हिन्दी साहित्य – परिचर्चा ☆ “लघुकथा वामन के पांव जैसी !” – श्री कमलेश भारतीय ☆ साक्षात्कारकर्ता – श्री नेतराम भारती ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित। कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4। यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार। हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष। दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ परिचर्चा ☆ “लघुकथा वामन के पांव जैसी !” – श्री कमलेश भारतीय ☆ साक्षात्कारकर्ता – श्री नेतराम भारती  

(श्री नेतराम भारती जी की “लघुकथा – चिंतन और चुनौतियाँ”  साक्षात्कार शृंखला की 26वीं कड़ी में प्रस्तुत है आधुनिक हिन्दी लघुकथा साहित्य के शुरुआती दौर से अविश्रांत पथिक सदृश, लघुकथा साहित्य को समृद्ध करते चले आ रहे वरिष्ठ लघुकथाकार श्री कमलेश भारतीय जी से परिचर्चा) 

नेतराम भारती :- सर! लघुकथा आपकी नजर में क्या है लघु कथा को लेकर बहुत सारी बातें जितने स्कूल उतने पाठ्यक्रम वाली स्थिति है यदि नव लघु कथाकार के लिए सरल शब्दों में आपसे कहा जाए तो आप इसे कैसे परिभाषित करेंगे ?

कमलेश भारतीय :- मेरी लघुकथा के बारे में इतनी सी राय है कि यह बिजली की कौंध‌ की तरह एकाएक चमकती है और जानबूझकर विस्तार नहीं दिया जाना चाहिए। यहां तक पाठ्यक्रम जैसी बात है तो मेरा या आठवें दशक तक के किसी भी लघु कथाकार का कोई पाठ्यक्रम नहीं था। हमें एकलव्य की तरह खुद ही अपनेआप से जूझना पड़ा और अब अगर मैं दिये गये या बनाये गये पाठ्यक्रम से लिखना चाहूं तो बुरी तरह खराब लघुकथा लिखूं। नहीं, मैं वही एकलव्य ठीक हूँ। अपना रास्ता खुद खोजता रहूं।

श्री नेतराम भारती

नेतराम भारती :- लघुकथा विधा में आपकी विशेष रुचि कब और कैसे उत्पन्न हुई?

कमलेश भारतीय :- लघुकथा में रूचि आठवें दशक की शुरुआत में सन् 1970 में ही हो गयी थी जब ‘प्रयास’ अनियतकालीन पत्रिका का प्रकाशन-संपादन शुरू किया। इसी के अंकों में मेरी पहली पहली लघुकथायें-किसान, सरकार का दिन और सौदा आदि आईं। प्रयास का दूसरा ही अंक लघुकथा विशेषांक था, जो संभवत : सबसे पहला लघुकथा विशेषांक या बहुत पहले विशेषांकों में एक है, जिसकी चर्चा सारिका की नयी पत्रिकाओं में भी हुई और यह विशेषांक चर्चा में आ गया। बाद में मैंने दस वर्ष सुपर ब्लेज़ (लखनऊ) मासिक पत्रिका का संपादन किया और फिर दैनिक ट्रिब्यून में उप संपादक रहते समय सात वर्ष कथा कहानी पन्ने का संपादन किया। इसी प्रकार कथा समय का संपादन तीन वर्ष तक किया। और मेरी रूचि निरंतर लघुकथा में बढ़ती ही गयी।

नेतराम भारती :- लघुकथा, कहानी और उपन्यास के बीच क्या अंतर है, आपके दृष्टिकोण से ?

कमलेश भारतीय :- वैसे ये अंतर वाली बातें बहुत पीछे छूट चुकी हैं। उपन्यास बृहद जीवन कथा तो कहानी एक घटना, भाव का कथन और लघुकथा वामन के पांव जैसी ! ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगें, घाव करे गंभीर।

नेतराम भारती :- एक लघुकथा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्त्व आप किसे मानते हैं ?

कमलेश भारतीय :- सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात कि आप कहना क्या चाहते हैं, उसका ट्रीटमेंट कैसा किया ? कहने-सुनने में अच्छा पर ट्रीटमेंट में फेल तो क्या करेगी लघुकथा ? संदेश क्या है ? छोटे पैकेट में बड़ा धमाका चाहिए लघुकथा में।

नेतराम भारती :- आजकल देखने में आ रहा है कि लघुकथा की शब्द सीमा को लेकर पूर्व की भांति सीमांकन नहीं है बल्कि एक लचीलापन देखने में आ रहा है। अब आकार की अपेक्षा कथ्य की संप्रेषणीयता पर अधिक बल है। कह सकते हैं कि जिस प्रकार एक नाटक में उसका रंगमंच निहित होता है उसी प्रकार एक लघुकथा में भी उसके कथ्य, उसके शिल्प में उसकी शब्द सीमा निहित रहती है। मैं छोटी बनाम लंबी लघुकथाओं की बात कर रहा हूंँ। आप इसे किस रूप में देखते हैं ?

कमलेश भारतीय :- लघुकथा का आकार जितना लघु हो सके, होना चाहिए, , यही तो इसकी लोकप्रियता का आधार है। संवाद शैली में रंगमंच का आभास होता है और ऐसी लघुकथाओं का पाठ बहुत मज़ेदार और लोकप्रिय रहता है। छोटी बनाम लम्बी कोई लघुकथा का विभाजन सही नहीं। लघुकथा बस, लघुकथा है और होनी चाहिए।

नेतराम भारती :- क्या लघुकथा साहित्य में वह बात है कि वह एक जन आंदोलन बन जाए अथवा क्या वह समाज को बदल सकने में सक्षम है?

कमलेश भारतीय :- कोई विधा जनांदोलन नहीं बन सकती। निर्मल वर्मा का कहना सही है कि साहित्य क्रांति नहीं कर सकता बल्कि विचार बदल सकता है। वही काम साहित्य की हर विधा करती है। यह भ्रम है। साहित्य मानसिकता बदलता है, राजपाट नहीं बदलता।

नेतराम भारती :- सर ! गुटबाजी और खेमेबाजी की बातें कोई दबे स्वर में तो कोई मुखर होकर आजकल कर रहा है। मैं आपसे सीधे-सीधे पूछना चाहता हूं क्या वास्तव में आज लघुकथा में खेमे तन गए हैं ?

कमलेश भारतीय :- लघुकथा भी राजनीति की तरह गुटबाजी की बुरी तरह शिकार है, यह कहने में संकोच नहीं लेकिन मेरा कोई गुट नहीं, न मैं किसी के गुट हूँ। मैं लघुकथा के साथ हूँ, यही मेरा गुट है।

नेतराम भारती :- वर्तमान लघुकथा में आप क्या बदलाव महसूस करते हैं ?

कमलेश भारतीय :- बदलाव तो संसार का, प्रकृति का नियम है और लघुकथा इससे अछूती नहीं। लघुकथा में नित नये विषय आ रहे हैं। अब तो थर्ड जेंडर पर भी लघुकथा संग्रह आ रहे हैं तो पुलिस पर भी। अब जो जैसे बदलाव कर सकते हैं, वे कर रहे हैं। ताज़गी बनी रहती है, नयापन बना रहता है।

नेतराम भारती :- आपको अपनी लघुकथाओं के लिए प्रेरणा कहाँ से मिलती है ?

कमलेश भारतीय :- शायद सबको साहित्य रचने की प्रेरणा आसपास से ही मिलती है। मैं भी निरंतर आसपास से लघुकथाओं की भावभूमि पाता हूँ। कोई बात चुभ जाये या फिर किसी का व्यवहार अव्यावहारिक लगे तो लघुकथा लिखी ही जाती है। प्रेरणा समाज है।

नेतराम भारती :- सर ! एक प्रश्न और सिद्ध लघुकथाकारों को पढ़ना नए लघु कथाकारों के लिए कितना जरूरी है जरूरी है भी या नहीं क्योंकि कुछ विद्वान् कहते हैं कि यदि आप पुराने लेखकों को पढ़ते हैं तो आप उनके लेखन शैली से प्रभावित हो सकते हैं और आपके लेखन में उनकी शैली के प्रतिबिंब उभर सकता है जो आपकी मौलिकता को प्रभावित कर सकती है इस पर आपका क्या दृष्टिकोण है ?

कमलेश भारतीय :- मेरी राय में पढ़ना चाहिए, मैंने पढ़ा है, पढ़ता रहता हूँ। बहुत प्रेरणा मिलती है। मंटो, जोगिंदरपाल, विष्णु प्रभाकर, कुछ विदेशी रचनाकार जैसे चेखव सबको पढ़ना अच्छा लगता है, सीखने को मिलता है, कहने का सलीका आता है। प्रभावित होकर न लिखिये, सीखिये। बस। नकल तो सब पकड़ लेंगे।

नेतराम भारती :- क्या कोई विशेष शैली है जिसे आप अपनी लघुकथाओं में पसंद करते हैं ?

कमलेश भारतीय :- संवाद शैली बहुत प्रिय है और मेरी अनेक लघुकथायें संवाद शैली में हैं।

नेतराम भारती :- आपके अनुसार, एक अच्छी लघुकथा की विशेषताएं क्या होती हैं?

कमलेश भारतीय :- अच्छी लघुकथा वह जो अपनी छाप, अपनी बात, अपना संदेश पाठक को देने में सफल रहे।

नेतराम भारती :- लघुकथा लिखने की प्रक्रिया के दौरान आप किन चुनौतियों का सामना करते हैं ?

कमलेश भारतीय :- चुनौती यह कि जो कहना चाहता हूँ, वह कहा गया या नहीं ? यह कशमकश लगातार बदलाव करवाती है और जब तक संतुष्टि नहीं होती तब तक संशोधन और चुनौती जारी रहती है।

नेतराम भारती :- आपकी स्वयं की पसंदीदा लघुकथाओं में से कुछ कौन- सी हैं और क्यों ?

कमलेश भारतीय :- यह प्रश्न‌ बहुत सही नहीं। लेखक को सभी रचनायें अच्छी लगती हैं जैसे मां को अपने बच्चे। फिर भी मैं सात ताले और चाबी, किसान, और मैं नाम लिख देता हूं, चौराहे का दीया, पुष्प की पीड़ा, मेरे अपने, आज का रांझा, खोया हुआ कुछ, पूछताछ शाॅर्टकट, जन्मदिन, मैं नहीं जानता, ऐसे थे तुम ऐसी अनेक लघुकथायें हैं, जो बहुत बार आई हैं और प्रिय जैसी हो गयीं हैं। और भी हैं लेकिन एकदम से ये ध्यान में आ रही हैं।

नेतराम भारती :- भविष्य में आप किस प्रकार की लघुकथाएं लिखने की योजना बना रहे हैं ?

कमलेश भारतीय :- वही संवाद शैली और समाज व राजनीति पर लगातार चोट करती़ं लघुकथायें।

नेतराम भारती :- आपके पसंदीदा लघुकथाकार कौन-कौन हैं और क्यों ?

कमलेश भारतीय :- रमेश बतरा, मंटो, जोगिंदरपाल, चेखव, मोपांसा, विष्णु प्रभाकर, शंकर पुणतांबेकर आदि जिनकी रचना जहां मिले पढ़ जाता हूँ।

नेतराम भारती :- आपके अनुसार लघुकथा का क्या भविष्य है ?

कमलेश भारतीय :- भविष्य उज्ज्वल है। सारी बाधायें पार कर चुकी लघुकथा। संशय के बादल छंट चुके हैं।

नेतराम भारती :- अगर आपसे पूछा जाए कि उभरते हुए अथवा लघुकथा में उतरने की सोचने वाले लेखक को कुछ टिप्स या सुझाव दीजिए, तो एक नव-लघुकथाकार को आप क्या या क्या-क्या सुझाव देना चाहेंगे ?

कमलेश भारतीय :- वही, ज्यादा से ज्यादा पढ़िये और कम से कम, बहुत महत्त्वपूर्ण लिखिये। कोई सुझाव नहीं, सब महारथी ही आ रहे हैं। दूसरों से हटकर लिखिये, आगे बढ़िये, बढ़ते रहिये। शुभकामनाएं।

नेतराम भारती :- सर ! आज बहुतायत में लघुकथा सर्जन हो रहा है। बावजूद इसके, नए लघुकथाकार मित्र इसकी यात्रा, इसके उद्भव, इसके पड़ावों से अनभिज्ञ ही हैं। आपने प्रारंभ से अब तक लघुकथा की इस यात्रा को न केवल करीब से देखा ही बल्कि उसपर काफ़ी कुछ कहा और लिखा भी है। कैसे आँकते हैं आप इस यात्रा को ?

