हिन्दी साहित्य- व्यंग्य – ☆ जीडीपी और दद्दू ☆ – श्री रमेश सैनी

श्री रमेश सैनी (प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध वरिष्ठ  साहित्यकार  श्री रमेश सैनी जी  का   एक बेहतरीन व्यंग्य। श्री रमेश सैनी जी ने तो जीडीपी नाम के शस्त्र का व्यंग्यात्मक पोस्टमार्टम ही कर डाला। यह बिलकुल सही है कि जी डी पी एक ऐसा शस्त्र है  जिसकी परिभाषा/विवेचना सब अपने अपने तरीके से करते हैं। यह तय है कि श्री सैनी जी के पात्र दद्दू जी के जी डी पी  से तो अर्थशास्त्री भी हैरान-परेशान  हो जाएंगे ।)   ☆ जीडीपी और दद्दू ☆ चुनाव के दिन चल रहे हैं और इसमें सभी दल के लोग जीतने के लिए अपने अपने हथियार भांज रहे हैं. उसमें एक हथियार है, जीडीपी. अब यह जीडीपी क्या होता है. हमारे नेताओं को इससे कोई मतलब नहीं. जीडीपी को समझना उनके बस की बात भी नहीं है. उन्हें तो बस उसका नाम लेना है. हमने कई नेताओं से बात करी. उन्हें जीडीपी का फुल फॉर्म नहीं मालूम. पर बात करते हैं जीडीपी की. वैसे हमारे नेताओं का एक तकिया कलाम है कि...
Read More

हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ पिता ☆ – सुश्री सुषमा सिंह

सुश्री सुषमा सिंह    (प्रस्तुत है सुश्री सुषमा सिंह जी की एक अत्यंत भावुक एवं हृदयस्पर्शी कविता “पिता ”।)   ☆ पिता ☆   तुम पिता हो, सृष्टा हो, रचयिता हो, हां, तुम स्नेह न दिखाते थे मां की तरह न तुम सहलाते हो, पर हो तो तुम पिता ही ना। जब मैं गिरती थी बचपन में, दर्द तुम्हें भीहोता था चाहे चेहरा साफ छिपा जाए, पर दिल तो रोता ही था माना गुस्सा आ जाता था, हम जरा जो शोर मचाते थे पर उस कोलाहल में कभी-कभी, मजा तुम भी तो पा जाते थे चलते-चलते राहों में, जब पैर मेरे थक जाते थे मां गोद उठा न पाती थीं, कांधें तो तुम्हीं बैठाते थे मां जब भी कभी बीमार पड़ीं, तुम कुछ पका न पाते थे, कुछ ठीक नहीं बन पाता था, कोशिश कर कर रह जाते थे उमस भरी उस गर्मी में, कुछ मैं जो बनाने जाती थी तब वह तपिश, उस गर्मी की, तुमको भी तो छू जाती थी जरा सी तुम्हारी डांट पर, हम सब कोने में छिप जाते थे झट फिर बाहर निकल आते,...
Read More

मराठी साहित्य – मराठी कविता – ☆ आकार …..! ☆ श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम   (श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं। इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं।)   ☆ आकार .....! ☆    फिरत्या चाकावर मातीला हवा तसा आकार देताना आयुष्याचा आकार नेहमीच चुकत गेला.... आख्खं आयुष्य गेलं ह्या फिरत्या चाकावर मातीला हवा तसा आकार देण्यात पण हे चाक कधी मला हवं तसं फिरलंच नाही आणि परिस्थितीला हवा तसा आकार मला कधी देताच आला नाही माझी लेकरं लहान असताना त्यांची कित्येक स्वप्न मी नाईलाजास्तव माझ्या पायाखालच्या चिखलात तुडवत गेलो आणि त्याच्याच स्वप्नांच्या चिखलाची त्यांच्यासाठीच मला हवी तशी स्वप्न दाखवत गेलो पण आता इतकी वर्षे संभाळून ठेवलेल्या परिस्थितीचा घडा आता हळूहळू पाझरू लागलाय पायाखालचा चिखलही आता पहील्या पेक्षा कमी झालाय कारण आता... लेकरांनी आपआपल्या स्वप्नांचा चिखल आपआपल्या पायाखाली तुडवायला सुरवात केलीय पुन्हा नव्याने परिस्थितीला त्यांना हवा तसा आकार देण्यासाठी....   © सुजित कदम, पुणे मोबाइल 7276282626. ...
Read More

योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Laughter Yoga For A Better Sex Life ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.) ☆ Laughter Yoga For A Better Sex Life ☆ I have been hesitating for quite a while to share what follows here because the subject remains hush-hush and taboo in the land of Kamasutra and Osho even today. We had a gentleman, on the wrong side of fifties, in our laughter sessions who was very punctual – a rare virtue in this part of the world – and sincere. He went through and through the literature available on Laughter Yoga and regularly discussed about its health benefits like better respiration, stronger immunity, stress busting, lower blood pressure and cardio-vascular workout. One day he confided to me over telephone that his married life has improved immensely and he feels happier as a consequence of regular laughter yoga. He and his wife had almost accepted that their sex life was over by virtue of their age but once they...
Read More

आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – तृतीय अध्याय (7) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ तृतीय अध्याय (ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण)   यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ।।7।। मन संयम कर इंद्रियों पर रखना अधिकार अनुष्ठान यह ही है सव से श्रेष्ठ प्रकार।।7।। भावार्थ :  किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है ।।7।।   But whosoever, controlling the senses by the mind, O Arjuna, engages himself in Karma Yoga with the organs of action, without attachment, he excels! ।।7।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More

हिन्दी साहित्य – कविता -☆ मूर्ति उवाच ☆ – श्री हेमन्त बावनकर

श्री हेमन्त बावनकर   ☆ मूर्ति उवाच ☆   मुझे कैसे भी कर लो तैयार ईंट, गारा, प्लास्टर ऑफ पेरिस या संगमरमर कीमती पत्थर या किसी कीमती धातु को तराशकर फिर रख दो किसी चौराहे पर या विद्या के मंदिर पर अच्छी तरह सजाकर।   मैं न तो  हूँ ईश्वर न ही नश्वर और न ही कोई आत्मा अमर मैं रहूँगा तो  मात्र मूर्ति ही निर्जीव-निष्प्राण।   इतिहास भी नहीं है अमिट वास्तव में इतिहास कुछ होता ही नहीं है जो इतिहास है वो इतिहास था ये युग है वो युग था जरूरी नहीं कि इतिहास सबको पसंद आएगा तुममें से कोई आयेगा और इतिहास बदल जाएगा।   मेरा अस्तित्व इतिहास से जुड़ा है और जब भी लोकतन्त्र भीड़तंत्र में खो जाएगा इतिहास बदल जाएगा फिर तुममें से कोई  आएगा और मेरा अस्तित्व बदल जाएगा इतिहास के अंधकार में डूब जाएगा।   फिर चाहो तो कर सकते हो पुष्प अर्पण या कर सकते हो पुनः तर्पण।   © हेमन्त  बावनकर  ...
Read More

