हिन्दी साहित्य- लघुकथा – डस्टबिन – डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डस्टबिन

विवाह सम्बन्ध के लिए आये परिवार में अलग से परस्पर बातचीत में नवयुवती शीला ने युवक मनोज से पहला सवाल किया”

आपके घर में भी डस्टबिन तो होंगे ही, बताएंगे आप कि, उनमें सूखे कितने हैं और गीले कितने?

समझा नहीं मैं शीला जी, डस्टबिन से आपका क्या तात्पर्य है!

तात्पर्य यह है मनोज जी कि–

आपके परिवार में कितने बुजुर्ग हैं? इनमें सूखे से आशय-जो कोई काम-धाम करने की हालत में नहीं है पर अपनी सारसंभाल खुद करने में सक्षम है और गीले डस्टबिन से मेरा मतलब अशक्त स्थिति में बिस्तर पर पड़े परावलंबी व्यक्ति से है।

तुम्हारा मतलब,  बुजुर्ग डस्टबिन होते हैं?

हाँ, सही समझे, यही तो मैं कह रही हूँ।

ओहो! कितनी एडवांस हैं आप शीला जी, आपके इन सुंदर नवाधुनिक क़विचारों ने तो मेरे ज्ञानचक्षु ही खोल दिये।

अब मैं आपके ही शब्दों में बताता हूँ, यह कि–

हाँ, है मेरे घर में, सूखे और गीले दोनों तरह के डस्टबिन जो हमारी गलतियों, भूलों, कमियों व अनचाहे दूषित तत्वों को अपने में समेटते-सोखते हुए अपने आशीष भावों से सदैव हमारे स्वास्थ्य, सुख एवं समृद्धि की कामना करते रहते हैं।

ये वही डस्टबिन हैं जिनकी वजह से मेरा घर-परिवार व आसपास का संसार शुरू से स्वच्छ और सुंदर बना हुआ है।

शीला जी, मेरी राय मानो तो,- आप इन गीले सूखे पचड़ों में पड़ने की बजाय कोई नितांत डस्टबिन रहित घर-वर अपने लिए ढूंढ लें, शायद सभी मनचाहे सुख प्राप्त हो जाएं।

हाँ एक समस्या हो सकती है,वो है – ” घर के कूड़े-कचरे की”

पर चिंता न करें, समय के साथ आखिर एक दिन आपको भी तो डस्टबिन में तब्दील होना ही है, तभी इस समस्या के निदान के साथ साफ-सफाई के बारे में भी सोच लेना।

अच्छा, चलता हूँ शीला जी, बाय…..

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – एक व्यंग्यकार की आत्मकथा – श्री जगत सिंह बिष्ट

जगत सिंह बिष्ट

एक व्यंग्यकार की आत्मकथा

यह एक व्यंग्यकार की आत्मकथा है।  इसमें आपको ’एक गधे की आत्मकथा’ से ज़्यादा आनन्द आएगा।  गधा ज़माने का बोझ ढोता है, व्यंग्यकार समाज की विडम्बनाओं को पूरी शिददत से मह्सूस करता है।  इसके बाद भी दोनों बेचारे इतने भले होते हैं कि वक्त-बेवक्त ढेंचू-ढेंचू करके आप सबका मनोरंजन करते हैं।  यदि आप हमारी पीड़ा को ना समझकर केवल मुस्कुराते हैं तो आप से बढ़कर गधा कोई नहीं।  क्षमा करें, हमारी भाषा ही कुछ ऐसी होती है।

इस आत्मकथा में जितने प्रयोग सत्य के साथ किये गये हैं, उससे कहीं अधिक असत्य के साथ।  यह निर्णय आपको करना होगा कि क्या सत्य है और क्या असत्य।  मोटे तौर पर, उपलब्धियों के ब्यौरे को झूठा मानें और चारित्रिक कमज़ोरियों के चित्रण को सच्चा जानें।  आत्मकथा का जो अंश अच्छा लगे, उसे चुराया हुआ समझें और जो घटिया लगे, उसे मौलिक मान लें।  जहां कोई बात समझ में न आये तो उसका ठीक विपरीत अर्थ लगायें क्योंकि व्यंग्यकार शीर्षासन के शौकीन माने जाते हैं।

व्यंग्यकार ज़माने के साथ चलता है और उनको पहचानता है जो गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं।  आपकी रुचि और रुझान की भी उसे पहचान है. इसलिये उसकी आत्मकथा में आपको भरपूर मसाला मिलेगा. इस व्यंग्यकार की हार्दिक और शारीरिक ख्वाहिश है कि वह भी कमला दास और खुशवंत सिंह की तरह चर्चित हो. इसलिये वह आवश्यक हथकंडे अपनाने को भी तैयार है।

अब आत्मकथा आरंभ होती है…..