कमलेश भारतीय :- आठवें दशक से अब तक पचास वर्ष से ऊपर की लघुकथा की यात्रा का गवाह हूं। बहुत, रोमांच भरी रही यह यात्रा। पहले इसके नामकरण को लेकर खूब बवाल मचा। कोई अणु कथा, मिन्नी कथा तो कोई व्यंग्य को ही इसका आधार बनाने पर तुले रहे लेकिन इन सब झंझावातों से बच निकल करकर यह आखिरकार लघुकथा के रूप में अपनी पहचान बना पाई। बहुत से बड़े रचनकारों‌ ने इसे फिलर, स्वाद की प्लेट या फिर रविवारीय लेखन तक कह कर‌ नकारा लेकिन सब बाधाओं और बोल कुबोल‌ को सहती लघुकथा इस ऊंचे पायदान पर पहुंची है।

नेतराम भारती :- सर ! लघुकथा आज तेजी से शिखरोन्मुख हो रही है। उसकी गति, उसके रूप, उसके संस्कार और उसके शिल्प से क्या आप संतुष्ट हैं ?

कमलेश भारतीय :- संतुष्ट होना नहीं चाहिए, संतोष जरूर है। शिखरोन्मुख अभी नहीं। अभी आप देखिये, कुछ बड़े समाचारपत्र इसे अब भी प्रकाशित नही कर रहे। उनके वार्षिक विशेषांक भी इसे अछूत ही मानते हैं। अभी लघुकथा को ज़ोर‌ का झटका धीरे से लगाना बाकी है।

साक्षात्कारकर्ता – श्री नेतराम भारती  

साभार – श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – परिचर्चा ☆ “आंदोलनों और विमर्शों से कुछ लोग चर्चित जरूर हुए” – श्रीमति नासिरा शर्मा ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित। कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4। यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार। हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष। दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ परिचर्चा ☆ “आंदोलनों और विमर्शों से कुछ लोग चर्चित जरूर हुए” – श्रीमति नासिरा शर्मा ☆ श्री कमलेश भारतीय  

-कमलेश भारतीय

आंदोलनों और विमर्शों से कुछ लोग चर्चित जरूर हुए

हरियाणा में साहित्य की बात बहुत ध्यान से सुनते हैं : नासिरा शर्मा

प्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा का कहना है कि चाहे कहानी आंदोलन रहे या फिर स्त्री या दलित जैसे विमर्श इनसे हिंदी साहित्य को तो फायदा नहीं हुआ लेकिन कुछ लोग इनके सहारे चर्चित जरूर हो गये। नासिरा शर्मा ने उपन्यास, कथा, रिपोर्ताज, बाल लेखन, संस्मरण और अनुवाद अनेक क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। हाल ही में राजकमल प्रकाशन से इनका उपन्यास ‘अल्फा बीटा गामा’ आया है और चर्चित हो रहा है।

मूल रूप से नासिरा शर्मा जिला रायबरेली के मुस्तफ़ाबाद से हैं और उन्हें गर्व है कि ऊंचाहार रेल का नाम उनके गांव के कारण ही रखा गया। इनकी स्नातक की शिक्षा इलाहबाद में हुई। फिर शादी हो जाने पर वे अपने पति प्रो रामचंद्र शर्मा के साथ इंग्लैड चली गयीं और तीन वर्ष तक एडनबरा में बिताने के बाद वापिस आने पर जेएनयू में पाच वर्ष की पर्शियन में एमए की। इसके बाद स्वतंत्र लेखन शुरू किया और पत्रकारिता भी।

– साहित्य में रूचि कैसे?

– पूरा परिवार साहित्यिक रूचि रखता है और इसी के चलते मेरी रूचि भी साहित्य में होना स्वाभाविक था।

– शुरूआत किस विधा से की?

– कथा लेखन से। फिर अन्य विधाओं में रूचि बढ़ती गयी।

– कितनी पुस्तकें आ गयीं अब तक?

– पचास के आसपास। इनमें चौदह उपन्यास, दस कथा संग्रह, लेख, संस्मरण, रिपोर्ताज, बाल लेखन आदि भी हैं तो अनुवादित साहित्य भी है।

– जो प्रमुख सम्मान मिले उनके बारे में बताइए।

– सन् 2016 का साहित्य अकादमी सम्मान, सन् 2019 का व्यास सम्मान और महात्मा गांधी हिंदी संस्थान से सन् 2012 में सम्मान सहित अनेक सम्मान/पुरस्कार।

– आपने अनेक विधाओं में लिखा तो कौन सी विधा में सबसे ज्यादा सुकून मिलता है?

– सभी विधाओं में सुकून मिलता है क्योंकि मैं एक लेखक हूं और लेखक के अपने कई रंग होते हैं।

– कोई फिल्म या नाटक बना आपकी रचनाओं पर?

– हरियाणा के राजीव रंजन ने मेरी कहानी पर ‘अपनी कोख’ नाटक तैयार करवाया जिसे दिनेश खन्ना ने निर्देशित किया और बहुत बार खेला गया। अनेक टीवी फिल्में भी बनी मेरी रचनाओं पर। ‘अपनी कोख’ नाटक के हरियाणा में तीन सौ से ऊपर शोज हुए जो एक प्रकार से कीर्तिमान कहा जा सकता है। यह नाटक भ्रूण हत्या पर है और लोग इसे देखते रोये बिना न रहते थे।

– कथा आंदोलनों और स्त्री/दलित जैसे विमर्शों से क्या हुआ?

–  दलित व स्त्री हमेशा साहित्य के फोकस में रहे हैं लेकिन बाद में इन्हें विमर्शों का हिस्सा बना दिया गया जो दुखद है। कुछ लोगों को फोकस मिला। नारे की तरह रहे ये विमर्श। यह हमेशा होता है। कुछ लोगों का भला हुआ। आंदोलन से जुड़ने से चर्चा मिली।

– क्या महिला लेखन /पुरूष लेखन की बात सही है?

– नही। मैं हमेशा से इस तरह की खानाबंदी के खिलाफ रही हूं।

– हरियाणा के बारे में आपके क्या अनुभव हैं?

– मै हरियाणा बहुत घूमी और अनेक स्कूल कालेजों में जाने का अवसर मिला। मेवात में मेरे पति रामचंद्र शर्मा ने गांव गोद ले रखा था तो मेवात जाने का अवसर भी बहुत बार मिला। भगवान् दास मोरवाल व पारूथी जी सहित अनेक रचनाकारों से परिचय भी है। भगवान् दास मोरवाल ने न केवल उर्दू सीखी बल्कि बहुत मेहनत से उपन्यास लिखे। आपसे भी दिल्ली में रेणु हुसैन के कथा संग्रह के विमोचन पर परिचय हुआ। हरियाणा के लोग साहित्य के प्रति बहुत उत्सुकता रखते हैं और बहुत ध्यान से सुनते हैं। ‘हरिभूमि’ में मेरी अनेक रचनाओं को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता रहा।

– नयी पीढ़ी को क्या गुरुमंत्र देना चाहेंगीं?

– बस। लिखते रहो। अच्छे से अच्छा लिखने की कोशिश करते रहो।

– आगे क्या योजना है?

– अभी तो उपन्यास आया है – अल्फा बीटा गामा। आगे देखते हैं नया।

हमारी शुभकामनाएं नासिरा शर्मा को। आप इस नम्बर पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं : 9811119489

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 280 ☆ परिचर्चा – सवाल लेखकों के जवाब मेरे ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक परिचर्चा सवाल लेखकों के जवाब मेरे। 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 280 ☆

? परिचर्चा – सवाल लेखकों के जवाब मेरे ?

(समकालीन व्यंग्य समूह एक मासिक स्तम्भ चलाता है  “रचनाकार कठघरे में “ इसमें लेखक से लेखक ही सवाल करते हैं। इसी स्तंभ में ई-अभिव्यक्ति के विवेक रंजन श्रीवास्तव।)

पहला सवाल — क्या आज के अधिकांश लेखक मजदूर से भी बदतर हैं जो बिना परिश्रमिक निरंतर लिख रहे हैं। इसके लिए लेखक या संपादक में कौन जिम्मेवार है ?

       — प्रभात गोस्वामी

उत्तर …मजदूर तो आजीविका के लिए किंचित मजबूर होता है, पर लेखक कतई मजबूर नहीं होता।

बिना पारिश्रमिक लिखने के पीछे छपास की अभिलाषा है। संपादक इसके लिए दोषी नहीं कहे जा सकते, यद्यपि पत्र , पत्रिका का मैनेजमेंट अवश्य दोषी ठहराया जा सकता है, जो लेखन के व्यय को बचा रहा है।

सवाल 2… व्यंग्य विधा हमेशा विद्रूपताओं को उजागर करती आई है। इसमें आम आदमी का दर्द और परेशानियों का अधिकतर समावेश होता रहा है। आज मजदूर दिवस पर यह सवाल लाजिमी हो जाता है कि क्या एक श्रमिक को व्यंग्य का पात्र बनाना उचित होगा ? वैसे भी यह वर्ग हमेशा उपहास का पात्र ही रहा है। आप क्या सोचते हैं ? कृपया बताएं।

– प्रीतम लखवाल, इंदौर

उत्तर … आपके प्रश्न में ही उत्तर निहित है, मजदूर यदि कामचोरी ही करे  तो उसकी इस प्रवृत्ति पर अवश्य व्यंग्य लिखा जाना चाहिए। हमने कई व्यंग्य पढ़े हैं जिनमे घरों में काम करने वाली मेड पर कटाक्ष हैं ।

मेहनतकश होना बिलकुल भी  उपहास का पात्र नहीं होना चाहिए।

प्रश्न : मैं तो कलम का मजदूर हूं इस उक्ति में कितनी सच्चाई है ?

एक श्रमिक के शारीरिक श्रम और बुद्धिजीवियों के श्रम में भारी अंतर है। दोनों एक दूसरे का पर्याय नहीं हो सकते, फिर बुद्धिजीवियों के सर पर ही मोरपंख क्यों खोंस दिये जाते हैं ?

–इन्दिरा किसलय

उत्तर : बुद्धिजीवी ही मोरपंख खोंसते हैं, वे ही उपमा , उपमेय, रूपक गढ़ते हैं।

मैं तो कलम का मजदूर हूं , किन्ही संदर्भो में  शब्दों की बाजीगरी है।

बौद्धिक श्रम और शारीरिक मजदूरी नितांत भिन्न हैं ।

सवाल – कहते हैं कि कविता के पांव अतीत में होते हैं और उसकी आंखें भविष्य में होती हैं, पर व्यंग्य इन दिनों लंगड़ा के चल रहा है और उसकी आंखों में मोतियाबिंद जैसा कुछ हो गया है ? आप इस बात पर क्या कहना चाहेंगे ?

 – जयप्रकाश पाण्डेय 

जवाब… विशेष रूप से नई कविता की समालोचना में  प्रयुक्त यह  युक्ति सही है , क्योंकी कविता की पृष्ठ भूमि , इतिहास की जमीन , विगत से उपजती है। प्रोग्रेसिव विचारधारा की नई कविता उज्ज्वल भविष्य की कल्पना के सपने रचती है । किंबहुना यह सिद्धांत प्रत्येक विधा की रचना पर आरोपित किया जा सकता है, व्यंग्य पर भी। किंतु आप सही कह रहे हैं की व्यंग्य लंगड़ा कर चल रहा है। व्यंग्य को महज सत्ता का विरोध समझने की गलती हो रही है, मेरी समझ में व्यंग्य विसंगतियों का विरोध है ।

यह हम आप की ही जबाबदारी है कि अपने लेखन से हम समय रहते व्यंग्य की लडखडाहट से उसे उबार लें ।

सवाल – बहुरूपिए निस्वार्थ भाव से त्याग करते हुए लोगों को हंसाते और मनोरंजन करते हैं। साथ ही समाज में फैली विसंगतियों पर कटाक्ष करते हुए लोगों को जागरूक बनाते हैं। पर व्यंग्यकार को बहुरूपिया कह दो तो वह मुंह फुला लेता है, क्या आप मानते हैं व्यंग्यकार बहुरूपिया होता है ?