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ सवाल एक – जवाब अनेक – 10 ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय         “सवाल एक – जवाब अनेक (10)” (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के एक प्रश्न का  विभिन्न  लेखकों के द्वारा  दिये गए विभिन्न उत्तरआपके ज्ञान चक्षु  तो अवश्य ही खोल  देंगे।  तो प्रस्तुत है यह प्रश्नोत्तरों की श्रंखला।  वर्तमान समय में ठकाठक दौड़ता समाज घोड़े की रफ्तार से किस दिशा में जा रहा है, सामूहिक द्वेष और  स्पर्द्धा को उभारकर राजनीति, समाज में बड़ी उथल पुथल मचा रही है। ऐसी अनेक बातों को लेकर हम सबके मन में चिंताएं चला करतीं हैं। ये चिंताएं हमारे भीतर जमा होती रहतीं हैं। संचित होते होते ये चिंताएं क्लेश उपजाती हैं, हर कोई इन चिंताओं के बोझ से त्रास पाता है ऐसे समय लेखक त्रास से मुक्ति की युक्ति बता सकता है। एक सवाल के मार्फत देश भर के यशस्वी लेखकों की राय पढें इस श्रृंखला में……… तो फिर देर किस बात की जानिए वह एकमात्र प्रश्न  और उसके अनेक उत्तर।  प्रस्तुत है  इंदौर से श्री सुधीर कुमार चौधरी,  जबलपुर से श्री रमेश सैनी, बैंगलोर...
Read More

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – 🍁 मी_माझी – #4 – भूक…. 🍁 – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते (स्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की   चतुर्थ कड़ी  भूक …। इस शृंखला की प्रत्येक कड़ियाँ आप आगामी  प्रत्येक रविवार को पढ़ पाएंगे। ) (e-abhivyakti की ओर से सुश्री आरूशी दाते जी का 'काव्यानन्द प्रतिष्ठान, पुणे' की ओर से विश्व महिला दिवस पर आयोजित काव्य प्रतिस्पर्धा में प्रथम स्थान प्राप्त करने के उपलक्ष में हार्दिक अभिनंदन।)     मी_माझी  – #4 – भूक …    भूक हा शब्दच अनेक उलाढाली घडवून आणायला कारणीभूत ठरतो... हो ना! शाळेत गेलं की आईने डब्यात काय दिलं असेल? किंवा घरी पोचल्यावर आई खायला काय देईल? हे विचार कायम ऑन असतात, कशासाठी ? पोटासाठी, खंडाळ्याच्या घाटासाठी ! कमवतो कशाला? पोट भरण्यासाठीच ना ! पोट भरण्यासाठी की जिभेचे चोचले पुरवण्यासाठी ? इथे खरी गोम आहे, नाही का ! चमचमीत खायला मिळालं पाहिजे... माझा भाऊ नेहमी म्हणतो, तळीचा आत्माराम शांत झाला पाहिजे... ! सगळी धावपळ, अट्टाहास ह्याच साठी... theoretically speaking, ह्याने पोटातली भूक भागते, बाकीच्या भुका आहेत, त्यांचं काय ? बाकीच्या म्हणजे काय हे कळलं नाही ना? वैचारिक, भावनिक, शारीरिक, आर्थिक, आध्यात्मिक... अहो, इतकंच...
Read More

योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Laughter Yoga – Laugh For No Reason ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.) ☆ Laughter Yoga - Laugh For No Reason ☆   Sun demands no reason to shine; Water demands no reason to flow; A child demands no reason to smile; Why do we need a reason to laugh?   Laughter Yoga is a Life Changing Experience. According to Dr Madan Kataria, Founder of Laughter Clubs Movement, “When you laugh, you change and when you change, the whole world changes.” Laughter Yoga combines unconditional laughter with yogic breathing (Pranayama). Anyone can laugh for no reason, without relying upon humour, jokes or comedy. In a session, laughter is simulated as a body exercise in a group. The group maintains eye contact and childlike playfulness, and laughter soon turns real and contagious. The concept of Laughter Yoga is based on the scientific fact that the body cannot differentiate between fake and real laughter. According to a study by Dr Michael Titze, a German Psychologist, people used to...
Read More

आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – तृतीय अध्याय (6) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ तृतीय अध्याय (ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण) कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ।।6।। कर्मेन्द्रिय निष्क्रिय मगर मन से है कोई व्यस्त तो यह मिथ्याचार है, आडंबर मात्र समस्त।।6।।   भावार्थ :  जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है।।6।। He who, restraining the organs of action, sits thinking of the sense-objects in mind, he, of deluded understanding, is called a hypocrite. ।।6।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More