पुस्तक समीक्षा/प्राक्कथन : ☆ भाव संवेदना का नैवेद्य रूपः ’’नेहांजलि’’☆ – डॉ राम विनय सिंह

नेहांजलि - डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव              भाव संवेदना का नैवेद्य रूपः ’’नेहांजलि’’ (प्रस्तुत है डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव जी के काव्य संग्रह "नेहांजलि" पर डॉ राम विनय सिंह, अध्यक्ष हिन्दी साहित्य समिति, एसोसिएट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, डी0ए0वी0 (पी0जी0) कॉलेज,  देहरादून, उत्तराखण्ड के सकारात्मक एवं सार्थक विचार।)    Amazon Link – >>>>  नेहांजलि  Flipkart Link – >>>>  नेहांजलि  bookscamel.com -  >>>>  नेहांजलि   काव्य मानव-मन के सत्व चिन्तन से समुदगत वह शब्द-चित्र है जो रस- वैभिन्नय में भी आहलाद के धरातल पर सर्वथा साम्य की स्थापना करता है। जीवन के प्रत्येक रंग में प्राकाशिक भंगिमा की अलौकिक आनुभूतिक छटा की साकार शाब्दी- स्थापना काव्य का अभिप्रेत है। वाच्य-वाचक सम्बन्ध से सज्जित शब्दार्थ मात्र से भिन्न व्यंग्य-व्यंजक सम्बन्ध की श्रेष्ठता के साथ व्यंग्य-प्राधान्य में काव्य के औदात्य के दर्शन का रहस्य भी तो यही है। अन्यथा तो शब्द कोष मात्र ही महाकाव्य का मानक बन जाता। लोक में लोकोत्तर का सौन्दर्य बोध क्योंकर उतरता! नितान्त नीरव मन में अदृश्य अश्राव्य ध्वनि के संकेत प्रकृत पद से पृथक अर्थबोध...
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हिन्दी साहित्य- पुस्तक समीक्षा – * भारत में जल की समस्या एवं समाधान  * श्री रमेश चंद्र तिवारी – (समीक्षक – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र‘)

भारत में जल की समस्या एवं समाधान -  श्री रमेश चन्द्र तिवारी न्यायालय के आदेश के परिपालन में लिखी गई किताब - भारत में जल की समस्या एवं समाधान लेखक - रमेश चंद्र तिवारी मूल्य - २८० रु पृष्ठ २७४ शकुंतला प्रकाशन, २१७६, राइट टाउन , जबलपुर टिप्पणीकार - इंजी विवेक रंजन श्रीवास्तव , मो ७०००३७५७९८ जबलपुर   सामान्यतः किताबें लेखक के मनोभावो की अभिव्यक्ति स्वरूप लिखी जाती हैं, जिन्हें वह सार्वजनिक करते हुये सहेजना चाहता है जिससे समाज उनसे लम्बे समय तक अनुप्राणित होता रह सके. पर्यावरण पर अनेक विद्वानो ने समय समय पर चिंता जताई है. मैंने भी मेरी किताब जल जंगल और जमीन भी इसी परिप्रेक्ष्य में लिखी थी. भारत में जल की समस्या एवं समाधान श्री रमेश चंद्र तिवारी की पुस्तक इस मामले में अनोखी है कि यह किताब माननीय उच्च न्यायालय के एक निर्णय के परिपालन में लिखी गई है. पृष्ठभूमि यह है कि श्री रमेश चंद्र तिवारी वन विभाग में सेवारत थे, उनके सेवाकाल में उन्हें विभिन्न पदो पर अवसर मिले कि...
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हिन्दी साहित्य- पुस्तक समीक्षा – * शिवांश से शिव तक * श्री ओम प्रकाश श्रीवास्तव एवं श्रीमति भारती श्रीवास्तव – (समीक्षक – प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘)

