी के ऊपर थे तब भी कमाल था कि कोई बात भूलते हों! संस्कारों में, रीति-रिवाज के पालन में, लेन -देन में, बहुओं की देखभाल में कहीं कोई कमी न आने देते। घर का सारा अंकुश उनके हाथ में था। सबको अपना हिस्सा मिले, सब स्वस्थ रहें, बहुएँ समय -समय पर अपने पीहर जाएँ, ज़ेवर बनाएँ, वस्त्र खरीदे इन सब बातों की ओर बाबूजी का पूरा ध्यान रहता था। खेतीबाड़ी साझा होने के कारण घर में धन का अभाव न था।

बाबूजी बहुत मेहनती थे। सत्तर साल की उम्र तक सुबह – शाम पहले तो खुद ही गोठ में जाते, गैया मैया की पूजा करते, उनके पैरों को छूकर प्रणाम करते उन्हें नहलाते, साफ करते फिर उनके पास उनके बछड़े को छोड़ते। वह भरपेट दूध पी लेते तो वे बाकी दूध दुहकर घर के भीतर ले लाते।

ताज़ा दूध उबल जाने पर अपनी आँखों के सामने बिठाकर अपने दोनों बेटों को और हम बच्चों को दूध पिलाते। घर में दो भैंसे भी थीं, उनकी भी खूब सेवा करते। दूध दुहकर लाते और उसी दूध से बेबे (दादीमाँ) दही जमाती, पनीर बनाती, मक्खन निकालती, घी बनाती। सुबह पराँठे के साथ ढेर सारा मक्खन मिलता, दोपहर को लस्सी, रात को पनीर। वाह ! बीजी ( माँ) और चाईजी ( चाचीजी) दोनों के हाथों में जादू था। क्या स्वादिष्ट भोजन पकाया करती थीं कि बस हम सब उँगलियाँ चाटते रहते थे।

घर के भीतर आठ बड़े कमरे थे और एक खुला हुआ आँगन। रसोई का कमरा भी बड़ा ही था और वहीं आसन बिछाकर हम सब भोजन किया करते थे। आँगन में बच्चों की तेल मालिश होती, मेरे चारों बड़े भाई मुद्गल उठा -उठाकर व्यायाम करते, उनकी भी मालिश होती और वे कुश्ती खेलने अखाड़ों पर जाते।

बेबे आँगन के एक कोने में कभी गेहूँ पीसती तो कभी चने की दाल। कभी मसालेदार बड़ियाँ बनाती तो कभी सब मिलकर पापड़। बेबे को दिन में कभी खाली बैठे हुए नहीं देखा। वह तो सिर्फ साँझ होने पर ही बाबूजी के साथ बैठकर फुरसत से हुक्का गुड़गुड़ाया करती और बतियाती।

बाबूजी सुबह- सुबह पाठ करते और बेबे नहा धोकर सब तरफ जल का छिड़काव करतीं। तुलसी के मंच पर सुबह शाम दीया जलाती। गायों को अपने हाथ से चारा खिलाती और अपनी दिनचर्या में जुट जातीं। बेबे हम हर पोता-पोती को अलग प्यार के नाम से पुकारती थीं। घर में किसी और को उस नाम से हमें पुकारने का अधिकार न था। मैं घर का सबसे छोटा और आखरी संतान था। वे मुझे दिलखुश पुकारा करती थीं। बेबे के जाने के बाद यह नाम सदा के लिए लुप्त हो गया। आज चर्चा करते हुए स्मरण हो आया।

ठंड के दिनों में गरम -गरम रोटियाँ, चूल्हे पर पकी अरहर की दाल, अरबी या जिमीकंद या पनीर मटर की स्वादिष्ट सब्ज़ियाँ सब चटखारे लेकर खाते। सब कुछ घर के खेतों की उपज हुआ करती थी। ताजा भोजन खाकर हम सब स्वस्थ ही थे। हाँ कभी किसी कारण पेट ऐंठ जाए तो बेबे बड़े प्यार से हमारी नाभी में हींग लगा देती और थोड़ी ही देर में दर्द गायब!कभी दाँत में दर्द हो तो लौंग का तेल दो बूँद दाँतों में डाल देतीं। दर्द गायब! सर्दी हो जाए तो नाक में घी डालतीं। सर्दी गुल! खाँसी हो जाए तो हल्दी वाला दूध रात को पिलाती। शहद में कालीमिर्च का चूर्ण और अदरक का रस मिलाकर पिलाती। खाँसी छूमंतर ! पर हम इतने सारे भाई बहन कभी किसी वैद्य के पास नहीं गए।

घर के हर लड़के के लिए यह अनिवार्य था कि दस वर्ष उम्र हो जाए तो बाबा और चाचाजी की मदद करने खेतों पर अवश्य जाएँ। गायों, भैंसो को नहलाना है, नाँद में चारा और चौबच्छे में पीने के लिए पानी भरकर देना है। बाबूजी अब देखरेख या यूँ कहें कि सुपरवाइजर की भूमिका निभाते थे।

लड़कियों के लिए भी काम निश्चित थे पर लड़कों की तुलना में कम। बहनें भी दो ही तो थीं। बेबे कहती थीं- राज करण दे अपणे प्यो दे कार, ब्याह तो बाद खप्पेगी न अपणे -अपणे ससुराला विच। ( राज करने दे अपने पिता के घर शादी के बाद खटेगी अपनी ससुराल में ) और सच भी थी यह बात क्योंकि हम अपनी बेबे, बीजी और चाइजी को दिन रात खटते ही तो देखते थे।

दोनों बहनें ब्याहकर लंदन चली गईं। बाबूजी के दोस्त के पोते थे जो हमारे दोस्त हुआ करते थे। घर में आना जाना था। रिश्ता अच्छा था तो तय हो गई शादी। फिर बहनें सात समुंदर पार निकल गईं।

