हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 183 ☆ नहि पावस ऋतुराज यह… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “नहि पावस ऋतुराज यह…। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 183 ☆ नहि पावस ऋतुराज यह ☆

स्वतंत्र होने पर जो आदर सम्मान मिलता है, वो पिंजरे में रहने पर नहीं मिल सकता। वैचारिक समृद्धता से परिपूर्ण व्यक्ति सही योजना के साथ टीम वर्क पर कार्य करता है और अपनी उपयोगिता को सिद्ध करते हुए सुखद वातावरण निर्मित करता जाता है। संगठन के साथ जुड़ाव होने पर एकता की शक्ति स्वाभाविक रूप से झलकती है। दूसरी तरफ अपने आपको बंधनो में बांध कर कम्फर्ट जोन में रहने वाला कोई भी नयी योजना को शुरू करने में झिझकता है। यदि किसी तरह कुछ करने भी लगे तो उसका परिणाम आशानुरूप नहीं होता। कारण साफ है, जमीनी स्तर पर कैसे कार्य होता है ये पिंजरे में बैठकर समझा नहीं जा सकता है।

जैसी संगत वैसी रंगत के कारण, बंधनों को अपना सुरक्षा कवच मानने वाले लोगों को ही अपना सलाहकार बना कर बड़ी काल कोठरी बनाने लगते हैं, जिसमें कोई भूलवश भले आ जाए पर जल्दी ही छटपटाने लगता है और मौका मिलते ही भाग जाता है। आने- जाने की प्रक्रिया तो भावनाओं की परीक्षा है जिससे सभी को गुजरना पड़ता है। मजे की बात तो ये है कि उम्रदराज लोग भी सही और गलत में भेद करने की हिम्मत जुटा रहे हैं और खुलकर अपने विचारों पर बोल रहे हैं। सत्य की राह पर चलने का सुख जब मिले तभी चल पड़ें। कहते हैं, राह और राही दोनों सही होते हैं तो भगवान भी मदद करने को आतुर हो उठते हैं।

बसंत ऋतु का आगमन, पतझड़ का होना, नई कोपलों का बनना, बौर का फूलना, फागुनी रंग, चैत्र की आहट सब जरूरी है। योग्य नेतृत्व के छाया तले, निश्चित रूप से सभी को फलने- फूलने का मौका मिलेगा।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 289 ⇒ वाद विवाद… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वाद विवाद।)

?अभी अभी # 289 ⇒ वाद विवाद… ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

Debate

वाद विवाद को आप बहस भी कह सकते हैं। किसी भी विषय के पक्ष अथवा विपक्ष में जब दलील दी जाती है और तर्क द्वारा उसकी पुष्टि की जाती है तो उसे वाद विवाद प्रतियोगिता अथवा डिबेट कंपटीशन कहते हैं। स्कूल कॉलेज के दिनों में कई अच्छे वक्ता बाद में जीवन में सफल अधिवक्ता और नेता सिद्ध हुए हैं।

वैसे तो वाद की जड़ में ही विवाद भी मौजूद है। जहां पक्ष है, वहीं विपक्ष भी है। जब दो पक्षों के बीच विवाद बढ़ जाता है तो अदालत में वाद प्रस्तुत किया जाता है, एक वादी कहलाता है तो दूसरा प्रतिवादी। जीत तो हमेशा सत्य की ही होती है।।

वाद विवाद प्रतियोगिता में सत्य के दो पहलू होते हैं। विषय भले ही एक हो, लेकिन पलड़ा दोनों पक्षों का भारी होता है। विजेता भी दो ही घोषित होते हैं और सत्य को दोनों में आपस में बांट दिया जाता है।

डिबेट के विषय भी तब कैसे होते थे। संयुक्त परिवार के गुण दोष, लव मैरिज और अरेंज्ड मैरेज और और सह शिक्षा के दुष्प्रभाव। गर्ल्स कॉलेज में एक पुरुष छात्र वक्ता, प्रेम विवाह के खिलाफ इतना गर्मजोशी से तर्क और दलीलें प्रस्तुत करता है कि ना केवल वह विजेता घोषित होता है, छात्राओं की तालियों के बीच, कोई अनजान लड़की उसे दिल दे बैठती है और कालांतर में दोनों प्रेम विवाह के सूत्र में बंध जाते हैं।।

समय के साथ वाद विवाद ने परिचर्चा और परिसंवाद का रूप ले लिया। ज्वलंत समस्याओं पर विचार विमर्श और सार्थक संवाद को अधिक महत्व दिया जाने लगा। संसद में भी विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष पर हमले होते थे। बेचारे सत्य की स्थिति भी डांवाडोल जैसी ही हो जाती थी। सत्य समझदार है, लोकतंत्र में वह भी हमेशा बहुमत के साथ ही चलता नजर आया है।

जब किसी वाद को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है, तो सत्य बड़ा परेशान हो जाता है। कोई बुलंद इमारत जब रातों रात विवादित ढांचे में परिवर्तित हो जाती है, तो सत्य और भी सुंदर और शिव हो जाता है और सत्य की ही विजय होती है, और मंदिर भी वहीं बनाया जाता है।।

