श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “गौरैया कहती सुनो…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 132 – गौरैया कहती सुनो… ☆

 कांक्रीट के शहर में, नहीं मिले अब छाँव।

गौरैया कहती सुनो, चलो चलें फिर गाँव।।

 *

रवि है आँख दिखा रहा, बढ़ा रहा है ताप।

ग्रीष्म काल का नवतपा, रहा धरा को नाप।।

 *

कंठ प्यास से सूखते, तन-मन है बैचेन ।

दूर घरोंदे में छिपे, बाट जोहते नैन।।

 *

उनने खुद ही कर दिया, काट उन्हें बेजान।

ठूंठों से है आजकल, जंगल की पहचान।।

 *

सभी घोंसले मिट गए, तनते रोज मकान।

दाना पानी अब नहीं, हम पंक्षी हैरान।।

 *

पोखर पूर तलाब में, तन गईं अब दुकान।

हम पक्षी दर-दर फिरें, खुला हुआ मैदान।।

 *

सूरज के उत्ताप से, सूखे नद-तालाब।

आकुल -व्याकुल कूप हैं, हालत हुई खराब।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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