हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ पिता ☆ – सुश्री सुषमा सिंह

सुश्री सुषमा सिंह    (प्रस्तुत है सुश्री सुषमा सिंह जी की एक अत्यंत भावुक एवं हृदयस्पर्शी कविता “पिता ”।)   ☆ पिता ☆   तुम पिता हो, सृष्टा हो, रचयिता हो, हां, तुम स्नेह न दिखाते थे मां की तरह न तुम सहलाते हो, पर हो तो तुम पिता ही ना। जब मैं गिरती थी बचपन में, दर्द तुम्हें भीहोता था चाहे चेहरा साफ छिपा जाए, पर दिल तो रोता ही था माना गुस्सा आ जाता था, हम जरा जो शोर मचाते थे पर उस कोलाहल में कभी-कभी, मजा तुम भी तो पा जाते थे चलते-चलते राहों में, जब पैर मेरे थक जाते थे मां गोद उठा न पाती थीं, कांधें तो तुम्हीं बैठाते थे मां जब भी कभी बीमार पड़ीं, तुम कुछ पका न पाते थे, कुछ ठीक नहीं बन पाता था, कोशिश कर कर रह जाते थे उमस भरी उस गर्मी में, कुछ मैं जो बनाने जाती थी तब वह तपिश, उस गर्मी की, तुमको भी तो छू जाती थी जरा सी तुम्हारी डांट पर, हम सब कोने में छिप जाते थे झट फिर बाहर निकल आते,...
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हिन्दी साहित्य – कविता -☆ मूर्ति उवाच ☆ – श्री हेमन्त बावनकर

श्री हेमन्त बावनकर   ☆ मूर्ति उवाच ☆   मुझे कैसे भी कर लो तैयार ईंट, गारा, प्लास्टर ऑफ पेरिस या संगमरमर कीमती पत्थर या किसी कीमती धातु को तराशकर फिर रख दो किसी चौराहे पर या विद्या के मंदिर पर अच्छी तरह सजाकर।   मैं न तो  हूँ ईश्वर न ही नश्वर और न ही कोई आत्मा अमर मैं रहूँगा तो  मात्र मूर्ति ही निर्जीव-निष्प्राण।   इतिहास भी नहीं है अमिट वास्तव में इतिहास कुछ होता ही नहीं है जो इतिहास है वो इतिहास था ये युग है वो युग था जरूरी नहीं कि इतिहास सबको पसंद आएगा तुममें से कोई आयेगा और इतिहास बदल जाएगा।   मेरा अस्तित्व इतिहास से जुड़ा है और जब भी लोकतन्त्र भीड़तंत्र में खो जाएगा इतिहास बदल जाएगा फिर तुममें से कोई  आएगा और मेरा अस्तित्व बदल जाएगा इतिहास के अंधकार में डूब जाएगा।   फिर चाहो तो कर सकते हो पुष्प अर्पण या कर सकते हो पुनः तर्पण।   © हेमन्त  बावनकर  ...
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हिन्दी साहित्य – कविता -☆ दीप अपने अपने – नया दृष्टिकोण ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी  की कविता  “स्त्री स्वतन्त्रता  पर आधारित  "नया  दृष्टिकोण” । ऐसे विषय पर नारी ही नारी के हृदय को समझ कर  इतना कुछ कल्पना कर सकती हैं।  आदरणीया डॉ मुक्ता जी की लेखनी को नमन । ) -: दीप अपने अपने :-  ☆ नया दृष्टिकोण ☆   मैं हर रोज़ अपने मन से वादा करती हूं अब औरत के बारे में नहीं लिखूंगी उसके दु:ख-दर्द को कागज़ पर नहीं उकेरूंगी दौपदी,सीता,गांधारी,अहिल्या और उर्मिला की पीड़ा का बखान नहीं करूंगी   मैं एक अल्हड़, मदमस्त, स्वच्छंद नारी का आकर्षक चित्र प्रस्तुत करूंगी जो समझौते और समन्वय से कोसों दूर लीक से हटकर,पगडंडी पर चल अपने लिये नयी राह का निर्माण करती ‘खाओ-पीओ, मौज-उड़ाओ’ को जीवन में अपनाती ‘तू नहीं और सही’ का मूल-मंत्र स्वीकार रंगीन वातावरण में हर क्षण को जीती वीरानों को महकाती,गुलशन बनाती पति व उसके परिवारजनों को अंगुलियों पर नचाती उन्मुक्त आकाश में विचरण करती नदी की भांति निरंतर बढ़ती चली जाती   परंतु यह सब त्याज्य है,निंदनीय है क्योंकि न तो यह रचा-बसा है हमारे संस्कारों में और...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ क्षितिज ☆ – श्री दिवयांशु शेखर 

