हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 13 – लघुकथा – एक पुरस्कार समारोह ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार   (आपसे यह  साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  e-abhivyakti के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं । अब हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे।  आज प्रस्तुत है  उनकी  लघुकथा  “एक पुरस्कार समारोह”।  ईमानदारी वास्तव में  नीयत से जुड़ी  है। समाज में व्याप्त ईमानदारी के स्तर को डॉ परिहार जी ने बेहद खूबसूरत अंदाज में प्रस्तुत किया है। हम आप तक ऐसा ही  उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 13 ☆   ☆ लघुकथा – एक पुरस्कार समारोह  ☆ कलेक्टरेट के चपरासी दुखीलाल को दस हजार रुपये से भरा बटुआ एक बेंच के पास पड़ा मिला। उसने उसे खोलकर देखा और सीधे जाकर उसे कलेक्टर साहब की टेबिल पर रखकर छाती तानकर सलाम ठोका। कलेक्टर साहब ने दुखीलाल की बड़ी तारीफ की। दुखीलाल...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ संजय उवाच – #10 – # No Abusing ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से इन्हें पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।” हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की  नौवीं कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # 10 ☆   ☆ # No Abusing ☆ रात चढ़ रही है, पास के मकान में हमेशा की तरह घनघोर कलह जारी है। सास-बहू के ऊँचे कर्कश स्वर गूँज रहे हैं, साथ ही किसी जंगली पशु की तरह...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – 🍁 मी_माझी – #17 – पाचोळा… 🍁 – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते   (प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की   सत्रहवीं कड़ी  पाचोळा...।  सुश्री आरूशी जी  के आलेख मानवीय रिश्तों  को भावनात्मक रूप से जोड़ते  हैं।  सुश्री आरुशी के आलेख पढ़ते-पढ़ते उनके पात्रों को  हम अनायास ही अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं और उनमें खो जाते हैं। एक पान  के पत्ते से  नवजीवन की परिकल्पना को जोड़ना एवं अंत में दी हुई कविता दोनों ही अद्भुत हैं। सुश्रीआरुशी जी के  संक्षिप्त एवं सार्थकआलेखों  तथा काव्याभिव्यक्ति का कोई सानी नहीं।  उनकी लेखनी को नमन। इस शृंखला की कड़ियाँ आप आगामी प्रत्येक रविवार को पढ़  सकेंगे।)     साप्ताहिक स्तम्भ – मी_माझी – #17    ☆ पाचोळा... ☆   पाचोळा, पानांचा... पानगळ... निष्पर्ण... एका सुरुवातीचा शेवट? कदाचित शेवट... म्हणून भकास? कदाचित? की नव्याची सुरुवात? अनेक विचार आपल्यालाच डाचत राहतात... पण पाचोळा कोणालाच नको असतो हे नक्की... पायदळी तुडवले जाण्याची शक्यताच जास्त असते... दुर्लक्षित होणे, ह्या सारखी भावना सुखावह नक्कीच नाही... पण मग अजून एक विचार मनात येतो... पाचोळा ही पूर्णत्वाची स्थिती तर नाही? समर्पणाची तयारी तर...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 3 ☆ अरबी के पत्तों का  पानी ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे (सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की  ऐसी ही एक संवेदनात्मक भावप्रवण कविता  ‘नजरें पार कर’।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 3 ☆ ☆ अरबी के पत्तों का  पानी ☆   प्रिये, तुम नक्षत्रों से चमकती हो, मैं अदना सा टिमटिमाता हुआ तारा हूँ ।   तुम बवंड़र सी चलती आँधी हो, मैं पुरवाई की मंद बहती हवा हूँ ।   तुम कोहरे से लिपटी हुई सुबह हो मैं दूब पर रहती की ओस की बूँद हूँ ।   तुम शंख में रहनेवाला मोती हो मैं अरबी के पत्तों का चमकता पानी हूँ ।   © सुजाता काळे … पंचगनी, महाराष्ट्र। 9975577684...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 5 – शक्ति का मद ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार   (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “शक्ति का मद”।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 5 ☆   ☆ शक्ति का मद ☆   राम, नाम अग्नि बीज मंत्र (रा) और अमृत बीज मंत्र (मा) के साथ संयुक्त है, अग्नि बीज आत्मा, मन और शरीर को ऊर्जा देता है एवं अमृत बीज पूरे शरीर में प्राण शक्ति (जीवन शक्ति) को पुन: उत्पन्न करता है । राम दुनिया का सबसे सरल, और अभी तक का सबसे शक्तिशाली नाम है । भगवान राम कोसला साम्राज्य (अब उत्तर प्रदेश में) के शासक दशरथ और कौशल्या के यहाँ सबसे बड़े पुत्र के रूप में पैदा हुए, भगवान राम को हिंदू...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 2 ☆ ताई बालवाड़ी ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे   (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है।  इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है। हम श्रीमती उर्मिला जी के आभारी हैं जिन्होने हमारे आग्रह को स्वीकार कर  “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होतं आहे रे ” शीर्षक से  प्रारम्भ करने हेतु अपनी अनुमति प्रदान की। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनका आलेख नवनिर्मिती।  )    ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 2 ☆   ☆ ताई बालवाडी ☆   सकाळी उठल्यावर हातात वर्तमानपत्र घेतलं..लक्षात आलं आज दहावीचा निकाल आहे त्यामुळे अख्ख्या पेपरमध्ये त्याच बातम्या ! तेवढ्यात माझं लक्ष १०० टक्के निकाल लागलेल्या शाळांच्या बातमीकडं गेलं.दुर्गम व डोंगराळ अशा भागातल्या एका माध्यमिक शाळेच्या निकाल १०० टक्के लागला हे वाचून माझं मन भुर्रकन पस्तीस वर्षामागं गेलं.. १९८३ साल होतं मी शिक्षण विभागात बदलून आल्याने माझ्या कामाचा चार्ज मी यादीप्रमाणे पाहून घेत होते.तेवढ्यात 'ताई बालवाड्या ' असं शीर्षक असलेल्या एका फाईलनं...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 12 ☆ घरौंदा ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है  डॉ मुक्ता जी की  कविता  “घरौंदा ”।)    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 12 ☆   ☆ घरौंदा ☆   घरौंदा   मालिक की नजर पड़ते ही घोंसले में बैठे चिड़ा-चिड़ी चौक उठते और अपने नन्हें बच्चों के बारे में सोच हैरान-परेशान हो उठते गुफ़्तगू करते आपात काल में इन मासूमों को लेकर हम कहां जाएंगे   चिड़ा अपनी पत्नी को दिलासा देता 'घबराओ मत! सब अच्छा ही होगा चंद दिनों बाद वे उड़ना सीख जाएंगे और अपना नया आशियां बनाएंगे'   'परन्तु यह सोचकर हम अपने दायित्व से मुख तो नहीं मोड़ सकते'   तभी माली ने दस्तक दी और घोंसले को गिरा दिया चारों ओर से त्राहिमाम् … त्राहिमाम् की मर्मस्पर्शी आवाज़ें सुनाई पड़ने लगीं   जैसे ही उन्होंने अपने बच्चों को उठाने के लिये कदम बढ़ाया उससे पहले ही माली द्वारा उन्हें दबोच लिया गया और चिड़ा-चिड़ी ने वहीं प्राण त्याग दिए   इस मंज़र को देख माली ने मालिक से ग़ुहार लगाई 'वह भविष्य में ऐसा कोई भी काम नहीं करेगा आज उसके हाथो हुई...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 10 ☆ सपना ☆ – डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल (डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची ‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ  -साहित्य निकुंज”के  माध्यम से आप प्रत्येक शुक्रवार को डॉ भावना जी के साहित्य से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ. भावना शुक्ल जी की  स्व. माँ  की स्मृति में  एक भावप्रवण कविता   “सपना”। )    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 10 साहित्य निकुंज ☆   ☆ सपना ☆   मैं नींद के आगोश में सोई लगा नींद में चुपके-चुपके रोई जागी तो सोचने लगी जाने क्या हुआ किसी ने दिल को छुआ कुछ-कुछ याद आया मन को बहुत भाया देखा था सपना वो हुआ न पूरा रह गया अधूरा उभरी थी धुंधली आकृति अरेे हूँ मैं उनकी कृति वे हैं मेरी रचयिता मेरी माँ एकाएक हो गई अंतर्ध्यान तब हुआ यह भान ये हकीकत नहीं है एक सपना जिसमें था कोई अपना   © डॉ भावना शुक्ल सहसंपादक…प्राची ...
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Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 4 – Amba’s wrath ☆

Ms Neelam Saxena Chandra   (Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday Ms. Neelam Saxena Chandra ji is Executive Director (Systems) Mahametro, Pune. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem “Amba's wrath”. This poem is from her book “Tales of Eon)   ☆ Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 4 ☆   ☆ Amba's wrath ☆ (Denied justice from Bheeshma, a sufferer of fate, Amba seeks justice from God)   O life! You have made me a chattel Loved, lost, owned and dismissed. And on one leg I stand here on the Himalayas O God! Before you, to ask for justice.   King Shalva I loved, gave away my heart And accepted I was by pleasure and grace And yet, taken away from my swayamwar I was Bheeshma, by virtue of force,...
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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 10 ☆ रेल्वे फाटक के उस पार ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’    (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक के व्यंग्य”  में हम श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्य आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्यों को “विवेक के व्यंग्य “ शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे।  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य “रेल्वे फाटक के उस पार ”)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 10 ☆     ☆ रेल्वे फाटक के उस पार ☆   मेरा घर और दफ्तर ज्यादा दूर नहीं है, पर दफ्तर रेल्वे फाटक के उस पार है. मैं देश को एकता के सूत्र में जोड़ने वाली, लौह पथ गामिनी के गमनागमन का सुदीर्घ समय से साक्षी हूँ. मेरा मानना है कि पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक देश को जोड़े रखने में, समानता व एकता के सूत्र स्थापित करने मे, भारतीय रेल, बिजली के नेशनल ग्रिड और टीवी सीरीयल्स के माध्यम से एकता कपूर ने बराबरी की भागीदारी की है. राष्ट्रीय एकता के इस...
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