संयोग से मेरा कलयुगी अवतार संस्कारधानी जबलपुर में हुआ जहां से ओशो रजनीश, महर्षी महेश योगी और हरिशंकर परसाई ताल्लुक रखते हैं।  आज तक मैं यह नहीं समझ पाया कि लुच्चों-लफ़ंगों के लिये मशहूर इस शहर को संस्कारधानी क्यों कहा जाता है? भगवान रजनीश की प्रवचन-पुस्तक ’संभोग से समाधि की ओर’ का गहन अध्ययन मैंने जवानी के दिनों में गैर धार्मिक कारणों से किया था।  महर्षि महेश योगी के प्रति मेरी गहरी श्रद्धा तब से है जब उन्होंने भावातीत ध्यान के माध्यम से विश्व शांति का अनुष्टान किया था और अमरीका ने इराक पर ’कारपेट” बमबारी कर दी थी।  हरिशंकर परसाई का प्रभाव अलबत्ता मेरी सोच पर पर्याप्त रूप से पड़ा है।  शायद वे ही इस व्यंग्यकार के प्रेरणा पुरुष हैं।  उनकी तरह लिखना-पढ़ना चाहता हूं लेकिन टांगें तुड़वाने में मुझे डर लगता है।  मैं प्रतिबद्धता का जोखिम मौका देखकर उठाता हूं।

हरिशंकर परसाई के सान्निध्य में कुछ बातें सीखीं।  व्यंग्यकार कोई विदूषक या मसखरा नहीं होता।  वह पूरी गंभीरता और सूक्ष्मता के साथ घटनाओं को देखता है और विसंगतियों पर निर्ममता से प्रहार करता है।  एक बात में अवश्य वे मुझे ’मिसगाइड’ कर गये – उन्होंने मुझे ध्यानपूर्वक रवीन्द्रनाथ त्यागी की रचनाएं पढ़ने की सलाह दी।  मैंने उनकी आज्ञा का पालन किया।  प्रारंभ में तो बहुत आनन्द आया लेकिन जब प्रत्येक व्यंग्य में महिलाओं का नख-शिख वर्णन आने लगा तो मैं दिग्भ्रमित-सा हो गया।  लिखते-पढ़ते वक्त मुझे जगह-जगह गद्य में उरोज और नितंब छिपे दिखाई देने लगे और मेरी बुद्धि और गद्य भ्रष्ट होते गये।  मुझे लगता है कि सम्मानित व्यंग्यकार की खोपड़ी में कोई रीतिकालीन पुर्जा आज भी फ़िट है।  मेरे लेखन में जहां कहीं घटियापन नज़र आये तो उसके लिये आदरणीय रवीन्द्रनाथ त्यागी को ज़िम्मेदार माना जाये।

शरद जोशी के व्यंग्य मैं मंत्रमुग्ध हो कर पढ़ता और सुनता था।  उनकी शब्द छटा अलौकिक होती थी और मैं मुक्त मन और कंठ से उसकी प्रशंसा करता था लेकिन उनके चेलों में एक अजब-सी संकीर्णता व विचारहीनता दृष्टिगोचर होती है।  वे हरिशंकर परसाई और उनके स्कूल के सभी व्यंग्यकारों को खारिज करते हैं जबकि उनके स्वयं के लेखन में दृष्टिशून्यता है।  मैंने व्यंग्य लेखन की शुरुआत भोपाल में की थी लेकिन ऐसे व्यंग्यकारों से दूर ही दूर रहा।  छ्त्तीसगढ़ अंचल के कुछ नामी व्यंग्यकारों के प्रति मेरी श्रद्धा, काफ़ी कोशिशों के बाद भी, उमड़ नहीं पाती।

आज तक मैं यह नहीं समझ सका कि इतने बड़े सरकारी अधिकारी होते हुए भी श्रीलाल शुक्ल और रवीन्द्रनाथ त्यागी इतने अच्छे व्यंग्य कैसे लिखते रहे।  मैं एक अदना-सा बैंक अधिकारी हूं लेकिन लाख चाहते हुए भी लिखने-पढ़्ने के लिये उतना समय नहीं दे पाता जितना उच्चकोटि के लेखन के लिये आवश्यक है।  नतीज़ा यह है कि मेरी गिनती न तो अच्छे अधिकारियों में होती है और न ही अच्छे व्यंग्यकारों में। मैं विज्ञान का विद्यार्थी था।  यह मेरी ताकत भी है और कमज़ोरी भी।  जीवन और लेखन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि मेरा ’असेट’ है और साहित्य का घोर अज्ञान मेरी कमी।