कैलाश मानसरोवर यात्रा - "शिवांश से शिव तक" –  श्री ओम प्रकाश श्रीवास्तव एवं श्रीमति भारती श्रीवास्तव पुस्तक समीक्षा शिवांश से शिव तक (कैलाश मानसरोवर यात्रा वर्णन) लेखक- श्री ओम प्रकाश श्रीवास्तव एवं श्रीमती भारती श्रीवास्तव प्रकाशक- मंजुल पब्लिषिंग हाउस प्रा.लि. अंसारी रोड दरियागंज नई दिल्ली। मूल्य – 225 रु. पृष्ठ संख्या-284, अध्याय-25, परिषिष्ट 8, चित्र 35   कैलाश और मानसरोवर भारत के धवल मुकुट मणि हिमालय के दो ऐसे पवित्र प्रतिष्ठित स्थल हैं जो वैदिक संस्कृति के अनुयायी भारतीय समाज के जन मानस में स्वर्गोपम मनोहर और पूज्य है। मान्यता है कि ये महादेव भगवान शंकर के आवास स्थल है। गंगाजी के उद्गम स्त्रोत स्थल है और नील क्षीर विवेक रखने वाले निर्दोष पक्षी जो राजहंस माॅ सरस्वती का प्रिय वाहन है उसका निवास स्थान है। हर भारतीय जो वैदिक साहित्य से प्रभावित है मन में एक बार अपने जीवन काल में इनके सुखद और पुण्य दर्शन की लालसा संजोये होता है। भारत के अनेको पवित्र तीर्थस्थलों में से ये प्रमुख तीर्थ है। इसीलिये इनकी पावन यात्रा...
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पुस्तक आत्मकथ्य: ☆सफर रिश्तों का ☆ – श्री प्रह्लाद नारायण माथुर 

आत्मकथ्य: सफर रिश्तों का - श्री प्रह्लाद नारायण माथुर            ('सफर रिश्तों का' श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी का एक अत्यंत भावनात्मक एवं मार्मिक कविताओं का संग्रह है। ये कवितायें न केवल मार्मिक हैं अपितु हमें आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में जीवन की सच्चाई से रूबरू भी कराती हैं। हमें सच्चाई के धरातल पर उतार कर स्वयं की भावनाओं के मूल्यांकन के लिए भी प्रोत्साहित करती हैं। इतनी अच्छी कविताओं के लिए श्री माथुर जी की कलम को नमन।)   आत्मकथ्य: आज के आधुनिक काल में भारतीय संस्कृति में तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में धुंधले पड़ते रिश्तों के मूल्य उनकी महत्वता और घटते मान सम्मान का विभिन्न कविताओं के माध्यम से बहुत भावुक एवं ममस्पर्शी वर्णन  किया गया हैं. रिश्तों पर जो सटीक लेखन  कविताओं के माध्यम से किया गया हैं वो  दिल को छू लेने वाला हैं. "इंसानियत शर्मसार हो गयी " में बूढ़े माँ बाप की व्यथा का भावुक वर्णन किया हैं. "मृत्यु बोध " एक बहुत ही भावुक...
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हिन्दी साहित्य- पुस्तक समीक्षा – * एक रोमांटिक की त्रासदी * डॉ. कुन्दन सिंह परिहार – (समीक्षक – श्री अभिमन्यु जैन)

व्यंग्य संकलन – एक रोमांटिक की त्रासदी  – डॉ.कुन्दन सिंह परिहार  पुस्तक समीक्षा डॉ कुन्दन सिंह परिहार (वरिष्ठ एवं प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का यह 50 व्यंग्यों  रचनाओं का दूसरा व्यंग्य  संकलन है। कल हम  आपके लिए इस व्यंग्य संकलन की एक विशिष्ट रचना प्रकाशित करेंगे) डॉ. कुन्दन सिंह परिहार जी  को e-abhivyakti की ओर से इस नवीनतम  व्यंग्य  संकलन के लिए हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई।         पुस्तक समीक्षा एक रोमांटिक की त्रासदी (व्यंग्य संकलन) लेखक- कुन्दन सिंह परिहार प्रकाशक- उदय पब्लिशिंग हाउस, विशाखापटनम। मूल्य - 650 रु. 'एक रोमांटिक की त्रासदी' श्री कुन्दन सिंह परिहार की 50 व्यंग्य रचनाओं का संकलन है।लेखक का यह दूसरा व्यंग्य-संकलन है, यद्यपि इस बीच उनके पाँच कथा-संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।संकलन हिन्दी के मूर्धन्य व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई को इन शब्दों के साथ समर्पित है----'परसाई जी की स्मृति को, जिन्होंने पढ़ाया तो बहुतों को, लेकिन अँगूठा किसी से नहीं माँगा। 'ये मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ बार बार आकर्षित करती हैं। पुस्तक का शीर्षक पहले व्यंग्य 'एक रोमांटिक की त्रासदी'से अभिप्रेरित है।दिन में जो प्रकृति...
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हिन्दी साहित्य- पुस्तक समीक्षा – * जॉब बची सो… * डॉ. सुरेश कान्त – (समीक्षक – श्री एम एम चन्द्रा)