दो साल में एक बार बहनें घर आतीं तो ढेर सारी विदेशी वस्तुएँ संग लातीं। अब घर में धीरे – धीरे विदेशी हवा, संगीत, पहनावा ने अपनी जगह बना ली। घर में भाइयों की आँखों पर काला चश्मा आ गया, मिक्सर, ज्यूसर, ग्राइंडर, टोस्टर आ गए। जहाँ गेहूँ पीसकर रोटियाँ बनती थीं वहाँ डबलरोटी जैम भी खाए जाने लगे। हर भोजन से पूर्व सलाद की तश्तरियाँ सजने लगीं। घर में कूलर लग गए। रसोई से आसन उठा दिए गए और मेज़ कुर्सियाँ आ गईं। ठंडे पानी के मटके उठा दिए गए और घर में फ्रिज आ गया। जिस घर में दिन में तीन- चार बार ताज़ा भोजन पकाया जाता था अब पढ़ी -लिखी भाभियाँ बासी भोजन खाने -खिलाने की आदी हो गईं।

सोचता हूँ शायद हम ही कमज़ोर पड़ गए थे सफेद चमड़ियों के सामने जो वे खुलकर राज्य करते रहे, हमें खोखला करते रहे। वरना आज हमारे पंजाब के हर घर का एक व्यक्ति विदेश में न होता।

बेबे चली गईं, मैं बीस वर्ष का था उस समय। बाबूजी टूट से गए। साल दो साल भर में नब्बे की उम्र में बाबूजी चल बसे। वह जो विशाल छप्पर हम सबके सिर पर था वह हठात ही उठ गया। वह दो तेज़ आँखें जो हमारी हरकतों पर नज़र रखती थीं अब बंद थीं। वह अंकुश जो हमारे ऊपर सदैव लगा रहता था, सब उठ गया।

घर के बड़े भाई सब पढ़े लिखे थे। कोई लंदन तो कोई कैलीफोर्निया तो कोई कनाडा जाना चाहता था। अब तो सभी तीस -बत्तीस की उम्र पार कर चुके थे। शादीशुदा थे और बड़े शहरों की पढ़ी लिखी लड़कियाँ भाभी के रूप में आई थीं तो संस्कारों की जड़ें भी हिलने लगीं थीं।

बीस वर्ष की उम्र तक यही नहीं पता था कि अपने सहोदर भाई -बहन कौन थे क्योंकि बीजी और चाईजी ने सबका एक समान रूप से लाड- दुलार किया। हम सबके लिए वे बीजी और चाईजी थीं। बाबा और चाचाजी ने सबको एक जैसा ही स्नेह दिया। हम सभी उन्हें बाबा और चाचाजी ही पुकारते थे। कभी कोई भेद नहीं था। हमने अपने भाइयों को कभी चचेरा न समझा था, सभी सगे थे। पर चचेरा, फ़र्स्ट कज़न जैसे शब्द अब परिवार में सुनाई देने लगे। कभी- कभी भाभियाँ कहतीं यह मेरा कज़न देवर है। शूल सा चुभता था वह शब्द कानों में पर हम चुप रहते थे। जिस रिश्ते के विषय से हम बीस वर्ष की उम्र तक अनजान थे उस रिश्ते की पहचान भाभियों को साल दो साल में ही हो गई। वाह री दुनिया!

पहले घर के हिस्से हुए, फिर खेत का बँटवारा। अपने -अपने हिस्से बेचकर चार भाई बाहर निकल गए।

बहनें तो पहले ही ब्याही गई थीं।

अगर कोई न बिखरा था तो वह थीं बीजी और चाइजी। उन्होंने बहुओं से साफ कह दिया था – सोलह साल दी उम्रा विच इस कार विच अस्सी दुआ जण आई सन, हूण मरण तक जुदा न होणा। बेशक अपनी रोटी अलग कर ले नुआँ। ( सोलह साल की उम्र में हम दोनों इस घर में आई थीं अब मरने तक जुदा न होंगी हम। बेशक बहुएँ अपनी रोटी अलग पका लें)

हमारा मकान बहुत बड़ा और पक्का तो बाबूजी के रहते ही बन गया था। सब कहते थे खानदानी परिवार है। गाँव में सब हमारे परिवार का खूब मान करते थे। बिजली, घर के भीतर टूटी (नल), ट्रैक्टर आदि सबसे पहले हमारे घर में ही लाए गए थे। पर सत्तर -अस्सी साल पुराना कुनबा विदेश की हवा लगकर पूरी तरह से बिखर गया।

आज मैं अकेला इस विशाल मकान में कभी – कभी आया जाया करता हूँ। अपनी बीजी, चाइजी और चाचाजी से मिलने आता हूँ। वे यहाँ से अन्यत्र जाना नहीं चाहते थे। खेती करना मेरे बस की बात नहीं सो किराए पर चढ़ा दी। जो रोज़गार आता है तीन प्राणियों के लिए पर्याप्त है। मैं यहीं भटिंडा में सरकारी नौकरी करता हूँ। बाबा का कुछ साल पहले ही निधन हुआ। अविवाहित हूँ इसलिए स्वदेश में ही हूँ वरना शायद मैं भी निकल गया होता।

आज अकेले बैठे -बैठे कई पुरानी बातें याद आ रही हैं।

बाबूजी कहते थे, *दोस्तानुं कार विच न लाया करो पुत्तर, पैणा वड्डी हो रही सन। ( अपने दोस्तों को लेकर घर में न आया करो बेटा, बहनें बड़ी हो रही हैं। )

हमारी बहनों ने हमारे दोस्तों से ही तो शादी की थी और घर पाश्चात्य रंग में रंग गया था। बाबूजी की दूरदृष्टि को प्रणाम करता हूँ।

बेबे कहती थीं – हॉली गाल्ल कर पुत्तर दीवारों दे भी कान होंदे। ( धीरे बातें करो बेटे दीवारों के भी कान होते हैं)

बस यह दीवारों के जो कान होने की बात बुजुर्ग करते थे वह खाँटी बात थी। घर के दूसरे हिस्से में क्या हो रहा था इसकी खबर पड़ोसियों को भी थी। वरना इस विशाल कुनबे के सदस्य इस तरह बिखर कर बाहर न निकल जाते।

© सुश्री ऋता सिंह

27/4/1998

फोन नं 9822188517, ईमेल आई डी – ritanani[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १९ – “गेंड़ी नृत्य से दुनिया भर में पहचान – बनाने वाले पद्मश्री शेख गुलाब” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।

ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है एक नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  – “गेंड़ी नृत्य से दुनिया भर में पहचान – बनाने वाले पद्मश्री शेख गुलाब”)

आप गत अंकों में प्रकाशित विभूतियों की जानकारियों के बारे में निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं –

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २ ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३ ☆ यादों में सुमित्र जी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४ ☆ गुरुभक्त: कालीबाई ☆ सुश्री बसन्ती पवांर ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५ ☆ व्यंग्यकार श्रीबाल पाण्डेय ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ६ ☆ “जन संत : विद्यासागर” ☆ श्री अभिमन्यु जैन ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ७ ☆ “स्व गणेश प्रसाद नायक” – लेखक – श्री मनोहर नायक ☆ प्रस्तुति  – श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ८ ☆ “बुंदेली की पाठशाला- डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ९ ☆ “आदर्श पत्रकार व चिंतक थे अजित वर्मा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ११ – “स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव उर्फ़ ऊँट बिलहरीवी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १२ ☆ डॉ. रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆   

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १३ ☆ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, लोकप्रिय नेता – नाट्य शिल्पी सेठ गोविन्द दास ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १४ ☆ “गुंजन” के संस्थापक ओंकार श्रीवास्तव “संत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १५ ☆ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कविवर – पंडित गोविंद प्रसाद तिवारी ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १६ – “औघड़ स्वाभाव वाले प्यारे भगवती प्रसाद पाठक” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆ 

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १७ – “डॉ. श्री राम ठाकुर दादा- समाज सुधारक” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १८ – “राजकुमार सुमित्र : मित्रता का सगुण स्वरुप” – लेखक : श्री राजेंद्र चन्द्रकान्त राय ☆ साभार – श्री जय प्रकाश पाण्डेय☆

पद्मश्री शेख गुलाब

☆ कहाँ गए वे लोग # १९ ☆

☆ “गेंड़ी नृत्य से दुनिया भर में पहचान – बनाने वाले पद्मश्री शेख गुलाब☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

शेख गुलाब का जन्म अविभाजित मण्डला जिले के डिंडौरी में हुआ था। अब मण्डला से अलग होकर डिंडौरी भी स्वतंत्र जिला बन गया है। तब यह गाँव बहुत छोटा था। नर्मदा के किनारे। नर्मदा के पानी से होकर इस अंचल की कला और संस्कृति जैसे शेख गुलाब की रगों में दौड़ने-फिरने लगी थी। इलाकाई नाच-गाने का उन्हें जुनून-सा था। सारा समय इसी को तलाशने, देखने, समझने, सुनने-गुनने में बीतता। बिल्कुल शुरुआती दौर में ही उन्होंने इस बात को पकड़ लिया था कि आने वाला समय बाज़ार के साथ मिलकर पारंपरिक कलाओं की इस अनमोल धरोहर पर बड़ा हमला करने वाला है। इसीलिए उन्होंने अपना सारा ध्यान दो बिंदुओं की ओर केंद्रित किया; एक तो लोक कलाओं की परंपरा, स्वरूप, शैली आदि का दस्तावेजीकरण और दूसरे नई पीढ़ी के बीच जाकर इन कलाओं को प्रायोगिक रूप में आगे बढ़ाना। इस काम के लिए उन्हें डिंडौरी का परिवेश जरा संकुचित लग रहा था।

मण्डला जबलपुर रोड पर आदिवासी गांव कालपी है  कालपी में हेड-मास्टर की पोस्ट थी, वे एक दर्जा नीचे थे। उन्होंने कहा कि वे अपने-आप को साबित कर दिखाएंगे और न कर पाए तो जीवन-भर प्रमोशन नहीं लेंगे। तब के लोगों के पास रीढ़ की हड्डी नामक दुर्लभ चीज भी हुआ करती थी और वे नियमों की लकीर पीटते बैठे नहीं रहते थे। स्कूल इंस्पेक्टर ने हेड मास्टर साहब को किसी ट्रेनिंग में भेज दिया और शेख गुलाब को कालपी में तैनात कर दिया। यहाँ आकर वे अपने काम में इस तरह जुटे की देश भर में उनका नाम फैलने लगा और दिलीप कुमार जैसी शख्सियत को भी यहाँ आना पड़ा। वे आदिवासी लोक-जीवन पर आधारित एक फ़िल्म “काला आदमी” बनाना चाहते थे। 

इस फ़िल्म के नृत्य-संगीत को लेकर शेख गुलाब के साथ उन्होंने लम्बी चर्चा की। आगे यह फ़िल्म बन तो नहीं सकी पर इस मुलाकात की चर्चा के साथ शेख गुलाब का नाम वे भी जानने लगे थे, जो अब तक उनके नाम और काम से वाकिफ़ न थे।

चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाई के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल भारत आया हुआ था। डेलिगेशन के सम्मान में होने वाले आयोजन के लिए कालपी से शेख गुलाब को याद किया गया। गुलाब साहब के दल को गेंड़ी नृत्य प्रस्तुत करना था।  

पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक, प्रधानमंत्री निवास में शेख गुलाब  का इस तरह से आना-जाना रहा कि गोया दरबान भी उन्हें पहचानने लगे थे।  शेख गुलाब को अलबत्ता पद्मश्री सम्मान मिल गया था। सम्मान लेने के लिए उन्होंने लोगों के दबाव में एक अदद कुर्ता-सलवार सिलवाया था। वे सादगी पसंद थे। जीवन भर धोती-कुर्ता पहनते रहे। उन्हें लगा कि एक सम्मान के लिए इस तरह से भेस बदलना बहुरूपियों का काम है। आखिरी वक्त में वे मौलिक रूप में आ गए। सलवार-कुर्ता धरा रह गया। बाज लोग तो सम्मान के लिए क्या-क्या स्वांग धर लेते हैं। इन काग के भाग में सम्मान के बदले फ़क़त कुछ मोर पंख होते हैं, जिन्हें  इन्हें अपनी दुम में खोंसना होता है।

शेख गुलाब को सबसे ज्यादा मकबूलियत गेंड़ी नाच की वजह से मिली। गेंड़ी नाच की इससे पहले कोई सुदीर्घ परम्परा नहीं रही। इसकी शुरुआत संयोगवश हुई और इसी नृत्य ने शेख गुलाब को खूब नाम दिया। बारिश वाले दिनों में जब खेतों में कीचड़ होता है तब किसान गेंड़ी का इस्तेमाल यहाँ आने-जाने में करते हैं। 

