यात्रा-संस्मरण – कनाडा – श्री सुरेश पटवा

श्री सुरेश पटवा कनाडा (आदरणीय श्री सुरेश पटवा जी की साहित्यिक अध्ययन  के अतिरिक्त पर्यटन में भी विशेष अभिरुचि है। श्री सुरेश पटवा जी की यात्रा संस्मरण लेखन की अपनी अलग ही शैली है। वे किसी  पर्यटन स्थल पर जाने से पहले उस स्थल का भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक एवं संस्कृतिक आदि प्रत्येक दृष्टि से  अध्ययन करते हैं। प्रस्तुत है उनके कनाडा यात्रा की कड़ी में यह प्रथम आलेख।) शब्द कनाडा इरोक्वॉयाई शब्द कनाटा से बना हुआ है जिसका अर्थ "गाँव" अथवा "बसावट" होता है। सन् 1535 में वर्तमान क्यूबेक नगर क्षेत्र के स्टैडकोना गाँव की खोज ज़ाक कार्तिए ने की थी। कार्तिए ने बाद में डोंनकना, स्टैडकोना के मुखिया से बातचीत में सम्बंधित पूर्ण क्षेत्र के लिए कनाडा शब्द से उल्लिखीत किया; इसके बाद सन् 1545 से यूरोपीय पुस्तकों और मानचित्रों में इस क्षेत्र को कनाडा नाम से उल्लिखित किया जाने गया। वर्तमान में कनाडा में आदिवासी लोगों में प्राथमिक रूप से इनुइट, और मेटीस लोग शामिल हैं। इसके अलावा मिश्रित नस्ल भी हैं, जो...
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सफरनामा-नर्मदा परिक्रमा-6 – श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा            प्रस्तुत है सफरनामा – श्री सुरेश पटवा जी की कलम से (इस श्रंखला में  अब तक आपने पढ़ा श्री पटवा जी की ही शैली में पवित्र नदी नर्मदा जी से जुड़ी हुई अनेक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और पौराणिक रोचक जानकारियाँ जिनसे आप संभवतः अनभिज्ञ  रहे होंगे। प्रस्तुत है उनकी  यात्रा के अनुभव उनकी ही कलम से उनकी ही शैली में। )   नर्मदा परिक्रमा 6 भड़पुरा से झाँसीघाट रात्रि विश्राम हमने भडपुरा स्थित कुटी में किया। कुटी की देखभाल एक बूढ़ी माँ माँग-ताँग कर करती है। वह आश्रम किसी बड़े किसान ने इस शर्त पर बनवा दिया था कि परिक्रमा करने वालों को भोजन मिलना चाहिए। वे वैरागी हैं, उसका बेटा नवरात्रि में दुर्गा जी की मूर्ति का पंडा बना था। वहीं झाँकी के पंडाल में रहता था। सुबह नहाने धोने भर को घर आता था। उसे ख़बर लगी तो वह देखने आया। बातचीत करके संतुष्ट हो कर चला गया। उसकी बीबी को छः लोगों के लिए रोटी सब्ज़ी बनाना था तो उसका मूड ख़राब होने...
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सफरनामा-नर्मदा परिक्रमा-5 – श्री सुरेश पटवा