एक बार अगर सत्य की विजय हो गई तो फिर विवाद अपने पांव नहीं जमा पाता। संसद में भी सत्य का ही बहुमत होता है और विपक्ष विवादित हो जाता है। अब ऊंट पहाड़ के नीचे आ जाता है और सत्ता पक्ष विवादित विपक्ष पर हमला बोल देता है।

तर्क और बुद्धि के ऊपर की मंजिल को विवेक कहते हैं। अध्यात्म की भाषा में इसे शरणागति कहते हैं। राजनीति में भी जब विपक्ष की दुर्गति होती है, तो वह सब ओर से निराश हो सत्ता के चरणों में शरणागति हो जाता है।

इसे आजकल अवसरवाद नहीं, शरणागत का भाव कहते हैं। सभी पापों से, और ईडी के छापों से, अगर तुझे मुक्त होना है प्राणी, तो सारे वाद विवादों को छोड़

तू मेरी शरण में आ ;

बह रही उल्टी गंगा।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

 

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर-☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर-  ??

आज अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने उर्दू को अपनी राजभाषा घोषित किया था। पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) बांग्लाभाषी था। वहाँ छात्रों ने बांग्ला को द्वितीय राजभाषा का स्थान देने के लिए मोर्चा निकाला। बदले में उन्हें गोलियाँ मिली। इस घटना ने तूल पकड़ा। बाद में 1971 में भारत की सहायता से बांग्लादेश स्वतंत्र राष्ट्र बन गया।

1952 की इस घटना के परिप्रेक्ष्य में 1999 में यूनेस्को ने 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया।

आज का दिन हर भाषा के सम्मान , बहुभाषावाद एवं बहुसांस्कृतिक समन्वय के संकल्प के प्रति स्वयं को समर्पित करने का है।

मातृभाषा मनुष्य के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मातृभाषा की जड़ों में उस भूभाग की लोकसंस्कृति होती है। इस तरह भाषा के माध्यम से संस्कृति का जतन और प्रसार भी होता है। भारतेंदु जी के शब्दों में, ‘ निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल/ बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।’

हृदय के शूल को मिटाने के लिए हम मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा की मांग और समर्थन सदैव करते रहे। आनंद की बात है कि करोड़ों भारतीयों की इस मांग और प्राकृतिक अधिकार को पहली बार भारत सरकार ने शिक्षानीति में सम्मिलित किया। नयी  शिक्षानीति  आम भारतीयों और भाषाविदों-भाषाप्रेमियों की इच्छा का दस्तावेज़ीकरण है। हम सबको इस नीति के क्रियान्वयन से अपरिमित आशाएँ हैं। 

विश्वास है कि यह संकल्प दिवस, आनेवाले समय में सिद्धि दिवस के रूप में मनाया जाएगा। अपेक्षा है कि भारतीय भाषाओं के संवर्धन एवं प्रसार के लिए हम सब अखंड कार्य करते करें। सभी मित्रों को शुभकामनाएँ।

© संजय भारद्वाज

अध्यक्ष, हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे

सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 🕉️ मार्गशीर्ष साधना सम्पन्न हुई। अगली साधना की सूचना हम शीघ्र करेंगे। 🕉️ 💥

नुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 288 ⇒ भौंकने का अधिकार… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भौंकने का अधिकार।)

?अभी अभी # 288 ⇒ भौंकने का अधिकार… ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

∆ BARKING RIGHT ∆

दुनिया बनाने वाले ने सभी प्राणियों को कुछ जन्मसिद्ध अधिकार दिये हुए हैं, इनमें बोलना, काटना और भौंकना भी शामिल है। मनुष्य तो खैर, इन सभी में आय एम द सर्वश्रेष्ठ है ही, क्योंकि वह दिमाग की खाता है। केवल उसमें ही नर से नारायण बनने की संभावना निहित है और केवल यही गुण जहां उसके उत्थान का कारण बनता है वहीं यही घमंड उसके पतन के लिए भी उत्तरदायी होता है।

जुबां और दिमाग का धनी यह इंसान इतना चालाक है कि इसने सभी प्राणियों से कुछ न कुछ गुण/अवगुण अपने जीवन में उतार लिए हैं। अकारण रात भर जागना, कुत्ते की तरह भौंकना और अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के संसाधनों का सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही इसमें शामिल है।।

बिना कारण सृष्टि के किसी जीव का जन्म नहीं होता। एक फूल के खिलने में जितना हाथ एक तितली का है, उतना ही एक भंवरे का भी। एक मधु मक्खी किसके इशारे पर छत्ते में शहद का निर्माण करती है, कोई नहीं जानता। मुर्गी किससे पूछकर अंडे देती है, गाय भैंस क्यों दूध देती है। एक रेशम का कीड़े से यह बुद्धिमान मनुष्य रेशम तक निकाल लेता है। और शायद इसीलिए वह इस सृष्टि का मालिक भी बन बैठा है।