गेंड़ी नाच की कोई स्थापित परम्परा नहीं रही। वर्ष 1952 में शेख गुलाब मिडिल स्कूल के अपने छात्रों को लोक-नृत्य की तालीम दे रहे थे। गाँव के कुछ लड़के गेड़ियों में चढ़कर नाच का देखने आए थे। जब अभ्यास खत्म हुआ गेंड़ी में सवार दर्शकों में से एक बालक हू ब हू नाच की नकल करने लगा। शेख गुलाब के जेहन में उसी तरह बिजली कौंध गई जैसे बारिश में पतंग उड़ाते हुए बेंजामिन फ्रेंकलिन के जेहन में चमकी होगी। उन्हें लगा कि लोक-नृत्य गेड़ियों पर भी किए जा सकते हैं। उन्होंने बालकों के लिए कतिपय छोटी-छोटी गेड़ियाँ बनवाई और इन पर छोटे-छोटे बालकों ने जरा बड़ा काम कर दिखाया।

गेंड़ी वाला करतब नृत्य तक सीमित नहीं रहा। गेंड़ी पर सवार होकर फुटबॉल भी खेला जा सकता है। जाने कैसे यह खबर ऑल इंडिया फुटबॉल एसोसिएशन तक पहुँच गई। उन्होंने कालपी की गेंड़ी फुटबॉल टीम को कोलकाता ( तब कलकत्ता) आमंत्रित किया। फुटबॉल वहाँ के लोगों ने खूब देखा था, पर गेंड़ी फुटबॉल एक अजूबा था। पूरे शहर में गेंड़ी फुटबॉल खेलने वाले बालकों के ‘कट आउट’ लग गए थे। बालक अपने ही होर्डिंग्स को हैरानी से देख रहे थे और यकीन नहीं कर पा रहे थे कि ये वही हैं। एमसीसी की क्रिक्रेट टीम भी वहीं थी। टीम के कप्तान हावर्ड जाफरी अपने दल-बल के साथ मैदान में मौजूद थे। मण्डला वाले इलाके में तब जंगल और भी घने हुआ करते थे, इसलिए टीम के नामकरण में थोड़ा ‘जंगलीपन’ जरूरी था। एक टीम का नाम ‘शेर दल’ था और दूसरा ‘भैंसा दल’ था। जंगली भैंस और शेर के बीच भिड़ंत बहुत जबरदस्त होती है। यहाँ भी जबरदस्त टक्कर हुई और दोनों दलों ने मिलकर लोगों का दिल जीत लिया। जैसा शोर गोल होने पर मचता है, इस मुकाबले में वैसा शोर एक-एक ‘किक’ पर मचता था, जो गेड़ियों से लगाई जाती थी। अगले दिन के अखबार मैच के विवरण से भरे पड़े थे। 

अगले ही बरस, यानी वर्ष 1954 में दिल्ली की गणतंत्र दिवस की परेड में पहली बार लोक-नृत्यों को शामिल किया गया। मध्य-प्रदेश की टीम तैयार करने की जिम्मेदारी प्रख्यात कथक नृत्यांगना सितारा देवी को सौंपी गई। सितारी देवी के बारे में ज्यादा जानना हो तो उन पर लिखा मंटो का आलेख पढ़ना चाहिए। सितारा शास्त्रीय कलाकार थीं और उनके जिम्मे जो टीम दी गई वो लोक-कलाकार थे। एक विधा कड़े अनुशासन और प्रशिक्षण वाली और इसके बरक्स दूसरी विधा ऐसी जो सहज जीवन शैली से आती है और थोड़ा खिलंदड़ापन लिए हुए होती है। दोनों के बीच पटरी बैठ नहीं पा रही थी। सितारा देवी भी असहज महसूस कर रही थीं। पंडित रविशंकर शुक्ल ने एक अभ्यास देखा तो वे पूरी तरह से उखड़ गए। उन्होंने शेख गुलाब का नाम सुन रखा था। आखिरकार लोक-कलाकारों की यह मंडली शेख गुलाब के हवाले कर दी गई। वे इसी काम के लिए बने थे।

कलाकारों के इस दल ने दिल्ली की परेड में जमकर नाच दिखाया। दर्शकों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अलावा फिल्मकार व्ही शांताराम भी मौजूद थे। वे “झनक झनक पायल बाजे” की तैयारी में लगे हुए थे। व्ही शांताराम ने कलाकारों के कैम्प में आकर शेख गुलाब से भेंट की और कहा कि वे एक बार फिर से इस नृत्य की रिहर्सल देखने की ख्वाहिश रखते हैं। रिहर्सल हुई। व्ही शांताराम की पूरी टीम रिहर्सल के दौरान नृत्य देखकर झूमती रही। फिर अगले दिन पूरी वेशभूषा के साथ शूटिंग की बात हुई। गाँव के कुछ बालक जानते भी न थे कि शूटिंग क्या बला होती है। पर वे जमकर नाचे। व्ही शांताराम ने नृत्य के इस टुकड़े को अपनी फिल्म में जगह दी। 

श्री जय प्रकाश पाण्डेय 

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग-24 – राहों पे नज़र रखना और होंठों पे दुआ… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ संस्मरण – मेरी यादों में जालंधर – भाग -24 – राहों पे नज़र रखना और होंठों पे दुआ… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(प्रत्येक शनिवार प्रस्तुत है – साप्ताहिक स्तम्भ – “मेरी यादों में जालंधर”)

समय के साथ साथ कैसे व्यक्ति ऊपर की सीढ़ियां चढ़ता है, यह देखना समझना हो तो आजकल ‘जनसत्ता’ के संपादक मुकेश भारद्वाज को देखिए !