व्यंग्य की दुनिया में महिला व्यंग्य लेखिकाओं और प्रशंसिकाओं की कमी बेहद खलती है।  शायद ’व्यंग्य’ शब्द में ही विकर्षण प्रतिध्वनित होता है।  फ़िर भी, भविष्य के प्रति यह व्यंग्यकार आशावान है और इंतज़ार के मीठे फ़लों के लिये पलक पाँवड़े बिछाये बैठा है।  एक गृहस्थ व्यंग्यकार इससे अधिक खुले आमंत्रण का खतरा मोल नहीं ले सकता।  मेरी इकलौती बीवी और मेरा इकलौता बेटा सब कुछ जानते समझते हुए भी मुस्कुराकर सब कुछ झेलते रहते हैं।  उन पर दो अलग अलग व्यंग्य महाकाव्य बुढ़ापे में रचूंगा।  अभी ’रिस्क’ लेना ठीक नहीं।  अपने प्रेम-प्रसंगों पर भी  फ़ुरसत में कभी लिखूंगा।  इनमेम धर्म, संप्रदाय और प्रदेशों की संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर अनेकता में एकता की राष्ट्रीय भावना आपको दिखाई देगी।  प्रारंभिक प्रेम कथाएं ’प्लेटोनिक’ हैं और बाद वाली ’फ़्रॉयडियन’ – यानि मैं निरंतर विकास क्रम में आगे बढ़ता रहता हूँ।

लेखन और प्रकाशन के क्षेत्र में मैं बहुत ’लकी’ रहा।  थोड़ा लिखकर खूब छ्पा और प्रसिद्धि पाई।  कुछ साहित्य-संपादक मेरे खास मित्र हैं और कुछ पंकज बिष्ट के धोखे में मुझे बेधड़क छाप देते हैं।  कई बार आकाशवाणी और दूरदर्शन पर भी मैं पंकज बिष्ट के नाम से वार्ताएं प्रसारित कर चुका हूँ।  स्थानान्तरण के बाद जब किसी नये नगर में पहुंचता हूं तो शायद इसीलिये मेरा परिचय ’सुविख्यात’ लेखक के रूप में कराया जाता है।  मैं खामोश रहता हूँ।  मेरा पहला व्यंग्य-संग्रह ’तिरछी नज़र’ भी उसी धोखे में छप गया।  प्रकाशक बेचारा आज तक पछता रहा है।  पुस्तक का शीर्षक देखकर गलतफ़हमी में नौजवान और बूढ़े सभी इसे रस लेकर एकांत में पढ़ते हैं।  बच्चे उसको पढ़कर बाल-साहित्य का आनंद पाते हैं।  कुछ विद्वान आलोचकों ने इस भ्रम में पहले संकलन की तारीफ़ कर दी कि शायद आगे चलकर मैं बेहतर लिखने लगूँ ।  पाठकों को मैं, खुशवंत सिंह की तरह, मसाले का प्रलोभन देता रहता हूं और वो मेरी रचनाएं किसी झूठी उम्मीद में पढ़ते चले जाते हैं।  साहित्यिक मित्रों को बेवकूफ़ बनाना ज़्यादा मुश्किल नहीं होता।  उन्होंने लिखना-पढ़ना, सोचना- समझना, काफ़ी समय पहले से बंद किया होता है।  उनसे मिलते ही मैं उनकी कीर्ति की चर्चा करने लगता हूँ और वे जाते ही मेरी प्रतिष्ठा बढ़ाने में लग जाते हैं।  साहित्य का संसार अंदर और बाहर बड़ा मज़ेदार है।

समाज में व्यंग्यकार कोई सम्माननीय जीव नहीं माना जाता।  इस जंतु को थोड़ी-बहुत स्वीकृति ’भय बिनु होय न प्रीति’ के सूत्र के अंतर्गत ही मिलती है।  नासमझ लोग उससे उसी तरह खौफ़ खाते हैं जैसे क्रिकेट में बल्लेबाज तूफ़ानी गेंदबाजों से आतंकित होते हैं।  मुझे तो ‘लेग स्पिन’ गेंदबाजी में ज़्यादा आनंद आता है।  लाइन, लैंग्थ और फ़्लाइट में परिवर्तन करते हुए, लैग स्पिन के बीच अचानक गुगली या फ़्लिपर फ़ैंकने का जो आनंद है, वो बाऊन्सर पटकने में कहाँ ! सार्थक और मारक व्यंग्य वही है जिसमें खिलाड़ी क्लीन-बोल्ड भी हो जाए और अपनी मूर्खता पर तिलमिलाने भी लगे।  व्यंग्य में लक्ष्य-भेदन की कुशलता के साथ-साथ खेल भावना, क्रीड़ा-कौतुक और खिलंदड़पन भी हो तो आनंद कई गुना बढ़ जाता है।  गंभीरता अपनी जगह है और छेड़छाड़ का मज़ा अपनी जगह।