अब आप एक श्वान को ही ले लीजिए ! उल्लू की तरह वह रात भर जागने के लिए अभिशप्त है। वह बिना वेतन का एक चौकीदार है। चूंकि वह बोल नहीं सकता, अतः पहरेदारी करते वक्त उसे भौंकने का अधिकार मिला है। उसके हाथ में कोई डंडा अथवा बंदूक नहीं, इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए वह किसी को काट भी सकता है।।

आज का नर, जो नारायण भी बन सकता है, कभी वानर ही तो था। आज भी उसकी नकल करने की आदत नहीं गई। सांप की तरह डंसना और कुत्ते की तरह भौंकना भी उसमें शामिल है। हम अगर कुत्ते की भाषा समझते तो शायद उसके भावों को पकड़ पाते। वह हमसे ज़्यादा समझदार है। जैसा आप सिखाओ, सीख ही लेता है। जो इंसान खुद एक बंदर की तरह नाचता फिरता है, वह मदारी बन, पहले सड़कों पर बंदरों का नाच करता है और बाद में पढ़ लिखकर नच बलिए में शामिल हो जाता है।

बंदर से नाचने का और कुत्ते से भौंकने का अधिकार भी आज इंसान ने छीन लिया है। कुत्ता मालिक का हो या सड़क का, जिस तरह भौंकना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, आज राजनीति में भी भौंकने का अधिकार जितना विपक्ष के पास है उतना ही सत्ता पक्ष के पास भी।।

अंतर सिर्फ इतना है किसी के गले में सत्ता का पट्टा है तो कोई निर्विघ्न सड़क पर घूम रहा है। Have और have nots की लड़ाई हमने इन मूक प्राणियों से सीखी या इन्हें सिखाई यह कहना बड़ा मुश्किल है।

इंसान के साथ रह रहकर श्वान, इंसानों के तौर तरीके सीख गया। एक इशारे पर चुप रहना, दुम हिलाना सीख गया। काश इंसान भी इन मूक प्राणियों से कुछ सीख पाता। अपनी भाषा छोड़ इनकी भाषा में भौंकना न तो राजा को शोभा देता है और न ही प्रजा को। मीठी जुबां दी बोलने को, इसमें जहर कौन घोल गया। मैं देशभक्त, वह देशद्रोही, कानों में यह कौन बोल गया।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 287 ⇒ बड़े काम के आदमी… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बड़े काम के आदमी।)

?अभी अभी # 287 ⇒ बड़े काम के आदमी… ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वैसे तो कोई काम बड़ा छोटा नहीं होता, आदमी ही बड़ा छोटा होता है, फिर भी, काम के आदमी के लिए, काम की कोई कमी नहीं। होते हैं कुछ लोग, काम के न काज के, दुश्मन अनाज के।

यह दुनिया भी अजीब है। यहां किसी को काम की तलाश है, तो किसी को काम के आदमी की तलाश। एक कहावत भी है, जिसका काम, उसी को साजे। क्या बात है, मकान का काम क्यूं ठप पड़ा है, क्या बताएं, कोई ढंग का कारीगर ही नहीं मिलता। अच्छा मिलता है तो टिकता नहीं, और जो टिकता है, वह किसी काम का नहीं।।

वैसे तो दुनिया चलती रहती है, किसी का काम नहीं रुकता। फिर भी आदमी वही, जो वक्त पड़ने पर किसी के काम आए।

अपना काम तो सभी करते हैं, लेकिन होते हैं कुछ ऐसे लोग भी, जो बिना किसी स्वार्थ अथवा लालच के, किसी का अटका हुआ काम, आसानी से पूरा करवा देते हैं। उनके लिए अक्सर अंग्रेजी के एक शब्द का प्रयोग होता है, वे बड़े हेल्पिंग नेचर के हैं।

यह दुनिया इतनी भली भी नहीं। दुनिया ओ दुनिया, तेरा जवाब नहीं।

यहां कुछ काम जब आसानी से नहीं निकलते, तब टेढ़ी उंगली से घी निकालना पड़ता है, और तब काम आते हैं कुछ ऐसे लोग, जिन्हें बड़े काम का आदमी कहा जाता है।।

ऐसे लोगों की एक क्लास होती है, जो साम, दाम, दंड भेद, यानी by book or by crook, आपका काम निकलवाना जानते हैं, फिर भले ही काम, दफ्तर में आपके ट्रांसफर का हो, प्रमोशन का हो, अथवा

रुकी हुई पेंशन का। मकान का नक्शा पास नहीं हो रहा हो, लड़की की शादी नहीं हो रही हो, साले की कहीं नौकरी नहीं लग रही हो, ऐसे में जो व्यक्ति संकटमोचक बनकर प्रकट हो जाए, वही आदमी बड़े काम का आदमी कहलाता है।

सरकारी दफ्तरों में नौकरशाही चलती है। वहां भी एक फोर्थ क्लास होती है, बाकी सभी क्लास थर्ड क्लास होती है। अफसर, बाबू, और बड़े बाबू

जो काम नहीं करवा सकते, वह काम कभी कभी साहब का ड्राइवर अथवा चपरासी चुटकियों में करवा देता है, क्योंकि उसकी पहुंच साहब के गृह मंत्रालय तक होती है।।