मुकेश भारद्वाज को याद करते हुए विनम्रता से यह बताना बहुत जरूरी समझता हूँ कि यह उन दिनों की बात है जब मैंने बीएड की परीक्षा पास की ही थी। नवांशहर के मेरे बीएड काॅलेज की प्राध्यापिका व मेरी बहन डाॅ देवेच्छा ने मुझे काव्य पाठ प्रतियोगिता का पहली बार निर्णायक बनाया। परिणाम घोषित किया तो एक लम्बा सा , पतला सा लड़का हम निर्णायकों के पास आया और विनम्रता से द्वितीय पुरस्कार दिए जाने का आभार व्यक्त करने लगा। वह होशियारपुर से आया था। वह मुकेश भारद्वाज था जो आज ‘दैनिक जनसत्ता’ का दिल्ली में संपादक है।

मुकेश ने कहा कि कोई राह सुझा दीजिए। मैं तब तक अध्यापन के साथ ‘दैनिक ट्रिब्यून’ का नवांशहर क्षेत्र में आंशिक रिपोर्टर हो चुका था और मुझे अध्यापन से ज्यादा पत्रकारिता में मज़ा और रोमांच आने लगा था। मैंने उसे पत्रकारिता की जितनी मेरी समझ बनी थी उसकी जानकारी दी और होशियारपुर चूंकि मेरा ननिहाल था , इसलिए लकड़ी के खिलौनों पर फीचर लिखने का सुझाव दिया। मुकेश ने लिखा और ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में भेजा , जिसे तब रविवारीय संस्करण के प्रभारी और सहायक संपादक वेदप्रकाश बंसल ने प्रकाशित भी कर दिया। इसके बाद मुकेश भारद्वाज के भारद्वाज के अनेक फीचर ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में आए। एक बार मैं चिंतपुर्णी (हिमाचल)जाते समय सपरिवार मुकेश का पता खोजते मिलने पहुंच गया और उसके परिवार से मिला। बहन कैलाश भी अब चंडीगढ़ में रहती है। इसके बाद मुकेश सन् 1987 में ‘जनसत्ता’ में टेस्ट दिया और रिपोर्टर चुना गया।

समय का कमाल देखिए कि सन् 1990 में मैं भी शिक्षण को अलविदा कह ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में उपसंपादक बन कर चंडीगढ़ पहुंच गया। ‘जनसत्ता’ कार्यालय में मुकेश से मिलने गया। कैंटीन में भीड़ होने के कारण हमने चाय की चुस्कियां सीढ़ियों पर बैठ कर लीं और खूब बतियाए।

मैं सन् 1997 में हिसार का रिपोर्टर बन कर हरियाणा आ गया तब से मुलाकात नहीं हुई लेकिन सम्पर्क बना रहा।

एक दिन हिसार के ‘नभछोर’ के संपादक ऋषि सैनी ने कहा कि मैं ‘जनसत्ता’ के संपादक मुकेश भारद्वाज को फोन लगाता हूं लेकिन सम्पर्क नहीं होता , बात करने की इच्छा है। असल में वे ‘जनसत्ता’ के फैन हैं और प्रभाष जोशी को भी खूब पढ़ते रहे थे। मैंने कहा कि लीजिए बात करवा देता हूँ।

 मैंने तुरंत मुकेश को फोन लगा दिया। उसने बड़े आदर से ‘सर’ कह कर  संबोधित किया और मैंने ऋषि सैनी से बात करने को कहा। जब दोनों की बात खत्म हुई तब मुकेश ने कहा कि सर को फोन दीजिए। उसने बड़े आग्रह से कहा कि आप तो पंजाब के कथाकार हो। ‘जनसत्ता’ के लिए कहानी भेजिए। मैंने दूसरे दिन ही कहानी भेज दी और उसी आने वाले रविवारी जनसत्ता में प्रकाशित भी हो गयी। यह उसका मेरे प्रति आदर था या कृतज्ञता या गुरु दक्षिणा, कह नहीं सकता। फिर और कहानियां भी भेजीं जो प्रकाशित होती गयीं। ‘नानी की कहानी’, ‘चरित्र’ आदि कहानियाँ प्रकाशित हुईं।

फिर ‘जनसत्ता’ के गरिमामयी दीपावली विशेषांक में भी मेरी कहानी आई -नीले घोड़े वाले सवार।  फिर ‘दुनिया मेरे आगे’ में भी लेख भी आये।

इन दिनों मुकेश हर शनिवार ‘जनसत्ता’ में अपना साप्ताहिक स्तम्भ-बेबाक बोल लिख रहा है जो खूब चर्चित भी है और पसंद भी किया जा रहा है। लगे रहो। बस, कलम पैनी रखना।

मुकेश भारद्वाज पंजाबी कवियों के अंशों को भी अपने स्तम्भ में बड़ी सही जगह उपयोग करता है, जो यह बता देता है कि मुकेश एक कवि /लेखक भी है और पंजाबी साहित्य से भी जुड़ा है।

 आज सुबह वैसे ही मन आया कि रास्ता तो एक शिक्षक पूरी क्लास को दिखाता है लेकिन कोई कोई मुकेश भारद्वाज जैसा प्रतिभावान अपनी मंजिल खुद बना और पा लेता है। बधाई मुकेश। इसमें तुम्हारी मेहनत ज्यादा झलकती है।

यह चंडीगढ़ ही था जहाँ मुझे डाॅ योजना रावत, बृज मानसी से मिलने का अवसर मिला। ये दोनों ‘जनसत्ता’ में काॅलम लिखती थीं। बृज मानसी पंजाब विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों में मिलती और हिमाचल से आई थी एम ए अंग्रेज़ी करने ! उसने एक बार ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में समीक्षा स्तम्भ में जुड़ने की इच्छा जाहिर की और मैंने संपादक विजय सहगल से मिलवाया और उसकी यह इच्छा भी पूरी है गयी। फिर वह अमेरिका चली गयी और संबंध वहीं छूट गया। योजना रावत के कथा संग्रह के विमोचन पर भी मौजूद रहा और कहानी भी प्रकाशित की – ‘कथा समय’ में ! राजी सेठ और निर्मला जैन विशेष तौर पर आमंत्रित थीं।