— जयप्रकाश पांडेय 

उत्तर …व्यंग्यकार व्यंग्यकार होता है, और बहुरूपिया बहुरूपिया । कामेडियन कामेडियन … अवश्य ही कुछ कामन फैक्टर हैं । व्यंग्यकार को बहुविध ज्ञानी होना पड़ता है, और कभी अभिव्यक्ति के लिए बहुरूपिया भी बनना पड़ सकता है।

प्रश्न : एक राम घट-घट में बोले की तर्ज पर विधा-विधा में व्यंग्य बोलता है। फिर भी इसको अलग श्रेणी की विधा मानने का विमर्श खड़ा करना क्या समुचित हैं ?

— भंवरलाल जाट

उत्तर … बिजली से ही टीवी , लाइट , फ्रिज , पम्प , सब चलते हैं, फिर भी बिजली तो बिजली होती है, उस पर अलग से भी बात होती है।

व्यंग्य हर विधा में प्रयुक्त हो सकता है , पर निखालिस व्यंग्य लेख का अपना महत्व है। उसे लिखने पढ़ने का मजा ही अलग है। इसी लिए यह विधा विमर्श बना रहने वाला है।

प्रश्न… विवेक जी, आप व्यंग्य के वैज्ञानिक हैं। तकनीकी व्यंग्य लेखन के कुछ पाॅइंट हमें भी सिखाईये।

साथ ही आपके व्यंग्य में शीर्षक हमेशा बड़े होते हैं। क्या शीर्षक भी प्रभाव डालते हैं ?

— सुषमा ‘राजनिधि’ इंदौर,

उत्तर … सुषमा जी यह आपका बड़प्पन है कि आप मुझे ऐसा समझती हैं। अब तो  व्यंग्य लेखन की स्वतंत्र वर्कशाप आयोजित हो रही हैं, प्रेम सर का प्रयोग सफल हो। हम सब एक दूसरे को सुनकर , पढ़कर प्रेरित होते हैं। कभी मिल बैठ विस्तार से बातें करने के अवसर मिलेंगे तो अच्छा लगेगा ।

जहां तक शीर्षक का प्रश्न है, मेरा एक चर्चित आलेख है ” परसाई के लेखों के शीर्षक हमे शीर्षक निर्धारण की कला सिखाते हैं “

न तो शीर्षक बहुत बड़ा होना चाहिए और न ही एक शब्द का की भीतर क्या है समझ ही न आए । शीर्षक से लेख के कर्टन रेजर का काम भी लिया जाना उचित है।

बच्चो के नाम पहले रखे जाते हैं , फिर उनका व्यक्तित्व विकसित होता है , जबकि व्यंग्य लेख में हमें अवसर होता है कि हम विचार लिपिबद्ध कर ले फिर शीर्षक तय करें । मैं इसी छूट का लाभ उठाया करता हूं।

प्रश्न…  कुछ व्यंग्यकार झूठों के सरताज, नौटंकीबाज, मक्कार और जहर उगलने वाले नेता की इन प्रवृत्तियों पर इसलिए प्रहार करने से परहेज करने की सलाह देते हैं कि वह जनता द्वारा चुना गया है। क्या ऐसे जनप्रतिनिधि को व्यंग्यकारों द्वारा बख्शा जाना चाहिए ?

ऐसी विसंगतियों के पुतले जनप्रतिनिधि का बचाव करने वाला लेखक क्या व्यंग्यकार कहलाने का हकदार है ?

— टीकाराम साहू ‘आजाद’

जवाब : आजाद जी , मेरा मानना है कि हमें पूरी जिम्मेदारी से ऐसे नेता जी पर जरूर लिखना चाहिए, व्यक्तिगत नाम लेकर लिखने की जगह उन प्रवृतियों पर कटाक्ष किए जाने चाहिए जिससे यदि वह नेता उस लेख को पढ़ सके तो कसमसा कर रह जाए ।

जनता द्वारा चुन लिए जाने मात्र से नेता व्यंग्यकार के जनहितकारी विवेक से ऊपर नहीं हो सकता।

सवाल…  व्यंग्य का पाठक वर्ग कितना बड़ा है? क्या व्यंग्यकार ही इसे पढ़ते हैं या यह आम जनता तक भी पहुँचता है ?

कविता के लिए तो कवि सम्मेलनों में व्यापक पब्लिसिटी से जनता का आवाहन किया जाता है और वह जन-जन तक पहुँचती है लेकिन यह व्यवहार व्यंग्य में नहीं है। व्यंग्य की जब भी बैठक/गोष्ठियां, आयोजन/सम्मेलन होते हैं तो उसमें प्राय: व्यंग्य लेखक ही सम्मिलित होते हैं या एक दो अतिथि और मुख्य अतिथि। क्या यह  स्थिति व्यंग्य के हित में है ?

क्या व्यंग्य, व्यंग्य लेखकों के बीच ही नहीं सिमट कर रह गया ?

— के.पी.सक्सेना ‘दूसरे’

जवाब… मेरा मानना है कि व्यंग्य का पाठक वर्ग विशाल है, तभी तो लगभग प्रत्येक अखबार संपादकीय के बाजू में व्यंग्य के स्तंभ को स्थान देता है।

यह और बात है की कई बार फीड बैक न मिलने से हमे लगता है कि व्यंग्य का दायरा सीमित है।

वरन गोष्ठियों के विषय में मुझे लगता है की लोग अपनी सुनाने में ज्यादा रुचि रखते हैं, शर्मा हुजूरी मित्रो की वाहवाही भी कर लेते हैं।

यदि छोटे व्यंग्य,  किंचित नाटकीय तरीके से प्रस्तुत किए जाए तो उनके पब्लिक शो सहज व्यवहारिक हो सकते हैं। जो व्यंग्य के व्यापक हित में होगा । आजकल युवाओं में लोकप्रिय स्टेंडप कामेडी कुछ इसी तरह के थोड़े विकृत प्रयोग हैं  ।

प्रश्न… आदरणीय विवेक जी

क्या गुरु को दक्षिणा स्वरुप अंगूठे की अभिलाषा रखनी चाहिए ? अंगूठा मांगना तो एक विकृति रही थी। क्या उसकी पुनरावृति होनी चाहिए ?

आप रचनात्मक और सृजनात्मक परिवार से हैं, किन्तु आपकी नौकरी बहुत सारी उन विसंगतियों से परिपूर्ण रही हैं जो व्यंग्य के विषय बन सकते हैंl ऐसे में सामंजस्य कैसे बना पाते थे ?

— परवेश जैन

उत्तर … परवेश जी गलत को किसी भी तरह की लीपा पोती से त्वरित कितना भी अच्छा बना दिया जाए समय के साथ वह गलत ही कहा और समझ आ जाता है ।

प्रचलित कथा के आचार्य द्रोण एकलव्य के संदर्भ में एक दूसरा एंगल भी दृष्टव्य और विचारणीय है । मेरी बात को इस तरह समझें कि यदि आज कोई विदेशी गुप्तचर भारतीय आण्विक अनुसंधान के गुर चोरी से सीखे तो उसके साथ क्या बरताव किए जाने चाहिए ??

एकलव्य हस्तिनापुर के शत्रु राज्य मगध के सेनापति का पुत्र था। अतः द्रोण की जिम्मेदारी उनकी धनुरविद्या को शत्रु से बचाने की भी मानी जानी चाहिए। इन स्थितियों में उन्होंने जो निर्णय लिया वह प्रासंगिक विशद विवेचना चाहता है । अस्तु ।

मैंने जीवन में हमेशा हर फाइल अलग रखी, घर, परिवार, आफिस, साहित्य … व्यंग्य लेखन में कार्यालयीन अनुभवों के साथ  हर सुबह का अखबार नए नए विषय दे दिया करता था।

सवाल… व्यंग्य उपन्यास लिखना कठिन कार्य है, हरिशंकर परसाई जी के “रानी नागफनी” से लेकर डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी के “नरक यात्रा” तक व्यंग्य उपन्यासों की लंबी सूची है लेकिन जब चर्चा  होती है तो सुई “राग दरबारी” पर आकर क्यों अटक जाती है ?

— जय प्रकाश पाण्डेय

जवाब… शायद कुछ तो ऐसा भी होता ही है की जो सबसे पहले सर्वमान्य स्थापना अर्जित कर लेता है , वह लैंडमार्क बन जाता है। उसी से कम या ज्यादा का कंपेरिजन होता है।

रागदरबारी जन मूल्यों पर आधारित व्यंग्य लेखन है , सुस्थापित है ।  उससे बड़ी लाइन कोई बने तो राग दरबारी का महत्व कम नहीं होगा ।

सवाल… व्यंग्यकार व्यंग्य को भले ही व्यंग्य लिख लिख कर हिमालय पर बिठा दें लेकिन साहित्य जगत में उसको आज भी अछूत माना जाता है। एक किताब के विमोचन समारोह में अतिथि जिन्होंने विमोचन भी किया था तब उन्होने व्यंग्य के लिए कहा था कि व्यंग्य तो कीचड़ है आप क्यों उसमें पड़े हैं। साथ ही कहा था कि अच्छा है आप अन्य विधाओं में भी लिख रहे हैं तो उससे मुक्त हो जायेंगे ।

– अशोक व्यास

जवाब…एक विधा में पारंगत जरूरी नहीं की दूसरी हर विधा में भी पारंगत ही हो , और उसकी पूरी समझ रखता हो।

ऐसे में इस तरह के बयान आ जाना स्वाभाविक नही है।

प्रश्न…व्यंग्य विधा में भी प्रयोग की गुंजाइश है। प्रयोग से व्यंग्य रचना और ध्यान खींच सकती है। आपके क्या विचार हैं ?

इसके लिए क्या प्रयास किये जा रहे हैं ?

— अनिता रश्मि

उत्तर… खूब संभावना है। प्रयोग हो ही रहे हैं। डायरी व्यंग्य , पत्र लेखन व्यंग्य , कहानी, विज्ञान कथा व्यंग्य , संवाद व्यंग्य , आत्मकथा व्यंग्य , संस्मरण व्यंग्य , आदि ढेरो तरह से रची गई रचनाएं पढ़ी है मैने ।

प्रश्न… मजदूरों के कुछ आम नारे हैं। पहला – “दुनिया के मजदूरों एक हो।”  मगर मजदूर एक न हुए।

दूसरा – “जो हमसे टकराएगा… चूर चूर हो जाएगा।” लेकिन मजदूरों से टकराने वाले अधिक पत्थर दिल हुए।

तीसरा – “हर जोर जुलुम की टक्कर में…हड़ताल हमारा नारा है।”  किंतु जोर जुलुम बरक़रार है।

चौथा – “इंकलाब ज़िंदाबाद।” पर इंकलाब के तेवर अब, ढीले हैं।

फिर मजदूर दिवस का औचित्य क्या ?