एक चीज आपको बता दूं, बड़े काम का आदमी, कभी ओहदे से बड़ा नहीं होता। बड़े काम का आदमी वह होता है, जो उस ओहदे वाले से आपका काम निकलवा दे। कांटा कितना भी बड़ा हो, एक सुई ही काफी होती है, उसे निकालने के लिए।

सुई की तरह कहीं दबे हुए, छुपे हुए होते हैं समाज में ये बड़े काम के आदमी। बस जिसके हाथ लग जाए, समझिए उसकी लॉटरी लग गई। बड़े मिलनसार, व्यवहार कुशल, हमेशा मुस्कुराने वाले होते हैं ये बड़े काम के आदमी। साहित्य, धर्म, राजनीति, समाज के हर क्षेत्र में, यत्र, तत्र, सर्वत्र खुशबू की तरह फैले हुए हैं, ये बड़े काम के आदमी, तलाशिए जरूर मिलेंगे। हो सकता है, आप उन्हें जानते भी हों। पूरी दुनिया टिकी हुई है, ऐसे ही बड़े काम के आदमियों के कंधों पर। मानिए या ना मानिए।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 71 – देश-परदेश – आज के बच्चे कल के नेता ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 71 ☆ देश-परदेश – आज के बच्चे कल के नेता ☆ श्री राकेश कुमार ☆

वर्षों पूर्व हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने इस बात को लेकर अपने उदगार व्यक्त किए थे।

विगत दो तीन वर्षों से फरवरी माह में सड़कों पर बड़ी और खुली कारों जिसको आजकल एसयूवी के नाम से जाना जाता है,में स्कूल के अंतिम वर्ष के छात्र और छात्राएं खुले आम यातायात के नियमों की अवेहलेना करते हुए दृष्टिगोचर  होते हैं।

स्कूल से परीक्षा पूर्व विदाई कार्यक्रम को अब सड़कों पर कार की खिड़कियों से लटकते हुए,हाथों में मोबाइल से लाइव प्रसारण भी होता रहता हैं।

परिवार के सदस्य सब से बड़े दोषी है, जो बिना लाइसेंस प्राप्त बच्चों को कार की चाबियां देकर कहते है, जिंदगी के मज़े ले लो। वैसे इसको फैशन परेड भी कहा जा सकता हैं। हमारे परिवारों की बेटियां भी इन सब में बेबाकी से भाग लेती है,वरन तरुणों को जोखिम भरे कदम उठाने के लिए उकसाती भी हैं। बाज़ार में बिना छत की कार भी किराए से लेकर इस नग्नता का हिस्सा बनती हैं।

ये, ही बच्चे कल के नेता बनकर देश को आगे बढ़ाएंगे। हमारे नेता भी तो आजकल जनता के बीच में “रोड शो” करने के समय इसी प्रकार से कारों से लटकते हुए देखे जा सकते हैं। कुछ नेता ट्रैक्टर पर बड़ी संख्या में बैठ कर “सड़क सुरक्षा” को परिभाषित करते हैं। शायद हमारे बच्चे इन नेताओं के चरण चिन्हों पर चलकर आने वाले समय में आज के बच्चे देश की बागडोर संभाल सकने में सक्षम होंगे।

ये ही बिगड़े हुए बच्चे स्कूल से उत्तीर्ण होकर महाविद्यालय में छात्र यूनियन के नेता बन जायेंगे। राजनैतिक दल भी छात्र नेताओं को प्राथमिकता से अपने अपने दल में ग्रहण कर लेते हैं।

नियम और कानून की धज्जियां उड़ाने वाले व्यक्ति ही हमारे नेता बनने में सक्षम होते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 286 ⇒ चार चांद… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चार चांद।)

?अभी अभी # 286 ⇒ चार चांद… ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कवियों, शायरों और प्रेमियों को चांद से कुछ ज्यादा ही प्रेम होता है। सुंदरता की उपमा चांद से, और जब ठंड ज्यादा पड़े, तो सूरज रे, जलते रहना। वैसे प्रत्यक्ष को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी शायर कहने से नहीं चूकता ;

एक हो मेरे तुम इस जहां में

एक हो चंदा, जैसे गगन में

तुम ही तुम हो, मेरे जीवन में।

लेकिन अगले ही पल वह कह उठता है,

एक चांद आसमान में, एक मेरे पास है।

इतना ही नहीं, उसे एक रात में दो दो चांद नजर आने लगते हैं,

एक घूंघट में, एक बदली में।।

होता है, प्रेम में सब कुछ संभव है। मां की ममता तो और एक कदम आगे बढ़ जाती है, चंदा है तू, मेरा सूरज है तू। ओ मेरी आंखों का तारा है तू। सूरज को तो बस एक बार सुबह सुबह सूर्य नमस्कार कर लिया और छुट्टी लेकिन बेचारे चांद की तो रात भर खैर नहीं।

कौन कहता है, सूरज सी महबूबा हो मेरी, सबको चांद सी ही चाहिए। वैसे भी जो दिन भर आग उगलेगा, उसे कौन गले लगाएगा। सबको चांद सी ही महबूबा चाहिए। चांद सा मुखड़ा क्यूं शरमाया।

अजीब होते हैं ये कवि, रवि से ऊपर तक पहुंच जाते हैं, लेकिन तारीफ चांद की करते हैं।।

