हिन्दी साहित्य – कविता – * मैं लौट आऊंगा * – डा. मुक्ता

डा. मुक्ता मैं लौट आऊंगा (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। प्रस्तुत है  एक सामयिक एवं मार्मिक रचना जिसकी पंक्तियां निश्चित ही आपके नेत्र नम कर देंगी और आपके नेत्रों के समक्ष सजीव चलचित्र का आभास देंगे।) वह ग़बरू जवान जिसे बुला लिया गया था मोर्चे पर आपात काल में जो चार दिन पहले ही बंधा था विवाह-बंधन में जिसकी पत्नी ने उसे आंख-भर देखा भी नहीं था और ना ही छूटा था उसकी मेहंदी का रंग उसके जज़्बात मन में हिलोरे ले रहे थे बरसों से संजोए स्वप्न साकार होने से पहले वह अपनी पत्नी से शीघ्रता से लौटने का वादा कर भारी मन से लौट गया था सरहद पर परंतु,सोचो!क्या गुज़री होगी उस नवयौवना पर जब उसका प्रिययम तिरंगे में लिपटा पहुंचा होगा घर मच गया होगा चीत्कार रो उठी होंगी दसों दिशाएं पल-भर में राख हो गए होंगे उस अभागिन के अनगिनत स्वप्न उसके सीने से लिपट सुधबुध खो बैठी होगी वह और बह निकला होगा उसके नेत्रों से अजस्र आंसुओं का सैलाब क्या गुज़री होगी उस मां पर जिस का इकलौता बेटा उसे आश्वस्त कर शीघ्र लौटने का वादा कर रुख्सत हुआ होगा और उसकी छोटी...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * साज़ का चमन * – श्रीमति सुजाता काले

श्रीमति सुजाता काले साज़ का चमन (श्रीमति सुजाता काले जी का e-abhivyakti में स्वागत है। प्रस्तुत है पर्यावरण एवं मानवीय संवेदनाओं का बेहद सुंदर शब्द चित्रण।) शहर शहर उजड़ गए, बाग में बसर नहीं । चारों ओर आग है, कहीं बची झील नहीं ।उजड़ गए हैं घोंसले, उजड़े हुए हैं दिन कहीं । सफ़र तो खैर शुरू हुआ, पर कहीं शज़र नहीं । मासूम से परिंदों का अब न वासता कहीं, कौन जिया कौन मरा, अब कोई खबर नहीं । दुबक गए पहाड़ भी, लुटी सी है नदी कहीं, ये कौन चित्रकार है, जिसने भरे न रंग अभी। शाम हैं रूकी- रूकी, दिन है बुझा कहीं, सहर तो रोज होती है, रात का पता नहीं । मंज़िलों की लाश ये, कर रही तलाश है, बेखबर सा हुस्न है, इश्क से जुदा कहीं । जहां बनाया या ख़ुदा, और तूने जुदा किया, साँस तो रूकी सी है, आह है जमीन हुई। लुट चुका जहां मेरा, अब कोई खुशी नहीं, राह तो कफ़न की है, ये साज़ का चमन नहीं । © सुजाता काले ✍... पंचगनी, महाराष्ट्र ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * तुझसे रुबरु होने को दिल करता है * – सुश्री निशा नंदिनी