— प्रभाशंकर उपाध्याय

जवाब… वामपंथ अब ढलान पर है । ये सारे नारे वामपंथ के चरम पर दिए गए थे। शहीद  भगत सिंह अपने समय में इस विचारधारा से प्रभावित हुए। किंतु समय के साथ साम्यवाद असफल सिद्ध हो रहा है। संभवतः मजदूरों का शोषण जितना चीन में है , अन्यत्र नहीं।

यदि मजदूरों को उनके वाजिब हक मिल जाएं तो ये नारे स्वतः गौण हो जाएं।यूं मजदूरों के हक की लड़ाई के लिए बनाए नारे कभी खत्म नहीं होते,समय बदलता है पर दबे कुचले मजदूरों के हक हमेशा जिन्दा रहते हैं, ये इंसानियत को जिंदा रखने वाले होते हैं। यही प्रगति भी है शायद , एक हक मिलते ही दूसरे के लिए जागना नैसर्गिक  प्रवृति है।

* * * *

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

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हिन्दी साहित्य ☆ परसाई जन्मशती विशेष – ‘व्यंग्यम जबलपुर’ के ‘परसाई समग्र विमर्श’ में डॉ प्रेम जनमेजय ☆ प्रस्तुति – श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

☆ परसाई जन्मशती विशेष – व्यंग्यम जबलपुर के ‘परसाई समग्र विमर्श’ में डॉ प्रेम जनमेजय ☆ प्रस्तुति – श्री जय प्रकाश पाण्डेय  



परसाई जन्मशती पर व्यंग्यम, जबलपुर में ‘परसाई समग्र विमर्श‘ का आयोजन किया। इस विमर्श में प्रतिष्ठित व्यंग्यकार एवं व्यंग्य यात्रा पत्रिका के सम्पादक डॉ प्रेम जनमेजय ने परसाई जी पर अपने विचार प्रस्तुत किए।

© जय प्रकाश पाण्डेय

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिचर्चा # 194 ☆ हरिशंकर परसाई जन्मशती विशेष – आमने-सामने – भाग-2 ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है। आज प्रस्तुत है हरिशंकर परसाई जन्मशती के अवसर पर श्री जयशंकर प्रसाद जी से किए गए सवाल जवाब का अंतिम भाग “आमने-सामने…”)

☆ परिचर्चा — हरिशंकर परसाई जन्मशती विशेष – आमने-सामने – भाग-2 ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

देश के जाने-माने व्यंग्यकारों ने विगत दिनों व्यंंग्यकार जय प्रकाश पाण्डेय से सवाल जबाव किए। विगत अंक में व्यंंग्यकार श्री मुकेश राठौर (खरगौन) एवं श्री प्रभाशंकर उपाध्याय (गंगानगर) जी के सवालों के जवाब आपसे साझा किये थे। आज आमने-सामने में प्रस्तुत है व्यंंग्यकार डॉ ललित लालित्य (दिल्ली), श्री आत्माराम भाटी (बीकानेर), श्री शशांक दुबे (मुंबई), श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल), श्री रमेश सैनी (जबलपुर), श्री अशोक व्यास (भोपाल) एवं डॉ अलका अग्रवाल सिगतिया (मुंबई) जी के सवालों के जवाब के अंश —

व्यंंग्यकार डॉ ललित लालित्य (दिल्ली)

प्रश्न – १ – पांडेय जी आप चुपचाप काम करने वाले व्यंग्यकार हैं जबकि आपके जूनियर कहाँ से कहाँ पहुँच गए ।

प्रश्न – २ – क्या आप मानते है कि व्यंग्यकार को ईमानदार होना चाहिए,चुगलखोर या ईर्ष्यालु नहीं ?

प्रश्न – ३ – क्या जीते जी व्यंग्यकार मंदिर बनवा कर पूजे जाएं यह कहाँ की भलमान्सियत है ?

जय प्रकाश पाण्डेय –

उत्तर (१) – सर जी,लेखन में कोई जूनियर, सीनियर या वरिष्ठ, कनिष्ठ या गरिष्ठ नहीं होता, ऐसा हमारा मानना है। ईमानदारी और दिल से जितना कुछ संभव हो, वही संतुष्टि देता है। यदि कोई कहां से कहां पहुंच भी गया तो खुशी की बात है, उसकी प्रतिभा उसका अध्ययन उसे और ऊपर ले जाएगा।

उत्तर (२) – ईमानदार और दीन-दुखी जन जन के साथ खड़ा लेखक ही असली व्यंंग्यकार कहलाने का हकदार है, जैसे आप हर दिन आम आदमी की दैनिक जीवन में आने वाली विसंगतियों और पाखंड पर रोज लिखकर आम आदमी के साथ खड़े दिखते हो। समाज की बेहतरी के लिए व्यंंग्यकार की ईमानदार कोशिश होनी चाहिए, ईमानदार प्रयास ही इतिहास में दर्ज होते हैं, फोटो और बोल्ड लेटर के नाम पानी के बुलबुले हैं। भाई,व्यंंग्यकार ही तो है जो जुगलखोरी और ईर्षालुओं के विरोध में लिखकर उनके चरित्र में बदलाव की कोशिश करता है।

उत्तर (३) – ऐसे लोगों को तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए जो आत्म प्रचार और आत्ममुग्धता के नशे में जीते जी मंदिर बनवाने की कल्पना करते हैं। ऐसे लेखक के अंदर खोट होती है, वे अंदर से अपने प्रति भी ईमानदार नहीं होते,जो लोग ऐसे लोगों के मंदिर बनवाने में सहयोग देते हैं वे भी साहित्य के पापी कहलाने के हकदार हो सकते हैं।

व्यंंग्यकार श्री आत्माराम भाटी(बीकानेर)

जयप्रकाश जी ! बतौर साहित्यकार स्वयं लिखी रचना को सम्पादित करना आसान है या किसी दूसरे की रचना को सम्पादक की नजर से देखना ?

जय प्रकाश पाण्डेय –

आदरणीय जी,स्वयं लिखी रचना को सबसे पहले सम्पादित करने और कांट-छांट करने का अधिकार, कायदे से घर की होम मिनिस्ट्री के पास होना चाहिए, फिर उसके बाद आवश्यक सुधार, संशोधन आदि स्वयं लेखक को करना चाहिए, दूसरे की रचना को सम्पादक की नजर से नहीं बल्कि सुझाव की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। पहले किसी लेखक की रचना जब संपादक के पास प्रकाशनार्थ जाती थी तो संपादक लेखक की अनुमति लेकर छुट-पुट सुधार कर लेता था, आजकल तो कुछ संपादक ऐसे हैं जो विचारधारा के गुलाम हैं,सत्ता के दलाल बनकर बैठे हैं, रचना मिलते ही सबसे पहले कांट-छांट कर रचना की हत्या करते हैं बिना लेखक की अनुमति लिए। फिर छापकर अच्छी रचना बनाने का श्रेय भी खुद ले लेते हैं।

व्यंंग्यकार श्री शशांक दुबे (मुंबई)

पाण्डेय जी आपको व्यंग्य के बहुत बड़े हस्ताक्षर *हरिशंकर परसाई जी* का सान्निध्य प्राप्त हुआ है। परसाई जी के दौर के व्यंग्यकारों के बौद्धिक व रचनात्मक स्तर में और आज के दौर के व्यंग्यकारों के स्तर में आप कोई अंतर देखते हैं?

जय प्रकाश पाण्डेय –

आदरणीय भाई दुबे जी, वास्तविकता तो ये है कि जब परसाई जी बहुत सारा लिख चुके थे, उन्होंने 1956 में वसुधा पत्रिका निकाली, उसके दो साल बाद हमारा धरती पर आना हुआ। बड़ी देर बाद परसाई जी के सम्पर्क में आए 1979 से।पर हां 1979से 1995 तक उनका आत्मीय स्नेह और आशीर्वाद मिला।

परसाई और जोशी जी के दौर के व्यंंग्यकार त्याग, तपस्या,, संघर्ष की भट्टी में तपकर व्यंग्य लिखते थे,उनका जीवन यापन व्यंग्य लेखन से होता था, उनमें सूक्ष्म दृष्टि, गहरी संवेदना, विषय पर तगड़ी पकड़ के साथ निर्भीकता थी ।आज के समय के व्यंग्यकारों में इन बातों का अभाव है। परसाई जी, जोशी जी के दिमाग राडार के गुणों से युक्त थे,वे अपने समय के आगे का ब्लु प्रिंट तैयार कर लेते थे, उन्हें पुरस्कार और सम्मान की भूख नहीं थी। बड़े बड़े पुरस्कार उनके दरवाजे चल कर आते थे।आज के अधिकांश व्यंग्यकार अवसरवादी,सम्मान के भूखे, पकौड़े छाप जैसी छवि लेकर पाठक के सामने उपस्थित हैं और इनके अंदर बर्र के छत्ते को छेड़ने का दुस्साहस कहीं से नहीं दिखता।

व्यंंग्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल) 

आप लंबे समय तक बैंकिंग सेवाओं मे थे,बैंक हिंदी पत्रिका छापते हैं,आयोजन भी करते हैं। 

आप क्या सोचते हैं की व्यंग्य, साहित्य के विकास व संवर्धन में संस्थानों की बड़ी भूमिका हो सकती है ? होनी चाहिये ?

जय प्रकाश पाण्डेय –

विवेक भाई, हम लगातार लगभग 36साल बैंकिंग सेवा में रहे और शहर देहात, आदिवासी इलाकों के आलावा सभी स्थानों पर लोगों के सम्पर्क में रहे और अपने ओर से बेहतर सेवा देने के प्रयास किए।पर हर जगह पाया कि बेचारे दीन हीन गरीब,दलित,किसान, मजदूर,दुखी है पीड़ित हैं,उनकी बेहतरी के लिए लगातार सामाजिक सेवा बैंकिंग के मार्फत उनके सम्पर्क में रहे, गरीबी रेखा से नीचे के युवक युवतियों को रोजगार की तरफ मोड़ा, दूरदराज की ग़रीब महिलाओं को स्वसहायता समूहों के मार्फत मदद की मार्गदर्शन दिया। प्रशासनिक कार्यालय में रहते हुए गृह पत्रिकाओं के मार्फत गरीबों के उन्नयन के लिए स्टाफ को उत्साहित किया, बिलासपुर से प्रतिबिंब पत्रिका, जबलपुर से नर्मदा पत्रिका, प्रशिक्षण संस्थान से प्रयास पत्रिका आदि के संपादन किए, और जो थोड़ा बहुत किया वह आदरणीय प्रभाशंकर उपाध्याय जी के उत्तर में देख सकते हैं। बैंक में रहते हुए साहित्य सेवा और सामाजिक सेवा से समाज को बेहतर बनाने की सोच में उन्नयन हुआ, दोगले चरित्र वाले पात्रों पर लिखकर उनकी सोच सुधारने का अवसर मिला। कोरोना काल में विपरीत परिस्थितियों के चलते बैंकों में अब समय खराब चल रहा है इसलिए आप जैसा सोच रहे हैं उसके अनुसार अभी परिस्थितियां विपरीत है।

व्यंंग्यकार श्री रमेश सैनी (जबलपुर) 

वर्तमान समय में सभी तरफ व्यंग्य पर बहुत गंभीरता से विमर्श हो रहा है,विशेषकर परसाई जी और आज लिखे जा रहे व्यंग्य के संदर्भ में। क्योंकि आज के पाठक और आलोचक इससे संतुष्ट नज़र नहीं हो रहे। एक व्यंग्य विमर्श गोष्ठी में आपके सवाल के उत्तर में यह बात उभर कर आई थी कि व्यंग्य में खतपरवार ऊग आई है,जो फसल को नष्ट कर रही है। 

उक्त टिप्पणी को केंद्र में रखकर व्यंग्य में खतपरवार और अराजक परिदृश्य पर आप क्या सोचते हैं ? 

इसकी सफाई कैसे संभव हैं?

जय प्रकाश पाण्डेय –

आदरणीय सैनी जी  व्यंग्य विधा के उन्नयन और संवर्धन के यज्ञ में आपका योगदान महत्वपूर्ण है,अब व्यंग्य विमर्श के आयोजन के बिना आपका खाना नहीं पचता,हम सब आप से और सबसे ही बहुत कुछ सीख रहे हैं। खरपतवार हमारे अपने ही कुछ लोग पैदा कर रहे हैं इसलिए व्यंग्य की लान में ऊग आयी जंगली घास को आप जैसे पुराने व्यंग्यकारों को निंदाई का कार्य करना पड़ेगा और जो लोग खरपतवार में खाद पानी दे रहे हैं उन्हें चौगड्डे में लाकर खड़ा करना पड़ेगा।

व्यंंग्यकार श्री अशोक व्यास (भोपाल) 

मेरा प्रश्न है कि आजकल जो व्यंग्य पढ़ने में आ रहे हैं उसमें  साहियकारों  पर जिसमें अधिकतर व्यंग्यकारों पर व्यंग्य किया जा रहा है । क्या विसंगतियों को अनदेखा करके दूसरे के नाम पर अपने आप को व्यंग्य का पात्र बनाने में खुजाने जैसा मजा ले रहे हैं हम ?  

