डाॅ. मीना श्रीवास्तव

☆ आलेख ☆ श्रीराम जन्म का उत्सव ☆ डाॅ. मीना श्रीवास्तव

प्रिय पाठकगण, नमस्कार

आज श्री राम प्रभु के धरती पर अवतरण का शुभ दिन है। आज की तिथि में मध्यान्ह प्रहर का सुमंगल सुमुहूर्त साधते हुए आकाश में देव सभा अवतरित हुई है, जबकि तेजोनिधि सूर्य उनके रथ के आवेग को रोकते हुए, ‘मुझसे तेजस्वी भला और कौन हो सकता है?’ कहते हैं, इसी सोच में वह कई महीनों तक ठिठक गया! यह तो अति आश्चर्यजनक बात हुई| अगर हम जैसे सामान्य लोगों का मन रामजन्म के क्षण में ऐसे आनंद के सागर में विचरण कर रहा है, तो इसमें आश्चर्य क्या है कि, सिद्धहस्त साहित्यिक महाकवि कालिदास की भावनाएँ रामजन्म की कल्पना के साथ कोटि कोटि उड़ानें भरती हैं!

महाकवि कालिदास के महाकाव्य ‘रघुवंशम्’ के दसवें सर्ग में राम जन्म के प्रसंग का अति सुंदर वर्णन किया गया है।

देवादिकों और भूमाता ने यह प्रार्थना करके विष्णु स्तुति शुरू की कि, भगवान विष्णु धरती और स्वर्ग के देवताओं को बोझ बने उन्मादी रावण का अंत करने के लिए मानव रूप में पृथ्वी पर अवतार लें। भूतल पर चल रहे रावण के सभी अत्याचारों को भगवान विष्णु पहले से ही जानते थे| उन्होंने देवताओं से कहा, ‘हे देवों! जिस प्रकार चन्दन का वृक्ष साँप को आलिंगन में भरते हुए उसे निर्भय वृत्ति से धारण करता है, उसी प्रकार मैं इस रावण में ब्रह्मा के वरदान से उत्पन्न हुए उन्माद को सहन कर रहा हूँ। अब मैं स्वयं ही दशरथ के पुत्र के रूप में मनुष्य जन्म लूंगा और अपने अक्षय बाणों से इस रावण के मस्तक रूपी कमल समूह को युद्धभूमि की पूजा करने के लिए बाध्य कर दूंगा!’ यथासमय महान तपस्वी ऋष्यश्रृंग मुनि के मार्गदर्शन में दशरथ के हाथों पुत्र कामेष्टि यज्ञ सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। उस यज्ञ की ज्वाला से एक अत्यंत तेजस्वी दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। उस दिव्य पुरुष को उस सुवर्ण कुम्भ के पायस (चरु) को सम्हालना कठिन जा रहा था क्यों कि, उस चरु में स्वयंभू भगवान विष्णु पहले ही प्रवेश कर चुके थे| जैसे ही दिव्य यज्ञ पुरुष उस सुवर्ण कुम्भ के साथ अग्नि से प्रकट हुआ, वह सभी के लिए दृश्यमान हो गया। राजा दशरथ ने उसे बड़ी श्रद्धा से स्वीकार किया।

मित्रों, तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु ने शक्तिशाली और धर्मात्मा राजा दशरथ से जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की, इसलिए हमें इस बात पर विचार करना होगा कि इस ‘देव पिता’ दशरथ में कितने देव समान गुण थे। जिस प्रकार वासरमणि (सूर्य) आकाश और पृथ्वी को अपनी प्रभात बेला की धूप का दान प्रदान करता है, उसी प्रकार उस राजा दशरथ ने विष्णु के चरु (तेज) को अपनी दोनों रानियों (कौशल्या और कैकेयी) के बीच समान रूप से विभाजित किया। चूँकि कौशल्या दशरथ की जेष्ठ पटरानी थी और केकय देश की राजकुमारी कैकेयी उनकी प्रिय रानी थी, इसलिए वह इन दोनों रानियों के माध्यम से उनके हिस्से में से एक हिस्सा दान करके सुमित्रा का सम्मान करना चाहते थे। वे दोनों पतिव्रता स्त्रियाँ (कौसल्या और कैकेयी) पृथ्वी पति दशरथ के सारे मनोभावों को उनके बिना बताये ही जान लेती थीं| उन्होंने बड़े प्रेम से प्राप्त चरु में से आधा आधा भाग रानी सुमित्रा को दे दिया। जिस प्रकार भ्रामरी को हाथी के दोनों गण्डस्थल से प्रवाहित होने वाली मदजल की दोनों धाराएँ समान रूप से प्रिय होती है, उसी तरह अति सद्गुणी रानी सुमित्रा, अपनी दोनों सौतों (कौशल्या और कैकेयी) से समान रूप से प्रेम करती थी। जिस प्रकार सूर्य अपनी अमृता नामक नाड़ियों के माध्यम से जलयुक्त गर्भ (वाष्प के रूप में) धारण करता है, उसी प्रकार तीनों रानियाँ प्रजा की उन्नति हेतु विष्णु के तेज से प्रकाशित उस दीप्तिमान गर्भ को धारण किया। जिस प्रकार नवीन फल धारण की हुई फसलें पीत वर्ण की कांति से सुशोभित हो जाती हैं, उसी प्रकार वें तीनों रानियाँ जो एक ही समय गर्भवती थीं और जिनकी कांति गर्भावस्था के कारण थोड़ी फीकी लग रही थी, अब गर्भतेज के अत्युत्कृष्ट लक्षणों से युक्त होकर और अधिक सौन्दर्यशालिनी प्रतीत हो रहीं थीं|

