हिन्दी साहित्य – कविता – सूरज – सुश्री नूतन गुप्ता

नूतन गुप्ता  सूरज  हर रोज़ शाम होते ही कहीं चला जाता है। पर वो कहाँ जाता है? जाते तो हम हैं हमारे मन का काला पन डराता है हमें वह तो आएगा ही कल अपनी नई किरण के साथ हम स्वयम् पर नहीं लगाते रोक दोष देते हैं सदा दूसरे को ही। उसके जाने से नहीं होता अंधेरा अंधेरा तो होता है हमारे मुँह फेर लेने से। वह तो जाने के बाद भी बड़ी देर तक भूलता नहीं जब हम ही भुला दें तो क्या करे वो भी? मैं करती हूँ प्रेम डूबते सूरज से और उगते चाँद से भी कुछ बातें जो तुम करोगे रात भर सूरज से वह सुबह आकर सब कहेगा मुझसे और जो मैं रात भर बतियाऊँगी चाँद से वो सब होगा तुम्हारे बारे में। ©  नूतन गुप्ता (सुश्री नूतन गुप्ता  जी एक कवयित्री  एवं गद्यकार हैं । आप शासकीय विद्यालयों में  प्रधान अध्यापिका  पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन एवं अध्ययन।  आप हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी दोनों साहित्य में समान रुचि रखती हैं।) ...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – डस्टबिन – डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ डस्टबिन विवाह सम्बन्ध के लिए आये परिवार में अलग से परस्पर बातचीत में नवयुवती शीला ने युवक मनोज से पहला सवाल किया" आपके घर में भी डस्टबिन तो होंगे ही, बताएंगे आप कि, उनमें सूखे कितने हैं और गीले कितने? समझा नहीं मैं शीला जी, डस्टबिन से आपका क्या तात्पर्य है! तात्पर्य यह है मनोज जी कि-- आपके परिवार में कितने बुजुर्ग हैं? इनमें सूखे से आशय-जो कोई काम-धाम करने की हालत में नहीं है पर अपनी सारसंभाल खुद करने में सक्षम है और गीले डस्टबिन से मेरा मतलब अशक्त स्थिति में बिस्तर पर पड़े परावलंबी व्यक्ति से है। तुम्हारा मतलब,  बुजुर्ग डस्टबिन होते हैं? हाँ, सही समझे, यही तो मैं कह रही हूँ। ओहो! कितनी एडवांस हैं आप शीला जी, आपके इन सुंदर नवाधुनिक क़विचारों ने तो मेरे ज्ञानचक्षु ही खोल दिये। अब मैं आपके ही शब्दों में बताता हूँ, यह कि-- हाँ, है मेरे घर में, सूखे और गीले दोनों तरह के डस्टबिन जो हमारी गलतियों, भूलों, कमियों व अनचाहे दूषित तत्वों को अपने में...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – एक व्यंग्यकार की आत्मकथा – श्री जगत सिंह बिष्ट

जगत सिंह बिष्ट एक व्यंग्यकार की आत्मकथा यह एक व्यंग्यकार की आत्मकथा है।  इसमें आपको ’एक गधे की आत्मकथा’ से ज़्यादा आनन्द आएगा।  गधा ज़माने का बोझ ढोता है, व्यंग्यकार समाज की विडम्बनाओं को पूरी शिददत से मह्सूस करता है।  इसके बाद भी दोनों बेचारे इतने भले होते हैं कि वक्त-बेवक्त ढेंचू-ढेंचू करके आप सबका मनोरंजन करते हैं।  यदि आप हमारी पीड़ा को ना समझकर केवल मुस्कुराते हैं तो आप से बढ़कर गधा कोई नहीं।  क्षमा करें, हमारी भाषा ही कुछ ऐसी होती है। इस आत्मकथा में जितने प्रयोग सत्य के साथ किये गये हैं, उससे कहीं अधिक असत्य के साथ।  यह निर्णय आपको करना होगा कि क्या सत्य है और क्या असत्य।  मोटे तौर पर, उपलब्धियों के ब्यौरे को झूठा मानें और चारित्रिक कमज़ोरियों के चित्रण को सच्चा जानें।  आत्मकथा का जो अंश अच्छा लगे, उसे चुराया हुआ समझें और जो घटिया लगे, उसे मौलिक मान लें।  जहां कोई बात समझ में न आये तो उसका ठीक विपरीत अर्थ लगायें क्योंकि व्यंग्यकार...
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हिन्दी साहित्य – आलेख – “भय” कानून का – डॉ विदुषी शर्मा