 सुरेश पटवा            प्रस्तुत है सफरनामा – श्री सुरेश पटवा जी की कलम से (इस श्रंखला में  अब तक आपने पढ़ा श्री पटवा जी की ही शैली में पवित्र नदी नर्मदा जी से जुड़ी हुई अनेक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और पौराणिक रोचक जानकारियाँ जिनसे आप संभवतः अनभिज्ञ  रहे होंगे। प्रस्तुत है उनकी  यात्रा के अनुभव उनकी ही कलम से उनकी ही शैली में। )   नर्मदा परिक्रमा 5 बिजना घाट से भड़पुरा सुबह जल्दी ही अगली यात्रा पर निकल लिए। पहले नदी के कछार में से ही चलते रहे। मुरकटिया घाट से नर्मदा का पहले बाई फिर दाई ओर मुडना देखा, उन दीर्घ चट्टानों को देखा जिन्हे नर्मदा मानो अपने साथ बहा कर लाई हो और फिर किनारे लगा दिया।हमें यहाँ नर्मदा का एक स्वरूप और दिखा बीच नदी पर स्थित गुफाओं का निर्माण मानो नर्मदा ने चट्टानो पर अपनी लहरिया छैनी हथौडी चलाकर छेद और गुफायें बना डाली हैं। आगे चले दुर्गम तो नहीं पर कठिन मार्ग कहीं नर्मदा के तीरे तीरे तो कहीं बीहड डांगर पार करते...
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सफरनामा-नर्मदा परिक्रमा-4 – श्री सुरेश पटवा

श्री सुरेश पटवा            प्रस्तुत है सफरनामा – श्री सुरेश पटवा जी की कलम से (इस श्रंखला में  अब तक आपने पढ़ा श्री पटवा जी की ही शैली में पवित्र नदी नर्मदा जी से जुड़ी हुई अनेक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और पौराणिक रोचक जानकारियाँ जिनसे आप संभवतः अनभिज्ञ  रहे होंगे। प्रस्तुत है उनकी  यात्रा के अनुभव उनकी ही कलम से उनकी ही शैली में। )   नर्मदा परिक्रमा 4 भेड़ाघाट से बिजना घाट भेड़ाघाट से बिजना घाट की यात्रा सबसे लम्बी थकाऊ और उबाऊ थी। पहले हमने तय किया था कि रामघाट में रुककर रात गुज़ारेंगे। मंगल सिंह परिहार जी वहाँ से चार किलोमीटर आगे रास्ता देख रहे थे। सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। खजूर मूँगफली दाने और चने व पानी के दम पर खींचे जा रहे थे। चार घण्टे चल चुके थे। दोपहर में तेज़ धूप में चलने से शरीर का ग्लूकोस जल जाता है और हवा में ऑक्सिजन भी कम हो जाती है। मांसपेशियाँ जल्दी थकने लगतीं हैं और साँस फूलने लगती है। दो बजे...
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सफरनामा-नर्मदा परिक्रमा-3 – श्री सुरेश पटवा

श्री सुरेश पटवा            प्रस्तुत है सफरनामा – श्री सुरेश पटवा जी की कलम से (इस श्रंखला में  अब तक आपने पढ़ा श्री पटवा जी की ही शैली में पवित्र नदी नर्मदा जी से जुड़ी हुई अनेक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और पौराणिक रोचक जानकारियाँ जिनसे आप संभवतः अनभिज्ञ  रहे होंगे। प्रस्तुत है उनकी  यात्रा के अनुभव उनकी ही कलम से उनकी ही शैली में। )   नर्मदा परिक्रमा 3 तिलवारा घाट से भेड़ाघाट  15 तारीख़ को हम तिलवारा घाट से चलने को तैयार हुए तो पता चला कि पुल के किनारे से एक नाला गारद और कंपे से भरा होने के कारण दलदली हो गया है लिहाज़ा एक किलोमीटर ऊपर से नए घूँसोर, लमहेंटा,चरगवा, धरती कछार से एक रोड शाहपुरा निकल गई है। लम्हेंटा घाट पर शनि मंदिर से लगा ब्रह्म कुंड देखा। ऐसी मान्यता है कि जब कोई कोढ़ी मर जाता है तो उसके शव को ब्रह्मकुंड में सिरा देते हैं। वह सीधा पाताल लोक पहुँच जाता है। शाम को चार बजे धुआँधार पहुँच गए। डूंडवारा से पसर कर बहने...
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सफरनामा-नर्मदा परिक्रमा-2 – श्री सुरेश पटवा