चंडीगढ़ में ही वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र भारद्वाज का इंटरव्यू लेने तब भेजा गया जब वे हिंदुस्तान से सेवानिवृत्त होकर अपने पैतृक गांव बद्दी बरोटीवाला जा रहे थे और सामान पैक हो रहा था। वे समाजसेवा में जाना चाहते थे लेकिन ज़िंदगी ने उन्हें यह अवसर न दिया। वैसे वे मेरी साहित्यिक यात्रा के पहले संपादक रहे। वे जालंधर से प्रकाशित ‘जन प्रदीप ‘ के संपादक थे और मेरी पहली पहली रचनाएँ इसी में प्रकाशित हुई और मैं कभी कभी भगत सिंह चौक के सामने बने कार्यालय में भी जाता। वहीं अनिल कपिला से पहली मुलाकात हुई, जो बरसों बाद ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में फिर जुड़ गयी ! ‘जन प्रदीप’ में साहित्य संपादक थे पूर्णेंदू ! वे हर माह किसी न किसी शहर में काव्य गोष्ठी रखते और एक बार लुधियाना में काव्य गोष्ठी रखी साइकिल कंपनी के मालिक मुंजाल की कोठी में, ये वही मुंजाल फेमिली है, जो आजकल हीरो हांडा के लिए जानी जाती है ! वैसे यह भी बताना कम रोचक नही होगा कि ज्ञानेंद्र भारद्वाज की बेटी सुहासिनी  ‘नभ छोर’ द्वारा प्रकाशित अंग्रेज़ी दैनिक ‘ होम पेजिज’ में रिपोर्टर बन कर हिसार आई और कुछ कवरेज के दौरान मुलाकातें होती रहीं। भारद्वाज की बड़ी बेटी मनीषा प्रियंवदा से भी जब हरियाणा ग्रंथ अकादमी का उपाध्यक्ष बना तब मुलाकात हुई और वह हमारे मित्र हरबंश दुआ की पत्नी है, जो खुद एक अच्छे लेखक हैं और उनकी किताबें आधार प्रकाशन से आई हैं। ‌वैसे वे बहुत ही क्रियेटिव शख्स हैं और मोहाली में उनका ऐसा शानदार शो रूम भी देखने को मिला! उन्होंने ही बताया कि सुहासिनी आजकल विदेश में है ! ज्ञानेंद्र भारद्वाज की वही इंटरव्यू मेरी पुस्तक ‘ यादों की धरोहर, में भी शामिल है।

मित्रो फिर‌ वही बात कि मैं कहाँ से कहां पहुंच गया ! इन पंक्तियों से आज विदा लेता हूँ :

होंठों पे दुआ रखना, राहों पे नज़र रखना

आ जाये कोई शायद दरवाजा खुला रखना!

क्रमशः…. 

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ सुरजीत पातर और मैं ☆ प्रो. नव संगीत सिंह ☆

प्रो. नव संगीत सिंह

☆ संस्मरण ☆ सुरजीत पातर और मैं ☆ प्रो. नव संगीत सिंह ☆

यह बात करीब चार दशक पुरानी है — 1978-79 की। उस समय मैं पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में कैलिग्राफिस्ट (1977-86) के तौर पर कार्यरत था। कैलिग्राफिस्ट, यानी ख़ुशनवीस, एक अच्छा सुलेखक। कैलिग्राफिस्ट को कहीं-कहीं कैलिग्राफर भी कहा जाता है। पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला से पहले मैं गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर में बतौर एक सुलेखक (1974-77) रह चुका हूं।

पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में डॉ. जोध सिंह सबसे पहले उप-कुलपति (1962-66) थे। पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला में मेरी सर्विस के दौरान, तीन कुलपति विश्वविद्यालय आये। जिनमें से डाॅ. अमरीक सिंह को बहुत सख्त और अनुशासित वीसी माना जाता था। प्रोफेसर के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, मैं पाँच उप-कुलपतियों से मिला — डॉ. जोगिंदर सिंह पुआर, डॉ. जसबीर सिंह आहलूवालिया, श्री स्वर्ण सिंह बोपाराय, डाॅ. जसपाल सिंह और डॉ. बी.एस. घुम्मण। जिस समय मेरी नियुक्ति हुई; डॉ पुआर वीसी थे। डा. आहलूवालिया के समय हमारा कॉलेज पंजाबी विश्वविद्यालय का पहला कान्सटिचुऐंट कॉलेज बना। श्री बोपाराय के समय में मुझे चयन ग्रेड व्याख्याता के रूप में पदोन्नत किया गया था; डॉ जसपाल सिंह के समय मैं एसोसिएट प्रोफेसर बन गया और डाॅ. जब घुम्मण पहली बार गुरु काशी कॉलेज आये तो मैं वाइस प्रिंसिपल के पद पर था और मैंने ही उनका स्वागत किया था, क्योंकि तब कॉलेज प्रिंसिपल छुट्टी पर थे।

जिस समय की यह बात है, उन दिनों गैर-शिक्षण कर्मचारी संघ के अध्यक्ष के रूप में हरनाम सिंह और कौर सिंह सेखों के बीच कश्मकश चल रही थी और वे दोनों अपने-अपने समय के कर्मचारी यूनियन के नेता थे। अब ये दोनों इस दुनिया में नहीं हैं।

पहली बार मुझे पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के कर्मचारियों द्वारा आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम में भाग लेना था और मेरी पहली पसंद कविता थी। तब मैं स्वयं कविता नहीं लिखता था। मुझे अन्य कवियों की कविताएँ पढ़ना/याद करना और उन्हें कहीं सुनाना पसंद था। मैं पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला की विशाल लाइब्रेरी में गया, जहां पहली नजर में ही ‘कोलाज किताब’ और इसके खूबसूरत नाम ने मुझे आकर्षित कर लिया। मुझे पता चला कि यह 1973 में प्रकाशित तीन कवियों, परमिंद्रजीत (1.1.1946-23.3.2015) जोगिंदर कैरों (जन्म 12.4.1941) और सुरजीत पातर (14.1.1945-11.5.2024) की सांझी पुस्तक है।

और यह भी कि यह तीनों लेखकों की पहली-पहली किताब है। इन लेखकों ने इस पुस्तक के बाद ही अपनी-अपनी अन्य पुस्तकें लिखीं। (यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पातर ने डॉ. जोगिंदर कैरों के मार्गदर्शन में गुरु नानक देव विश्वविद्यालय से पीएचडी की थी।) इस किताब में से जिस कविता ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह थी सुरजीत पातर की कविता ‘हुण घरां नूं पतरणा…’। मैं किताब घर ले आया, एक कागज पर कविता लिखी और फिर उसे याद कर लिया। मैं इसे एक सप्ताह तक दोहराता रहा, कई बार विशेष संकेतों और भाव-भंगिमाओं के साथ इसे पढ़ा और जब मुझे यकीन हो गया कि मैं यही कविता सुनाऊंगा, तो मैंने इस कार्यक्रम में अपना नाम लिखवा दिया।

