हिन्दी साहित्य- पुस्तक समीक्षा – * एक रोमांटिक की त्रासदी * डॉ. कुन्दन सिंह परिहार – (समीक्षक – श्री अभिमन्यु जैन)

व्यंग्य संकलन – एक रोमांटिक की त्रासदी  – डॉ.कुन्दन सिंह परिहार  पुस्तक समीक्षा डॉ कुन्दन सिंह परिहार (वरिष्ठ एवं प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का यह 50 व्यंग्यों  रचनाओं का दूसरा व्यंग्य  संकलन है। कल हम  आपके लिए इस व्यंग्य संकलन की एक विशिष्ट रचना प्रकाशित करेंगे) डॉ. कुन्दन सिंह परिहार जी  को e-abhivyakti की ओर से इस नवीनतम  व्यंग्य  संकलन के लिए हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई।         पुस्तक समीक्षा एक रोमांटिक की त्रासदी (व्यंग्य संकलन) लेखक- कुन्दन सिंह परिहार प्रकाशक- उदय पब्लिशिंग हाउस, विशाखापटनम। मूल्य - 650 रु. 'एक रोमांटिक की त्रासदी' श्री कुन्दन सिंह परिहार की 50 व्यंग्य रचनाओं का संकलन है।लेखक का यह दूसरा व्यंग्य-संकलन है, यद्यपि इस बीच उनके पाँच कथा-संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।संकलन हिन्दी के मूर्धन्य व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई को इन शब्दों के साथ समर्पित है----'परसाई जी की स्मृति को, जिन्होंने पढ़ाया तो बहुतों को, लेकिन अँगूठा किसी से नहीं माँगा। 'ये मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ बार बार आकर्षित करती हैं। पुस्तक का शीर्षक पहले व्यंग्य 'एक रोमांटिक की त्रासदी'से अभिप्रेरित है।दिन में जो प्रकृति...
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हिन्दी साहित्य- पुस्तक समीक्षा – * जॉब बची सो… * डॉ. सुरेश कान्त – (समीक्षक – श्री एम एम चन्द्रा)

व्यंग्य उपन्यास - जॉब बची सों......  - डॉ. सुरेश कान्त    पुस्तक समीक्षा   जॉब  बची सो.... नहीं, व्यंग्य बची सो कहो...! (महज 22 वर्ष की आयु में 'ब' से 'बैंक जैसे उपन्यास की रचना करने वाले डॉ. सुरेश कान्त जी  ने बैंक ही नहीं कॉर्पोरेट जगत की कार्यप्रणाली को भी बेहद नजदीक से देखा है। व्यंग्य उपन्यास "जॉब बची सो....." की मनोवैज्ञानिक समीक्षा श्री एम. एम. चंद्रा  जी (सम्पादक, आलोचक, व्यंग्यकार एवं उपन्यासकार) की पैनी दृष्टि एवं कलम ही कर सकती है।) डॉ. सुरेश कान्त जी को e-abhivyakti की ओर से इस नवीनतम  व्यंग्य उपन्यास के लिए हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई।         Amazon Link - >>>>  जॉब  बची सो.... सुरेश कान्त के नवीनतम उपन्यास “जॉब  बची सो” मुझे अपनी बात कहने के लिए बाध्य कर रही है। मुझे लगता है कि “किसी रचना का सबसे सफल कार्य यही है कि वह बड़े पैमाने पर पाठकों की दबी हुयी चेतना को जगा दे, उनकी खामोशी को स्वर दे और उनकी संवेदनाओं को विस्तार दे।” बात सिर्फ यहाँ...
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पुस्तक समीक्षा : व्यंग्य – मिली भगत – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

