हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 6 ☆ स्त्री क्या है? ☆ – डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल (डॉ भावना शुक्ल जी  को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ  -साहित्य निकुंज”के  माध्यम से अब आप प्रत्येक शुक्रवार को डॉ भावना जी के साहित्य से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ. भावना शुक्ल जी की  एक भावप्रवण कविता   “स्त्री क्या है ?”। )    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 6  साहित्य निकुंज ☆   ☆ स्त्री क्या है ? ☆   क्या तुम बता सकते हो एक स्त्री का एकांत स्त्री जो है बेचैन नहीं है उसे चैन स्वयं की जमीन तलाशती एक स्त्री क्या तुम जानते हो स्त्री का प्रेम स्त्री का धर्म सदियों से वह स्वयं के बारे में जानना चाहती है क्या है तुम्हारी नजर मन बहुत व्याकुल है सोचती है स्त्री को किसी ने नहीं पहचाना कभी तुमने एक स्त्री के मन को है  जाना पहचाना कभी तुमने उसे रिश्तों के उधेड़बुन में जूझते देखा है.. कभी उसके मन के अंदर झांका है कभी पढ़ा है उसके भीतर का...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गौरैया ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय "आत्मानंद" (श्री सूबेदार पाण्डेय "आत्मानंद" जी का e-abhivyakti में हार्दिक स्वागत है। मैं कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी का हृदय से आभारी हूँ जिन्होने हीरा तलाश कर भेजा है। संभवतः ग्रामीण परिवेश में रहकर ही ऐसी अद्भुत रचना की रचना करना संभव हो। कल्पना एवं शब्द संयोजन अद्भुत! मैं  निःशब्द एवं विस्मित हूँ, आप भी निश्चित रूप से मुझसे सहमत होंगे। प्रस्तुत है श्री सूबेदार पाण्डेय जी कीअतिसुन्दर रचना "गौरैया"।) संक्षिप्त परिचय  व्यवसाय - कृषि, इंजन मैकेनिक नौकरी - डाक विभाग - ग्रामीण पोस्टमैन सम्मान - "कलम के सिपाही" टर्निंग टाइम द्वारा प्रदत्त 5 अगस्त 2017 अभिरुचि - समाज सेवा, साहित्य लेखन सामाजिक कार्य - रक्तदान, मृत्यु-पश्चात शोध कार्य हेतु देहदान, बहन की मृत्यु पश्चात नेत्रदान में सहयोग, निर्धन कन्याओं के विवाह में सक्रिय योगदान।    ☆ गौरैया ☆   मेरे घर के मुंडेर पर गौरैया एक रहती थी अपनी भाषा मे रोज़ सवेरे मुझसे वो कुछ कहती थी   चीं चीं चूं चूं करती वो रोज़ माँगती दाना-पानी गौरैया को देख मुझे आती बचपन की याद सुहानी   नील गगन से झुंडों में वो आती थी पंख पसारे कभी...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ तन्मय साहित्य – # 7 – गुरु पर्व पर विनम्र नमन….. ☆ – डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’   (अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  गुरु पर्व  पर प्रस्तुत है एक कविता  “गुरु पर्व पर विनम्र नमन.....”। )   ☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 7 ☆   ☆ गुरु पर्व पर विनम्र नमन.....  ☆     क्या कहें आपको, अध्यापक टीचर, शिक्षक जी, या गुरुवर या कहें, शिक्षकों के शिक्षक दीक्षा दानी, हे पूण्य प्रवर।   क, क-कहरा से शुभारम्भ ज्ञ, ज्ञान प्राप्ति ,करवाते हो य, योग, गुणनफल, गुण अनेक भ, भाग-बोध सिखलाते हो।   जीवन के लक्ष्य प्राप्ति में, गुरुवर सहचर तुम बन जाते हो बाधाओं से,  संघर्ष करें साहस के मंत्र, सिखाते हो।   कहते हैं कि, है शब्द - ब्रह्म तो, ब्रह्म ज्ञान के, हो दाता गुरु-गोविंद में से पूज्य कौन गुरुवर ही है, विद्या दाता।   हो ज्ञानी, तुम सम्माननीय हे वंदनीय, है नमन् तुम्हें अभिलाषा है, अनवरत,गुरु- मुख...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सनातन प्रश्न ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  आज प्रस्तुत है  उनकी एक विचारणीय कविता   “सनातन प्रश्न ”।)   ☆ सनातन प्रश्न ☆   चंद सनातन प्रश्नों के उत्तर की तलाश में मन आज विचलित है मेरा कौन हूं,क्यों हूं और क्या है अस्तित्व मेरा   शावक जब पंख फैला आकाश में उड़ान भरने लगें दुनिया को अपने नज़रिए से देखने लगें उचित-अनुचित का भेद त्याग गलत राह पर कदम उनके अग्रसर होने लगें दुनिया की रंगीनियों में मदमस्त वे रहने लगें माता-पिता को मौन रहने का संकेत करने लगें उनके साथ चंद लम्हे गुज़ारने से कतराने लगें आत्मीय संबंधों को तज दुनियादारी निभाने लगें तो समझो --मामला गड़बड़ है   कहीं ताल्लुक बोझ ना बन जाएं और एक छत के नीचे रहते हुए होने लगे अजनबीपन का अहसास सहना पड़े रुसवाई और ज़लालत का दंश तो कर लेना चाहिए अपने आशियां की ओर रुख ताकि सुक़ून से कर सकें वे अपना जीवन बसर   डा. मुक्ता पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com मो•न• 8588801878  ...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ॐ गुरुवे नम:।☆ सुश्री निशा नंदिनी भारतीय

सुश्री निशा नंदिनी भारतीय    (आज प्रस्तुत है सुदूर उत्तर -पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी   द्वारा गुरु पर्व पर रचित कविता ॐ गुरुवे नम:।)   ☆ ॐ गुरुवे नम: ☆   ज्ञान गंगा में नहला कर उज्ज्वल जो कर देता है। गति दे पथ की भटकन को सुमार्ग निर्दिष्ट कर देता है। संघर्ष मय जीवन पथ में आशांवित कर देता है। नव उमंग नव ऊर्जा से हर कोना भर देता है।   क्रोधाग्नि को शांत कर सलिल सम कर देता है। जागृत कर विवेक को हंस सम बनाता है। लक्ष्य विहिन जीवन को दिशा नई दिखाता है। जन्म मरण के चक्कर से मुक्ति का मार्ग बताता है।   ज्ञान- तृण को जोड़ कर मनोहर कुटी बनाता है। वही होता है सच्चा गुरु जो लघु को गुरु कर देता है।   © निशा नंदिनी भारतीय  तिनसुकिया, असम 9435533394  ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ हर वर्ष सा गुरुपर्व देखो फिर से आया है ☆ – डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव

गुरु पुर्णिमा विशेष  डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव    (डॉ. प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव जी की एक  भावप्रवण कविता।)   ☆ हर वर्ष सा गुरुपर्व देखो फिर से आया है ☆   हर वर्ष सा गुरुपर्व देखो फिर से आया है, गुरुओं की स्मृति जगाने मन में आया है। मन में बहते गुरु प्रेम का ये सिंधु लाया है, गुरुकृपा वात्सल्यता की सौगात लाया है।। हर वर्ष  - - - - - - - - - - - आया है।   गुरूः बृह्मा गुरुः विष्णु गुरुः देवो महेश्वरः, गुरूः साक्षात् परबृहम् का मंत्र लाया है। गुरू सच्चा मिल जाए तो मिलता है ईश्वर, जीवन में सफलता के वो सोपान लाया है।। हर वर्ष - - - - - - - - - - - - आया है।   गुरू वशिष्ठ और विश्वामित्र की ही कृपा थी, दोनों के सान्निध्य ने राम त्रेता में  बनाया है। सांदीपनी ने द्वापर में कृष्ण बलराम लाया है, द्रोणाचार्य की शस्त्र विद्या ने अर्जुन बनाया है।। हर वर्ष  - - - - - - - - - - - - - - आया है।   परशुराम ने गंगापुत्र को अजेय भीष्म बनाया...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ गुरु वन्दना ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

गुरु पुर्णिमा विशेष  श्री संतोष नेमा “संतोष”   (आज प्रस्तुत है आदरणीय श्री संतोष नेमा जी की  गुरु पुर्णिमा पर विशेष रचना "गुरु वंदना"  “गुरु वन्दना”)   ☆ गुरु वन्दना☆  बिन गुरु कृपा न हरि मिलें,बिनु सत्संग न विवेक हरि सम्मुख जो कर सके,गुरू वही हैं नेक।   गुरु की है महिमा अंनत ,है ऊंचा गुरु मुकाम पहले सुमरें गुरू को,फिर सुमिरें श्री राम।   गुरु को हिय में राखिये, गुरु चरणो में प्रेम दिग्दर्शक नहीं गुरु सा,वही सिखाते नेम।   भय भ्रांति हरते गुरू,दिखा सत्य की राह थामी जिसने गुरु शरण,मिलती कृपा अथाह।   गुरु कृपा से काम बनें,गुरू का पद महान सेवा से ही सुखद फल,जानत सकल जहान।   गुरु का वंदन नित करें,गुरु का रखें ध्यान प्रेरक न कोई गुरु सा,गुरु सृष्टि में महान।   