श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 228 ☆ मानस प्रश्नोत्तरी ?

एक व्यक्ति को नरश्रेष्ठ कहलाने  होने की इच्छा हुई। इच्छा होना और भाव जगने में बड़ा अंतर है। इच्छा का तो दिनचर्या में कई बार जन्म होता है, कई बार मरण होता है। भाव की बात अलग है। इच्छा स्थितियों से प्रभावित हो सकती है जबकि काल, पात्र, परिस्थिति, भाव के आगे निर्बल होते हैं। 

नानाविध विचार कर व्यक्ति मार्गदर्शन लेने एक साधु के पास पहुँचा। व्यक्ति और साधु में कुछ यों प्रश्नोत्तर हुए-

श्रेष्ठ मनुष्य बनने के लिए क्या करना चाहिए?

– पहले मनुष्य बनने का प्रयास करना चाहिए।

मनुष्य बनने के लिए क्या करना चाहिए?

– परपीड़ा को समानुभूति से ग्रहण करना चाहिए।

परपीड़ा को समानुभूति से ग्रहण करने के लिए क्या करना चाहिए?

– परकाया प्रवेश आना चाहिए।

परकाया प्रवेश के लिए क्या करना चाहिए?

– अद्वैत भाव जगाना चाहिए।

अद्वैत भाव जगाने के लिए क्या करना चाहिए?

– जो खुद के लिए चाहते हो, वही दूसरों को देना आना चाहिए क्योंकि तुम और वह अलग नहीं हो।

‘मैं’ और ‘वह’ की अवधारणा से मुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए?

– सत्संग करना चाहिए। सत्संग ‘मैं’ की वासना को ‘वह’ की उपासना में बदलने का चमत्कार करता है।

सत्संग के लिए क्या करना चाहिए?

-अपने आप से संवाद करना चाहिए। हरेक का भीतर ऐसा दर्पण है जिसमें स्थूल और सूक्ष्म दोनों दिखते हैं। भीतर के सच्चिदानंद स्वरूप से ईमानदार संवाद पारस का स्पर्श है जो लौह को स्वर्ण में बदल सकता है।

लौह के स्वर्ण में बदलने की यह भावात्मक प्रक्रिया विभिन्न चरणों में होती है। सच्चा सत्संगी  स्वयं से संवाद करना आरम्भ करता है। जिस तरह स्वयं से संवाद करता है, अगले चरणों में उसी भाँति हरेक से संवाद करने लगता है। अब हरेक में वह है, अब वही हरेक है। स्व का यह विस्तार मनुष्य को अमृतपान कराता है। सारा विषाद, मत्सर, ईर्ष्या, लोभ, वासना, क्रोध, भय मरने लगता है, मनुष्य आत्मतत्व के प्रति रीझने लगता है। आत्म पर जितना मरता है, उतना अमर होता है मनुष्य।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 🕉️ मार्गशीर्ष साधना सम्पन्न हुई। अगली साधना की सूचना हम शीघ्र करेंगे। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
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