तीनों गर्भवती रानियों ने एक अलौकिक स्वप्न देखा। शंख, चक्र, गदा, तलवार और धनुष आदि सभी आयुधों से सुसज्जित देवतुल्य पुरुषों द्वारा उन तीनों को सुरक्षा प्रदान की जा रही है। साक्षात पक्षीराज गरुड़ अपने तेजस्वी एवं मजबूत पंखों द्वारा अपने प्रकाशपुंज के साम्राज्य को दूर-दूर तक फैलाते हुए आकाश के बादलों को आकर्षित कर बड़ी तीव्र गति से उड़ान भरते हुए उन्हें आकाश में उड़ाकर ले जा रहा है। बड़े ही अभिमान से भगवान विष्णु द्वारा उपहार में दी गई कौस्तुभ माला को अपने वक्षस्थल पर धारण करने वाली देवी लक्ष्मी उन्हें कमलरूपी पंखे से हवा दे रही है। आकाशगंगा में अन्हिक कर पवित्र हुए सप्तर्षि, अर्थात सात ब्रह्मर्षि, अंगिरस, अत्रि, क्रतु, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि और वशिष्ठ परब्रम्ह के नाम का जाप करते हुए उन्हें वंदन कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें ज्ञात है कि, ये तीनों पूजनीय देव माता होने वाली हैं। जब उन रानियों ने दशरथ को उस अलौकिक स्वप्न के बारे में बताया, तो वह उसे सुनकर बहुत खुश हुआ और अपने आप को जगत्पिता के पिता के रूप में जानकर सर्वोत्तम और धन्य माना| जिस प्रकार चंद्रमा का प्रतिबिंब निर्मल जल में विभाजित हुआ दिखता है, वैसे ही एकरूप सर्वव्यापी महा विष्णु ने उन तीन रानियों के उदरों में विभाजित होकर निवास किया।

ऐसा माना जाता है कि, जब सूर्य का अस्त होता है तो वह अपना तेज वनस्पतियों में रखकर जाता है| इसीको आधार बनाते हुए महाकवि कालिदास कहते हैं कि, जैसे रात्रि के अंधियारे में वनस्पति उस तम को नष्ट करने वाला तेज प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ की पतिव्रता पटरानी कौशल्या को तमोगुण का विनाशक एक पुत्र प्राप्त हुआ| इसी कौशल्यासुत के ‘अभिराम’ देह अर्थात अत्यंत मनोहर रूप से प्रभावित होकर पिता ने इस बालक का नाम ‘राम’ रखा, जो सर्वप्रथम मंगलस्वरूप के नाम से सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध हुआ। राम शब्द का अर्थ है ‘कल्याणकारी’। ‘राम’ नाम प्राप्त किया हुआ यह बालक (अर्थात् रघुकुल का दीपक) अद्वितीय, अनुपम एवं तेजस्वी दिख रहा था। प्रसूति गृह में सुरक्षात्मक दीपक ऐसे निस्तेज लग रहे थे, मानों इस नवजात बालक के रूप तेज के समक्ष होने के कारण उन्होंने अपना तेज खो दिया हो। क्या मनोहर दृश्य है! अभी अभी कौशल्या ने बाल राम को जन्म दिया है| वह उसके समीप शांति से सो रहा है। उनके जन्म के बाद, माता कौशल्या (उदर रिक्त होने के कारण) कृशोदरी प्रतीत हो रही है। कौशल्या माता ऐसे शोभा पा रही थीं मानों शरद ऋतु में रेतीले तट ने कमल का उपहार प्राप्त किया हो| कैकेयी ने भरत नामक शीलसंपन्न पुत्र को जन्म दिया। जिस प्रकार लक्ष्मी विनय से सुशोभित होती हैं, उसी प्रकार भरत ने अपनी जन्मदात्री (कैकेयी) को विनय को आभूषण के रूप में अर्पित किया। यदि कोई व्यक्ति योग्य प्रकार से साधना करता है, तो वह इंद्रियों पर विजय (जितेंद्रियता) प्राप्त कर सकता है और दर्शन के संपूर्ण आशय को भी आत्मसात कर सकता है, उसी तरह सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न नामक जुड़वां बालकों को जन्म दिया।