उस समय डाॅ. अमरीक सिंह विश्वविद्यालय के उप-कुलपति थे। पहले दिन कर्मचारियों की खेल प्रतियोगिताएं थीं, जिसमें मेरी कोई रुचि नहीं थी। दूसरे दिन सांस्कृतिक गतिविधियों की प्रतियोगिता थी, जो गुरु तेग बहादुर हॉल में हुईं। ये प्रतियोगिताएं शाम करीब पांच बजे शुरू हुईं और रात नौ बजे तक चलीं। कविता के अलावा गीत-संगीत और गिद्धा-भांगड़ा की भी प्रस्तुति हुई। इस अवसर पर मैंने काव्य-पाठ में भाग लिया। मुझे याद नहीं कि उस प्रतियोगिता में अन्य कितने प्रतियोगी थे। लेकिन मेरे साथ कर्मचारी संघ के उस समय के अध्यक्ष कौर सिंह सेखों भी इसमें शामिल हुए, जिन्होंने संत राम उदासी की कविता सुनाई थी और मैंने सुरजीत पातर की – ‘हुण घरां नूं परतणा …’ मैं स्वयं को इस प्रतियोगिता के प्रथम तीन स्थानों पर देख रहा था। मुझे लगता था कि मेरी कविता दूसरा या तीसरा पुरस्कार जीतेगी। क्योंकि सबसे पहले स्थान पर मैं संघ के अध्यक्ष को देख रहा था। इसलिए नहीं कि उसकी प्रस्तुती मुझसे बेहतर थी, सिर्फ इसलिए कि वह संघ के अध्यक्ष थे और उन्हें ‘अनदेखा’ कैसे किया जा सकता था!

लेकिन मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, जब मेरी प्रस्तुति के लिए प्रथम स्थान की घोषणा की गई और संघ-अध्यक्ष को दूसरे पुरस्कार से संतोष करना पड़ा। उद्घोषक  विश्वविद्यालय का ही एक शिक्षक था, जो निर्णायक मंडल में बैठा था। कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने वाले अन्य दर्शकों में उप-कुलपति, रजिस्ट्रार, उप रजिस्ट्रार और विश्वविद्यालय के बड़ी संख्या में कर्मचारी शामिल थे।

इसके बाद मैं सुरजीत पातर से चार बार मिला। तीन बार दर्शक के तौर पर और एक बार मंच-संचालक के रूप में। 29 मार्च 2018 को अकाल यूनिवर्सिटी तलवंडी साबो में जब सुरजीत पातर आए तो उनका परिचय देने के लिए मैं मंच संचालक के तौर पर उपस्थित था। यहां मैंने उनसे अपना परिचय एक पाठक के रूप में करवाया। जिसमें मैंने उसी कविता को सुनाया (‘हुण घरां नूं  परतणा…’), जिसमें मुझे पहला पुरस्कार मिला था। इस कार्यक्रम में उप-कुलपति समेत पूरी यूनिवर्सिटी मौजूद थी। उनके साथ उनके छोटे भाई उपकार सिंह भी आये थे। छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों ने उनके साथ फोटो खिंचवाईं। छुट्टी के बाद भी हम काफी देर तक उनके साथ बैठे रहे, उनकी बातें सुनते रहे। आज जब यह महान कवि हमारे बीच शारीरिक रूप में मौजूद नहीं है तो मन भावुक हो रहा है। आज मैंने यूं ही प्रोफ़ेसर प्रीतम सिंह द्वारा संपादित ‘पंजाबी लेखक कोश’ (2003) को देखना शुरू किया। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि ‘लेखक कोश’ में “सुरजीत” नाम के 29 लेखक हैं, जिनमें 4 महिला-लेखिकाएँ भी शामिल हैं। सबसे बड़ी प्रविष्टियों वाले चार लेखक हैं — सुरजीत सिंह सेठी, सुरजीत सिंह गांधी, सुरजीत सिंह भाटिया और सुरजीत पातर। आज की तारीख में आकाश में ध्रुव तारे की तरह चमकने वाले लेखक सिर्फ और सिर्फ सुरजीत पातर ही हैं।

*

© प्रो. नव संगीत सिंह

# अकाल यूनिवर्सिटी, तलवंडी साबो-१५१३०२ (बठिंडा, पंजाब) ९४१७६९२०१५.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मेरी डायरी के पन्ने से # 16 – संस्मरण # 10 – गुलमोहर का पेड़ ☆ सुश्री ऋता सिंह ☆

सुश्री ऋता सिंह

(सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुश्री ऋता सिंह जी द्वारा ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपने यात्रा संस्मरणों पर आधारित आलेख श्रृंखला को स्नेह प्रतिसाद के लिए आभार।आज प्रस्तुत है आपकी डायरी के पन्ने से …  – संस्मरण)

? मेरी डायरी के पन्ने से # 16 – संस्मरण # 10 – गुलमोहर का पेड़ ?

आज भयंकर गर्मी पड़ रही थी। मैं चाय की प्याली लेकर सुबह -सुबह ही बालकनी का दरवाज़ा खोलकर,  बालकनी की छोटी दीवार से सटकर खड़ा हो गया।

अपनी भागती -दौड़ती ज़िंदगी में बहुत कम समय मिलता है कि मैं फुर्सत से कभी बालकनी में भी आऊँ। यहाँ गमलों में लगे हरे- भरे पौधे इस गर्मी में आँखों को सुकून दे रहे थे।

अचानक सुदूर एक विशाल गुलमोहर का वृक्ष दिखा। रक्तरंजित पुष्पों से सुसज्जित! वृक्ष आज संपूर्ण शृंगार के साथ अपने यौवन का प्रदर्शन कर रहा था।

न जाने क्यों मेरे हृदय में एक टीस-सी उठने लगी। अपने बचपन की कुछ घटनाएँ अधूरे चलचित्र की तरह मेरी आँखों के सामने उभरने लगीं।

मैं अभी छह-सात वर्ष का ही था। अपने घर की खिड़की पर लोहे की सलाखों को पकड़कर फेंस के उस पार के गुलमोहर के वृक्ष को मैं अक्सर निहारा करता था। प्रतिदिन उसे देखते -देखते मेरा उससे एक अटूट संबंध – सा स्थापित हो गया था। उसका विभिन्न रूप मुझे बहुत भाता रहा। कभी हरे पत्तों से भरी  हुई टहनियाँ, तो कभी लाल फूलों से भरी तो कभी नग्न टहनियों पर लटकती उसकी भूरी चपटी फलियाँ मुझे आकर्षित करतीं।