सुश्री निशा नंदिनी  तुझसे रुबरु होने को दिल करता है (आज प्रस्तुत है सुदूर पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी की  एक प्यारी सी नज़्म “तुझसे रुबरु होने को दिल करता है। ” )   तुझसे रुबरु होने को दिल करता है। दिल मेरा बच्चे के मानिंद मचलता है।   रूप ऐसा तेरा कि ना कभी दिखाई दिया। झुरमुठों की एक आस पर ये चलता है। तुझसे रुबरु होने को दिल करता है।   तेरी ज्योति से जगमग ये कायनात सारी, तुझे ढूंढने की कोशिश में ये बहलता है। तुझसे रुबरु होने को दिल करता है।   कल तक फकीरी में जो गुजारे थे  दिन "निशा" आज तेरे वजूद पर महकता है। तुझसे रुबरु होने को दिल करता है।   © निशा नंदिनी भारतीय  तिनसुकिया,असम ...
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हिन्दी साहित्य-कविता – जीवन-प्रवाह – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय           जीवन-प्रवाह     (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की  विश्व कविता दिवस पर जीवन की कविता -"जीवन –प्रवाह" )   सबसे बड़ी होती है आग, और सबसे बड़ा होता है पानी, तुम आग पानी से बच गए, तो तुम्हारे काम की चीज़ है धरती, धरती से पहचान कर लोगे, तो हवा भी मिल सकती है, धरती के आंचल से लिपट लोगे, तो रोशनी में पहचान बन सकती है, तुम चाहो तो धरती की गोद में, पांव फैलाकर सो भी सकते हो, धरती को नाखूनों से खोदकर, अमूल्य रत्नों भी पा सकते हो, या धरती में खड़े होकर, अथाह समुद्र नाप भी सकते हो, तुम मन भर जी भी सकते हो, धरती पकडे यूं मर भी सकतेहो, कोई फर्क नहीं पड़ता, यदि जीवन खतम होने लगे, असली बात तो ये है कि,          धरती पर जीवन प्रवाह चलता रहे।    © जय प्रकाश पाण्डेय, जबलपुर (श्री जय प्रकाश पाण्डेय, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा हिन्दी व्यंग्य है। )   ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * आज होली है * – सुश्री निशा नंदिनी

सुश्री निशा नंदिनी  आज होली है  (आज प्रस्तुत है सुदूर पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी की  होली पर्व पर विशेष कविता  “आज होली है” ) आओ करें परिहास,आज होली है कहीं सूखी कहीं गीली,आज होली है। उड़े अबीर गुलाल रंग पिचकारी है गाओ खुशी के गीत आज होली है। नैनों से नैनों का मिलन है राधे खो गई श्यामल संग है। पायल बिंदिया झुमका कंगन अब तो इठलाते हैं हरदम । रंग रंगीली और छबीली होली है। आओ करे परिहास आज होली है कहीं सूखी कहीं गीली आज होली है। उडे़ अबीर गुलाल रंग पिचकारी है गाओ खुशी के गीत आज होली है। चूनर रंग गई श्याम रंग चढ़े न अब तो दूजा रंग बरसाने की गोपी ग्वालिन रास रचाये कान्हा संग। कान्हा कान्हा रटते, रस घोली है। आओ करे परिहास, आज होली है कहीं सूखी कहीं गीली,आज होली है। उड़े अबीर गुलाल, रंग पिचकारी है। गाओ खुशी के गीत आज होली है। © निशा नंदिनी भारतीय  तिनसुकिया,असम  ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * अबकी होली …. बेरंग होली  * – श्रीमति सखी सिंह 

श्रीमति सखी सिंह    अबकी होली .... बेरंग होली  (श्रीमति सखी सिंह जी का e-abhivyakti में स्वागत है।  प्रस्तुत कर रहा हूँ  प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमति सखी सिंह जी की कविता बिना किसी भूमिका के  उन्हीं के शब्दों के साथ - एक ख्याल आया रात कि जो शहीद हुए हैं पिछले कुछ दिनों में उनके घर का आलम क्या होगा इस वक़्त। मन उदासी से भर गया। आंखें नम हो गयी। ) उन सभी लोगों को समर्पित जो कहीं न कहीं इस दर्द से जुड़े हैं। अबकी होली बेरंग होली सैयां न अब घर आएंगे, नयन हमारे अश्क़ बहाते चौखट पे जा टिक जाएंगे। राह हो गयी सूनी कबसे पिया गए किस देश हमारे भारत माँ की चुनर रंग दी सुर्ख लहूँ के बहा के धारे माटी को मस्तक धारूँगी माटी में पिया दिख जाएंगे। अबकी होली बेरंग होली.... गहनों की झंकार तुम्ही थे मेरा सब श्रृंगार तुम्हीं थे मात पिता के तुम थे सहारा सपनों का आधार तुम्ही थे सपने बिखरे साथ तुम्हारे बिन सपनों के कित जाएंगे। अबकी होली.... © सखी सिंह, पुणे    ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * फागुन आया * – सुश्री मालती मिश्रा ‘मयंती’