श्री सुरेश पटवा            प्रस्तुत है सफरनामा – श्री सुरेश पटवा जी की कलम से (इस श्रंखला में  अब तक आपने पढ़ा श्री पटवा जी की ही शैली में पवित्र नदी नर्मदा जी से जुड़ी हुई अनेक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और पौराणिक रोचक जानकारियाँ जिनसे आप संभवतः अनभिज्ञ  रहे होंगे। प्रस्तुत है उनकी  यात्रा के अनुभव उनकी ही कलम से उनकी ही शैली में। )  नर्मदा परिक्रमा 2 ग्वारीघाट से तिलवारा घाट ग्वारीघाट से चले दो घंटे हो चुके थे। तिलवारा घाट शाम तक पहुँचने का लक्ष्य था। तिलवारा घाट का पुल तीन किलोमीटर पहले से दिखने लगा था। उसे देखते ही लगा कि लो पहुँच गए तिलवारा घाट परंतु चलते-चलते पुल नज़दीक ही नहीं आ रहा था। पुल के  दृश्य का पेनोरमा नज़ारा जैसा का तैसा बना था। तभी सामने एक बड़ा चौड़ा पहाड़ी नाला रास्ता रोककर खड़ा हो गया। खेतों में काम कर रहे मल्लाहों से पूछा तो उन्होंने बताया कि दो किलोमीटर ऊपर चढ़कर नाला पार करके नागपुर रोड पर पहुँच कर तिलवारा घाट पहुँचा जा सकता...
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सफरनामा-नर्मदा परिक्रमा-1 – श्री सुरेश पटवा

श्री सुरेश पटवा            प्रस्तुत है सफरनामा – श्री सुरेश पटवा जी की कलम से (इस श्रंखला में  अब तक आपने पढ़ा श्री पटवा जी की ही शैली में पवित्र नदी नर्मदा जी से जुड़ी हुई अनेक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और पौराणिक रोचक जानकारियाँ जिनसे आप संभवतः अनभिज्ञ  रहे होंगे। श्री पटवा जी  ने नर्मदा परिक्रमा खंड-1 की यात्रा अपने परिक्रमा-दल के साथ पूर्ण  कर ली है। अब  हम साझा करेंगे उनकी  यात्रा का अनुभव उनकी ही कलम से उनकी ही शैली में ।)  नर्मदा परिक्रमा-1 परिक्रमा दल  नाम              उम्र  परिचय बी सी कोलिता      91      सेवानिवृत्त फ़ौजी जगमोहन अग्रवाल  71      सेवानिवृत बैंकर प्रयास जोशी        66      सेवानिवृत बैंकर अरुण दनायक      59      स.म.प्र. भारतीय स्टेट बैंक श्रीवर्धन नेमा      59      सेवारत बैंकर रवि भाटिया        63      सेवानिवृत्त बैंकर विनोद प्रजापति    59      सेवारत बैंकर अविनाश दवे      60      सेवारत बैंकर मुंशीलाल पाटकर    59   ...
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सफरनामा-रेवा : नर्मदा -6 – श्री सुरेश पटवा

