रंगमंच स्मृतियाँ – “कोर्ट मार्शल” – श्री समर सेनगुप्ता एवं श्री अनिमेष श्रीवास्तव

रंगमंच स्मृतियाँ – "कोर्ट मार्शल" – श्री समर सेनगुप्ता एवं श्री अनिमेष श्रीवास्तव  (यह विडम्बना है कि  – हम सिनेमा की स्मृतियों को तो बरसों सँजो कर रखते हैं और रंगमंच के रंगकर्म को मंचन के कुछ दिन बाद ही भुला देते हैं। रंगकर्मी अपने प्रयास को आजीवन याद रखते हैं, कुछ दिन तक अखबार की कतरनों में सँजो कर रखते हैं और दर्शक शायद कुछ दिन बाद ही भूल जाते हैं। कुछ ऐसे ही क्षणों को जीवित रखने का एक प्रयास है “रंगमंच स्मृतियाँ “। यदि आपके पास भी ऐसी कुछ स्मृतियाँ हैं तो आप इस मंच पर साझा कर सकते हैं। इस प्रयास में  सहयोग के लिए  श्री समर सेनगुप्ता जी  एवं श्री अनिमेष श्रीवास्तव जी का आभार।  साथ ही भविष्य में सार्थक सहयोग की अपेक्षा के साथ   – हेमन्त बावनकर)    "कोर्ट मार्शल" संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के व्यक्तिगत अनुदान योजना के अंतर्गत ( CFPGS) इस नाटक की प्रस्तुति विगत 18 मार्च 2019 तो शाम 7.30 बजे  मानस भवन, जबलपुर में श्री स्वदेश...
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रंगमंच/Theatre – “मूवी मेकर” – अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में चयनित – श्री दीपक तिवारी ‘दिव्य’

"मूवी मेकर" – अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में चयनित संस्कारधानी जबलपुर ने अब तक कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कलाकार देश को दिए हैं। किंतु अब शहर में बनी फिल्मों ने भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना शुरू कर दिया है। फाइव गाड फिल्म्स के बैनर तले बनी फिल्म मूवी मेकर फिल्म को दो अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में अधिकारिक रूप से चयनित किया गया है। मुंबई के सबसे सम्माननीय दादा साहब फाल्के अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव  2019 एवं अमेरिका के प्रतिष्ठित द लिफ्ट अप  सेशन 2019 के लिए चुना गया है। जहां इस फिल्म में शहर के कलाकार संदीप सोनकर ने लेखक, निर्माता,निर्देशक, एडिटर,डीओपी एवं अभिनेता के रूप में काम किया है। वहीं शहर के कलाकार दीपक तिवारी ने मूवी मेकर फिल्म प्रोड्यूसर का अहम किरदार निभाया है। फिल्म मूवी मेकर एक अति उत्साही युवा की कहानी है। जिसके माध्यम से हास्य एवं व्यंग की विधा का उपयोग कर फिल्मी दुनिया की जटिलताओं से युवाओं को अवगत कराने का प्रयास किया गया है। इस फिल्म के...
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रंगमंच स्मृतियाँ – “कफन” – श्री समर सेनगुप्ता

रंगमंच स्मृतियाँ – “कफन” – श्री समर सेनगुप्ता (यह विडम्बना है कि  – हम सिनेमा की स्मृतियों को तो बरसों सँजो कर रखते हैं और रंगमंच के रंगकर्म को मंचन के कुछ दिन बाद ही भुला देते हैं। रंगकर्मी अपने प्रयास को आजीवन याद रखते हैं, कुछ दिन तक अखबार की कतरनों में सँजो कर रखते हैं और दर्शक शायद कुछ दिन बाद ही भूल जाते हैं। कुछ ऐसे ही क्षणों को जीवित रखने का एक प्रयास है “रंगमंच स्मृतियाँ “। यदि आपके पास भी ऐसी कुछ स्मृतियाँ हैं तो आप इस मंच पर साझा कर सकते हैं। इस प्रयास में  सहयोग के लिए e-abhivyakti श्री समर सेनगुप्ता जी का आभार व्यक्त करता है। साथ ही भविष्य में सार्थक सहयोग की अपेक्षा करता है  – हेमन्त बावनकर)    कफन  यह नाटक मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी "कफन" पर आधारित है। भारतीय समाज का गठन बहुत ही  निर्मम ढंग से हुआ है. मेहनत-मशक्कत से आजीविका चलानेवालों को निम्न वर्ग में रखा गया है और दूसरों की...
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रंगमंच नाटिका – “राह” – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नाटिका राह (स्मरण महीयसी महादेवी वर्मा जी: १)  संवाद शैली में संस्मरणात्मक लघु नाटिका   १. राह एक कमरे का दृश्य: एक तख़्त, दो कुर्सियाँ एक मेज। मेज पर कागज, कलम, कुछ पुस्तकें, कोने में कृष्ण जी की मूर्ति या चित्र, सफ़ेद वस्त्रों में आँखों पर चश्मा लगाए एक युवती और कमीज, पैंट, टाई, मोज़े पहने एक युवक बातचीत कर रहे हैं। युवक कुर्सी पर बैठा है, युवती तख़्त पर बैठी है। नांदीपाठ: उद्घोषक: दर्शकों! प्रस्तुत है एक संस्मरणात्मक लघु नाटिका 'विश्वास'। यह नाटिका जुड़ी है एक ऐसी गरिमामयी महिला से जिसने पराधीनता के काल में, परिवार में स्त्री-शिक्षा का प्रचलन न होने के बाद भी न केवल उच्च शिक्षा ग्रहण की, अपितु देश के स्वतंत्रता सत्याग्रह में योगदान किया, स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में असाधारण कार्य किया, हिंदी साहित्य की अभूतपूर्व श्रीवृद्धि की, अपने समय के सर्व श्रेष्ठ पुरस्कारों के लिए चुनी गयी, भारत सरकार ने उस पर डाक टिकिट निकाले, उस पर अनेक शोध कार्य हुए, हो रहे हैं और होते रहेंगे। नाटिका का नायक एक...
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रंगमंच स्मृतियाँ – “काल चक्र” – श्री असीम कुमार दुबे