जय प्रकाश पाण्डेय –

भाई साहब,सही पकड़े हैं।हम आसपास बिखरी विसंगतियों, विद्रूपताओं, अंधविश्वास को अनदेखा कर अपने आसपास के तथाकथित नकली व्यंंग्यकारों को गांव की भौजाई बनाकर खुजाने का मजा ले रहे हैं, जबकि हम सबको पता है कि इनकी मोटी खाल खुजाने से कुछ होगा नहीं,वे नाम और फोटो के लिए व्यंग्य का सहारा ले रहे हैं।

व्यंंग्यकार डॉ अलका अग्रवाल सिगतिया (मुंबई) 

आपने परसाईं जी का साक्षात्कार  भी किया है।

उस साक्षात्कार  के अनुभव क्या रहे?

आज यह कहा जा रहा है,व्यंग्य कार खुल कर नहीं  लिख रहे,अक्सर व्यंग्य  चर्चाओं में  बहस छोड़ रही है ।

कितने सहमत  हैं, आप?

क्या अभिव्यक्ति  के खतरे पहले नहीं  थे?

आपके लेखन में आप इसे कितना  उठाते हैं, या स्टेट बैंक  के महाप्रबंधक  पद रहकर उठाए?

परसाई जी से आप अपने लेखन  को लेकर चर्चा  करते थे?

जय प्रकाश पाण्डेय –

डॉ अलका जी की कहानियां हम 1980 से पढ़ रहे हैं, कहानियां मासिक चयन (भोपाल) पत्रिका में हम दोनों अक्सर एक साथ छपा करते थे। उन्हें परसाई जी का आत्मीय आशीर्वाद मिलता रहा है। 

वे परसाई जी के बारे में सब जानतीं हैं। पर चूंकि प्रश्र किया है इसलिए थोड़ा सा लिखने की हिम्मत बनी है।

 1- सुंदर नाक नक्श, चौड़े ललाट,साफ रंग के विराट व्यक्तित्व परसाई जी से हमने इलाहाबाद की पत्रिका कथ्य रूप के लिए इंटरव्यू लिया था। हमने उनकी रचनाओं को पढ़कर महसूस किया कि उनकी लेखनी स्याही से नहीं खून से लेख लिखती थी, व्यंग्य करती थी और हृदय भेदकर रख देती थी। परसाई जी से हमारे घरेलू तालुकात थे, ऐसे विराट व्यक्तित्व से इंटरव्यू लेना बड़े साहस का काम था। इंटरव्यू के पहले परसाई जी कुछ इस तरह प्रगट हुए जैसे अर्जुन के सामने कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया था। उनके विराट रूप और आभामंडल को देखकर हमारी चड्डी गीली हो गई, पसीना पसीना हो गये क्योंकि उनके सामने बैठकर उनसे आंख मिलाकर सवाल पूछने की हिम्मत नहीं हुई,तो टेपरिकॉर्डर छोटा था हमने बहाना बनाया कि टेपरिकॉर्डर पुराना है आवाज ठीक से रिकार्ड नहीं हो रही और हम उनके सिर के तरफ बैठकर सवाल पूछे। परसाई जी पलंग पर अधलेटे जिस ऊर्जा से बोल रहे थे,हम दंग रह गए थे।

2- हमारा सौभाग्य था कि हमारी पहली व्यंग्य रचना परसाई ने पढ़ी और पढ़कर शाबाशी दी, और लगातार लिखते रहने की प्रेरणा दी।

3- आजकल बहुत से व्यंंग्यकार खुल कर नहीं लिख रहे हैं, इस बारे में आदरणीय शशांक दुबे के उत्तर में स्पष्ट कर दिया गया है।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिचर्चा # 193 ☆ हरिशंकर परसाई जन्मशती विशेष – आमने-सामने – भाग-1 ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है। आज प्रस्तुत है हरिशंकर परसाई जन्मशती के अवसर पर श्री जयशंकर प्रसाद जी से किए गए सवाल जवाब दो भागों में परिचर्चा – “आमने-सामने…”)

☆ परिचर्चा — हरिशंकर परसाई जन्मशती विशेष – आमने-सामने – भाग-1 ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

देश के जाने-माने व्यंग्यकारों ने विगत दिनों व्यंंग्यकार जय प्रकाश पाण्डेय से सवाल जबाव किए, आमने-सामने में प्रस्तुत हैं, आनलाइन बातचीत के अंश 

व्यंंग्यकार श्री मुकेश राठौर (खरगौन)

प्रश्न – १ – आप परसाई जी की नगरी से आते है| परसाई जी ने अपनी व्यंग्य रचनाओं में तत्कालीन राजनेताओं, राजनैतिक दलों और जातिसूचक शब्दों का भरपूर उपयोग किया | क्या आज व्यंग्यलेखक के लिए यह सम्भव है  या फ़िर कोई बीच का रास्ता है?ऐसा तब जबकि रचना की डिमांड हो सीधे-सीधे किसी राजनैतिक दल,राजनेता या जाति विशेष के नामोल्लेख की।

प्रश्न- २ – कथा के माध्यम से किसी सामाजिक,राजनैतिक विसंगति की परतें उधेड़ना |बग़ैर पंच, विट, ह्यूमर के ऐसी रचना कथा मानी जायेगी या व्यंग्य?

जय प्रकाश पाण्डेय –

उत्तर (१) – मुकेश भाई, व्यंग्य लेखन जोखिम भरा गंभीर कर्म है, व्यंग्य बाबा कहता है जो घर फूंके आपनो, चले हमारे संग। व्यंग्य लेखन में सुविधाजनक रास्तों की कल्पना भी नहीं करना चाहिए, लेखक के लिखने के पीछे समाज की बेहतरी का उद्देश्य रहता है। परसाई जी जन-जीवन के संघर्ष से जुड़े रहे,लेखन से जीवन भर पेट पालते रहे,सच सच लिखकर टांग तुड़वाई,पर समझौते नहीं किए, बिलकुल डरे नहीं। पिटने के बाद उन्हें खूब लोकप्रियता मिली, उनकी व्यंग्य लिखने की दृष्टि और बढ़ी।लेखन के चक्कर में अनेक नौकरी गंवाई। व्यंंग्य तो उन्हीं पर किया जाएगा जो समाज में झूठ, पाखंड,अन्याय, भ्रष्टाचार फैलाते हैं, व्यंग्यकार तटस्थ तो नहीं रहेगा न, जो जीवन से तटस्थ है वह व्यंंग्यकार नहीं ‘जोकर’ है। यदि आज का व्यंग्य लेखक तत्कालीन भ्रष्ट अफसर या नेता या दल का नाम लेने में डरता है तो वह अपने साथ अन्याय करता है। आपने अपने सवाल में अन्य कोई बीच के रास्ते निकाले जाने की बात की है, तो उसके लिए मुकेश भाई ऐसा है कि यदि ज्यादा डर लग रहा है तो उस अफसर या नेता की प्रवृत्ति से मिलते-जुलते प्रतीक या बिम्बों का सहारा लीजिए, ताकि पाठक को पढ़ते समय समझ आ जाए। जैसे आप अपने व्यंग्य में सफेद दाढ़ी वाला पात्र लाते हैं तो पाठक को अच्छे दिन भी याद आ सकते हैं।पर आपके कहने का ढंग ऐसा हो,कि ऐसी स्थिति न आया…

रहिमन जिव्हा बावरी, कह गई सरग-पताल।

आप तो कह भीतर गई, जूती खात कपाल।

उत्तर (२) – मुकेश जी, व्यंग्य वस्तुत:कथन की प्रकृति है कथ्य की नहीं।कथ्य तो हर रचना की आकृति देने के लिए आ जाता है। आपके प्रश्न के अनुसार यदि कथा के ऊपर कथन की प्रकृति मंडराएंगी तो वह व्यंग्यात्मक कथा का रुप ले लेगी।

व्यंंग्यकारश्री प्रभाशंकर उपाध्याय (गंगानगर)

आपने अभियांत्रिकी में स्नातकोत्तर किया। बैंक की अफसरी की। आपकी अभिरूचि व्यंग्य लेखन, काव्य और नाट्य में है। आपको निरंतर ‘ई-अभिव्यक्ति’ में पढता रहता हूँ। आपके संकलन- डांस इंडिया डांस के आवरण पृष्ठ पर एक बिजूका खेत में खड़ा हुआ चित्रित है। कोने में एक किसान अग्नि पर कुछ पका रहा है। इसे देखकर रंगमंच की प्रतीति होती है।  इसके बरबक्स, मेरी जिज्ञासा ‘चुटका’ के बारे में जानने की है, तनिक बताइए ?

जय प्रकाश पाण्डेय – पंडित प्रभाशंकर उपाध्याय जी ने अपने प्रश्न के माध्यम से पन्द्रह साल पहले का जूनूनी प्रसंग छेड़ दिया,प्रश्न के उत्तर की गहराई में जाने के लिए आपको चुटका परमाणु बिजली घर की लम्बी दास्तान पढ़ना पड़ेगी। जो इस प्रकार है…

पन्द्रह साल पहले मैं स्टेट बैंक की नारायणगंज (जिला – मण्डला) म. प्र. में शाखा प्रबंधक था। बैंक रिकवरी के सिलसिले में बियाबान जंगलों के बीच बसे चुटका गांव में जाना हुआ था। आजीवन कुंआरी कलकल बहती नर्मदा के किनारे बसे छोटे से गांव चुटका में फैली गरीबी, बेरोजगारी, निरक्षरता देखकर मन द्रवित हुआ । चुटका गांव की आंगन में रोटी सेंकती गरीब छोटी सी बालिका ने ऐसी प्रेरणा दी कि हमारे दिल दिमाग पर चुटका के लिए कुछ करने का भूत सवार हो गया। उस गरीब बेटी के एक वाक्य ने चुटका परमाणु बिजली घर बनाने के द्वार खोल दिए।

बैंक वसूली प्रयास ने इस करुण कहानी को जन्म दिया…

आफिस से रोज पत्र मिल रहे थे,… रिकवरी हेतु भारी भरकम टार्गेट दिया गया था । कहते है – ” वसूली केम्प गाँव -गाँव में लगाएं, तहसीलदार के दस्तखत वाला वसूली नोटिस भेजें… कुर्की करवाएं… और दिन -रात वसूली हेतु गाँव-गाँव के चक्कर लगाएं,… हर वीक वसूली के फिगर भेजें,… और ‘रिकवरी -प्रयास ‘ के नित -नए तरीके आजमाएँ…। बड़े साहब टूर में जब-जब आते है… तो कहते है – ”तुम्हारे एरिया में २६ गाँव है, और रिकवरी फिगर २६ रूपये भी नहीं है, धमकी जैसे देते है… कुछ नहीं सुनते है, कहते है – कि पूरे देश में सूखा है … पूरे देश में ओले पड़े है… पूरे देश में गरीबी है… हर जगह बीमारी है पर हर तरफ से वसूली के अच्छे आंकड़े मिल रहे है और आप बहानेबाजी के आंकड़े पस्तुत कर रहे है, कह रहे है की आदिवासी इलाका है गरीबी खूब है… कुल मिलाकर आप लगता है की प्रयास ही नहीं कर रहे है… आखें तरेर कर न जाने क्या -क्या धमकी…।

तो उसको समझ में यही आया की वसूली हेतु बहुत प्रेशर है और अब कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा… सो उसने चपरासी से वसूली से संबधित सभी रजिस्टर निकलवाये,  … नोटिस बनवाये… कोटवारों और सरपंचों की बैठक बुलाकर बैंक की चिंता बताई । बैठक में शहर से मग्वाया हुआ रसीला -मीठा, कुरकुरे नमकीन, ‘फास्ट-फ़ूड’ आदि का भरपूर इंतजाम करवाया ताकि सरपंच एवम कोटवार खुश हो जाएँ … बैठक में उसने निवेदन किया की अपने इलाका का रिकवरी का फिगर बहुत ख़राब है कृपया मदद करवाएं , बैठक में दो पार्टी के सरपंच थे …आपसी -बहस ….थोड़ी खुचड़ और विरोध तो होना ही था, सभी का कहना था की पूरे २६ गाँव जंगलों के पथरीले इलाके के आदिवासी गरीब गाँव है, घर -घर में गरीबी पसरी है फसलों को ओलों की मर पडी है… मलेरिया बुखार ने गाँव-गाँव में डेरा दल रखा है,.. जान बचाने के चक्कर में सब पैसे डॉक्टर और दवाई की दुकान में जा रहा है …ऐसे में किसान मजदूर कहाँ से पैसे लायें… चुनाव भी आस पास नहीं है कि चुनाव के बहाने इधर-उधर से पैसा मिले… सब ने खाया पिया और ”जय राम जी की ” कह के चल दिए और हम देखते ही रह गए…।

