डाॅ. मीना श्रीवास्तव

☆ आलेख  – शिवजयंती का प्रेरणादायक सुवर्णदिन ☆ डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

प्रिय स्वजनों,

आप सबको आज के परम पावन दिन आदरयुक्त प्रणाम! 

आज हम छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती मना रहे हैं। ३९४ साल पहले (१९ फरवरी, १६३०) जब शिवाजी महाराज का जन्म शिवनेरी किले में हुआ था, तब मुगलों और आदिल शाही ने न केवल महाराष्ट्र बल्कि, पूरे हिंदुस्तान को गुलाम बना लिया था। शिवराय के पराक्रम की कहानी को समझने के लिए, उनकी माता ने उन्हें किस प्रकार उनके जनम से ही रही प्रतिकूल परिस्थितियों में पाला, इस पर हमें विचार करना चाहिए। जिजाऊ द्वारा बाल शिवाजी को सुलाने के लिए गाई हुई लोरी इन त्रासदियों का सटीक वर्णन करती है, गोविंदाग्रज उर्फ राम गणेश गडकरी अपनी इसी रचना में कहते हैं-

गुणी बाळ असा जागसि कां रे वाया । नीज रे नीज शिवराया ॥ ध्रु ॥

अपरात्री प्रहर लोटला बाई । तरि डोळा लागत नाहीं ॥

हा चालतसे चाळा एकच असला । तिळ उसंत नाहीं जिवाला ॥

निजवायाचा हरला सर्व उपाय । जागाच तरी शिवराय ॥

चालेल जागता चटका, हा असाच घटका घटका

कुरवाळा किंवा हटका, कां कष्टविसी तुझी सांवळी काया ।

नीज रे नीज शिवराया ॥१॥

ही शांत निजे बारा मावळ थेट । शिवनेरी जुन्नर पेठ ॥

त्या निजल्या ना तशाच घाटाखालीं । कोंकणच्या चवदा ताली ॥

ये भिववाया बागुल तो बघ बाळा । किति बाई काळा काळा ॥

इकडे हे सिद्दि-जवान, तो तिकडे अफझुलखान

पलिकडे मुलुख मैदान, हे आले रे तुजला बाळ धराया ।

नीज रे नीज शिवराया ॥२॥

इस कर्तव्यकठोर माता ने बाल शिवाजी के चरित्र को सुचारु रूप से सही आकार दिया। उस समय शिवबा के महा पराक्रमी पिता शहाजी राजे भोसले कर्नाटक में थे। लेकिन उनकी अनुपस्थिति में भी यह वीरमाता शिवबा पर सर्वांगीण संस्कार कर रही थी। शिवबा न केवल रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथ बल्कि युद्ध कला भी सीखकर अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए सम्पूर्ण शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। अपनी मां जिजाबाई और गुरु दादोजी कोंडदेव के मार्गदर्शन में शिवबा सकलगुणमंडित बन गए, उनमें देशभक्ति की जाज्वल्य भावना इस तरह भर गई कि, मात्र 16 साल की उम्र में ही शिवबा ने तोरणा किला जीत लिया और स्वराज्य का तोरण बांध दिया!

उनकी संघटन शक्ति का उदाहरण भी लें, तो उनकी पारखी नजर हमें आश्चर्यचकित कर देती है| महाराज के साथ रह कर पवित्र हुए और पहले से ही पवित्र रहे १८ पगड जातिके और प्रत्येक धर्म के मावळे स्वराज्यबंधन अभिमान से धारण करते थे और उनके प्रत्येक स्वराज्य-अभियान में अत्यंत आत्मविश्वास के साथ, जिद्द लेकर, उत्साह से भरपूर, बड़े ही आनंदपूर्वक शामिल होते थे| उनका शौर्य, पराक्रम, बुद्धिमत्ता, रणकौशल आदि के बारे में मैं अल्पमति क्या लिखूं, केवल नतमस्तक होती हूँ| वे स्त्रियों का बहुत सन्मान करते थे| क्या वर्णन करें उसका! कल्याण के सूबेदार की सुन्दर बहू को देख, ‘अशीच आमुची आई असती सुंदर रूपवती, आम्हीही सुंदर झालो असतो वदले छत्रपती’.(उन्होंने कहा कि, अगर हमारी माता ऐसे ही सुन्दर होती, तो हम भी सुन्दर होते)| ये माता के संस्कार तथा शिवराय की  निर्लोभ और निरंकारी वृत्ति थी| उनका अव्वल शत्रु औरंगजेब भी उसके सरदारों को शिवाजी के गुण आत्मसात करने को कहता था| शिवराय ने मुगल बादशहा औरंगजेब और सब नए पुराने अस्त्र-शस्त्र के साथ रही उसकी महाकाय फौज का आक्रमण रोका, यहीं नहीं, उनका पारिपत्य भी किया। यह करते हुए अपनी मुठ्ठी भर फौज के साथ “गनिमी कावा” को अमल में लाते हुए इस “दक्खन के चूहे” ने औरंगजेब के नाक में दम कर दिया था| 