रेवा : नर्मदा - 6            प्रस्तुत है सफरनामा – श्री सुरेश पटवा जी की खोजी कलम से (इस श्रंखला में आप पाएंगे श्री पटवा जी की ही शैली में पवित्र नदी नर्मदा जी से जुड़ी हुई अनेक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और पौराणिक रोचक जानकारियाँ जिनसे आप संभवतः अनभिज्ञ  हैं।) लोग अक्सर नर्मदा को सतपुड़ा की बेटी कह देते हैं जो पूरी तरह सही नहीं है। भारत के भूगोल को जानने वाले समझते हैं कि विंध्याचल और सतपुड़ा दो पर्वत श्रेणियाँ मध्यभारत में पूर्व से पश्चिम की तरफ़ पसरी हुईं हैं। आज के रीवा संभाग में सीधी से एक पर्वत श्रंखला रीवा सतना पन्ना छतरपुर दमोह सागर रायसेन सिहोर देवास इंदौर झाबुआ होते हुए गुजरात निकल जाती है। वही विंध्याचल पर्वत शृंखला है। जिससे हिरन, टिंदोली, बारना, चंद्रकेशर, कानर, मान, उटी और हथनी, ये आठ नदियाँ आकर माँ नर्मदा में मिलतीं हैं।     रेवा कुंड अमरकण्टक     मैकल पर्वत से निकलकर नर्मदा के साथ सतपुड़ा की पर्वतश्रेणियाँ डिंडोरी मंडला जबलपुर नरसिंघपुर होशंगाबाद और हरदा से होकर गुज़रती है। इस...
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सफरनामा-नर्मदा का ऐतिहासिक महत्व-5 – श्री सुरेश पटवा

नर्मदा का ऐतिहासिक महत्व-5           प्रस्तुत है सफरनामा – श्री सुरेश पटवा जी की खोजी कलम से (इस श्रंखला में आप पाएंगे श्री पटवा जी की ही शैली में पवित्र नदी नर्मदा जी से जुड़ी हुई अनेक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और पौराणिक रोचक जानकारियाँ जिनसे आप संभवतः अनभिज्ञ  हैं।) ऐतिहासिक तत्व दर्शन से भी नर्मदा को समझना उतना ही ज़रूरी है जितना भाव दृष्टि से है। हिंदू दर्शन का काल निर्धारण इस तरह हुआ है कि सबसे पहले ईसा से दो हज़ार साल याने आज से चार हज़ार साल पहले चार वेदों की रचना पंजाब की पाँच नदियों व्यास सतलज झेलम रावी चिनाब और अफगानिस्तान की काबुल नदी लद्दाख़ से आती हुई सिन्ध में समाहित हो जाती हैं, उस क्षेत्र में हुई थी। आज से तीन हज़ार पाँच सौ साल पहले वेदों के 108 उपनिषद गंगा और यमुना के मैदानी भू-भाग में रचे गए। वैदिक काल में कृषि और ऋषि, ये दो महान संस्थाएँ थीं। लोग कृषि से अवकाश पाकर ऋषि की कुटिया के पास बने चबूतरों...
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सफरनामा-नर्मदा की असफल प्रेम कथा-4 – श्री सुरेश पटवा

नर्मदा की असफल प्रेम कथा-4            आर्यों के साहित्य में यह चीज़ बार-बार मिलती है कि उन्होंने अनार्यों से वैवाहिक सम्बंध बनाकर अपने में मिला लिया। यही बात नर्मदा के प्रेम प्रसंग में भी दिखती है। लोक कथा में नर्मदा को रेवा नदी और शोणभद्र को सोनभद्र के नाम से जाना गया है। राजकुमारी नर्मदा राजा मेखल (महाकाल) की पुत्री थी। राजा मेखल ने अपनी अत्यंत रूपसी पुत्री के लिए यह तय किया कि जो राजकुमार गुलबकावली के दुर्लभ पुष्प उनकी पुत्री के लिए लाएगा वे अपनी पुत्री का विवाह उसी के साथ संपन्न करेंगे। पड़ौसी राज्य के राजकुमार सोनभद्र गुलबकावली के फूल ले आए अत: उनसे राजकुमारी नर्मदा का विवाह तय हुआ। नर्मदा अब तक सोनभद्र के दर्शन ना कर सकी थी लेकिन उसके रूप, यौवन और पराक्रम की कथाएं सुनकर मन ही मन वह भी उसे चाहने लगी। विवाह होने में कुछ दिन शेष थे लेकिन नर्मदा से रहा ना गया उसने अपनी दासी जुहिला के हाथों प्रेम संदेश भेजने की...
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