दूसरे दिन उसने सोचा -सबने डट के खाया पिया है तो खाये पिए का कुछ तो असर होगा ,थोड़ी बहुत वसूली तो आयेगी… यदि हर गाँव से एक आदमी भी हर वीक आया तो महीने भर में करीब १०४ लोगों से वसूली तो आयेगी ऐसा सोचते हुए वह रोमांचित हो गया… उसने अपने आपको शाबासी दी,और उत्साहित होकर उसने मोटर सायकिल निकाली और ”रिकवरी प्रयास ” हेतु वह चल पड़ा गाँव की ओर… जंगल के कंकड़ पत्थरों से टकराती… घाट-घाट कूदती फांदती… टेडी-मेढी पगडंडियों में भूलती – भटकती मोटर साईकिल किसी तरह पहुची एक गाँव तक…।

 सोचा कोई जाना पहचाना चेहरा दिखेगा तो रोब मारते हुए ” रिकवरी धमकी ” दे मारूंगा , सो मोटर साईकिल रोक कर वह थोडा देर खड़ा रहा , फिर गली के ओर-छोर तक चक्कर लगाया… वसूली रजिस्टर निकलकर नाम पड़े… कुछ बुदबुदाया… उसे साहब की याद आयी… फिर गरीबी को उसने गालियाँ बकी… पलट कर फिर इधर-उधर देखा… कोई नहीं दिखा । गाँव की गलियों में अजीब तरह का सन्नाटा और डरावनी खामोशी फैली पडी थी , कोई दूर दूर तक नहीं दिख रहा था।

कोई नहीं दिखा तो सामने वाले घर में खांसते – खखारते हुए वह घुस गया ,अन्दर जा कर उसने देखा… दस-बारह साल की लडकी आँगन के चूल्हे में रोटी पका रही है , रोटी पकाते निरीह… अनगढ़ हाथ और अधपकी रोटी पर नजर पड़ते ही उसने ” धमकी ” स्टाइल में लडकी को दम दी… ऐ लडकी ! तुमने रोटी तवे पर एक ही तरफ सेंकी है , कच्ची रह जायेगी? … लडकी के हाथ रुक गए… पलट कर देखा , सहमी सहमी सी बोल उठी… बाबूजी रोटी दोनों तरफ सेंकती तो जल्दी पक जायेगी और जल्दी पक जायेगी तो… जल्दी पच जायेगी… फिर और आटा कहाँ से पाएंगे…?

वह अपराध बोध से भर गया… ऑंखें नम होती देख उसने लडकी के हाथ में आटा खरीदने के लिए १००/ का नोट पकडाया…और मोटर सायकिल चालू कर वापस बैंक की तरफ चल पड़ा…

रास्ते में नर्मदा के किनारे अलग अलग साइज के गढ्ढे खुदे दिखे तो जिज्ञासा हुई कि नर्मदा के किनारे ये गढ्ढे क्यों  ? गांव के एक बुजुर्ग ने बताया कि सन् 1983 में यहां एक उड़न खटोले से चार-पांच लोग उतरे थे गढ्ढे खुदवाये और गढ्ढों के भीतर से पानी मिट्टी और थोड़े पत्थर ले गए थे और जाते-जाते कह गए थे कि यहां आगे चलकर बिजली घर बनेगा। बात आयी और गई और सन् 2006 तक कुछ नहीं हुआ हमने शाखा लौटकर इन्टरनेट पर बहुत खोज की चुटका परमाणु बिजली घर के बारे में पर सन् 2005 तक कुछ जानकारी नहीं मिली। चुटका के लिए कुछ करने का हमारे अंदर जुनून सवार हो गया था जिला कार्यालय से छुटपुट जानकारी के आधार पर हमने सम्पादक के नाम पत्र लिखे जो हिन्दुस्तान टाइम्स, एमपी क्रोनिकल, नवभारत आदि में छपे। इन्टरनेट पर पत्र डाला सबने देखा सबसे ज्यादा पढ़ा गया… लोग चौकन्ने हुए। 

हमने नारायणगंज में “चुटका जागृति मंच” का निर्माण किया और इस नाम से इंटरनेट पर ब्लॉग बनाकर चुटका में बिजली घर बनाए जाने की मांग उठाई। चालीस गांव के लोगों से ऊर्जा विभाग को पोस्ट कार्ड लिख लिख भिजवाए। तीन हजार स्टिकर छपवाकर बसों ट्रेनों और सभी जगह के सार्वजनिक स्थलों पर लगवाए। चुटका में परमाणु घर बनाने की मांग सबंधी बच्चों की प्रभात फेरी लगवायी, म. प्र. के मुख्य मंत्री के नाम पंजीकृत डाक से पत्र भेजे। पत्र पत्रिकाओं में लेख लिखे। इस प्रकार पांच साल ये विभिन्न प्रकार के अभियान चलाये गये। 

जबलपुर विश्वविद्यालय के एक सेमिनार में परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ काकोड़कर आये तो चुटका जागृति मंच की ओर से उन्हें ज्ञापन सौंपा और व्यक्तिगत चर्चा की उन्होंने आश्वासन दिया तब उम्मीदें बढ़ीं। डॉ काकोड़कर ने बताया कि वे भी मध्यप्रदेश के गांव के निवासी हैं और इस योजना का पता कर कोशिश करेंगे कि उनके रिटायर होने के पहले बिजलीघर बनाने की सरकार घोषणा कर दे और वही हुआ लगातार हमारे प्रयास रंग लाये और मध्य भारत के प्रथम परमाणु बिजली घर को चुटका में बनाए जाने की घोषणा हुई।

मन में गुबार बनके उठा जुनून हवा में कुलांचे भर गया। सच्चे मन से किए गए प्रयासों को निश्चित सफलता मिलती है इसका ज्ञान हुआ। बाद में भले राजनैतिक पार्टियों के जनप्रतिनिधियों ने अपने अपने तरीके से श्रेय लेने की पब्लिसिटी करवाई पर ये भी शतप्रतिशत सही है कि जब इस अभियान का श्रीगणेश किया गया था तो इस योजना की जानकारी जिले के किसी भी जनप्रतिनिधि को नहीं थी और जब हमने ये अभियान चलाया था तो ये लोग हंसी उड़ा रहे थे। पर चुटका के आंगन में कच्ची रोटी सेंकती वो सात-आठ साल की गरीब बेटी ने अपने एक वाक्य के उत्तर से ऐसी पीड़ा छोड़ दी थी कि जुनून बनकर चुटका में परमाणु बिजली घर बनने का रास्ता प्रशस्त हुआ। वह चुटका जहां बिजली के तार नहीं पहुंचे थे आवागमन के कोई साधन नहीं थे, जहां कोई प्राण छोड़ देता था तो कफन का टुकड़ा लेने तीस मील पैदल जाना पड़ता था। मंथर गति से चुटका में परमाणु बिजली घर बनाने का कार्य चल रहा है। प्रत्येक गरीब के घर से एक व्यक्ति को रोजगार देने कहा गया है जमीनों के उचित दाम गरीबों के देने के वादे हुए हैं,जमीन के कंपनसेशन देने की कार्यवाही हो गई है। चुटका से बनी बिजली से मध्य भारत के जगमगाने की उम्मीदें पूरी होने की तैयारियां चल रहीं हैं।

धन्यवाद उपाध्याय जी,इस बहाने आपने पुरानी यादों को हमसे संस्मरण रूप में लिखवा लिया। आपकी गहराई से पड़ताल और अपडेट जानकारियों के लिए हम आश्चर्य चकित हैं।आदरणीय उपाध्याय जी आपके पास सूक्ष्म दृष्टि और तिरछी नजर है,आप चीजों को सही नाम से बुलाते हैं एवं सही ढंग से पकड़ते हैं। आपने अपने विस्तृत फलक लिए प्रश्न में बहुत सी चीजें सही पकड़ी है, बैंक की नौकरी करते हुए हमने पच्चीसों साल सामाजिक सेवा कार्यों से जुड़े रहे। लम्बे समय तक एसबीआई आरसेटी के डायरेक्टर के रूप में कार्य करते हुए नक्सल प्रभावित पिछड़े आदिवासी जिले के सुदूर अंचलों के ग़रीबी रेखा से नीचे के करीब 3500-4000 युवक युवतियों का हार्ड स्किल डेवलपमेंट एवं साफ्ट स्किल डेवलपमेंट करके उन्हें रोजगार से लगाकर एक अच्छे नागरिक बनने में सहयोग किया।देश की पहली माइक्रो फाइनेंस ब्रांच के मेनेजर रहते हुए म.प्र.के अनेक जिलों की 90 हजार गरीब महिलाओं को स्वसहायता समूहों के मार्फत वित्त पोषित कर महिला सशक्तिकरण के लिए कार्य किया, ऐसे अनेक उल्लेखनीय कार्य की लंबी लिस्ट है,पर आपने चूंकि अपने प्रश्न के मार्फत छेड़ दिया इसीलिए थोड़ा सा लिखना पड़ा। अन्य भाई इसको पढ़कर आत्मप्रशंसा न मानें, ऐसा निवेदन है।

क्रमशः… शेष भाग अगले सोमवार केअंक में…

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साक्षात्कार ☆ हर साहित्यिक आंदोलन के साथ समाज का परिवर्तन सामने आता है : रचना यादव ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ हर साहित्यिक आंदोलन के साथ समाज का परिवर्तन सामने आता है : रचना यादव ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

फिर चाहे वह नयी कहानी आंदोलन हो या कोई और ! यह कहना है प्रसिद्ध लेखक राजेंद्र यादव व मन्नू भंडारी की बेटी रचना यादव का ! उन्होंने कहा कि साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब है और समय के साथ समाज भी बदलता है। समय के बदलाव के साथ नयी दृष्टि और नयी दिशा भी बनती है।

रचना यादव का जन्म कोलकाता में हुआ और इनकी पढ़ाई लिखाई दिल्ली में हुई। दिल्ली के तीसहजारी स्थित क्वीन मेरी में स्कूलिंग तो हिंदू काॅलेज से ग्रेजुएशन। इसके बाद इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन, नयी दिल्ली से विज्ञापन व जनसम्पर्क में डिप्लोमा।

– आप तो क्लासिकल डांसर हैं तो वह कहां और कितना सीखा?

– प्रयाग विश्वविद्यालय से छह साल का प्रभाकर सर्टिफिकेट। वैसे रवि जैन, अदिति मंगलदास और पंडित जैकिशन महाराज से बाकायदा कत्थक सीखा।

– स्कूल काॅलेज में किन गतिविधियों में रूचि रही आपकी?

– डांस, भाषण के साथ साथ हैड गर्ल भी रही। स्पोर्ट्स में बास्केटबॉल और एथलीट भी रही। काॅलेज कलर भी मिला।

– कब पता चला कि इतने बड़े सेलिब्रिटी मम्मी पापा की बेटी हो?

– बाहर वालों से धीरे धीरे ! एक बार काॅलेज में एडमिशन लेने बस में जा रही थी। बाॅयोडाटा था जो पारदर्शी कवर में था तो एक ने पढ़ लिये मम्मी- पापा के नाम और सभी मुझे देखने लगे हैरान होकर ! उनको जब अवार्ड्स मिलते थे तब पता चलता था।

– ये बताइये कि पापा राजेंद्र यादव के क्या क्या गुण याद हैं?

– पापा अपने काम व लेखन को लेकर बहुत ही समर्पित थे। जो ठान लिया वह किया, फिर किसी की परवाह कम ही करते थे। बड़े फैसले लेते समय उन्हें खुद पर विश्वास होता था।

– और मम्मी मन्नू भंडारी के बारे में?

– मम्मी उसूलों की बहुत पक्की थीं। बहुत पारदर्शी , ईमानदार और कुछ भी गलत बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं। अंदर व बाहर से एक।

– मम्मी पापा से क्या ग्रहण किया?

– पापा से अनुशासन और समर्पण। देर से फैसला किया था क्लासिकल डांसर बनने का। पहले थोड़ी डांवाडोल सी थी , फिर पापा की सीख से कि करना है तो करना है और कर लिया ! बन गयी क्लासिकल डांसर। मम्मी से सीखा दूसरों के दुख को समझना। वादे की पक्की रहना !