श्री दिवयांशु शेखर    (युवा साहित्यकार श्री दिवयांशु शेखर जी का e-abhivyakti में स्वागत है। आपने बिहार के सुपौल में अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण की।  आप  मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक हैं। जब आप ग्यारहवीं कक्षा में थे, तब से  ही आपने साहित्य सृजन प्रारम्भ कर दिया था। आपका प्रथम काव्य संग्रह “जिंदगी – एक चलचित्र” मई 2017 में प्रकाशित हुआ एवं प्रथम अङ्ग्रेज़ी उपन्यास “Too Close - Too Far” दिसंबर 2018 में प्रकाशित हुआ। ये पुस्तकें सभी प्रमुख ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर उपलब्ध हैं। आपके अनुसार – “मैं हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में कविताएँ, कहानियाँ, नाटक और स्क्रिप्ट लिखता हूँ। एक लेखक के रूप में स्वयं को संतुष्ट करना अत्यंत कठिन है किन्तु, मैं पाठकों को संतुष्ट करने के लिए अपने स्तर पर पूरा प्रयत्न करता हूँ। मुझे लगता है कि एक लेखक कुछ भी नहीं लिखता है, वह / वह सिर्फ एक दिलचस्प तरीके से शब्दों को व्यवस्थित करता है, वास्तविकता में पाठक अपनी समझ के अनुसार अपने मस्तिष्क में वास्तविक...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ बहस ☆ – सुश्री निशा नंदिनी

सुश्री निशा नंदिनी    (आज प्रस्तुत है सुदूर पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी की  कागज और कलम के बहस की सार्थक काव्यात्मक अभिव्यक्ति।)    ☆ बहस ☆   पुरजोर बहस हुई कागज़ और कलम में मोल किसका है ज्यादा?   बिन कलम मूल्य हीन कोरा कागज़ महज़ चने की पुड़िया पानी में तैरती बच्चों की नाव, कागज़ रहित कलम बढ़ाता जेब की सुंदरता बालों को खुजलाता ऐंठता इठलाता।   भिन्न भिन्न रसों को समेटे कलम की स्याही को रोशनाई बनाते बिखरते हैं आखर जब कलम से कागज पर रसास्वादन कराते बिदकते थिरकते हैं।   करते एक नए युग की शुरुआत रचते इतिहास ज्ञान का हस्तांतरण करते प्रगति का पथ दिखाते कभी मौखिक तो कभी लिखित बन जाते, अपने अर्थ के अनुरूप न घटते, न नष्ट होते स्थिर हो अमर बन जाते।   बगिया के खिले-खिले फूल शांति बन महकते हृदय में अपंग भिक्षुक को देख राह में हृदय को चीरती करूणा टपकती कागज पर बनकर आँसू, सौंदर्य पर मंत्र-मुग्ध होता मन श्रृंगार की अभिव्यक्ति पर बेचैन हो ढूंढता कागज़।   देखकर सूत्रधार के हास्य को मन हंस पड़ता खिलखिलाकर लिख कर शहीदों की गाथाएं वीरता बरसाती कलम, प्राकृतिक आपदा का रौद्र रूप लिखा इस कलम ने जघन्य कृत्य का वीभत्स रूप भी लिखती कागज़ पर ये कलम।   ये कागज़, ये कलम, ये...
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हिन्दी साहित्य – कविता -☆ एक आम मजदूर का साक्षात्कार ☆ – श्री हेमन्त बावनकर