यह आत्मकथा मैंने बड़ी संजीदगी के साथ शुरु की थी लेकिन लंबा लिखने का धैर्य मुझमें नहीं है और जो कुछ भी आड़ा-तिरछा लिखता हूं, उसे छपवाने की मुझे जल्दी रहती है।  अतः आत्मकथा न सही, फ़िलहाल आत्मकथा की भूमिका पढ़कर ही कृतार्थ हों।  शुभचिंतकों की सलाह पर धीरे-धीरे मैं अपने व्यंगों को ’चुइंगम’ की तरह खींचने का अभ्यास कर रहा हूं।  अगर सफ़ल हुआ तो कभी न कभी आत्मकथा अवश्य लिखूंगा……..

©  जगत सिंह बिष्ट

(श्री जगत सिंह बिष्ट जी मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता के अतिरिक्त एक श्रेष्ठ व्यंग्यकार भी हैं।)

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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – माँ की नज़र – श्री सदानंद आंबेकर

श्री सदानंद आंबेकर 

माँ की नज़र
अपनी बेटी अंजलि के आठवी की परीक्षा में प्रावीण्य सूची में आने की खुशी में सुधीर जी ने अपने घर पर आस-पास के लोगों की एक छोटी सी घरेलू पार्टी का आयोजन आज शाम को किया था।
रविवार का दिन था सो सुबह से ही घर के तीनों सदस्य व सुधीर की माताजी भी व्यवस्थाओं में जुटे थे।
इस गहमागहमी में बेटी को आराम से बैठ कर टी वी देखते पाकर वे गुस्सा होकर बोले- ”तुम्हारे ही लिये हमने ये कार्यक्रम रखा है और तुम काम में माँ को थोड़ा हाथ बंटाने की जगह आराम से बैठकर टी वी देख रही हो ? जाओ और मम्मी को रसोई में मदद करो।”
शोर सुनकर अंजलि की माँ बाहर आई और पति को कहा- “क्यों उसके पीछे पड़े रहते हो, अभी वह छोटी है फिर बड़ी होकर तो ताउम्र गृहस्थी में खटना ही है” – कहकर स्नेह भरी नजर बेटी पर ड़ालकर रसोई में चली गई। बेटी ने भी सुना और वैसे ही बैठी रही।
कुछ देर बाद नहाने के पूर्व सुधीर जी को याद आया कि नहाने का साबुन खत्म हो गया है। उन्होंने फिर बेटी को आवाज दी और कहा कि चेलाराम की दुकान से नहाने के साबुन की दो टिकिया जल्दी से ला दो और पैसे माँ से ले लेना।
यह सुनते ही उनकी  पत्नी फिर रसोई से बाहर आई और कहा-”सुनो, बिटिया अब बड़ी हो गई है, उसे यूं अकेला-दुकेला चाहे जहाँ बाहर मत भेजा करो, कुछ आया समझ में……..? आप खुद जाओ”….
अंजलि ने अपनी माँ की तरफ उलझन भरी निगाहों से देखा मानो उसकी दोनों बातों का मतलब समझना चाह रही हो फिर पहले की तरह चुपचाप टी वी देखने लगी।

©  सदानंद आंबेकर

(श्री सदानंद आंबेकरजी हिन्दी एवं मराठी साहित्य लेखन में अभिरुचि।  गायत्री तीर्थ  शांतिकुंज, हरिद्वार के निर्मल गंगा जन अभियान के अंतर्गत गंगा स्वच्छता जन-जागरण हेतु गंगा तट पर 2013 से  निरंतर प्रवास।)

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हिन्दी साहित्य- कविता -मैं काली नहीं हूँ माँ! – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

नीलम सक्सेना चंद्रा

 

 

 

 

 

मैं काली नहीं हूँ माँ!

 

माँ,

सुना है माँ,

कल किसी ने एक बार फ़िर

यह कहकर मुझसे रिश्ता ठुकरा दिया

कि मैं काली हूँ!

 

माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ!

 

कल जब मैं

बाज़ार जा रही थी,

चौक पर जो मवाली खड़े रहते हैं,

उन्होंने मुझे देखकर सीटी बजाई थी

और बहुत कुछ गन्दा-गन्दा बोला था,

जिसे मैंने हरदम की तरह नज़रंदाज़ कर दिया था;

काले तो वो लोग हैं माँ!

माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ!

 

उस दिन जब मेरे बॉस ने

चश्मे के नीचे से घूरकर कहा था,

प्रमोशन के लिए

और कुछ भी करना होता है,

मैं तो डर ही गयी थी माँ!

काला तो वो मेरा बॉस था माँ!

माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ!

 

अभी कल टेलीविज़न पर ख़बर सुनी,

एक औरत के साथ कुकर्म कर

उसे जला दिया गया!