मिली भगत - श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव   संपादक - विवेक रंजन श्रीवास्तव प्रकाशक - रवीना प्रकाशन, दिल्ली-110094 मूल्य - 400 रू हार्ड बाउंड संस्करण, पृष्ठ संख्या 256 फोन- 8700774571,७०००३७५७९८ समीक्षक - डॉ. कामिनी खरे,भोपाल कृति चर्चा .. मिली भगत - (हास्य व्यंग्य का वैश्विक संकलन) तार सप्तक संपादित संयुक्त संकलन साहित्य जगत में बहुचर्चित रहा है. सहयोगी अनेक संकलन अनेक विधाओ में आये हैं, किन्तु मिली भगत इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है कि इसमें संपादक श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव के वैश्विक संबंधो के चलते सारी दुनिया के अनेक देशो से व्यंग्यकारो ने हिस्सेदारी की है. संपादकीय में वे लिखते हैं कि  “व्यंग्य विसंगतियो पर भाषाई प्रहार से समाज को सही राह पर चलाये रखने के लिये शब्दो के जरिये वर्षो से किये जा रहे प्रयास की एक सुस्थापित विधा है. “यद्यपि व्यंग्य  अभिव्यक्ति की शाश्वत विधा है, संस्कृत में भी व्यंग्य मिलता है,  प्राचीन कवियो में कबीर की प्रायः रचनाओ में  व्यंग्य है, यह कटाक्ष  किसी का मजाक उड़ाने या उपहास करने के लिए नहीं, बल्कि उसे सही...
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पुस्तक समीक्षा / आत्मकथ्य – किसलय मन अनुराग  (दोहा कृति)– डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’ 

आत्मकथ्य – किसलय मन अनुराग  (दोहा कृति) – डॉ विजय तिवारी 'किसलय'  पुरोवाक्:  (प्रस्तुत है "किसलय मन अनुराग - (दोहा कृति)" पर डॉ विजय तिवारी 'किसलय' जी का आत्मकथ्य।  पुस्तकांश के रूप में हिन्दी साहित्य - कविता/दोहा कृति के अंतर्गत प्रस्तुत है एक सामयिक दोहा कृति "आतंकवाद" ) धर्म, संस्कृति एवं साहित्य का ककहरा मुझे अपने पूज्य पिताजी श्री सूरज प्रसाद तिवारी जी से सीखने मिला। उनके अनुभवों तथा विस्तृत ज्ञान का लाभ ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते मुझे बहुत प्राप्त हुआ। कबीर और तुलसी के काव्य जैसे मुझे घूँटी में पिलाए गये।  मुझे भली-भाँति याद है कि कक्षा चौथी अर्थात 9-10 वर्ष की आयु में मेरा दोहा लेखन प्रारंभ हुआ। कक्षा आठवीं अर्थात सन 1971-72 से मैं नियमित काव्य लेखन कर रहा हूँ। दोहों की लय, प्रवाह एवं मात्राएँ जैसे रग-रग में बस गई हैं। दोहे पढ़ते और सुनते ही उनकी मानकता का पता लग जाता है। मैंने दोहों का बहुविध सृजन किया है, परंतु इस संग्रह हेतु केवल 508 दोहे चयनित किए गये...
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हिन्दी साहित्य- पुस्तक समीक्षा – * यह गांव बिकाऊ है * – श्री एम एम चन्द्रा (समीक्षक – श्री उमाशंकर सिंह परमार)

यह गांव बिकाऊ है लेखक - श्री एम एम चन्द्रा समीक्षक - श्री उमाशंकर सिंह परमार भूमंडलीकरण व आर्थिक उदारीकरण ने हिन्दुस्तानी गाँवों और गाँव की संस्कृति व सम्बन्धों पर व्यापक प्रभाव डाला है इन प्रभावों को किसानी जीवन से जोड़कर सकारात्मक नकारात्मक सन्तुलित नजरिए से देखने वाले तमाम उपन्यास हिन्दी में प्रकाशित हुए है । राजकुमार राकेश , अनन्त कुमार सिंह , रणेन्द्र , रुपसिंह चन्देल ने इस विषय पर क्रमशः धर्मक्षेत्र , ताकि बची रहे हरियाली , ग्लोबल गाँव का देवता  , पाथरटीला , जैसे शानदार उपन्यास लिखे । इसी क्रम में हम यह गाँव बिकाऊ है रख सकते हैं "यह गाँव बिकाऊ है" ग्राम्य जीवन व समाज की गतिशील आत्मकथा है । कथा गाँव की है एक ऐसा गाँव जो बदले हुए मिजाज़ का है जहाँ कोई भी घटना व्यक्ति उसकी पहचान स्वायत्त नही है सब परस्पर एक दूसरे से संग्रथित हैं । वर्तमान  परिदृष्य  में गाँव की असलियत बताता हुआ  उपन्यास है जिसमें लेखक ने गाँव को केन्द्रिकता प्रदत्त करते...
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पुस्तक समीक्षा / आत्मकथ्य – सच्चाई कुछ पन्नो में – श्री आशीष कुमार