कहते हैं, किसी की तारीफ करने से उसमें चार चांद लग जाते हैं। ना कम ना ज्यादा। कृष्णचंद्र हों अथवा चन्द्रमौलिश्वर भगवान शिव, वहां भी शोभायमान तो एक ही अर्धचन्द्र है। चार चांद कौन लगाता है भाई।

अतिशयोक्ति तो है, फिर भी हमको कुबूल है। अतिशयोक्ति में तर्क का कोई स्थान नहीं। चार चांद ही क्यों, क्या तीन से काम नहीं चल सकता। अगर आपने अपनी प्रेयसी की तारीफ में गलती से पांच चांद लगा दिए तो क्या वह आपको छोड़कर चली जाएगी। तारीफ नहीं, बनिये की दूकान हो गई। अतिशयोक्ति का भी एक भाव होता है, न कम, न ज्यादा।।

अगर आपकी तारीफ में दो सूरज और दो चांद लगा दें, तो चलेगा। सूरज आपको खा थोड़े ही जाएगा। अच्छा चलिए, चारों सूरज चलेंगे। अलग ही चमकेंगे। कहां चार चांद और जहां चार सूरज। बस आफताब मियां से एक बार पूछना पड़ेगा।

आपके पास जो आएगा, वो जल जाएगा। मतलब एक भी सूरज नहीं चलेगा। अपने तो चंदामामा दूर के ही भले। चार मामा होंगे तो शायद मां भी खुश हो जाए। वैसे भी तीन का आंकड़ा शुभ नहीं माना जाता। बहुत सोच समझकर चार चांद लगाए जाते हैं किसी की तारीफ में।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

 

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ – शिवजयंती का प्रेरणादायक सुवर्णदिन ☆ डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डाॅ. मीना श्रीवास्तव

☆ आलेख  – शिवजयंती का प्रेरणादायक सुवर्णदिन ☆ डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

प्रिय स्वजनों,

आप सबको आज के परम पावन दिन आदरयुक्त प्रणाम! 

आज हम छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती मना रहे हैं। ३९४ साल पहले (१९ फरवरी, १६३०) जब शिवाजी महाराज का जन्म शिवनेरी किले में हुआ था, तब मुगलों और आदिल शाही ने न केवल महाराष्ट्र बल्कि, पूरे हिंदुस्तान को गुलाम बना लिया था। शिवराय के पराक्रम की कहानी को समझने के लिए, उनकी माता ने उन्हें किस प्रकार उनके जनम से ही रही प्रतिकूल परिस्थितियों में पाला, इस पर हमें विचार करना चाहिए। जिजाऊ द्वारा बाल शिवाजी को सुलाने के लिए गाई हुई लोरी इन त्रासदियों का सटीक वर्णन करती है, गोविंदाग्रज उर्फ राम गणेश गडकरी अपनी इसी रचना में कहते हैं-

गुणी बाळ असा जागसि कां रे वाया । नीज रे नीज शिवराया ॥ ध्रु ॥

अपरात्री प्रहर लोटला बाई । तरि डोळा लागत नाहीं ॥

हा चालतसे चाळा एकच असला । तिळ उसंत नाहीं जिवाला ॥

निजवायाचा हरला सर्व उपाय । जागाच तरी शिवराय ॥

चालेल जागता चटका, हा असाच घटका घटका

कुरवाळा किंवा हटका, कां कष्टविसी तुझी सांवळी काया ।

नीज रे नीज शिवराया ॥१॥

ही शांत निजे बारा मावळ थेट । शिवनेरी जुन्नर पेठ ॥

त्या निजल्या ना तशाच घाटाखालीं । कोंकणच्या चवदा ताली ॥

ये भिववाया बागुल तो बघ बाळा । किति बाई काळा काळा ॥

इकडे हे सिद्दि-जवान, तो तिकडे अफझुलखान

पलिकडे मुलुख मैदान, हे आले रे तुजला बाळ धराया ।

नीज रे नीज शिवराया ॥२॥

इस कर्तव्यकठोर माता ने बाल शिवाजी के चरित्र को सुचारु रूप से सही आकार दिया। उस समय शिवबा के महा पराक्रमी पिता शहाजी राजे भोसले कर्नाटक में थे। लेकिन उनकी अनुपस्थिति में भी यह वीरमाता शिवबा पर सर्वांगीण संस्कार कर रही थी। शिवबा न केवल रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथ बल्कि युद्ध कला भी सीखकर अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए सम्पूर्ण शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। अपनी मां जिजाबाई और गुरु दादोजी कोंडदेव के मार्गदर्शन में शिवबा सकलगुणमंडित बन गए, उनमें देशभक्ति की जाज्वल्य भावना इस तरह भर गई कि, मात्र 16 साल की उम्र में ही शिवबा ने तोरणा किला जीत लिया और स्वराज्य का तोरण बांध दिया!