माँ, यह कैसा न्याय है माँ?

काले तो वो लोग थे माँ!

माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ!

 

यह कैसा देश है माँ

जहाँ बुरे काम करने से कुछ नहीं होता

और चमड़ी के रंग पर

लड़की को काली कहा जाता है?

माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ!

माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ!

© नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की साहित्यकार हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। वर्तमान में  आप जनरल मैनेजर (विद्युत) पद पर पुणे मेट्रो में कार्यरत हैं।)

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हिन्दी साहित्य-कविता – पहाड़ पर कविता – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

जय प्रकाश पाण्डेय

 

 

 

 

 

पहाड़ पर कविता

जंगल को बचाने के लिए,
पहाड़ पर कविता जाएगी,
कुल्हाड़ी की धार के लिए,
कमरे में दुआ मांगी जाएगी,
पहाड़ पर बोली लगेगी,
कविता भी नीलाम होगी,
कवियों के रुकने के लिए,
कटे पेड़ के घरौंदे बनेंगे,
उनके ब्रेकफास्ट के लिए,
सागौन के पेड़ बेचे जाएंगे,
उनके मूड बनाने के लिए,
महुआ रानी चली आयेगी,
कविता याद करने के लिए,
रात रानी बुलायी जाएगी,
कविता के प्रचार के लिए,
नगरों के टीवी खोले जाएंगे,
कवि लोग कविता में,
जंगल बचाने की बात करेंगे,
टी वी में कविता के साथ,
पेड़ रोने की आवाजें आयेंगी,
दूसरे दिन मीडिया से,
जांच कमेटी खबर बनेगी,
और पहाड़ पर कविता,
बेवजह बिलखती मिलेगी,

© जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जय प्रकाश पाण्डेय, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा हिन्दी व्यंग्य है। )

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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – जवाब – श्री सदानंद आंबेकर

श्री सदानंद आंबेकर 

 

 

 

 

 

लघुकथा- जवाब

 

“जिसने जीवन बांटा है वो सुख के पल भी बांटेगा,

जीवन में जो दुःख आयेंगे, वो दिन भी वह ही काटेगा…..”

 

तेजी से भागती हरिद्वार अहमदाबाद एक्सप्रेस में कच्चे कंठ से यह गाना सुनाई दिया, धीरे-धीरे गाने के बोल साफ होने लगे। थोड़ी देर बाद एक छोटी-सी लड़की पत्थर की दो चिप्स उंगलियों में फंसाकर ताल देकर गाना गाते हुये आगे निकल गई। डिब्बे के दूसरे छोर पर पहुँच  कर उसने हाथ फैलाकर पैसे मांगना शुरू  किया। मेरे पास जब वो आई तो उसे ध्यान से देखा, आठ-नौ साल की लड़की, मैली से जीन्स टी शर्ट  पहने सामने खड़ी थी। चेहरे पर भिखारियों का भाव न होकर छिपा हुआ अभिजात्य दिख रहा था। उसकी मासूमियत देखकर उसे भिखारी मानने का मन नहीं करता था। उसके हाथ पर पैसे रखते हुये सहज भाव से मैंने पूछा – “स्कूल में पढ़ती हो?”

उसने झिझकते हुये कहा- “पढ़ती थी, चौथी कक्षा में।”

मैंने फिर प्रश्न किया- “फिर अब ये काम क्यों करती हो?”

जवाब में उसने सूनेपन से कहा- “पिताजी का देहांत हो गया है।”

मेरी उत्सुकता ने फिर प्रश्न  दागा- “फिर अब घर कौन चलाता है?”   ……

उसने विरक्त भाव से मुझे देखा, पैसे जेब में रखे, गाना शुरू किया और आगे चल दी –

 

“जिसने जीवन बांटा है वो सुख के पल भी बांटेगा,

जीवन में जो दुःख आयेंगे, वो दिन भी वह ही काटेगा…..”

 

मुझे जैसे मेरे प्रश्न  का जवाब मिल गया था।

©  सदानंद आंबेकर

(श्री सदानंद आंबेकरजी हिन्दी एवं मराठी साहित्य लेखन में अभिरुचि।  गायत्री तीर्थ  शांतिकुंज, हरिद्वार के निर्मल गंगा जन अभियान के अंतर्गत गंगा स्वच्छता जन-जागरण हेतु गंगा तट पर 2013 से  निरंतर प्रवास।)

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हिन्दी साहित्य- व्यंग्य- सेल की शाॅल – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

जय प्रकाश पाण्डेय

 

 

 

 

 