– अब बताइये कि पापा राजेंद्र यादव के साहित्य में से क्या पसंद है?

– शह और मात व प्रेत बोलते हैं। जिस उम्र में ये रचनायें लिखीं वह भी महत्वपूर्ण है।

– और मम्मी के साहित्य में से क्या पसंद है आपकी?

– महाभोज और आपका बंटी उपन्यास। महाभोज में जिस तरह से राजनीति की परतें उधेड़ी हैं , वह हैरान करती हैं। मेरे ख्याल से इससे पहले यह उनके लेखन का स्टाइल नहीं था।

– और मन्नू भंडारी की फिल्मों और धारावाहिकों में कौन सा पसंद?

– रजनी धारावाहिक जिससे वे घर घर तक पहुंच गयीं थीं।

– आपको कोई पुरस्कार मिला?

– क्लासिकल डांस में और स्पोर्ट्स में।

– परिवार के बारे में?

– पति दिनेश खन्ना फोटोग्राफर। दो बेटियां – मायरा योगा टीचर तो माही पोस्ट ग्रेजुएट।

– आप हंस के अतिरिक्त क्या करती हैं?

– गुरुग्राम में रचना यादव कत्थक स्टुडियो चलाती हूं और कोरियोग्राफर भी।

– पापा के बाद हंस के प्रकाशन की जिम्मेदारी कैसी लगी?

– हंस का हिस्सा बन कर अच्छा लगा। सोचती हूं यदि पापा के समय से ही जुड़ी होती तो और भी कुछ सीखने को मिलता और बेहतर कर पाती। हंस की टीम बहुत अच्छी है और पापा के समय की है।

– हंस की ओर से कौन कौन से समारोह किये जाते हैं?

– पहला 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती। दूसरा 28 अगस्त पापा के जन्मदिन पर कथा सम्मान। तीसरा 28 अक्तूबर को साहित्य समारोह।

– कथा आंदोलनों का क्या योगदान?

– हर साहित्यिक आंदोलन के साथ परिवर्तन आता है। साहित्य समाज का प्रतिबिंब ही तो है और इसमे समाज का बदलाव दिखता है। इसके साथ साथ साहित्य का बदलाव भी दिखता है।

– इन दिनों किन रचनाकारों को पढ़ रही हैं?

– अलका सरावगी पसंद है। अनिल यादव की कहानियां खूब हैं और गीतांजलिश्री का  बुकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यास ‘रेत की समाधि’ पढ़ रही हूं।

हमारी शुभकामनाएं रचना यादव को। आप इस नम्बर पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं – 011- 41050047

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साक्षात्कार ☆ साहित्य अकादमी उपाध्यक्ष प्रो. कुमुद शर्मा से बातचीत ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ साक्षात्कार ☆ साहित्य अकादमी उपाध्यक्ष प्रो. कुमुद शर्मा से बातचीत ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

सभी भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय स्थापित करने का रहेगा प्रयास : प्रो. कुमुद शर्मा

साहित्य अकादमी की नवनिर्वाचित उपाध्यक्ष प्रो कुमुद शर्मा का जन्म मेरठ में हुआ लेकिन पालन पोषण व एम ए, पीएचडी तक की शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई । एम.ए में सर्वोच्च अंकों का रिकॉर्ड बनाकर तीन स्वर्ण पदक प्राप्त किए। मीडिया में डी लिट रांची विश्वविद्यालय से की । आईएएस बनने का संकल्प था पर विवाह के बाद अध्यापन का विकल्प चुना। विवाह से पूर्व एम ए करते ही इलाहाबाद के एक महाविद्यालय में तीन महीने पढ़ाया । यू जी सी फैलोशिप प्राप्त होने पर डॉ जगदीश गुप्त के निर्देशन में ‘ नयी कविता में राष्ट्रीय चेतना के स्वरूप विकास ‘ विषय पर पर पीएचडी की उपाधि । विवाह के उपरांत दिल्ली आते ही जीसेस एंड मेरी कॉलेज में अध्यापन शुरु किया । फिर दिल्ली के एस पी एम कॉलेज, आई पी कॉलेज, शिवाजी कॉलेज में पढ़ाने के बाद के बाद सन् 2004 से दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में हैं। इस समय हिंदी विभाग की अध्यक्ष एवं इसी विश्वविद्यालय में हिंदी माध्यम कार्यालय निदेशालय के कार्यवाहक निदेशक का दायित्व भी सँभाल रही हैं ।

लेखन कब शुरू किया ?

उन्नीस साल की उम्र में । इलाहाबाद के समाचार पत्र ‘अमृत प्रभात’ में पहला लेख अनुशासनहीनता की जड़ें कहां है’ प्रकाशित हुआ । फिर आकाशवाणी की ओर भी मुड़ी । ड्रामा ऑडिशन क्लीयर किया और रेडियो नाटक किये ।

अमृत प्रभात से आगे कहां कहां ?

जनसत्ता , सारिका , नवभारत टाइम्स , दैनिक जागरण ,कादम्बिनी, वामा , गगनाचंल, इन्द्रप्रस्थ भारती, बहुवचन जैसी अनेक पत्र -पत्रिकाओं में लेखन। साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य अमृत’ की संयुक्त संपादक रही । इस पत्रिका के संपादक थे पं विद्यानिवास मिश्र । इसी पत्रिका में स्तम्भ लिखा- हिंदी के निर्माता ! जिसे बाद में भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया जिसके चार संस्करण आ चुके हैं । दिल्ली में 1987 से दूरदर्शन से जुड़ी । पत्रिका, कला परिक्रमा , मेरी बात जैसे कार्यक्रमों की प्रस्तुति ही । फिर प्रसार भारती बोर्ड के अन्तर्गत लिटरेरी कोर कमेटी की सदस्य के रुप में साहित्यिक कृतियों पर बनी फ़िल्मों के निर्माण से जुड़ी ।

आप प्रसिद्ध कथाकार अमरकांत की बहू हैं । क्या स्मृतियां हैं आपकी ?

बहुत कुछ सीखने लायक़ था उनके व्यक्तित्व में। बाबू जी स्थितप्रज्ञ व्यक्ति थे। किसी के लिए भी कोई दुर्भावना नहीं । किसी से ईर्ष्या द्वेष नहीं । सुख दुख में सम भाव से जीने वाले । लेखन उनकी प्राथमिकता थी । भौतिक संसाधनों को लेकर कोई महत्वाकांक्षा नहीं । मैंने जीवन में उन्हें कभी भी क्रोध करते हुए नहीं देखा ।

परिवार के बारे में बताइए ।

दो बेटे हैं- बड़ा बेटा अमेरिका में माइक्रोसॉफ्ट कम्पनी में डायरेक्टर है। बहू बैंक ऑफ अमेरिका में है। दूसरा बेटा फिल्म जगत में । पति अरूण वर्धन ‘टाइम्स ऑफ इन्डिया’ के ‘नवभारत टाइम्स’ अख़बार में विशेष संवाददाता थे। कोरोना की दूसरी लहर में सन् 2021 में हमने उन्हें खो दिया ।

साहित्य अकादमी से नाता ?

पहले कार्यक्रमों में व्याख्यान देने के लिये जाती थी । साहित्य अकादमी द्वारा पंडित विद्यानिवास मिश्र पर बनी फिल्म लिखी । साहित्य अकादमी की भारतीय साहित्य के निर्माता श्रंखला के अन्तर्गत अम्बिका प्रसाद वाजपेयी पर पुस्तक लिखी । यहॉं से निकलनेवाली पत्रिका में भी लिखा ।

पहले भी कोई चुनाव लड़ा आपने साहित्य अकादमी का ?

पहली बार ही चुनाव लड़ा और उपाध्यक्ष चुनी गयी ।

कितनी किताबें हैं आपकी ?

तेरह किताबें हैं । आलोचना , स्त्री विमर्श और मीडिया पर केंद्रित ।

उल्लेखनीय सम्मान /पुरस्कार ?

केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्रालय से दो बार भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार । पहला ‘स्त्री घोष’ कृति पर । दूसरा समाचार बाज़ार की नैतिकता पुस्तक पर । उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से ‘साहित्य भूषण’ सम्मान। दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन से साहित्य श्री सम्मान बाबू बालमुकुंद गुप्त सम्मान। इनके अतिरिक्त अनेक सम्मान/पुरस्कार ।

उपाध्यक्ष बन कर क्या करने का सपना ?

अपने देश के साथ विविध भारतीय भाषाओं के रचनाकारों के भावों का रिश्ता एक जैसा ही रहा । आज भी सामजिक , मानवीय और राष्ट्रीय सरोकारों को अपनी रचनाधर्मिता का अभिन्न हिस्सा मानने वाले विविध भारतीय भाषाओं के रचनाकारों की चिँताए एक जैसी है, उनके सरोकार एक जैसे हैं । उनकी निष्ठाएँ एक जैसी हैं। भाषा के ज़रिए मनुष्यत्व को बचा लेने की ज़िद भी एक जैसी है । भाषा और साहित्य दोनों का प्रयोजन सबको एक स्वस्थ साझेदारी के लिए तैयार करना होना चाहिए । साहित्य अकादमी का प्रयास रहेगा सभी भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों की सोच में सांस्कृतिक साझेदारी की उत्कंठा बनी रहे। सभी भारतीय भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय स्थापित करने की कोशिश।

क्या सपने है साहित्य अकादमी को लेकर ?

साहित्य अकादमी अपने कार्यक्रमों को लेकर देश भर के छोटे-छोटे शहरों और गॉंवों तक जायेगी।

हमारी शुभकामनाएं प्रो. कुमुद शर्मा को ! 💐

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साक्षात्कार ☆ फिल्मों में सफलता के बावजूद थियेटर की जिद्द बरकार : हिमानी शिवपुरी ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ साक्षात्कार ☆ फिल्मों में सफलता के बावजूद थियेटर की जिद्द बरकार : हिमानी शिवपुरी ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

हम आपके हैं कौन, दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे, कुछ कुछ होता है, परदेस जैसी अनेक सफल फिल्मों  की अभिनेत्री हिमानी शिवपुरी की थियेटर की जिद्द अभी तक बरकरार है । वे सिर्फ थियेटर ही करना चाहती थीं और इसके लिए अमेरिका में पढ़ाई के लिये स्कॉलरशिप मिलने के बावजूद एनएसडी में दाखिला लेकर दुनिया की नजर में अपने सुनहरे करियर को उस समय बर्बाद कर लिया ! अब भी हिमानी 22 फरवरी को दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में ‘जीना इसी का नाम है ‘नाटक मंचन करने आ रही हैं, जो सिर्फ दो पात्रों वाला नाटक है और दूसरे पात्र हैं प्रसिद्ध एक्टर राजेंद्र गुप्ता !

हिमानी शिवपुरी मूलतः देहरादून की रहने वाली हैं और प्रसिद्ध लेखक डाॅ हरिदत्त भट्ट शैलेश की बेटी हैं । दून स्कूल,देहरादून की छात्रा रहते ही डांस व थियेटर से जुड़ीं और फिर आजीवन यह जुड़ाव चला आ रहा है । डी ए वी काॅलेज , देहरादून से एम एस सी की और स्कॉलरशिप के आधार पर अमेरिका जाने की बजाय एनएसडी में थियेटर पढ़ने चली गयीं !

-यह खूबसूरत मोड़ कैसे आया ?

-जब स्कूल में डांस, डिबेट आदि में  परफाॅर्म करती थी तब हमारे हैडमास्टर साहब की पत्नी ने कहा था कि तुम्हें तो फिल्मों में जाना चाहिए ! हालांकि उन दिनों इस बात पर गौर नहीं किया । बात आई गयी हो गयी । जबकि साइंस की ब्रिलियंट छात्रा थी, अच्छे मार्क्स लेती लेकिन थियेटर से लगाव बराबर जारी रहा ! जैसे जैसे काॅलेज में थियेटर करने लगी तब बहुत मज़ा आने लगा और सोच लिया कि इसी क्षेत्र में जाना है मुझे !

-जब अमेरिका की बजाय एनएसडी जाने का फैसला किया तब परिवार में क्या प्रतिक्रिया रही ?

