श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीष साधना🌻

बुधवार 9 नवम्बर से मार्गशीष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा-

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

☆  संजय उवाच # 163 ☆ विद्या विनयेन शोभते ☆?

मेरे लिए प्रातःभ्रमण, निरीक्षण एवं अपने आप से संवाद करने एवं आकलन का सर्वश्रेष्ठ समय होता है। रोज़ाना की कुछ किलोमीटर की ये पदयात्रा अनुभव तो समृद्ध करती ही है, मुझे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य भी प्रदान करती है।

कुछ वर्ष पहले की घटना है। टहलते हुए हिंदी माध्यम के एक विद्यालय के सामने से निकला। बड़े शहरों में भारतीय भाषाओं के माध्यम से ज्ञानदान करने वाली अधिकांश पाठशालायें अस्तित्व टिकाये रखने का संघर्ष कर रही हैं। उच्च, मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग अँग्रेज़ी माध्यम को अलादीन का चिराग मान चुका है। उन्हें लगता है कि शिक्षा-दीक्षा, नौकरी-व्यवसाय, संभ्रांत-अभिजात्य जैसा हर स्वप्न अँग्रेज़ी माध्यम में ‘इनबिल्ट’ है। इस पलायन का प्रभाव स्वाभाविक रूप से ‘वर्नाकुलर’ पाठशालाओं की इमारतों और रख-रखाव पर भी पड़ा है।

यह पाठशाला भी इसका अपवाद नहीं है। स्थिति जीर्ण-शीर्ण है। कॉर्पोरेट कल्चर के मारे इंटरनेशनल स्कूलों (अलबत्ता वे कितने अंतरराष्ट्रीय हैं, यह अनुसंधान का विषय हो सकता है) की गेट जैसा कोई प्रावधान यहाँ नहीं है। मुख्य फाटक के दो पल्लों में से एक शायद वर्षों से अपनी जगह से हिलाया भी नहीं गया है। पाठशाला को खुला या बंद दर्शाने का काम दूसरा पल्ला ही कर रहा था।

आर्थिक स्थिति का यह चित्र विद्यार्थियों में भी दिख रहा था।  कॉन्वेंट स्कूलों में वैन, स्कूल बस और ऑटोरिक्शा से उतरनेवाने स्टुडेंटस्‌ की बनिस्बत यहाँ घर से पैदल आनेवाले विद्यार्थियों की भीड़ फुटपाथ पर थी। हाँ, माध्यम कोई भी हो, बच्चों उत्साह में कोई कमी नहीं थी।

देखता हूँ कि आपस में बातचीत करती दस-बारह वर्ष की दो बच्चियाँ स्कूल के फाटक पर पहुँचीं। प्रवेश करने के पूर्व दोनों ने स्कूल की माटी मस्तक से लगाई, जैसे मंदिर में प्रवेश से पहले भक्तगण करते हैं। फिर विद्यालय में प्रवेश किया।

इंटरनेशनल और अंतर्भूत का अंतर अब स्पष्ट था। स्टुडेंट नहीं होता विद्यार्थी। दोनों के शाब्दिक अर्थ की मीमांसा करें तो सारी शंका का समाधान स्वयंमेव हो जाएगा।  ज्ञान वही जो विनय उत्पन्न करे। विद्या विनयेन शोभते। विनय समर्पण से उत्पन्न होता है। समर्पण धरती को माथा नवाता है।

मन भर आया। इच्छा हुई कि दोनों बच्चियों के चरणों में माथा नवाकर कहूँ , “बेटा आज समझ में आया कि विद्यालय को ज्ञान मंदिर क्यों कहा जाता था। ..दोनों खूब पढ़ो, खूब आगे बढ़ो!’

नयी शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं और भारतीय जीवनमूल्यों को प्रधानता देने का लक्ष्य नयी आशा उत्पन्न करता है। यह आशा इस विश्वास को बल देती है कि ये बच्चियाँ और इस भाव को जपने वाले अन्य विद्यार्थी अपने जीवन में आनेवाले उतार-चढ़ावों का बेहतर सामना कर पाएँगे।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
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लतिका

विनयशील होना मतलब बुजदिली ऐसा पाठ आजकल पढ़ाया जाता है। ऐसे समय में यह दुर्लभ उदाहरण है। बहुत दिलासा देनेवाला आलेख।🙏🏻