आत्मकथ्य – सच्चाई कुछ पन्नो में  – श्री आशीष कुमार  आत्मकथ्य: जिंदगी रंग-बिरंगी है ये हमे हर मोड़ पर अलग-अलग रसों का अनुभव करवाती है । इस पुस्तक में भी कुछ पन्नो की 27 कहनियाँ है नौ रसों में से हर एक रस की 3 कहानियाँ, पहली 9 कहानियाँ एक-एक रस की नौ रसों तक फिर कहानी नंबर 10 से 18 तक फिर उसी क्रम में नौ रसों की एक-एक कहानी ऐसे ही 19 से 27 तक फिर उसी क्रम में नौ रसों की एक-एक कहानी। कुछ कहानियों में सब को आसानी से पता चल जाएगा की वो किस रस की है । कुछ में उन्हें थोड़ा सोचना पड़ेगा इसलिए हर एक कहानी के बाद मैंने लिख दिया है की उस कहानी में कौन सा रस प्रधान है पुस्तक की कहानियों में रसो का क्रम श्रृंगार, हास्य, अद्भुत, शांत, रौद्र, वीर, करुण, भयानक एवं वीभत्स हैं। अर्थात पहली कहानी श्रृंगार रस दूसरी हास्य ऐसे ही नौवीं कहानी वीभत्स रस की है इसी क्रम में...
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हिन्दी साहित्य- पुस्तक समीक्षा – * इंतजार अतीत के पन्नों से * – सुश्री मालती मिश्रा

सुश्री मालती मिश्रा           इंतजार अतीत के पन्नों से  कहानीकार मालती मिश्रा समीक्षक डॉ ज्योत्सना सिंह समदर्शी प्रकाशन, संस्करण (प्रथम) जून 2018 कहानी गद्य की अति महत्वपूर्ण विधा है,कहानी को सुनने और सुनाने की परंपरा बहुत प्राचीन है। हमारे देश में कहानियों की बहुत समृद्ध परंपरा रही है। वेदों, उपनिषदों  पुराणों तथा ब्राह्मण ग्रंथों में वर्णित कहानियां प्राप्त होती है जिनमें यम-यमी 'पुरुरवा-उर्वशी, नल-दमयन्ती, दुष्यंत-शकुन्तला,आदि । इसके बाद वीर राजाओं के साहस शौर्य, न्याय, वैराग्य त्याग आदि की कहानियां प्रायः सुनने को मिलने लगी। संस्कृत साहित्य के बाद हिंदी साहित्य में भी कहानी लेखन की परंपरा का निर्वहन बखूबी किया गया है इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए युवा लेखिका मालती मिश्रा ने 13 कहानियों के संग्रह को अपने अनुभवों की स्याही से भावनाओं की लेखनी के साथ समसामयिक विषयों के चिंतन को बखूबी उकेरा है परम सम्माननीय वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामलखन शर्मा जी ने बहुत सुन्दर भूमिका लिखी है उनके द्वारा यह पुस्तक प्राप्त हुई,  बहुत आभारी हूँ। इस कहानीं संग्रह में ऐसा प्रतीत होता है कि...
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पुस्तक समीक्षा / आत्मकथ्य – चुभता हुआ सत्य (ईबुक) – हेमन्त बावनकर 