-परिवार में  जैसे हाय तौबा मच गयी ! बस एक पापा को छोड़कर सबने इसका विरोध किया कि स्कॉलरशिप छोड़कर , बढ़िया करियर छोड़कर यह क्या नौटंकी करने जा रही है ! यह क्या ड्रामा ड्रामा लगा रखा है ! मैंने पापा से कहा कि मेरे मन में यह मलाल न रहे कि थियेटर नहीं किया और पापा चल दिये मुझे एनएसडी में दाखिल करवाने ! आखिरी कोशिश जरूर की जब बी बी कारंत से कहा कि इसे समझाइए कि पहले अमेरिका जाये और फिर थियेटर करे ! इस पर कारंत जी ने कहा कि जब वह थियेटर करना चाहती हो तो करने दीजिए न ! फिर पापा दाखिल करवा कर चले गये !

-दिल्ली में कब तक रहीं ?

-लगभग दस साल ! कोर्स करने के बाद खुद्दारी के चलते छह सौ रुपये की एप्रेंटिसशिप की ! फिर रेपेट्री में आई, ए ग्रेड आर्टिस्ट बनी और यहीं ज्ञानदेव शिवपुरी से मुलाकात हुई, निकटता बढ़ी और हम एक साथ मुम्बई तक पहुंचे !

-पहला अवसर या पहली बार नोटिस कब लिया गया आपका ?

-पहला अवसर ‘हमराही’ में मिला दूरदर्शन पर ! देवकी भौजाई को सफल कैरेक्टर के रूप में चहुंओर प्रसिद्धि मिली ।

-फिर ?

-आप हैरान होंगे कि लेखक तो ज्यादातर मनोहर श्याम जोशी होते थे तो उन्होंने मुझे ‘हम लोग’ सीरियल में छुटकी के रोल का ऑफर दिया लेकिन मैंने कहा कि थियेटर नहीं छोड़ूंगी और यह रोल नहीं किया । फिर हमराही का ऑफर आया तब ज्ञानदेव जी ने कहा कि देख लो ! और फिर देवकी भौजाई की धूम मच गयी !

-मुम्बई कब गये ?

-सन् 1990 के आसपास ।

-देवकी भौजाई के बाद क्या ?

-यही हम भी सोच रहे थे कि अब क्या होगा ? हमराही तो खत्म हो गया । इस बीच बेटा भी हो गया । तभी सूरज बड़जात्या ने मुझे ‘हम आपके हैं कौन’  का रोल ऑफर किया ! हालांकि बीच में जीटीवी में ‘हसरतें’ सीरियल भी किया । बस हम आपके हैं कौन सुपरहिट रही और मैं भी चल निकली !

-आगे का सफर ?

-फिर तो दिल वाले दुल्हनिया , कुछ कुछ होता है जैसी फिल्मों में आई और ये फिल्में हिट रहीं और मुझे लक्की माना जाने लगा ! परदेस, उमराव जान , आ अब लौट चलें आदि अनेक फिल्मों में अवसर मिलता गया !

-जीना इसी का नाम है नाटक में क्या रोल है ?

-यह विदेशी नाटक का रुपांतरण है । दो वृद्धों के अकेलेपन पर आधारित जो संयोगवश इकट्ठे होते हैं और राजेंद्र गुप्ता इसमें डाॅक्टर के रोल में हैं जहां हैल्थ रिवाइनिंग सेंटर में मैं जाती हूं पेशेंट जैसी ! परिस्थितियोंवश हम निकट आते हैं और एक दूसरे के अकेलेपन को महसूस करते हैं ! यह आज के समाज की बहुत बडी समस्या भी है और सच्चाई भी ! अभी पटना में मन्नू भंडारी की कहानियों पर भी मंचन करके आई हूं !

-देहरादून को कितना याद करती हैं ?

-बहुत बहुत मिस करती हूं देहरादून को । जब दिल्ली रही तब तक रोडवेज की बस में हर वीकेंड पर देहरादून पहुंच जाती थी । फिर पापा की पहली बरसी पर उनकी कहानी ‘सुनहरी सपने’ पर नाटक मंचन करने गयी थी । अब भी साल में दो तीन बार तो देहरादून जाना हो ही जाता है ! अब भी दिल्ली में नाटक के बाद देहरादून जाऊंगी !

-कौन सी एक्ट्रेस पसंद ?

-ऐसे कोई आइडिया नहीं लेकिन डांसर थी तो वहीदा रहमान बहुत अच्छी लगती थीं । बलराज साहनी और फिर डांस के चलते ही माधुरी दीक्षित भी । यहां तक कि कंगना रानौत भी !

-वह भी आपकी तरह पहाड़ से है , हिमाचल से !

-जी ।

-पसंदीदा नाटक ?

-कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’ पर आधारित नाटक जिसकी नायिका उस जमाने से आगे काफी बोल्ड थी लेकिन वह अद्भुत नाटक था । खुद कृष्णा सोबती देखने आईं और गले लगा कर कहा कि तुमने तो मेरी मित्रो को जीवंत कर दिखाया !

-परिवार के बारे में कुछ ?

-ज्ञानदेव शिवपुरी जी का निधन तब हुआ जब ‘दिल वाले दुल्हनिया’ का क्लाईमेक्स शूट होने जा रहा था और आप देखेंगे उसमें मैं नहीं हूं ! एक बेटा है कात्यायन जो फिल्म निर्देशन से जुड़ा है और शाॅर्ट फिल्में भी बनाता है !

-किन निर्देशकों के साथ कैसा लगा ?

-सूरज बड़जात्या बहुत प्यारे डायरेक्टर और कम बोलने वाले जबकि करण जौहर खूब बोलते हैं । डेविड धवन डायरेक्टर के तौर पर पूरी छूट देते हैं । उनके और गोविंदा के साथ बीबी नम्बर वन और हीरो नम्बर वन करके मजा आ गया ।

-कोई पुरस्कार ?

-अनेक । संगीत नाटक अकादमी अवाॅर्ड, श्रीकांत वर्मा स्मृति अवाॅर्ड, महाराष्ट्र सरकार सम्मान , उत्तराखंड गौरव और टीवी में आईटीए अवाॅर्ड, कलर्स अवाॅर्ड और ऑल इंडिया जर्नलिस्ट अवाॅर्ड सहित अनेक सम्मान !

-लक्ष्य ?

-थियेटर की जिद्द व सार्थक फिल्में ।

हमारी अनंत शुभकामनाएं हिमानी शिवपुरी को !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – परिचर्चा ☆ “साहित्य में कोई शाॅर्टकट नहीं होता” – श्री शेखर जोशी ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ परिचर्चा ☆ “साहित्य में कोई शाॅर्टकट नहीं होता” – श्री शेखर जोशी ☆ श्री कमलेश भारतीय  

साहित्य में कोई शाॅर्टकट नहीं होता

खुली आंखों देखें दुनिया , अच्छा साहित्य पढ़ें नये रचनाकार

-कमलेश भारतीय

हरियाणा ग्रंथ अकादमी की ओर से शुरू की गयी पत्रिका के प्रवेशांक नवम्बर , 2012 के अंक में हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार शेखर जोशी से कथा विधा पर चर्चा की गयी थी । कल पंचकूला के सेक्टर 14 स्थित हरियाणा अकादमी भवन जाना हुआ तो प्रवेशांक ले आया ।

-हिंदी कहानी में वाद और आंदोलन कैसे शुरू हुए ?

-हिंदी कहानी में वाद और आंदोलन की शुरूआत का रोचक तथ्य यह है कि पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था ‘ सन् 1915 में प्रकाशित हुई थी । संवेदना व शिल्प की दृष्टि से यह कहानी अपने रचनाकाल में बेजोड़ थी और आज भी है ! इस नयेपन के बावजूद गुलेरी ने इसे नयी कहानी नहीं कहा ।

प्रेमचंद , सुदर्शन , जैनेंद्र , अज्ञेय , पहाड़ी, इलाचंद्र जोशी और अमृत राय ने भी सहज ढंग से कहानी के विकास में अपना योगदान दिया लेकिन किसी आंदोलन की घोषणा नहीं की ।

संभवतः सन् 1954 में कवि दुष्यंत कुमार ने ‘कल्पना’ पत्रिका में कहानी विधा पर केंद्रित एक आलेख लिखा और स्वयं खूब जोर शोर से ‘नयी कहनी’ का नारा बुलंद किया । अपने अभिन्न मित्रों मार्कंडेय व कमलेश्वर की कहानियों को नयी कहानी की संज्ञा दी ! संपादक भैरव प्रसाद गुप्त और आलोचक नामवर सिंह ने भी इस नामकरण पर अपनी मुहर लगा दी तो यह नाम पड़ा !

नयी कहानी के प्रवक्ता कहानीकारों की दिगंतव्यापी कीर्ति को देखकर ही शायद आने वाली पीढ़ियों के कहानीकारों ने भी अपने लिए एक नया नाम खोजने की परंपरा चलाई ताकि अपना वैशिष्ट्य रेखांकित किया जा सके ! जो भी हो कहानी को किसी वाद या आंदोलन से लाभ या नुकसान नहीं हुआ । कालांतर में वे ही कहानियां सर्वमान्य हुईं जिनमें अपना युग का यथार्थ प्रतिबिंबित था और कथ्य और शिल्प के स्तर पर बेजोड़ थीं !

-क्या कविता में सन्नाटा है ?

-कौन कहता है कि कविता में सन्नाटा है ? नये ऊर्जावान , प्रतिभाशाली कवि बहुत अच्छी कविताएं लेकर आ रहे हैं । हिमाचल , उत्तराखंड , छत्तीसगढ़, बिहार , मध्यप्रदेश और देश के अन्य भागों से कवि अच्छा लिख रहे हैं । प्रकाशकों से पूछ कर देखिए उनके पास कितने काव्य संग्रहों की पांडुलिपियां प्रकाशन की बाट जोह रही हैं !

-क्या कविता की तरह कथा में भी सन्नाटे की बात की जा सकती है ?

-कहानी में भी कोई सन्नाटा नहीं । जितने नये कहानीकार इस दौर में उभरे हैं उतने तो पचास दशक में भी नही थे !

-क्या कहानी पर बौद्धिकता भारी पड़ रही है ?

-कहानी पर बौद्धिकता हावी नहीं हो रही । कुछ लोग कई माध्यमों से अर्जित ज्ञान को अपनी कहानियों में प्रक्षेपित कर रहे हैं ! ऐसा प्रतीत होता है कि बौद्धिकता हावी हो गयी! हां , कुछ प्रबुद्ध कहानीकार वाकई अच्छे बौद्धिक हैं । सहज ढंग से अपनी अभिव्यक्ति में बौद्धिकता का आभास देते हैं । यह स्वागत् योग्य है ।

-पत्र पत्रिकाओं में साहित्य का स्थान कम होता जा रहा है । ऐसा क्यों ?

-कथा के ही नहीं समाचारपत्रों के रविवारीय अंकों में भी पहले जो साहित्यिक सामग्री रहा करती थी अब वह लुप्त होती जा रही है । कहानी के लिए यदि पत्रिकाओं में पृष्ठ कम होने की शिकायत है तो यह स्वीकार करना होगा कि कुछ पत्रिकायें कहानी पर ही केंद्रित हैं । बहुत कहानियां आ रही हैं । कितना पढ़ेंगे ? संस्मरण , यात्रा वृत्तांत , निंदापुराण इस कमी को पूरा कर ही रहे हैं न !

-नये रचनाकारों के नाम कोई संदेश देना चाहेंगे ?

– नये रचनाकारों के नाम कोई संदेश देने की पात्रता मैं स्वयं में नही देखता ! जैसे हमने खुली आंखों दुनिया को देखकर लिखा , उस्ताद लेखकों के साहित्य को पढ़कर सीखा,अपने समकालीन रचनाकारों की रचनाओं की बारीकियों को समझा वैसे ही किया जाये तो कुछ हासिल किया जा सकता है । आज के समाज को समझने के लिए साहित्य के अलावा अन्य विषयों की भी अच्छी जानकारी उतनी ही जरूरी है । सबसे बड़ी बात है आत्मविश्वास। धैर्य की ! साहित्य में कोई शाॅर्टकट नहीं होता !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