उनकी संघटन शक्ति का उदाहरण भी लें, तो उनकी पारखी नजर हमें आश्चर्यचकित कर देती है| महाराज के साथ रह कर पवित्र हुए और पहले से ही पवित्र रहे १८ पगड जातिके और प्रत्येक धर्म के मावळे स्वराज्यबंधन अभिमान से धारण करते थे और उनके प्रत्येक स्वराज्य-अभियान में अत्यंत आत्मविश्वास के साथ, जिद्द लेकर, उत्साह से भरपूर, बड़े ही आनंदपूर्वक शामिल होते थे| उनका शौर्य, पराक्रम, बुद्धिमत्ता, रणकौशल आदि के बारे में मैं अल्पमति क्या लिखूं, केवल नतमस्तक होती हूँ| वे स्त्रियों का बहुत सन्मान करते थे| क्या वर्णन करें उसका! कल्याण के सूबेदार की सुन्दर बहू को देख, ‘अशीच आमुची आई असती सुंदर रूपवती, आम्हीही सुंदर झालो असतो वदले छत्रपती’.(उन्होंने कहा कि, अगर हमारी माता ऐसे ही सुन्दर होती, तो हम भी सुन्दर होते)| ये माता के संस्कार तथा शिवराय की  निर्लोभ और निरंकारी वृत्ति थी| उनका अव्वल शत्रु औरंगजेब भी उसके सरदारों को शिवाजी के गुण आत्मसात करने को कहता था| शिवराय ने मुगल बादशहा औरंगजेब और सब नए पुराने अस्त्र-शस्त्र के साथ रही उसकी महाकाय फौज का आक्रमण रोका, यहीं नहीं, उनका पारिपत्य भी किया। यह करते हुए अपनी मुठ्ठी भर फौज के साथ “गनिमी कावा” को अमल में लाते हुए इस “दक्खन के चूहे” ने औरंगजेब के नाक में दम कर दिया था| 

महाराज के जीवन में उनकी कसौटी परखने वाले कई क्षण आए|, जयसिंग राजे के साथ किये समझौते में हारे हुए कई किले, आगरे की कैद से चतुराई दिखाकर खुद की और बाल संभाजी की अविश्वसनीय रिहाई,  बाजीप्रभू देशपांडे, मुरारबाजी और तानाजी जैसे अपने कई साथियों की मृत्यू, स्वकीयोंके कपट, ऐसे कई संकटों से जूझकर महाराज बाहर निकले और फिर राजगड पर राज्याभिषेक हुआ शिवराय का (६ जून १६७४)| इस प्रसंग का अविस्मरणीय वर्णन समर्थ रामदास स्वामीजी के ‘आनंदवन भुवनी’ इस काव्य में अनुभव करना होगा:

‘स्वर्गीची लोटली जेथे, रामगंगा महानदी, तीर्थासी तुळणा नाही आनंदवनभुवनी

बुडाली सर्व ही पापे, हिंदुस्थान बळावले,अभक्तांचा क्षयो झाला आनंदवनभुवनी’

महाकवि भूषण शिवराय के महापराक्रमी रूप का वर्णन ऐसे करते हैं: 

इन्द्र जिमि जंभ पर, बाडब सुअंभ पर, रावन सदंभ पर, रघुकुल राज हैं।

पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर,ज्यौं सहस्रबाह पर राम-द्विजराज हैं॥

दावा द्रुम दंड पर, चीता मृगझुंड पर,’भूषन वितुंड पर, जैसे मृगराज हैं।

तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर,त्यौं मलिच्छ बंस पर, सेर शिवराज हैं॥

(भूषण कवि कहते हैं कि, इंद्र ने जिस प्रकार जंभासुर नामक दैत्य पर आक्रमण करके उसे मारा था, जिस प्रकार बाडवाग्नि समुद्रजल को जलाकर सोखती है, दुराचारी एवं कपटी रावण पर जिस प्रकार रघुकुल तिलक श्रीराम ने आक्रमण किया था, जैसे बादलों पर वायु का वेग टूट पडता है, जिस प्रकार शिवजी ने रति के पति कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया था, जिस प्रकार अत्याचारी सहस्रबाहु (कार्त्तवीर्य) राजा को परशुराम ने आक्रमण कर मार गिराया था, जंगली वृक्षों पर दावाग्नि का जैसा प्रकोप दिखता है, जिस प्रकार वनराज सिंह का हिरणों के झुंड पर आतंक छाया रहता है, या हाथियों पर मृगराज सिंह का दबदबा रहता है, जिस प्रकार सूर्य की किरणें तम नष्ट कर देती हैं और खली कंस पर जिस तरह आक्रमण कर युवा श्रीकृष्ण ने उसका विनाश किया था, उसी प्रकार सिंह के समान शौर्य, साहस  एवं पराक्रम दर्शाने वाले छत्रपति शिवाजी का मुग़लों के वंश पर आतंक छाया रहता है।) 

संभाजी महाराज को भेजे हुए पत्र में समर्थ रामदासस्वामी उन्हें उनके महान पिता का स्मरण करवाते हुए ऐसा उपदेश करते हैं:

शिवरायांचे आठवावे रूप। शिवरायांचा आठवावा प्रताप ।

शिवरायांचा आठवावा साक्षेप ।भूमंडळी ||

शिवरायांचे कैसें बोलणें ।शिवरायांचे कैसें चालणें ।

शिवरायांची सलगी देणे ।कैसी असे ||

निश्चयाचा महामेरू । बहुत जनांसी आधारू ।

अखंड स्थितीचा निर्धारु । श्रीमंत योगी ||

मुगलशाही और आदिलशाही के वर्चस्व को नकारते हुए “स्वराज्य का तोरण” बांधने वाले हमारे सच्चे हृदयसम्राट गो-ब्राम्हण प्रतिपालक शिवाजी महाराज! ऐसे महान राष्ट्रपुरुष के गुणों का जितना ही बखान करें, सो कम ही है! महाराष्ट्र यानि छत्रपती शिवाजी महाराज, परन्तु छत्रपती शिवाजी महाराज यानि महाराष्ट्र, ऐसा ओछा विचार मन में लाना यानि, प्रत्यक्ष राष्ट्रभूषण छत्रपती शिवाजी महाराज का ही अपमान होगा| 

इसीलिए तो शिवराय का केवल नाम याद आते ही रोमांच का अनुभव होता है| यहीं सकल गुणनिधान छत्रपती शिवाजी महाराज हमारे सर्वकालीन आदर्श हैं!  मैं उनके  चरणों पर नतमस्तक हो कर आज के पवित्र शिवजयंती के अवसर पर उन्हें यह शब्दकुसुमांजली अर्पण करती हूँ! 

जय शिवराय!!! 🙏🙏🙏

डॉ. मीना श्रीवास्तव                                         

फोन नंबर – ९९२०१६७२११

© डॉ. मीना श्रीवास्तव

दिनांक-१९ फरवरी २०२४

ठाणे 

मोबाईल क्रमांक ९९२०१६७२११, ई-मेल – [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 228 – मानस प्रश्नोत्तरी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 228 ☆ मानस प्रश्नोत्तरी ?

एक व्यक्ति को नरश्रेष्ठ कहलाने  होने की इच्छा हुई। इच्छा होना और भाव जगने में बड़ा अंतर है। इच्छा का तो दिनचर्या में कई बार जन्म होता है, कई बार मरण होता है। भाव की बात अलग है। इच्छा स्थितियों से प्रभावित हो सकती है जबकि काल, पात्र, परिस्थिति, भाव के आगे निर्बल होते हैं। 

नानाविध विचार कर व्यक्ति मार्गदर्शन लेने एक साधु के पास पहुँचा। व्यक्ति और साधु में कुछ यों प्रश्नोत्तर हुए-

श्रेष्ठ मनुष्य बनने के लिए क्या करना चाहिए?

– पहले मनुष्य बनने का प्रयास करना चाहिए।

मनुष्य बनने के लिए क्या करना चाहिए?

– परपीड़ा को समानुभूति से ग्रहण करना चाहिए।

परपीड़ा को समानुभूति से ग्रहण करने के लिए क्या करना चाहिए?

– परकाया प्रवेश आना चाहिए।

परकाया प्रवेश के लिए क्या करना चाहिए?

– अद्वैत भाव जगाना चाहिए।

अद्वैत भाव जगाने के लिए क्या करना चाहिए?

– जो खुद के लिए चाहते हो, वही दूसरों को देना आना चाहिए क्योंकि तुम और वह अलग नहीं हो।

‘मैं’ और ‘वह’ की अवधारणा से मुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए?

– सत्संग करना चाहिए। सत्संग ‘मैं’ की वासना को ‘वह’ की उपासना में बदलने का चमत्कार करता है।

सत्संग के लिए क्या करना चाहिए?

-अपने आप से संवाद करना चाहिए। हरेक का भीतर ऐसा दर्पण है जिसमें स्थूल और सूक्ष्म दोनों दिखते हैं। भीतर के सच्चिदानंद स्वरूप से ईमानदार संवाद पारस का स्पर्श है जो लौह को स्वर्ण में बदल सकता है।

लौह के स्वर्ण में बदलने की यह भावात्मक प्रक्रिया विभिन्न चरणों में होती है। सच्चा सत्संगी  स्वयं से संवाद करना आरम्भ करता है। जिस तरह स्वयं से संवाद करता है, अगले चरणों में उसी भाँति हरेक से संवाद करने लगता है। अब हरेक में वह है, अब वही हरेक है। स्व का यह विस्तार मनुष्य को अमृतपान कराता है। सारा विषाद, मत्सर, ईर्ष्या, लोभ, वासना, क्रोध, भय मरने लगता है, मनुष्य आत्मतत्व के प्रति रीझने लगता है। आत्म पर जितना मरता है, उतना अमर होता है मनुष्य।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 🕉️ मार्गशीर्ष साधना सम्पन्न हुई। अगली साधना की सूचना हम शीघ्र करेंगे। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 285 ⇒ सिटी रिपोर्टर… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सिटी रिपोर्टर।)

