श्री गोपाल सिंह सिसोदिया ‘निसार’

 

(श्री गोपाल सिंह सिसोदिया  ‘निसार ‘ जी एक प्रसिद्ध कवि, कहानीकार तथा अनेक पुस्तकों के रचियता हैं। इसके अतिरिक्त आपकी विशेष उपलब्धि ‘प्रणेता संस्थान’ है जिसके आप संस्थापक हैं। आज प्रस्तुत है  बाल मनोविज्ञान एवं माता पिता की मानवीय संवेदनाओं को उकेरती भावुक कथा  “मौत का खेल”।  आज सोशल मीडिया पर ऐसे विडियो गेम्स आ गए हैं जो बच्चों की मनोवृत्ति को किस तरह अपने कब्जे में कर लेते हैं इसकी जानकारी माता पिता को होना अत्यंत आवश्यक है। यह एक दुखांत किन्तु शिक्षाप्रद कहानी है जिसे प्रत्येक अभिभावक को अवश्य पढ़नी चाहिए। ऐसे विषयों पर साहित्यिक रचना के लिए श्री सिसोदिया जी  बधाई के पात्र हैं।) 

☆ मौत का खेल ☆

“मम्मी, मैं खेलने जा रहा हूँ, ओके बाय!” अंकुर ने दूध का गिलास सिंक में फेंकते हुए कहा और दरवाज़ा खोल कर बिना अपनी माँ के उत्तर की प्रतीक्षा किये घर से बाहर भाग गया।

“अरे! अपने पापा के घर आने से पहले ज़रूर आ जाना, वरना वे बहुत गुस्सा होंगे!” अंदर से सुमन ने बाहर भागते अपने पुत्र को लगभग चिल्लाते हुए हिदायत दी। परन्तु सुमन की आवाज़ जैसे अंकुर ने सुनी ही नहीं। वह तो अपने मित्रों की ओर भागा जा रहा था। वह सोच रहा था कि आज भी उसके साथी उसका मज़ाक बनाएंगे कि वह तो लड़कियों की तरह घर में ही घुसा रहता है। वह हाँफता हुआ कॉलोनी के पार्क में पहुँच गया। उसे यह देख कर अपार खुशी हुई कि आज वह अपने साथियों में सबसे पहले पहुँचा था। वह उनकी प्रतीक्षा करने लगा । तभी उसे सामने से आता हुआ गौरव दिखाई दिया। आज अंकुर की बारी थी।

उसने ऊँची आवाज़ में गौरव को लक्ष्य करके कहा,

“अबे यार, मैं कब से तुम लोगों का वेट कर रहा हूँ और वह गोलू कहाँ है?”

“अच्छा बेटा, आज जल्दी आ गया तो इतना इतरा रहा है! अभी तो चार भी नहीं बजे। यह देख गोलू भी आ गया।” गौरव ने नज़दीक पहुँचते हुए उत्तर दिया।

“अबे, आज तो ढीलू भी टाइम पर आ गया”, दूर से ही गोलू ने हँसते हुए चुटकी ली।

दरअसल अंकुर को उसके साथी इसी नाम से पुकारते थे।  कारण यह था कि वह समय पर कभी नहीं पहुँचता था।  जब उसके पापा घर पर होते थे, तब तो उसका घर से निकलना ही नहीं हो पाता था।  यदि वे उसे बुलाने जाते तो अंकुर के पापा शर्मा जी, उन्हें ही डाँट कर भगा दिया करते थे। कुछ ही देर में वे सारे इकट्ठे हो गये  और क्रिकेट खेलने लगे।  गोलू बल्लेबाजी कर रहा था और सुमित गेंदबाजी।  अंकुर बाउन्ड्री बचाने के लिए सीमा रेखा पर तैनात था।

गोलू ने सुमित की एक ढीली गेंद को उछाल दिया।  अंकुर ने हवा में डाईव लगाते हुए गेंद को लपकना चाहा, किंतु वह गेंद तक नहीं पहुँच सका और पार्क की रेलिंग पर जा गिरा।  रेलिंग की नुकीली सलाखों ने उसके शरीर को लहुलुहान कर दिया।  सभी लोग इकट्ठे हो गये।  बच्चे अंकुर की छाती और गर्दन से रक्त बहता देख कर घबरा गये।  तभी कुछ सज्जन पुरुष जो पार्क में मौजूद थे, वहाँ पहुँच गये और तत्काल अंकुर को उठा कर अस्पताल ले गये और अंकुर के घर खबर भिजवा दी। शर्मा जी भी अपने दफ्तर से तुरंत अस्पताल पहुँच गये और घर से सुमन भी।

अंकुर की मरहम-पट्टी करके दवाइयाँ लिख दी गयीं और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी।  उसे पूरी तरह ठीक होने में एक सप्ताह लग गया। लेकिन शर्मा जी ने पुत्र तथा पत्नी सुमन को सख्त हिदायत दी कि अब से अंकुर का बाहर जाना बिल्कुल बंद है। हालाँकि सुमन ने पति को बहुत समझाया कि खेलकूद में बच्चों को चोट तो लगती ही रहती है, पर शर्मा जी पर सुमन के समझाने का कोई असर न हुआ, उलटे सुमन को ही चार बातें सुननी पड़ीं।

अगले दिन शर्मा जी पुत्र के लिए लैपटॉप तथा महंगा मोबाइल ले आए।

उन्होंने उसे ये उपकरण देते हुए कहा,  “ले, मैंने तेरे लिए घर में ही खेलने का प्रबन्ध कर दिया है, अब से बाहर जा कर उन आवारा लड़कों के साथ खेलने की ज़रूरत नहीं है, समझे!”