बाबा कॉटन मिल में कार्यरत थे। छोटा -सा सुखी परिवार था हमारा, दादा-दादी,बाबा -माँ और मैं। फिर हड़तालों की वजह से कॉटन मिल बंद होने लगे।बाबा बेरोज़गार हो गए।माँ दहेज़ में मिले पैतृक निशानी कभी कंगन बेचती तो कभी अपना हार। इस तरह एक वर्ष बीत गया। कारखाने से भी कोई धनराशि न मिली। फिर बाबा को सात समुंदर पार विदेश में कहीं काम मिल गया। माँ ने अपना प्रिय चंद्रहार बेचकर बाबा को विदेश जाने के लिए रुपयों की व्यवस्था कर दी। बाबा मशीनों के जानकार थे। काम मिलते ही वे चले गए।

प्रति वर्ष जब गुलमोहर के वृक्ष पर फूल खिलते तो बाबा घर आते। माह भर रहते खूब जी भरकर खिलौने लाते,विदेशी वस्तुएँ लाते और एक बार घर में फिर रौनक छा जाती।

गुलमोहर के वृक्ष पर ज्योंही एक फूल खिला हुआ दिखाई दे जाता मैं दौड़कर माँ को सुखद संवाद देता।उसके गले में अपनी बाहें डालकर कहता ” बाबा के आने का मौसम है।” माँ हँस देती।

हर पंद्रह दिनों में बाबा की चिट्ठी आती।उस लिफ़ाफ़े में  दादा-दादी के लिए भी अलग खत होते।माँ बाबा की चिट्ठी पढ़ती तो अपने आँचल के कोने  से अपना मुँह छिपाकर मंद -मंद मुस्कराती। मेरे बारे में लिखी बातें वह मुझे अपनी गोद में बिठाकर कई बार पढ़कर सुनाती।शायद उस बहाने वह अपने हिस्से का भी खत बाँच लेती।

काठ की बड़ी सी डिबिया में माँ अपने खत रखा करती थीं। दो खतों के बीच की अवधि में न जाने माँ उन  खतों को  कितनी बार पढ़ लिया करती थीं। हर बार चेहरे पर मुस्कान फैली दिखाई देती। अब बाबा की पदोन्नति हुई तो शायद वे व्यस्त रहने लगे,न केवल खतों का आना कम हुआ बल्कि बाबा भी अब दो वर्ष बाद घर लौटे। इस बीच दादाजी का स्वर्गवास हो गया। दादी अपने गाँव लौट गईं।

इधर देश भी उन्नति कर रहा था। सत्तर का दशक था।जिनके पास धनाभाव न था उनके घर टेलीफोन लगने लगे थे। हमारे घर पर भी  काला यंत्र लग गया। अब बाबा फोन ही किया करते।खतों का आदान -प्रदान बंद हो गया।

अब जब कभी बाबा का फोन आता तो माँ कम बोलती दिखाई देती और उधर से बाबा बोलते रहते। माँ अक्सर फोन पर बातें करते समय आँचल के कोने से नयनों के कोर पोंछती हुई दिखाई देती । मैं तो अभी छोटा ही था उन आँसुओं को समझ न पाता पर दौड़कर उनके  पास पहुँच जाता ,अपनी छोटी -छोटी उँगलियों से उनके आँसू पोंछता और वे मुझे अपने अंक में भर लेतीं।

समय कहाँ रुकता है। मैं भी तो बड़ा हो चला था।अब कभी -कभी मैं भी बाबा से फोन पर बातें कर लेता था। पर यह भी सच है कि मेरे पास कहने को कुछ खास न होता था सिवाय इसके कि बाबा कब आओगे? और उत्तर मिलता ,देखो शायद इस गर्मी में।

उस साल ज्योंही मैंने गुलमोहर के फूलों को खिलते देखा तो मैं दौड़कर माँ के पास आया और यह सुखद समाचार दिया कि बाबा के आने का मौसम है। उस दिन माँ ने करुणा भरी दृष्टि से मेरी ओर देखा और कहा , “तेरे बाबा अब घर नहीं लौटेंगे, मैं तुझे अब इस भुलावे में न रखूँगी। तेरे बाबा ने विदेश में अपनी अलग गृहस्थी बसा ली। “

उस दिन मैंने माँ को अपने सीने से लगा लिया था और माँ घंटों मुझसे लिपटकर रोती रहीं।उस दिन  समझ में आ रहा था कि माँ फोन पर बातें करती हुई आँखें क्यों पोंछा करती थीं।उस दिन उसके भीतर की दबी वेदना ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ी थी।

मैं जैसे अचानक ही बड़ा हो गया था। माँ का दर्द मुझे भीतर तक गीला कर गया जैसे भारी वर्षा के बाद ज़मीन की कई परतें गीली हो जातीं हैं वैसे ही मेरे हृदय का ज़र्रा – जर्रा लंबे अंतराल तक भीगा रहा।

एक दिन मैं फेंस के उस पार गया और गुलमोहर के तने से लिपटकर खूब रोया। फिर न जाने मुझे क्या सूझा मैंने उसके तने से कई टहनियाँ कुल्हाड़ी मारकर छाँट दी मानो अपने भीतर का क्रोध उस पर ही व्यक्त कर रहा था। बेकसूर गुलमोहर का वृक्ष कुरूप, क्षत -विक्षत दिखाई देने लगा।मैंने उसके तने पर भी कई चोटें की। अचानक उस पर खिला एक फूल मेरी हथेली  पर आ गिरा। फूल सूखा – सा था।ठीक बाबा और माँ के बीच के टूटे,सूखे रिश्तों की तरह । फूल भी अपने वृक्ष से अलहदा हो रहा था।

मैंने वृक्ष  से अपना सारा नाता तोड़ दिया।तोड़ दिया अपना सारा नाता अपने बाबा से जिसने मेरी स्नेहमयी,त्यागमयी प्रतीक्षारत माँ को केवल दर्द उपहार में दिए थे। अपना बाकी जीवन फिर कभी माँ को हँसते हुए नहीं देखा।उसके उदास चेहरे ने मेरे जीवन के कई अध्याय लिख डाले।

सोचता हूँ कि दुनियावाले सात जन्म साथ निभाने की कसमें  क्यों खाते हैं जब कि एक जन्म भी साथ निर्वाह  करना कठिन होता है!!

© सुश्री ऋता सिंह

13/12/1993

फोन नं 9822188517, ईमेल आई डी – ritanani[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares
image_print