महाराज के जीवन में उनकी कसौटी परखने वाले कई क्षण आए|, जयसिंग राजे के साथ किये समझौते में हारे हुए कई किले, आगरे की कैद से चतुराई दिखाकर खुद की और बाल संभाजी की अविश्वसनीय रिहाई,  बाजीप्रभू देशपांडे, मुरारबाजी और तानाजी जैसे अपने कई साथियों की मृत्यू, स्वकीयोंके कपट, ऐसे कई संकटों से जूझकर महाराज बाहर निकले और फिर राजगड पर राज्याभिषेक हुआ शिवराय का (६ जून १६७४)| इस प्रसंग का अविस्मरणीय वर्णन समर्थ रामदास स्वामीजी के ‘आनंदवन भुवनी’ इस काव्य में अनुभव करना होगा:

‘स्वर्गीची लोटली जेथे, रामगंगा महानदी, तीर्थासी तुळणा नाही आनंदवनभुवनी

बुडाली सर्व ही पापे, हिंदुस्थान बळावले,अभक्तांचा क्षयो झाला आनंदवनभुवनी’

महाकवि भूषण शिवराय के महापराक्रमी रूप का वर्णन ऐसे करते हैं: 

इन्द्र जिमि जंभ पर, बाडब सुअंभ पर, रावन सदंभ पर, रघुकुल राज हैं।

पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर,ज्यौं सहस्रबाह पर राम-द्विजराज हैं॥

दावा द्रुम दंड पर, चीता मृगझुंड पर,’भूषन वितुंड पर, जैसे मृगराज हैं।

तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर,त्यौं मलिच्छ बंस पर, सेर शिवराज हैं॥

(भूषण कवि कहते हैं कि, इंद्र ने जिस प्रकार जंभासुर नामक दैत्य पर आक्रमण करके उसे मारा था, जिस प्रकार बाडवाग्नि समुद्रजल को जलाकर सोखती है, दुराचारी एवं कपटी रावण पर जिस प्रकार रघुकुल तिलक श्रीराम ने आक्रमण किया था, जैसे बादलों पर वायु का वेग टूट पडता है, जिस प्रकार शिवजी ने रति के पति कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया था, जिस प्रकार अत्याचारी सहस्रबाहु (कार्त्तवीर्य) राजा को परशुराम ने आक्रमण कर मार गिराया था, जंगली वृक्षों पर दावाग्नि का जैसा प्रकोप दिखता है, जिस प्रकार वनराज सिंह का हिरणों के झुंड पर आतंक छाया रहता है, या हाथियों पर मृगराज सिंह का दबदबा रहता है, जिस प्रकार सूर्य की किरणें तम नष्ट कर देती हैं और खली कंस पर जिस तरह आक्रमण कर युवा श्रीकृष्ण ने उसका विनाश किया था, उसी प्रकार सिंह के समान शौर्य, साहस  एवं पराक्रम दर्शाने वाले छत्रपति शिवाजी का मुग़लों के वंश पर आतंक छाया रहता है।) 

संभाजी महाराज को भेजे हुए पत्र में समर्थ रामदासस्वामी उन्हें उनके महान पिता का स्मरण करवाते हुए ऐसा उपदेश करते हैं:

शिवरायांचे आठवावे रूप। शिवरायांचा आठवावा प्रताप ।

शिवरायांचा आठवावा साक्षेप ।भूमंडळी ||

शिवरायांचे कैसें बोलणें ।शिवरायांचे कैसें चालणें ।

शिवरायांची सलगी देणे ।कैसी असे ||

निश्चयाचा महामेरू । बहुत जनांसी आधारू ।

अखंड स्थितीचा निर्धारु । श्रीमंत योगी ||

मुगलशाही और आदिलशाही के वर्चस्व को नकारते हुए “स्वराज्य का तोरण” बांधने वाले हमारे सच्चे हृदयसम्राट गो-ब्राम्हण प्रतिपालक शिवाजी महाराज! ऐसे महान राष्ट्रपुरुष के गुणों का जितना ही बखान करें, सो कम ही है! महाराष्ट्र यानि छत्रपती शिवाजी महाराज, परन्तु छत्रपती शिवाजी महाराज यानि महाराष्ट्र, ऐसा ओछा विचार मन में लाना यानि, प्रत्यक्ष राष्ट्रभूषण छत्रपती शिवाजी महाराज का ही अपमान होगा| 

इसीलिए तो शिवराय का केवल नाम याद आते ही रोमांच का अनुभव होता है| यहीं सकल गुणनिधान छत्रपती शिवाजी महाराज हमारे सर्वकालीन आदर्श हैं!  मैं उनके  चरणों पर नतमस्तक हो कर आज के पवित्र शिवजयंती के अवसर पर उन्हें यह शब्दकुसुमांजली अर्पण करती हूँ! 

जय शिवराय!!! 🙏🙏🙏

डॉ. मीना श्रीवास्तव                                         

फोन नंबर – ९९२०१६७२११

© डॉ. मीना श्रीवास्तव

दिनांक-१९ फरवरी २०२४

ठाणे 

मोबाईल क्रमांक ९९२०१६७२११, ई-मेल – [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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