सेल की शाॅल 

करेला और नीम चढ़ा की तरह सेल में डिस्काउंट चढ़ बैठता है पुरुष सेल और डिस्काउंट से चिढ़ते हैं और महिलाएं सेल और डिस्काउंट के चक्कर मे सीढ़ी चढ़तीं हैं। माल में सेल और डिस्काउंट का बोलबाला है।माल  के बाहर बैठा हुआ एक फिलासफर टाइप का आदमी एक डेढ़ घंटे से S. A. L. E और डिस्काउंट शब्दों की उधेड़बुन में इतना परेशान दिख रहा है कि उसके चेहरे में हवाईयां उड़ रही हैं। बीच बीच में बुदबुदाता हुआ वो आदमी कभी दाढ़ी के बाल नोंचता है कभी नाक में ऊंगली डाल के नाक छिंनकता है। कभी पेन खोलकर हाथ की गदेली में एस ए एल ई लिखकर आसमान की तरफ देखता है तो कभी दूसरे हाथ की गदेली में डिस्काउंट लिखकर थूक से मिटाता है। जिस चमचमाते वैभवशाली अलबेले मॉल के सामने वह बैठा है वहां लड़के लड़कियों के झुंड फटे जीन्स पहने कूल्हे मटका रहे हैं, बीच बीच में कुछ लड़के लड़कियां अल्हड़ सी आवारगी के साथ भटकते हुए स्वचलित सीढ़ियों से माल की रंगत और जगमगाहट का आनंद लेते हैं माल के गेट का कांच दरवाजा शर्म से पानी पानी हो जाता है जब ये करीब आते हैं।

वह फिलासफर टाइप का आदमी अपने आप से ही पूछता है कि क्या बाजार संस्कृति का मायावी तिलिस्म हमसे हमारा समय बोध छीनने पर उतारू है? माल के सामने दो आटो वाले डिस्काउंट पर बहस करते हुए मजाकिया अंदाज में कह रहे हैं कि सेल में अधिकांश चीजें एक खरीदो साथ में एक फ्री मिलतीं हैं जिसके पास बीबी नहीं होती उसको भी सुविधा मिलती है। माल के गेट पर दो तीन मनचले माल में आते जाते मनभावन माल की फटी जीन्स पर फिदा लग रहे हैं।

माल की सारी दुकानों के गेट पर चमचमाते शब्दों में अंग्रेजी में सेल और डिस्काउंट लिखे शब्दों को वह कांच से देख रहा है पत्नी अंदर माल की सेल में है। वह बार बार सोचता है कि ये सेल और डिस्काउंट शब्दों में लार टपकता गजब का आकर्षण क्यों होता है जो महिलाओं और खाऊ पुरुषों को आकर्षित कर चुम्बक की तरह खींचता है। उसे याद आया पड़ोसन जब भी सेल से कुछ खरीद कर लाती है उस दिन घर में खूब उठापटक और गालीगलौज का माहौल बनता है।

सुबह अखबार आता है अखबार के अंदर सेल के पम्पलेट से उसे चिढ़ होती है इसलिए वह चुपके से उस पम्पलेट को फाड़ कर छुपा देता है। एक बार फाड़ते समय बीबी ने रंगे हाथों पकड़ लिया और खूब सुनाया बोली – ‘तुम मेरी भावनाओं और इच्छाओं से खिलवाड़ करते हो, मेरे शापिंग के शौक में अडंगा डालते हो’….. और भी बहुत बोला, बताने लायक नहीं है।

सब शापिंग पीड़ित पतियों को आज तक समझ नहीं आया कि महिलाओं को सेल और डिस्काउंट से इतना प्रेम क्यों होता है। सेल और डिस्काउंट से पति लोग चिढ़ते हैं पर पत्नियां सेल और डिस्काउंट से अजीब तरह का प्रेम करतीं हैं। प्रेम करते समय उनसे पूछो तो कहतीं हैं “पता नहीं क्या हो जाता है खरीदारी का भूत सवार हो जाता है” हांलाकि हर बार घर पहुंच कर दबी जुबान से ठगे जाने का अहसास करातीं हैं और दुकान मालिक की ‘ठठरी बंध जाए’ कहके पति का दिल जीतना चाहतीं हैं। ऐसे में पति का बाप कवि हो तो बहू बेटे की ये बातें सुन सुन कर सेल और डिस्काउंट विषय पर महाकाव्य लिख लेता है।

माल संस्कृति ने सेल और डिस्काउंट को बढ़ावा दिया है। सेल से निकली एक महिला से एक भिखारी ने पूछा कि सेल में महिलाओं की ज्यादा भीड़ क्यों रहती है?