सुश्री मालती मिश्रा ‘मयंती’ फागुन आया हवाओं की नरमी जब मन को गुदगुदाने लगे नई-नई कोपलें जब डालियाँ सजाने लगें, खुशनुमा माहौल लगे, मन में उठें तरंग तब समझो फागुन आया, लेकर खुशियों के रंग। खिलते टेसू पलाश मन झूमे होके मगन पैर थिरकने लगे नाचे मन छनन-छनन, बैर-भाव भूलकर खेलें जब सभी संग तब समझो फागुन आया लेकर खुशियों के रंग। होली है त्योहार रंगों का खुशियाँ भर-भर लाता है फागुन के मदमस्त फिजां में, झूम-झूम मन गाता है, राग रंजिश भूल सभी आज रंगें प्रेम रंग अब देखो फागुन आया लेकर खुशियों के रंग। © मालती मिश्रा ‘मयंती’ ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * आओ मिलकर होली मनाए * – श्री नरेंद्र राणावत

श्री नरेंद्र राणावत   आओ मिलकर होली मनाए   जाति पांति के बंधन तोड़ो सब एक दूसरे को जोड़ो नही जगत में कुछ भी अपना छोड़ो झूठी माया का सपना   वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना जगाकर सत्य अहिंसा की हम ज्योत जलाए सब आपसी मनमुटाव भुलाकर एक दूसरे को गले लगाए   नफरत की दीवारें मिटाकर साम्प्रदायिकता की होली जलाए गीत ख़ुशी के हम सब गाए आओ मिलकर होली मनाए   © नरेंद्र राणावत   (सर्वाधिकार सुरक्षित) मूली चितलवाना, जिला-जालोर, राजस्थान ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * बिनआखर बिन शब्द के * – सुश्री निशा नंदिनी

सुश्री निशा नंदिनी  बिनआखर बिन शब्द के  (आज प्रस्तुत है सुदूर पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी की भावप्रवण  कविता  "बिनआखर बिन शब्द के" )   उड़ते हुए शब्दों को पकड़ मन पिंजर में बंद कर निर्जन शांत एकांत में बैठ जुगाली का आनंद लिया कुछ कटीले कुश सम कंठ को घायल कर तो कुछ नरम घास सम जठरानल को शांत कर गए। मन-मस्तिष्क, हृदय से जन्मे ये कुछ आड़े-तिरछे से कुछ शालीनता की चादर ओढ़े चौकड़ी जमाये मुख के द्वार पर बैठे कुछ सम्मान की डोर को थामे तो कुछ अपमान की रस्सी पकड़े सहमे सिमटे से पड़े हैं। अनोखे जादूगर सम गीतों का आनंद देकर मन शांत रखने में सहायक पंछी सम समीपस्थ उड़कर लोरी की मिठास,ममत्व को कानों में मिस्री सा घोल देते हैं। दंतहीन होकर भी विषैले दर्द का अहसास दे निर्मल नैनों से अश्रुधार बहा उतावला कर हर किसी की पोल खोल विकास के नये आयामों से जोड़ देते हैं। कबीर के ढाई आखर की महिमा कण कण में व्याप्त हो बिखेरती सिंदूरी रंग चढ़कर सीढ़ी पर देख लिया विस्तृत संसार बिनआखर बिनशब्द के रामायण, गीता, वेद, कुरान गुप्त रह बेमोल हो जाते। © निशा नंदिनी भारतीय  तिनसुकिया, असम 9435533394 ...
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हिन्दी साहित्य – कविता – * आग * – डा. मुक्ता

डा. मुक्ता आग   (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। प्रस्तुत है  विचारणीय एवं सार्थक कविता ‘आग ’)   आग!माचिस की तीली से लगाई जाए या शॉर्ट सर्किट से लगे विनाश के कग़ार पर पहुंचाती दीया हो या शमा...काम है जलना पथ को आलोकित कर भटके राही को मंज़िल तक पहुंचाना   यज्ञ की समिधा प्रज्जवलित अग्नि लोक-मंगल करती प्रदूषण मिटा पर्यावरण को स्वच्छ बनाती क्योंकि जलने में निहित है त्याग,प्यार व समर्पण का भाव... और जलाना… सदैव स्वार्थ व विनाश से प्रेरित   भेद है,लक्ष्य का...सोच का क्योंकि परार्थ व परोपकार की सर्वोपरि भावना सदैव प्रशंनीय व अनुकरणीय होती   आग केवल जलाती नहीं मंदिर की देहरी का दीया बन निराश मन में उजास भरती ऊर्जस्वित करती सपनों को पंख लगा नयी उड़ान भरती आकाश की बुलंदियों को छू एक नया इतिहास रचती   © डा. मुक्ता पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com  ...
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