व्यंग्य उपन्यास - जॉब बची सों......  - डॉ. सुरेश कान्त    पुस्तक समीक्षा   जॉब  बची सो.... नहीं, व्यंग्य बची सो कहो...! (महज 22 वर्ष की आयु में 'ब' से 'बैंक जैसे उपन्यास की रचना करने वाले डॉ. सुरेश कान्त जी  ने बैंक ही नहीं कॉर्पोरेट जगत की कार्यप्रणाली को भी बेहद नजदीक से देखा है। व्यंग्य उपन्यास "जॉब बची सो....." की मनोवैज्ञानिक समीक्षा श्री एम. एम. चंद्रा  जी (सम्पादक, आलोचक, व्यंग्यकार एवं उपन्यासकार) की पैनी दृष्टि एवं कलम ही कर सकती है।) डॉ. सुरेश कान्त जी को e-abhivyakti की ओर से इस नवीनतम  व्यंग्य उपन्यास के लिए हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई।         Amazon Link - >>>>  जॉब  बची सो.... सुरेश कान्त के नवीनतम उपन्यास “जॉब  बची सो” मुझे अपनी बात कहने के लिए बाध्य कर रही है। मुझे लगता है कि “किसी रचना का सबसे सफल कार्य यही है कि वह बड़े पैमाने पर पाठकों की दबी हुयी चेतना को जगा दे, उनकी खामोशी को स्वर दे और उनकी संवेदनाओं को विस्तार दे।” बात सिर्फ यहाँ...
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पुस्तक समीक्षा : व्यंग्य – मिली भगत – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

मिली भगत - श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव   संपादक - विवेक रंजन श्रीवास्तव प्रकाशक - रवीना प्रकाशन, दिल्ली-110094 मूल्य - 400 रू हार्ड बाउंड संस्करण, पृष्ठ संख्या 256 फोन- 8700774571,७०००३७५७९८ समीक्षक - डॉ. कामिनी खरे,भोपाल कृति चर्चा .. मिली भगत - (हास्य व्यंग्य का वैश्विक संकलन) तार सप्तक संपादित संयुक्त संकलन साहित्य जगत में बहुचर्चित रहा है. सहयोगी अनेक संकलन अनेक विधाओ में आये हैं, किन्तु मिली भगत इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है कि इसमें संपादक श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव के वैश्विक संबंधो के चलते सारी दुनिया के अनेक देशो से व्यंग्यकारो ने हिस्सेदारी की है. संपादकीय में वे लिखते हैं कि  “व्यंग्य विसंगतियो पर भाषाई प्रहार से समाज को सही राह पर चलाये रखने के लिये शब्दो के जरिये वर्षो से किये जा रहे प्रयास की एक सुस्थापित विधा है. “यद्यपि व्यंग्य  अभिव्यक्ति की शाश्वत विधा है, संस्कृत में भी व्यंग्य मिलता है,  प्राचीन कवियो में कबीर की प्रायः रचनाओ में  व्यंग्य है, यह कटाक्ष  किसी का मजाक उड़ाने या उपहास करने के लिए नहीं, बल्कि उसे सही...
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पुस्तक समीक्षा / आत्मकथ्य – किसलय मन अनुराग  (दोहा कृति)– डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’ 

