श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ धनवान…. ☆

मनुष्य अतीतजीवी होता है। अपना बीता समय, विशेषकर बचपन उसकी स्मृतियों के केंद्र में होता है। अनेक बार इच्छा जगती है कि काश बचपन में लौट सकें! यह बात अलग है कि वयस्क बोध के साथ बचपन में लौटने की सोच, ख़ालिस बचपने के अलावा कुछ भी नहीं।

तब भी मनुष्य यह मनभावन बचपना करता रहता है। अनेक बार यह बचपना, सचमुच बचपन में ले जाता है। ऐसी ही एक घटना कल घटी।

सम्पूर्ण लॉकडाउन और उसके बाद अनलॉक-3 तक चरणबद्ध तरीके से पहुँचने की प्रक्रिया में लगभग पाँच माह बीत चुके हैं। इन पाँच माह में अनावश्यक कामों से बाहर जाना हर घर में प्रतिबंधित है। स्वाभाविक है कि इस बंधन से उच्चशिक्षा ग्रहण करती बिटिया की आउटिंग पर भी ब्रेक है। अपनी मित्रों के साथ कुछ शॉपिंग और फिर होटेल में भोजन, इस आउटिंग का एजेंडा होता है।

यह ब्रेक कल हटा जब अपने आगत जन्मदिन के निमित्त उसे पास के एक मॉल में कपड़े खरीदने जाने की अनुमति मिली। सारी एहतियात बरतकर वह और उसकी एक मित्र शॉपिंग के लिए गए।

शॉपिंग से लौटी तो  मेरे लिए दो टी-शर्ट साथ लाई। लॉकडाउन और उसके बाद लगभग ठप पड़ी व्यापारिक गतिविधियों के चलते अधिकांश समय ‘वर्क फ्रॉम होम’ ही रहा है। घर पर रहते हुए तीन टी-शर्ट में सारा काम चल रहा है। दो नियमित पहनने के लिए, एक बाजार से खरीदारी करने जाने के लिए जो लौटते ही धोने के लिए डाल दी जाती है। अन्य टी-शर्ट प्रयोग करने की न आवश्यकता अनुभव हुई, न अवसर ही आया। कुछ चित्त की वृत्ति भी ऐसी कि वसन की विविधता के आकर्षण में विशेष रमती नहीं।

याद आया कि माँ-पिताजी जब बाजार जाते थे तो हम भाई-बहनों के कपड़़े लाते थे। अपने आनंद में मग्न हमने कभी नहीं पूछा कि वे ख़ुद के लिए क्या लाए!

माँ का विस्तार होती है बेटी। उसके थैले से टी- शर्ट के रूप में निकला माँ का आशीर्वाद और बेटी का साथ पाकर मैं मानो बचपन में लौट गया! सुदर्शन फ़ाकिर ने लिखा है, ‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी!’

कुछ भी दिये बिना, सबकुछ पा लेनेवाले इस धनवान से ईर्ष्या करने के लिए पाठक स्वतंत्र हैं!

#हर मित्र इसी तरह धनवान हो!

©  संजय भारद्वाज 

 प्रात: 4:03 बजे, 27.8.20

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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अलका अग्रवाल

बेटी में माँ का अक्स देख उसकी लायी हुई शर्टें माँ का आशीर्वाद स्वरूप लगते ही बचपन की याद आ जाता है।बहुत सुंदर आलेख।

माया कटारा

यह कैसी अलौकिक अनुभूति है पितृ -पुत्री स्नेह की !
यह कैसी अनमोल प्राप्ति है धन की , जिसके समक्ष है नगण्य धन कुबेर का
रोम-रोम से दे रहा है दुआ एक पिता – जुग-जुग जीओ बिटिया….
तथास्तु का गुंजन है दसों दिशाओं में …
है मेरा भी अंतर्नाद – जुग जुग जीओ बिटिया रानी …. कृतिका बिटिया !
रचनाकार ! धन्य है भारत भूमि , बसता है जहाँ ऐसा धनवान , ऐसी धनी बिटिया..
ईर्ष्या नहीं
गर्व होगा पिता-पुत्री दोनों पर
प्रमाणित होंगे ..
अमोघ संस्कारों की खान …..