श्री हेमन्त बावनकर   (गत 12 मई 2019 को अंजुमन लिटररी क्लब द्वारा अट्टा गलट्टा, कोरमंगला में आयोजित कार्यक्रम में इस कविता की काव्यभिव्यक्ति दी थी। आशा है आपको पसंद आएगी।)   ☆ एक आम मजदूर का साक्षात्कार ☆   जब से चैनलों पर देखे हैं कई हस्तियों के साक्षात्कार मन में आया ये विचार क्यों न किसी आम मजदूर का लिया जाए साक्षात्कार।   कोई राष्ट्राध्यक्ष तो कह सकता है मन के विचार कभी भी करवा सकता है अपना साक्षात्कार उसके लिए हैं तैयार कई सेलिब्रिटी और पत्रकार   भला कौन साझा करेगा और क्यों करेगा? आम मजदूर के विचार खाक छान ली एक प्रश्नावली लेकर सारे शहर की मजदूर बस्तियों में बस्ती की एक एक गलियों में सब के सब अतिव्यस्त दिखे अस्तव्यस्त दिखे सुबह काम पर जाने की जल्दी शाम को थक कर सोने की जल्दी फिर पिये व्यक्ति से बातें करना था फिजूल कौन सुन सकता है उनकी बातें ऊल जुलूल।   ध्यान आया हर शहर में एक लेबर चौक होता है। जहां हर उस मजदूर का हर सुबह सौदा होता है। जो है बेरोजगार और रहता है बिकने को तैयार।   अलसुबह कलेवा लेकर अपने चंद औज़ार समेटकर चौक पर खड़ा हो जाता है खरीददार ठेकेदार आता है। कद, काठी, हुनर तलाशता है जरूरत और काम के मुताबिक किसी...
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हिन्दी साहित्य – कविता -☆ अनुत्तरित प्रश्न ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी  की कविता  “अनुत्तरित प्रश्न” जिसके उत्तर शायद किसी के भी पास नहीं है।  बस इसका उत्तर नियति पर छोड़ने के अतिरिक्त और कोई उपाय हो तो बताइये। )    ☆ अनुत्तरित प्रश्न ☆   कांधे पर बैग लटकाए बच्चों को स्कूल की बस में सवार हो माता-पिता को बॉय-बॉय करते देख मज़दूरिन का बेटा उसे कटघरे में खड़ा कर देता   ‘तू मुझे स्कूल क्यों नहीं भेजती?’ क्यों भोर होते हाथ में कटोरा थमा भेज देती है अनजान राहों पर जहां लोग मुझे दुत्कारते प्रताड़ित और तिरस्कृत करते विचित्र-सी दृष्टि से निहारते व बुद्बुदाते जाने क्यों पैदा करके छोड़ देते हैं सड़कों पर भीख मांगने के निमित इन मवालियों को उनकी अनुगूंज हरदम मेरे अंतर्मन को सालती   मां! भगवान ने तो सबको एक-सा बनाया फिर यह भेदभाव कहां से आया? कोई महलों में रहता कोई आकाश की खुली छत के नीचे ज़िन्दगी ढोता किसी को सब सुख-सुविधाएं उपलब्ध तो कोई दो जून की रोटी के लिए भटकता निशि-बासर और दर-ब-दर की ठोकरें खाता   बेटा! यह हमारे पूर्व-जन्मों का फल है और नियति है हमारी यही...
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हिन्दी साहित्य – हिन्दी कविता – 🍁 मदर्स डे 🍁 – डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’  मदर्स डे ( डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन ।) हम मातृ दिवस और अन्य कई दिवस मनाते हैं और इसी बहाने कुछ न कुछ सेलिब्रेट करते हैं। मैं डॉ गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' जी की बेबाकी का कायल हूँ। प्रस्तुत है मातृ दिवस पर उनकी विशेष रचना तथाकथित सार्थक बेबाक  Belated टिप्पणी के साथ। मातृदिवस पर कोई दो साल पहले लिखी थी एक कविता. सोचा उसी दिन था कि पोस्ट कर दें  पर फिर मन किया कि अभी तो बाढ़ आई हुई है.कविता भी जल जैसी होती है.  मन और समय की उथल-पुथल में कविता और उसके अभिप्रेत अर्थ उसी तरह  गड्ड-मड्ड होकर उसे अग्राह्य कर देते  हैं जैसे बाढ़़ के पानी में मिट्टी और अन्य तरह की गंदगियां मिलकर पानी को।     मानव वृत्तियाँ भी इसी तरह से कुविचारों से प्रदूषित होकर सुयोधन को दुर्योधन बना देती हैं-"जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः।जानामि अधर्मं न च मे निवृत्तिः।।" बाढ़ के पानी को तत्काल नहीं...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ माँ का वात्सल्य ☆ – सुश्री निशा नंदिनी