आत्मकथ्य – किसलय मन अनुराग  (दोहा कृति) – डॉ विजय तिवारी 'किसलय'  पुरोवाक्:  (प्रस्तुत है "किसलय मन अनुराग - (दोहा कृति)" पर डॉ विजय तिवारी 'किसलय' जी का आत्मकथ्य।  पुस्तकांश के रूप में हिन्दी साहित्य - कविता/दोहा कृति के अंतर्गत प्रस्तुत है एक सामयिक दोहा कृति "आतंकवाद" ) धर्म, संस्कृति एवं साहित्य का ककहरा मुझे अपने पूज्य पिताजी श्री सूरज प्रसाद तिवारी जी से सीखने मिला। उनके अनुभवों तथा विस्तृत ज्ञान का लाभ ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते मुझे बहुत प्राप्त हुआ। कबीर और तुलसी के काव्य जैसे मुझे घूँटी में पिलाए गये।  मुझे भली-भाँति याद है कि कक्षा चौथी अर्थात 9-10 वर्ष की आयु में मेरा दोहा लेखन प्रारंभ हुआ। कक्षा आठवीं अर्थात सन 1971-72 से मैं नियमित काव्य लेखन कर रहा हूँ। दोहों की लय, प्रवाह एवं मात्राएँ जैसे रग-रग में बस गई हैं। दोहे पढ़ते और सुनते ही उनकी मानकता का पता लग जाता है। मैंने दोहों का बहुविध सृजन किया है, परंतु इस संग्रह हेतु केवल 508 दोहे चयनित किए गये...
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हिन्दी साहित्य- पुस्तक समीक्षा – * यह गांव बिकाऊ है * – श्री एम एम चन्द्रा (समीक्षक – श्री उमाशंकर सिंह परमार)

यह गांव बिकाऊ है लेखक - श्री एम एम चन्द्रा समीक्षक - श्री उमाशंकर सिंह परमार भूमंडलीकरण व आर्थिक उदारीकरण ने हिन्दुस्तानी गाँवों और गाँव की संस्कृति व सम्बन्धों पर व्यापक प्रभाव डाला है इन प्रभावों को किसानी जीवन से जोड़कर सकारात्मक नकारात्मक सन्तुलित नजरिए से देखने वाले तमाम उपन्यास हिन्दी में प्रकाशित हुए है । राजकुमार राकेश , अनन्त कुमार सिंह , रणेन्द्र , रुपसिंह चन्देल ने इस विषय पर क्रमशः धर्मक्षेत्र , ताकि बची रहे हरियाली , ग्लोबल गाँव का देवता  , पाथरटीला , जैसे शानदार उपन्यास लिखे । इसी क्रम में हम यह गाँव बिकाऊ है रख सकते हैं "यह गाँव बिकाऊ है" ग्राम्य जीवन व समाज की गतिशील आत्मकथा है । कथा गाँव की है एक ऐसा गाँव जो बदले हुए मिजाज़ का है जहाँ कोई भी घटना व्यक्ति उसकी पहचान स्वायत्त नही है सब परस्पर एक दूसरे से संग्रथित हैं । वर्तमान  परिदृष्य  में गाँव की असलियत बताता हुआ  उपन्यास है जिसमें लेखक ने गाँव को केन्द्रिकता प्रदत्त करते...
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पुस्तक समीक्षा / आत्मकथ्य – सच्चाई कुछ पन्नो में – श्री आशीष कुमार

आत्मकथ्य – सच्चाई कुछ पन्नो में  – श्री आशीष कुमार  आत्मकथ्य: जिंदगी रंग-बिरंगी है ये हमे हर मोड़ पर अलग-अलग रसों का अनुभव करवाती है । इस पुस्तक में भी कुछ पन्नो की 27 कहनियाँ है नौ रसों में से हर एक रस की 3 कहानियाँ, पहली 9 कहानियाँ एक-एक रस की नौ रसों तक फिर कहानी नंबर 10 से 18 तक फिर उसी क्रम में नौ रसों की एक-एक कहानी ऐसे ही 19 से 27 तक फिर उसी क्रम में नौ रसों की एक-एक कहानी। कुछ कहानियों में सब को आसानी से पता चल जाएगा की वो किस रस की है । कुछ में उन्हें थोड़ा सोचना पड़ेगा इसलिए हर एक कहानी के बाद मैंने लिख दिया है की उस कहानी में कौन सा रस प्रधान है पुस्तक की कहानियों में रसो का क्रम श्रृंगार, हास्य, अद्भुत, शांत, रौद्र, वीर, करुण, भयानक एवं वीभत्स हैं। अर्थात पहली कहानी श्रृंगार रस दूसरी हास्य ऐसे ही नौवीं कहानी वीभत्स रस की है इसी क्रम में...
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