इन गुणनिधान बच्चों के जन्म के बाद, सम्पूर्ण जगत सूखे की चिंताओं से मुक्त हुआ और हर स्थान स्वास्थ्य, समृद्धि आदि गुणों से समृद्ध हो गया। यह तो ऐसा हुआ मानों, स्वर्ग की सुखसम्पन्नता विष्णु के पगचिन्हों का अनुसरण करती हुई महाविष्णु के पीछे-पीछे पृथ्वी पर अवतरित हुई। परन्तु राम के जन्म के समय ही उधर लंका में दशानन रावण के मुकुट के मौक्तिकमणि धरती पर गिर पड़े। मानों इसके जरिये राक्षसों की ऐश्वर्य लक्ष्मी आँसू बहाने लगी। निस्संदेह, मुकुट के रत्नों का गिरना अमंगल था। जैसे ही यह निश्चित हो गया कि, रावण की मृत्यु राम के हाथों होगी, रावण की वैभवशाली ऐश्वर्य लक्ष्मी अश्रुपात करने लगी। अयोध्या में पुत्रप्राप्ति से धन्य हुए राजा दशरथ के चारों पुत्रों के जन्म के मुहूर्त पर स्वर्ग में मंगल वाद्य बजने का शुभारम्भ हुआ। वहां देवताओं ने नगारे बजाना प्रारम्भ किया। राजा दशरथ के भव्य महल पर स्वर्ग के कल्प वृक्ष के दिव्य सुमनों की बौछार हुई|  इस पुष्पवर्षा के साथ ही पुत्र-जन्म के लिए आवश्यक मंगलमय उपचारों का प्रारम्भ हुआ।

जातक अनुष्ठान से संस्कारित वे तीनों बालक धात्री का दूध पीते हुए, मानों उनसे किंचित पहले जन्मे उनके जेष्ठ भ्राता (राम) के साथ परमानंद से अभिभूत पिता की छत्रछाया में बड़े हो रहे थे| जिस प्रकार आहुति प्राप्त होते हुए घृत (घी) द्वारा अग्नि का तेज सहज ही वृद्धिंगत होता है, वैसे ही इन बालकों के सद्गुण और विनम्र स्वभाव उन्हें प्राप्त संस्कारों और शिक्षा से और भी विकसित हो गए थे। आश्चर्य की बात यह है कि, उन चारों भाइयों में सम समान प्रेम संबंध थे, फिर भी जैसे राम और लक्ष्मण की अनायास ही जोड़ी बन गई, वैसी ही भरत और शत्रुघ्न की भी जोड़ी बनी| अखिल पृथ्वी के स्वामी दशरथ के ये चार शिशु मानों चार प्रकारों से सुशोभित धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सजीव अवतारों के जैसे शोभायमान प्रतीत होने लगे।

मित्रों, इस प्रकार महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य ‘रघुवंशम्’ में श्रीराम जन्म के इस पुण्य पावन पर्व का बड़े रसीले तथा भक्ति भाव से वर्णन किया है। आइए, रामनवमी के इस परम पवित्र दिन पर हम प्रभु श्रीराम के चरणों में नतमस्तक होते हुए उनके महान गुणविशेषों को आत्मसात करने का प्रयास करें!

टिप्पणी –  प्रभू श्रीराम का स्तवन करने वाले दो गाने शेअर करती हूँ| (लिंक के न चलने पर यू ट्यूब पर शब्द डालें|)

‘ठुमक चलत रामचंद् बाजत पैंजनिया’

गायिका-मैथिली ठाकूर- रचना-गोस्वामी तुलसीदास

‘रामचंद्र मनमोहन नेत्र भरून पाहीन काय’

गायिका- माणिक वर्मा, गीत-ज. के. उपाध्ये, संगीत – व्ही. डी. अंभईकर

डॉक्टर मीना श्रीवास्तव

ठाणे

मोबाईल क्रमांक ९९२०१६७२११, ई-मेल – [email protected]

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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Pentaji G. Muttewar

Very nice post