डॉ विदुषी शर्मा  आलेख - "भय" कानून का। आज बात करते हैं भय की, कानून के भय की। आज अखबार के मुख्य पृष्ठ पर ही यह खबर थी कि एक शख्स ने दूसरे शख्स को केवल गाड़ी ठीक से चलाने की नसीहत दी तो उन्होंने उसे गोली मार दी। उस इंसान की मदद को कोई नहीं आया ।परिणाम , उसकी मौत मौत हो गई। (विनोद मेहरा , 48 वर्ष जी टी करनाल रोड भलस्वा फ्लाईओवर) घर से जब किसी की असामयिक मृत्यु हो जाती है  तो उस परिवार पर क्या बीतती है, यह सब शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल है क्योंकि यह ऐसा दर्द है जो उसके परिवार को, उस शख्स से जुड़े हर इंसान को जिंदगी भर झेलना पड़ता है। कई लोग यहां सोचेंगे कि यह खबर तो पुरानी है। तो हफ्ते, 10 दिन में किसी की जिंदगी नहीं बदलती ।जिस घर से एक इंसान की मौत हुई है 10 दिन में उनका कुछ भी नहीं बदलता और जिंदगी की...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – माँ की नज़र – श्री सदानंद आंबेकर

श्री सदानंद आंबेकर  माँ की नज़र अपनी बेटी अंजलि के आठवी की परीक्षा में प्रावीण्य सूची में आने की खुशी में सुधीर जी ने अपने घर पर आस-पास के लोगों की एक छोटी सी घरेलू पार्टी का आयोजन आज शाम को किया था। रविवार का दिन था सो सुबह से ही घर के तीनों सदस्य व सुधीर की माताजी भी व्यवस्थाओं में जुटे थे। इस गहमागहमी में बेटी को आराम से बैठ कर टी वी देखते पाकर वे गुस्सा होकर बोले- ”तुम्हारे ही लिये हमने ये कार्यक्रम रखा है और तुम काम में माँ को थोड़ा हाथ बंटाने की जगह आराम से बैठकर टी वी देख रही हो ? जाओ और मम्मी को रसोई में मदद करो।” शोर सुनकर अंजलि की माँ बाहर आई और पति को कहा- "क्यों उसके पीछे पड़े रहते हो, अभी वह छोटी है फिर बड़ी होकर तो ताउम्र गृहस्थी में खटना ही है” - कहकर स्नेह भरी नजर बेटी पर ड़ालकर रसोई में चली गई। बेटी ने भी सुना और...
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हिन्दी साहित्य- कविता -मैं काली नहीं हूँ माँ! – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

नीलम सक्सेना चंद्रा           मैं काली नहीं हूँ माँ!   माँ, सुना है माँ, कल किसी ने एक बार फ़िर यह कहकर मुझसे रिश्ता ठुकरा दिया कि मैं काली हूँ!   माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ!   कल जब मैं बाज़ार जा रही थी, चौक पर जो मवाली खड़े रहते हैं, उन्होंने मुझे देखकर सीटी बजाई थी और बहुत कुछ गन्दा-गन्दा बोला था, जिसे मैंने हरदम की तरह नज़रंदाज़ कर दिया था; काले तो वो लोग हैं माँ! माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ!   उस दिन जब मेरे बॉस ने चश्मे के नीचे से घूरकर कहा था, प्रमोशन के लिए और कुछ भी करना होता है, मैं तो डर ही गयी थी माँ! काला तो वो मेरा बॉस था माँ! माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ!   अभी कल टेलीविज़न पर ख़बर सुनी, एक औरत के साथ कुकर्म कर उसे जला दिया गया! माँ, यह कैसा न्याय है माँ? काले तो वो लोग थे माँ! माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ!   यह कैसा देश है माँ जहाँ बुरे काम करने से कुछ नहीं होता और चमड़ी के रंग पर लड़की को काली कहा जाता है? माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ! माँ, मैं काली नहीं हूँ माँ! ©...
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हिन्दी साहित्य-कविता – पहाड़ पर कविता – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

जय प्रकाश पाण्डेय           पहाड़ पर कविता जंगल को बचाने के लिए, पहाड़ पर कविता जाएगी, कुल्हाड़ी की धार के लिए, कमरे में दुआ मांगी जाएगी, पहाड़ पर बोली लगेगी, कविता भी नीलाम होगी, कवियों के रुकने के लिए, कटे पेड़ के घरौंदे बनेंगे, उनके ब्रेकफास्ट के लिए, सागौन के पेड़ बेचे जाएंगे, उनके मूड बनाने के लिए, महुआ रानी चली आयेगी, कविता याद करने के लिए, रात रानी बुलायी जाएगी, कविता के प्रचार के लिए, नगरों के टीवी खोले जाएंगे, कवि लोग कविता में, जंगल बचाने की बात करेंगे, टी वी में कविता के साथ, पेड़ रोने की आवाजें आयेंगी, दूसरे दिन मीडिया से, जांच कमेटी खबर बनेगी, और पहाड़ पर कविता, बेवजह बिलखती मिलेगी, © जय प्रकाश पाण्डेय (श्री जय प्रकाश पाण्डेय, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा हिन्दी व्यंग्य है। )...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – जवाब – श्री सदानंद आंबेकर

