श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 105 – मनोज के दोहे… ☆

1 चाँद

हाथ थाम कर चल प्रिये, प्रेम भरी सौगात।

चाँद हँसा आकाश में, शरद पूर्णिमा रात।।

2 चकोर

नयना चंद्र चकोर बन, प्रिय को रहे निहार।

विरहन-सी रातें लगें, प्रतिदिन लगते भार।।

3 चंद्रिका

शरद रात में चंद्रिका, झिलमिल लगे अनूप।

शृंगारित दुल्हन बनी, धरे मोहनी रूप।।

4 चंद्रमुखी

देख रही आकाश में, चंद्रमुखी वह चाँद।

स्वप्न सलौने बुन रही, प्रेमिल सी उन्माद।।

5 पूनम

पूनम का वह चाँद फिर, खिला आज आकाश।

पृथ्वी पर बिखरा रहा, दुधिया नवल प्रकाश।।

6 शरद

शरद ऋतु ने ठंड की, बिखराई सौगात।

ओढ़ दुशाला काँपते, बूढ़ों की जगरात।।

 ©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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