चुभता हुआ सत्य (ईबुक) – हेमन्त बावनकर  आत्मकथ्य - यह उपन्यासिका मेरी पहली कहानी ‘चुभता हुआ सत्य’ पर आधारित है। यह कहानी दैनिक नवीन दुनिया, जबलपुर की साप्ताहिक पत्रिका ‘तरंग’ के प्रवेशांक में 19 जुलाई 1982 को डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी के साहित्य सम्पादन में प्रकाशित हुई थी। इस उपन्यासिका का कथानक एवं कालखंड अस्सी-नब्बे के दशक का है। अतः इसके प्रत्येक पात्र को विगत 36 वर्ष से हृदय में जीवित रखा। जब भी समय मिला तभी इस कथानक के पात्रों  को अपनी कलम से उसी प्रकार से तराशने का प्रयत्न किया, जिस प्रकार कोई शिल्पकार अपने औजारों से किसी शिलाखण्ड को वर्षों तराश-तराश कर जीवन्त नर-नारियों की मूर्तियों का आकार देता है, मानों वे अब बोल ही पड़ेंगी। सबसे कठिन कार्य था, एक स्त्री पात्र को लेकर आत्मकथात्मक शैली में उपन्यासिका लिखना। संभवतः किसी लेखिका को भी एक पुरुष पात्र को लेकर आत्मकथात्मक शैली में लिखना इतना ही कठिन होता होगा। इन पात्रों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझते हुए...
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पुस्तक समीक्षा / आत्मकथ्य – एहसासों के मोती  – डॉ दिवाकर पोखरियाल 

आत्मकथ्य – एहसासों के मोती  – डॉ दिवाकर पोखरियाल  इस काव्य संग्रह ‘एहसासों के मोती’ की हर कविता, कवि के दिल के बहुत करीब है| १६ पुस्तके प्रकाशित होने के बाद अब यह डॉ दिवाकर पोखरियाल की १७ वी पुस्तक है परंतु हर बार जब भी कोई नयी पुस्तक प्रकाशित होती है तो उनको वही खुशी और वही रोमांच का एहसास मन में रहता है जो प्रथम पुस्तक के प्रकाशित होने में होता है| हाल ही में इनका प्रथम हिन्दी उपन्यास 'सपने सच और उड़ान’ प्रकाशित हुआ और उससे पहले काव्य संग्रह 'मेरी कविता' प्रकाशित हुआ| इन दोनो पुस्तकों के प्रकाशित होने पर भी उन्हे उसी नयी सुफूर्ति एवं खुशी का एहसास हुआ जो इस पुस्तक में हो रहा है| डॉ दिवाकर का कहना है की शायद अब वह यह जान सकते है कि क्यूँ एक माँ के लिए उसका हर एक बच्चा प्यारा होता है| इस काव्य संग्रह में कवि ने एहसासों को मोतियों सा पिरोने की कोशिश की है| यह एहसास कविता...
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पुस्तक समीक्षा / आत्मकथ्य – सेकंड चान्स  – डॉ संदीप जटवा  

आत्मकथ्य – सेकंड चान्स  – डॉ संदीप जटवा     (प्रस्तुत है डॉ संदीप जटवा के उपन्यास "सेकंड चान्स" जिसमें व्यवसायी शेखर के जीवन परिवर्तन की कहानी निहित है। संभव है यह उपन्यास आपका जीवन परिवर्तित कर दे और आपको जीवन के सार से अवगत करा दे। यह कहानी है प्रेम की, जीवन की; पिता और पुत्र की; दूसरों के लिए जीवन जीने की, जीवन में कर्म की महत्ता की और अंत में एक मानव जीवन की।) पुस्तक समीक्षा/सार  उसे नहीं पता था कि उसकी मृत्यु उसकी जिंदगी बदल सकती है। “सेकंड चान्स” एक अहंकारी व्यापारी शेखर कपूर की भावनात्मक और विचार-विमर्शकारी कहानी है। शेखर एक ऐसा आदमी है जिससे आप कभी नहीं मिलना चाहेंगे। वह पूरी दुनिया में किसी का सम्मान नहीं करता है। वह स्वार्थी, असंवेदनशील है और उसके पास कोई नैतिक मूल्य नहीं है। वह अरबपति है लेकिन वह नहीं जानता कि जीवन क्या है? वह अपने लकवाग्रस्त पिता से पिछले दस साल से बात नहीं कर रहा है और उसके पास "परिवार"...
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