श्री सदानंद आंबेकर            लघुकथा- जवाब   “जिसने जीवन बांटा है वो सुख के पल भी बांटेगा, जीवन में जो दुःख आयेंगे, वो दिन भी वह ही काटेगा.....”   तेजी से भागती हरिद्वार अहमदाबाद एक्सप्रेस में कच्चे कंठ से यह गाना सुनाई दिया, धीरे-धीरे गाने के बोल साफ होने लगे। थोड़ी देर बाद एक छोटी-सी लड़की पत्थर की दो चिप्स उंगलियों में फंसाकर ताल देकर गाना गाते हुये आगे निकल गई। डिब्बे के दूसरे छोर पर पहुँच  कर उसने हाथ फैलाकर पैसे मांगना शुरू  किया। मेरे पास जब वो आई तो उसे ध्यान से देखा, आठ-नौ साल की लड़की, मैली से जीन्स टी शर्ट  पहने सामने खड़ी थी। चेहरे पर भिखारियों का भाव न होकर छिपा हुआ अभिजात्य दिख रहा था। उसकी मासूमियत देखकर उसे भिखारी मानने का मन नहीं करता था। उसके हाथ पर पैसे रखते हुये सहज भाव से मैंने पूछा - “स्कूल में पढ़ती हो?” उसने झिझकते हुये कहा- “पढ़ती थी, चौथी कक्षा में।” मैंने फिर प्रश्न किया- “फिर अब ये काम क्यों करती हो?” जवाब में उसने सूनेपन से...
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हिन्दी साहित्य- व्यंग्य- सेल की शाॅल – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

जय प्रकाश पाण्डेय           सेल की शाॅल  करेला और नीम चढ़ा की तरह सेल में डिस्काउंट चढ़ बैठता है पुरुष सेल और डिस्काउंट से चिढ़ते हैं और महिलाएं सेल और डिस्काउंट के चक्कर मे सीढ़ी चढ़तीं हैं। माल में सेल और डिस्काउंट का बोलबाला है।माल  के बाहर बैठा हुआ एक फिलासफर टाइप का आदमी एक डेढ़ घंटे से S. A. L. E और डिस्काउंट शब्दों की उधेड़बुन में इतना परेशान दिख रहा है कि उसके चेहरे में हवाईयां उड़ रही हैं। बीच बीच में बुदबुदाता हुआ वो आदमी कभी दाढ़ी के बाल नोंचता है कभी नाक में ऊंगली डाल के नाक छिंनकता है। कभी पेन खोलकर हाथ की गदेली में एस ए एल ई लिखकर आसमान की तरफ देखता है तो कभी दूसरे हाथ की गदेली में डिस्काउंट लिखकर थूक से मिटाता है। जिस चमचमाते वैभवशाली अलबेले मॉल के सामने वह बैठा है वहां लड़के लड़कियों के झुंड फटे जीन्स पहने कूल्हे मटका रहे हैं, बीच बीच में कुछ लड़के लड़कियां अल्हड़ सी...
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हिन्दी साहित्य- कविता – आँखें – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

नीलम सक्सेना चंद्रा           आँखें  मंज़र बदल जाते हैं और उनके बदलते ही, आँखों के रंग-रूप भी बदलने लगते हैं...   ख़्वाबों को बुनती हुई आँखें सबसे खूबसूरत होती हैं, न जाने क्यों बहुत बोलती हैं वो, और बात-बात पर यूँ आसमान को देखती हैं, जैसे वही उनकी मंजिल हो... अक्सर बच्चों की आँखें ऐसी ही होती हैं, है ना?   यौवन में भी इन आँखों का मचलना बंद नहीं होता; बस, अब तक इन्हें हार का थोड़ा-थोड़ा एहसास होने लगता है, और कहीं न कहीं इनकी उड़ान कुछ कम होने लगती है...   पचास के पास पहुँचने तक, इन आँखों ने बहुत दुनिया देख ली होती है, और इनका मचलनापन बिलकुल ख़त्म हो जाता है और होने लगती हैं वो स्थिर सी!   और फिर कुछ साल बाद यही आँखें एकदम पत्थर सी होने लगती हैं, जैसे यह आँखें नहीं, एक कब्रिस्तान हों और सारी ख्वाहिशों की लाश उनमें गाड़ दी गयी हो...   सुनो, तुम अपनी आँखों को कभी कब्रिस्तान मत बनने देना, तुम अपने जिगर में जला लेना एक अलाव जो तुम्हारे ख़्वाबों को धीरे-धीरे सुलगाता रहेगा और तुम्हारी आँखें भी हरदम रहेंगी रौशनी से भरपूर! © नीलम सक्सेना चंद्रा (सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की साहित्यकार हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। वर्तमान में  आप जनरल...
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