सुश्री निशा नंदिनी  (आज प्रस्तुत है सुदूर पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी की  मातृ  दिवस पर  शेष कविता "माँ का वात्सल्य"।) मातृ दिवस पर विशेष  ☆ माँ का वात्सल्य ☆ माँ तो सिर्फ माँ होती है हो चाहे पशु-पक्षी की पथ की ठोकर से बचाकर रक्षा करती बालक की हाथ थाम चलती शिशु का पल-पल साथ निभाती है थोड़ा-थोड़ा दे कर ज्ञान जीवन कला सिखाती है।   विस्तृत नीले आकाश सी धरती सी सहनशील होती टटोल कर बालक के मन को आँचल की घनी छाँव देती पीड़ा हरती बालक की खुशियों का हर पल देती पिरो न सकें शब्दों में जिसे माँ ऐसी अनमोल होती। रचना माँ से सृष्टि की माँ जननी है विश्व की अद्भुत है वात्सल्य माँ का माँ से तुलना नहीं किसी की बेटी, बहन, पत्नी बनकर चमकाती अपने चरित्र को माँ बनकर सर्वस्व अपना देती अपनी संतान को।   © निशा नंदिनी भारतीय  तिनसुकिया,असम...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ जिसका जीवन मां चरणों में ईश्वर उसे दिखता है ☆ – डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव

डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव  मातृ दिवस विशेष  ☆ जिसका जीवन मां चरणों में ईश्वर उसे दिखता है ☆   जो निज गर्भ में नौ माह सृजन करती है, निज लहू से निज संताने सींचा करती है। निज मांस मज्जा जीन गुणसूत्र उसे देती है, जो पालन पोषण करती है वो मां होती है।।   जीवन देती दुनिया में लाती प्रथम गुरु होती है, मां की जान सदा ही निज बच्चों में ही होती है। जैसे धरा की दुनिया सूर्य के चंहु ओर होती है, मां की दुनिया संतानों के आसपास ही होती है।।   क्षिति जल पावक गगन समीरा भी मां होती है, जग से वही मिलाती और सही ग़लत बताती है। व्यक्तित्व गढ़ सवांरती संस्कार वही सिखाती है , दु:ख निराशा असफलता में धीरज दिखाती है।   जीवन है संघर्ष धरती पर जो हारे वो गिरता है, गिर कर उठ जाए जो संग्राम वही जय करता है। असफलता से सफलता दुख से सुख मिलता है, जो निराश हो नहीं उठे वो मां का दूध लजाता है।।   वो बेटे में प्रेमी खोजे और निज पति सा रूप गढ़े, वो बेटे की दोस्त बने और...
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