गुरु में गुरुता वही गुरु,गुरु में न हो ग़ुरूर ज्ञान सिखाता गुरु हमें,गुरु से रहें न दूर।   नीर क्षीर करते वही,करें शिष्य उपचार तम हरके रोशन करें,सिखाते सदाचार।   गुरु भक्ति हम सदा करें,हर दिन हो गुरुवार आता जो भी गुरु शरण,उसका हो उद्धार।   गुरु सागर हैं ज्ञान के,गुरू गुणों की खान अंदर बाहर एक रहें,वही गुरु हैं महान।   गुरु पारस सम जानिये, स्वर्ण करें...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सामाजिक चेतना – #6 ☆ भोला सा बचपन ☆ सुश्री निशा नंदिनी भारतीय

सुश्री निशा नंदिनी भारतीय    (सुदूर उत्तर -पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना की  छठवीं  कड़ी में प्रस्तुत है उनकी भावप्रवण कविता  “भोला सा बचपन”। अब आप प्रत्येक सोमवार सुश्री  निशा नंदिनी  जी के साहित्य से रूबरू हो सकते हैं।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना – #6 ☆   ☆ भोला सा बचपन ☆   वो घर से स्कूल स्कूल से घर दौड़ता बचपन पंतग की डोर सा मित्रों से लिपटा बचपन अपना टिफिन भूलकर दूसरे के टिफिन में झांकता बचपन पीछे की बैंच पर बैठकर टीचर की शक्ल बनाता बचपन।   टीचर की डांट से घबराकर नित नये बहाने बनाता बचपन एक छोटी सी पेंसिल पर सर्वस्व लुटाता बचपन घर में आते ही बस्ता फेंककर सड़क पर खेलता बचपन पिता के डांटने पर माँ के आंचल में छिपता बचपन।   गली मोहल्ले की धूल से श्रृंगार करता बचपन पक्षियों सा पेड़ों पर चढ़कर डाल पर बैठ इठलाता बचपन बारिश के पानी में हिरण सा कुलाचें मारता बचपन मुट्ठी भर चने को बांट कर खाता बचपन   गर्मियों की छुट्टियों में नानी के खेतों में हरियाली संग बतियाता बचपन तालाब में नहाता कीचड़ में लोट पोट होता बचपन मकई के खेतों में घुसकर भुट्टे चुराता बचपन याद आते ही...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य #5 – राजनीति के तीतर ☆ – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय   (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  पाँचवी  कड़ी में उनकी  एक सार्थक व्यंग्य कविता “राजनीति के तीतर”। अब आप प्रत्येक सोमवार उनकी साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचना पढ़ सकेंगे।) ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य #5 ☆   ☆ व्यंग्य कविता – राजनीति के तीतर ☆ तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर, बढ़  ना पाये तीनों तीतर ।   कुंठित रह गये भीतर-भीतर, बढ ना जाये अगला तीतर, खींच रहा है पिछला तीतर।   बाहर खूब दिखावा करते, कुढ़ते रहते भीतर-भीतर, जहां खड़े थे पहले तीतर।   वही खड़े हैं अब भी तीतर, तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ होम करते रहे हाथ जलते रहे.! ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”   (आदरणीय श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी  एक भावप्रवण रचना   “होम करते रहे हाथ जलते रहे.!”)   ☆ होम करते रहे हाथ जलते रहे.! ☆    होम करते रहे हाथ जलते रहे.! हम मगर सत्य के साथ चलते रहे।   हर कदम पर दिया प्यार का इम्तिहां। मुझको पागल समझता रहा ये जहां।। नफरतों के कुटिल साँप पलते रहे होम करते रहे हाथ जलते रहे..!   एक उम्मीद जलती रही रात-दिन। बर्फ मन की पिघलती रही रात-दिन। हर नजर में हमीं रोज खलते रहे। होम करते रहे हाथ जलते रहे..!   ज्यादती कर रही बदनियति आजकल। बदनुमा है मनुज की प्रकृति आजकल। आचरण धर्म के हाथ मलते रहे। होम करते रहे हाथ जलते रहे..!   आस-विश्वास का खुद हीआधार हूँ। मुश्किलों का स्वयं मैं खरीदार हूँ । वक्त के साथ ही रोज ढलते रहे। होम करते रहे हाथ जलते रहे..!   @ संतोष नेमा “संतोष” आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मोबा 9300101799...
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