अंकुर पहले पहल उपकरणों को देखकर चहक उठा था, लेकिन पापा की शर्त सुनकर उसका दिल बुझ गया। खुले गगन में उन्मुक्त उड़ान भरने वाले पंछी को सोने के पिंजरे में कैद कर दिया गया था। आखिरकार अंकुर को हालात से समझौता करना पड़ा। उसे भी अब मोबाइल तथा लैपटॉप पर गेम खेलने में आनंद आने लगा। कुछ दिन तक उसे बहुत छटपटाहट महसूस हुई, किंतु कुछ दिन बाद उसकी दुनिया ही इंटरनेट हो गयी।

अब वह विद्यालय से आते ही गेम खेलने बैठ जाता और फिर उठने का नाम न लेता। उसे इतना भी होश न रहता कि गृहकार्य भी करना है। विद्यालय से अब उसकी शिकायतें आने लगीं थीं। अभी तक प्रत्येक विषय में वह अव्वल आया करता था, लेकिन अब उससे सभी अध्यापक परेशान रहने लगे थे। लगभग प्रतिदिन ही विद्यालय के किसी-न-किसी अध्यापक का सुमन के पास फोन आया करता। उसके पश्चात् सुमन विद्यालय जाती और अध्यापकों तथा प्रधानाचार्य की डाँट खाकर लौट आती। वह करती भी क्या, अंकुर को वह समझा-समझा कर थक चुकी थी, परन्तु उस पर अब कहने का कोई असर होता ही नहीं था। वह सुमन की बात एक कान से सुनता और दूसरी से निकाल देता। उसके पास उसकी बात सुनने का समय ही कहाँ था।

वह तो हर समय मोबाइल अथवा लैपटॉप पर लगा रहता। कानों में इयरफोन ठुसा रहता और आँखों के सामने स्क्रीन। उसके इंटरनेट गेम की दीवानगी का आलम ये हो गया कि वह खाना-पीना सब कुछ गेम खेलते हुए ही करता। सुमन शर्मा जी से उसकी शिकायत करती तो वह यह कह कर टाल जाते कि बच्चे ऐसा करते ही रहते हैं। कुछ दिनों बाद हालत यह हो गयी कि उसे पेशाब आ रहा होता, पर वह न उठता और उसके कपड़े गीले हो जाते। सुमन बहुत चिंतित थी अपने पुत्र की इस दशा को देख कर, पर वह बेचारी क्या करती, शर्मा जी उसकी एक न सुनते थे। उसने चोरी-छुपे एक-दो बार मनोचिकित्सकों से भी सम्पर्क किया, जिन्होंने अंकुर की हालत बहुत चिंताजनक बतायी।

जब सुमन ने पति को इस विषय में शीघ्र कुछ करने के लिए कहा तो वे उस पर बहुत बिगड़े। कहने लगे, “सुमन, मुझे लगता है कि तुम मुझे समाज में उठने-बैठने लायक भी नहीं छोड़ोगी। क्या तुम जानती नहीं कि मेरी समाज में क्या पोज़ीशन है? यदि अंकुर को मनोचिकित्सक के पास दिखाने ले गये तो लोग क्या कहेंगे? वे समझेंगे कि शर्मा जी का बेटा पागल है। क्या तुम चाहती हो कि हमारे बेटे को लोग पागल कहें? तुम ने तो तिल का ताड़ बना डाला। वह मेरा बेटा है, एकदम स्वस्थ और तन्दुरुस्त समझी! अब से इस तरह की ऊट-पटांग बातें मेरे सामने कभी मत करना, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा।”

एक दिन की बात है। अंकुर विद्यालय से घर आ गया था। उसने माँ द्वारा दिया भोजन गेम खेलते हुए ही किया। उसके पश्चात् सुमन सब्जियाँ लेने के लिए बाजार चली गयी। लेकिन जब लौटी तो उसकी आँखें फटी रह गयीं। वह दहाड़ें मार कर रो पड़ी। उसकी चीखों ने घर ही नहीं पूरे मोहल्ले को हिला कर रख दिया।

पल भर में ही आसपास के महिला-पुरुषों से घर भर गया। अंकुर ने स्वयं को फाँसी लगा ली थी और मोबाइल पर एक गेम की विन्डो खुली हुई थी, जिस पर लिखा था,

“कॉंग्रेचुलेशन अंकुर! आज तुम्हारी बारी है। जाओ और खुद को फाँसी लगा कर खत्म कर दो!”

अंकुर ने उत्तर में लिखा था,

 “ओके गाइज्, आई ऐम गोइंग टू डाई। गुडबाय!”

 

© श्री गोपाल सिंह सिसोदिया  ‘निसार’ 

दिल्ली

2 Comments

  • सुरेश कुशवाहा तन्मय

    आज के यथार्थ पर आधारित सुंदरता से संजोई बढ़िया कहानी, बधाई सम्माननीय लेखक जी को

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