रंगमंच स्मृतियाँ – “काल चक्र” – श्री असीम कुमार दुबे (यह विडम्बना है कि  – हम सिनेमा की स्मृतियों को तो बरसों सँजो कर रखते हैं और रंगमंच के रंगकर्म को मंचन के कुछ दिन बाद ही भुला देते हैं। रंगकर्मी अपने प्रयास को आजीवन याद रखते हैं, कुछ दिन तक अखबार की कतरनों में सँजो कर रखते हैं और दर्शक शायद कुछ दिन बाद ही भूल जाते हैं। कुछ ऐसे ही क्षणों को जीवित रखने का एक प्रयास है “रंगमंच स्मृतियाँ “। यदि आपके पास भी ऐसी कुछ स्मृतियाँ हैं तो आप इस मंच पर साझा कर सकते हैं। – हेमन्त बावनकर)    काल चक्र - मानवीय संवेदनाओं का बयां करता नाटक   संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से कोशिश नाट्य संस्था की ओर से भारत भवन के अंतरंग सभागार में रंगकर्मी श्री असीम कुमार दुबे के निर्देशन में नाटक 'काल चक्र' का मंचन किया गया। इस नाटक का मंचन 13 वर्ष बाद कुछ बदलाव के बाद दुबारा किया गया। इससे पहले यह...
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रंगमंच स्मृतियाँ – “तीसवीं शताब्दी” – श्री असीम कुमार दुबे

रंगमंच स्मृतियाँ - "तीसवीं शताब्दी" - श्री असीम कुमार दुबे (यह विडम्बना है कि  - हम सिनेमा की स्मृतियों को तो बरसों सँजो कर रखते हैं और रंगमंच के रंगकर्म को मंचन के कुछ दिन बाद ही भुला देते हैं। रंगकर्मी अपने प्रयास को आजीवन याद रखते हैं, कुछ दिन तक अखबार की कतरनों में सँजो कर रखते हैं और दर्शक शायद कुछ दिन बाद ही भूल जाते हैं। कुछ ऐसे ही क्षणों को जीवित रखने का एक प्रयास है "रंगमंच स्मृतियाँ "। यदि आपके पास भी ऐसी कुछ स्मृतियाँ हैं तो आप इस मंच पर साझा कर सकते हैं। - हेमन्त बावनकर)    उपरोक्त चित्र भोपाल के भारत भवन में स्वर्गीय के जी त्रिवेदी नाट्य समारोह में बादल सरकार के नाटक "तीसवीं शताब्दी" के मंचन के समय का है। इस नाटक का ताना बाना हिरोशिमा की बरसी पर हिरोशिमा की विभीषिका के इर्द गिर्द बुना गया है। इस नाटक में पात्र कल्पना करता है कि वह तीसवीं शताब्दी के लोगों से बात कर...
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रंगमंच – मध्य प्रदेश के रंगक्षेत्र में स्टेट बैंक के रंगकर्मियों का योगदान – श्री असीम कुमार दुबे

असीम कुमार दुबे  मध्य प्रदेश के रंगक्षेत्र में स्टेट बैंक के रंगकर्मियों का योगदान न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला  | ना सौ न तत्कर्म नाट्यास्मिन  यन्नदृश्यते || (कोई ज्ञान, कोई शिल्प, कोई विद्या , कोई कला, कोई योग तथा कोई कर्म ऐसा नहीं है जो नाट्य में दिखाई न देता हो |) नाटक से न केवल भाषा का विकास होता है, वरन मनुष्य का भी विकास होता है . भौतिकवाद के विश्व-व्यापी विकास के बाद आज सारी दुनिया में पुनः सांस्कृतिक मूल्यों कि आवश्यकता महसूस कि जा रही है . भले ही साहित्य में नाटक को कविता या कहानी के समतुल्य स्थान न मिला हो परन्तु नाटक में साहित्य कि सारी विधाओं का अद्भुत मेल है. नाटक भाषा को भाषा से जोड़ता है, नाटक मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है और नाटक जीवन को जीवन से जोड़ता है. दरअसल नाटक का एक मजबूत संपर्क सूत्र है . भारतीय  स्टेट बैंक और रंगकर्म यदि इस विषय पर चर्चा की जाये तो लोग...
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