महिला ने तपाक से जबाब दिया – वहां सब टंगी चीजों को बार – बार छूने का सुख मिलता है और सबको उलटा पलटा के पटकने का मजा आता है वहां खूब मन भी भटकता है मन भटकने से गुदगुदी होती है और इंद्रधनुषी निर्णय के महासागर में बार बार डुबकी लगाने का अवसर भी मिलता है, अंडर गारमेंट के पोस्टर देखने का आनंद भी लूटते हैं और तरह-तरह से सज धज के आयी औरतों को देखकर ईर्ष्या का चिपचिपा रस भी पैदा होता है।

भिखारी बोला – पर मेडम यहां तो सब माल रिजेक्टेड वाला रखा जाता है, ऐसा माल जो कहीं नहीं बिकता। सेल और डिस्काउंट का लोभ ऐसे सब माल को बिकवा देता है यहां मन ललचाने का पूरा प्रपंच रचा जाता है।

भिखारी की सच बात सुनकर मेडम नाराज हो जाती है पुरानी चौवन्नी उसके कटोरे में फैंक कर माल के बाहर इंतजार कर रहे पति की तलाश करने लगती है।

हाथ में दो बड़े बड़े चमचमाते मुस्कराते बैग भारी लग रहे हैं इसलिए पति को थमा दिये गये, पति लद गया है कार पार्किंग तक पहुंचते पहुंचते हांफने लगता है।

कार चलाते हुए रास्ते भर इसी उधेड़बुन में रहता है कि घर पहुंच कर पहले चाय बनानी पड़ेगी, उनके थके पैर दबाना होगा फिर सेल से खरीदे गए हर सामान की चुम्मी ले लेकर झूठी तारीफ करनी पड़ेगी।

जैसा रास्ते भर सोचा था वही सब सब करने का आदेश हुआ। चमचमाते फिसलते पहले बैग से एक से एक साड़ियाँ और अंडर गारमेंट निकाल कर तारीफ के पुल बांधे गए। दूसरे बैग से निकाले गए शाल को देखकर उसका गला सूख गया, काटो तो खून नहीं, दिन में तारे नजर आने लगे, आसमान धरती पर गिर पड़ा, होश उड़ गए…. वह वही शाॅल था जो उसके पिता की शव यात्रा में उसके फूफा ने पिता के शव के ऊपर डाला था।

तीन महीने पहले ही उसके पिता कविता लिखते लिखते चल बसे थे उन्हें जीवन भर शाॅल श्रीफल से सम्मानित किया जाता रहा इसलिए दोस्तों ने अंतिम यात्रा में मंहगे मंहगे शाॅल उनके शव पर डाले थे………….

शाॅल की सलवटें ठीक करती पत्नी चहकते हुए बोली – ये शाॅल तुम्हारे लिए लिया है, कई महिलाओं को ये शाॅल ज्यादा पसंद आ रहा था इसलिए इसमें डिस्काउंट भी नहीं मिला……….

© जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जय प्रकाश पाण्डेय, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा हिन्दी व्यंग्य है। )

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हिन्दी साहित्य- कविता – आँखें – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

नीलम सक्सेना चंद्रा

 

 

 

 

 

आँखें 

मंज़र बदल जाते हैं

और उनके बदलते ही,

आँखों के रंग-रूप भी

बदलने लगते हैं…

 

ख़्वाबों को बुनती हुई आँखें

सबसे खूबसूरत होती हैं,

न जाने क्यों

बहुत बोलती हैं वो,

और बात-बात पर

यूँ आसमान को देखती हैं,

जैसे वही उनकी मंजिल हो…

अक्सर बच्चों की आँखें

ऐसी ही होती हैं, है ना?

 

यौवन में भी

इन आँखों का मचलना

बंद नहीं होता;

बस, अब तक इन्हें

हार का थोड़ा-थोड़ा एहसास होने लगता है,

और कहीं न कहीं

इनकी उड़ान कुछ कम होने लगती है…

 

पचास के पास पहुँचने तक,

इन आँखों ने

बहुत दुनिया देख ली होती है,

और इनका मचलनापन

बिलकुल ख़त्म हो जाता है

और होने लगती हैं वो

स्थिर सी!

 

और फिर

कुछ साल बाद

यही आँखें

एकदम पत्थर सी होने लगती हैं,

जैसे यह आँखें नहीं,

एक कब्रिस्तान हों

और सारी ख्वाहिशों की लाश

उनमें गाड़ दी गयी हो…

 

सुनो,

तुम अपनी आँखों को

कभी कब्रिस्तान मत बनने देना,

तुम अपने जिगर में

जला लेना एक अलाव

जो तुम्हारे ख़्वाबों को

धीरे-धीरे सुलगाता रहेगा

और तुम्हारी आँखें भी हरदम रहेंगी

रौशनी से भरपूर!

© नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की साहित्यकार हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। वर्तमान में  आप जनरल मैनेजर (विद्युत) पद पर पुणे मेट्रो में कार्यरत हैं।)

 

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कविता, हिन्दी
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हिन्दी साहित्य-डॉ राजकुमार ‘सुमित्र’ जी का 36 वर्ष पूर्व लिखित पत्र – मेरी धरोहर

डॉ राजकुमार तिवारी सुमित्र जी का 36 वर्ष पूर्व लिखा पत्र – मेरी धरोहर

 

इस ईमेल के युग में आज कोई किसी को पत्र नहीं लिखता। किन्तु, श्रद्धेय डॉ सुमित्र जी का वह हस्तलिखित प्रथम पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित है। यह साहित्यिक एवं प्रेरणादायी पत्र 36 वर्ष पूर्व गुरुतुल्य अग्रज का आशीर्वाद एवं मनोभावनात्मक सन्देश मेरी धरोहर है। इस पत्र के प्रत्येक शब्द मुझे सदैव प्रेरित करते हैं।

प्रिय भाई हेमन्त,

पत्र लिखना मुझे प्रिय है किन्तु बहुधा अपना यह प्रिय कार्य नहीं कर पाता और कितने ही परिजन रूठ जाते हैं। लोगों से मिलना और विविध विषयों पर बातें करना ही मेरी संजीवनी है किन्तु इस कार्य में भी व्यवधान आ जाता है। संत समागम हरि मिलन, तुलसी ने दुर्लभ बताए हैं। फिर भी जीवन को अनवरत यात्रा मानकर चलता जा रहा हूँ।

इस यात्रा में तुम्हारा नाम मिला, तुम मिले। सुख मिला। प्रभु की प्रेरणा ही थी कि तुम्हारे पिताश्री द्वारा मैंने मिलने का सन्देश पहुंचाया। एक कौतूहल था। तुमसे भेंट हुई प्रतीक्षा को पड़ाव मिला। तुम्हारा लेखन देखा पढ़ा लगा कि संभावनाएं अंकुरा रही हैं।

मुझे लगा कि तुम गद्य में लेख, व्यंग्य और कथा लिख सकते हो। छंदमुक्त कविता लिखने की  क्षमता भी तुममें है।  तुम्हारा लेखन पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि तुम नौसिखिये हो या कि हिन्दी तुम्हारी मातृभाषा नहीं है। यही लगता है कि तुम्हें भाषा का पर्याप्त ज्ञान है, लेखन का पर्याप्त अभ्यास है। ये तो ऊपरी बातें हैं सबसे बड़ी बात यह है कि संवेदना की शक्ति और जीवन की दृष्टि तुम्हारे पास है।

चुभता हुआ सत्य – एक श्रेष्ठ कथा है। सैनिक जीवन, सैनिक के पारिवारिक जीवन के अनछुए पक्ष को, पीड़ा को, तुमने संयमित ढंग से उद्घाटित किया है। कथा मन को गीला और मस्तिष्क को सचेत करती है।

सैनिक जीवन के विविध पक्षों का शब्दांकन करना देश और साहित्य के हित में होगा। संभव हो तो कथाओं के अतिरिक्त सैनिक जीवन पर उपन्यास भी लिखना चाहिए। एक दो उपन्यास कभी देखे पढे थे किन्तु वे काल्पनिक से थे।

एक सुझाव और देना चाहूँगा – ताकि तुम्हारी क्षमता का पूरा लाभ साहित्य को मिल सके – हिन्दी से अङ्ग्रेज़ी और अङ्ग्रेज़ी से हिन्दी रूपांतर पर भी ध्यान दो। यानि अन्य लेखकों की रचनाओं का रूपांतर। मराठी से भी काफी कुछ लिया दिया जा सकता है।

मेरा पूरा सहयोग तुम्हें प्राप्त होता रहेगा।

एक बात और – आलोचना प्रत्यालोचना के लिए न तो ठहरो, न उसकी परवाह करो। जो करना है करो, मूल्य है, मूल्यांकन होगा।

हमें परमहंस भी नहीं होना चाहिए कि हमें यश से क्या सरोकार।  हाँ उसके पीछे भागना नहीं है, बस।

हार्दिक स्नेह सहित

सुमित्र

13 जुलाई 1982

112, सराफा, जबलपुर

(यह एक संयोग ही है कि आज से 36 वर्ष पूर्व मेरी पहली कहानी चुभता हुआ सत्य” डॉ॰  राजकुमार तिवारी सुमित्र जी द्वारा दैनिक नवीन दुनिया, जबलपुर की साप्ताहिक पत्रिका तरंग के प्रवेशांक में 19 जुलाई 1982 को प्रकाशित हुई थी। यह कहानी शीघ्र प्रकाश्य उपन्यासिका का एक अंश मात्र थी जो अस्सी-नब्बे के दशक के परिपेक्ष्य में लिखी थी। )

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