?अभी अभी # 285 ⇒ सिटी रिपोर्टर… ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह आंखों देखी और कानों सुनी को ही सच मानता है। आज यह कितना सच है, यह हम नहीं जानते, लेकिन हम तब की बात कर रहे हैं, जब लोग अपने आसपास के हालचाल और खबरों के लिए या तो रेडियो पर समाचार सुनते थे, अथवा रोजाना अखबार का सहारा लेते थे। जब आकाशवाणी पर भी भरोसा नहीं होता था, तो बीबीसी सुनते थे। अच्छे फिल्मी संगीत के श्रोता विविध भारती छोड़, रेडियो सीलोन की ओर रुख करते थे। पसंद अपनी अपनी, खयाल अपना अपना।

देश विदेश की खबरें तो अखबारों को न्यूज एजेंसियों के जरिये मिल जाती थी, लेकिन शहर की खबरों के लिए वे नगर संवाददाता अथवा नगर प्रतिनिधि नियुक्त करते थे। बोलचाल की भाषा में तब उन्हें सिटी रिपोर्टर कहा जाता था। हर अखबार का एक प्रेस फोटोग्राफर भी होता था।।

तब सब कुछ इतना ग्लोबल और डिजिटल नहीं था जितना आज है। आज तो जिसके हाथ में कैमरे वाला मोबाइल है, वही फोटो खींच खींचकर, वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहा है। जो खबरों और घटनाओं का सस्पेंस और इंतजार कभी रहता था, अब वह सब कुछ खत्म सा हो गया है।

सोचिए, शहर की अथवा प्रदेश की किसी घटना के लिए सुबह तक का इंतजार, और जब तक कोई खबर अखबार में छप नहीं जाती, अथवा रेडियो पर प्रसारित नहीं हो जाती, तब तक उसकी सत्यता पर भरोसा नहीं होता था। सत्य अगर सुंदर होता है, तो कभी कभी सच कड़वा भी होता है। अखबार तब सच का आइना होता था, और पत्रकारिता धर्म।।

तब इस शहर में कितने अखबार थे। ले देकर दैनिक इंदौर समाचार, नव भारत, पुराना जागरण और नईदुनिया। बहुत बाद में अग्नि बाण टाइप दो तीन अखबार शाम को भी छपने लगे। गर्मागर्म खबरों के शौकीन चाय के ठेलों पर, पान की दुकान और केश कर्तनालय पर बेसब्री से उनका इंतजार करते पाए जाते थे।

अखबारों के शौकीन तो आज भी बहुत हैं। कहीं कहीं तो चाय और अखबार के बाद ही नित्य कर्म का नंबर आता था। सबसे पहले घर में अखबार पिताजी के हाथ में जाता था, बाद में वह पन्नों में बंट जाता था। कोई एक पन्ना लेकर चाय पी रहा है तो दूसरा उसे पढ़ते पढ़ते दातून कर रहा है। पहले हमारे घर नव भारत आता था लेकिन कालांतर में नई दुनिया ने अंगद के पांव की तरह आसन जमा लिया।।

तब नई दुनिया की पहचान राजेंद्र माथुर, राहुल बारपुते और लाभचंद छजलानी से होती थी। बाद में बारपुते जी का स्थान अभय छजलानी जी ने ले लिया।

नईदुनिया तब सिटी रिपोर्टर श्री गोपीकृष्ण गुप्ता थे। नगर का कोई भी थाना हो, कोई भी सरकारी विभाग हो, स्कूल हो, कॉलेज हो, अथवा विश्व विद्यालय, सब जगह आपको गुप्ता जी मौजूद मिलेंगे। किंग मेकर नई दुनिया यूं ही नहीं बना।

एक टीम थी नई दुनिया की, जिसमें प्रेस फोटोग्राफर शरद पंडित भी शामिल थे।

गोपीकृष्ण गुप्ता का स्थान बाद में श्री रामचंद्र नीमा, मामा जी ने ले लिया। सहज, सरल, सौम्य, मिलनसार व्यक्तित्व। एक और नईदुनिया से जुड़े पत्रकार थे श्री जवाहरलाल राठौड़, मध्यप्रदेश की रोडवेज बसों पर उनके धारावाहिक लेख “लाल डब्बों का सफर” ने पूरी कांग्रेस सरकार को हिलाकर रख दिया था।

नर्मदा आंदोलन भी अभ्यास मंडल और नईदुनिया का मिला जुला प्रयास ही तो था।।

हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में नईदुनिया गुरुकुल से कोई चेला गुड़ बनकर नहीं निकला, सब शक्कर ही बन गए। रमेश बख्शी, प्रभाष जोशी जैसे कई वरिष्ठ पत्रकार कभी एक समय नईदुनिया से जुड़े हुए थे। हिंदी को समृद्ध बनाने और हिंदी पत्रकारिता को बुलंदियों तक पहुंचाने में नईदुनिया के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

कहीं पीत पत्रकारिता तो कहीं निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के दौर से निकलकर आज पत्रकारिता जिस मोड़ पर खड़ी है, उसके आगे कई चुनौतियां हैं। आपातकाल में अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश के विरोध स्वरूप संपादकीय खाली छोड़ना केवल राजेंद्र माथुर जैसा निडर और समर्पित संपादक ही कर सकता था। खतरों से खेलने वाले सिटी रिपोर्टर और पत्रकार शायद आज भी कहीं मौजूद अवश्य होंगे। बस नजर नहीं आ रहे।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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