हेमन्त बावनकर

संस्कारधानी जबलपुर अंतर्राष्ट्रीय कला एवं साहित्य महोत्सव – एक परिकल्पना

सम्पूर्ण भारतवर्ष के विभिन्न शहरों में निर्धारित तिथियों में अंतर्राष्ट्रीय साहित्य उत्सवों का आयोजन होता है, जिन्हें “लिटेररी फेस्टिवल (लिटफेस्ट)” के नाम से जाना जाता है। इनमें से कुछ प्रसिद्ध लिटफेस्ट हैं – जयपुर लिटेररी फेस्टिवल, चंडीगढ़ लिटेररी फेस्टिवल, कोलकाता लिटेररी, पुणे लिटेररी फेस्टिवल, बेंगलुरु लिटेररी फेस्टिवल आदि। इनमें से कुछ राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किए जाते हैं और कुछ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किए जाते हैं। इन साहित्यिक एवं कला महोत्सवों में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकार अपने अनुभव एवं विचार साझा करते हैं और साथ ही देश भर से आए साहित्यकारों को उन वरिष्ठ साहित्यकारों से रूबरू होने का अवसर भी मिलता है। इसके अतिरिक्त स्थानीय भाषा के साहित्य, रंगमंच एवं कला पर भी विचार-विमर्श, प्रस्तुतियां, पुस्तक प्रदर्शनी एवं अन्य स्तरीय कार्यक्रमों का आयोजन होता है। ऐसे कार्यक्रमों से कोई भी अनभिज्ञ नहीं हैं।

विगत दिनों मुझे पाथेय कला एवं साहित्य अकादमी ’ के एक साहित्यिक आयोजन में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। इसके पूर्व मेरे समकालीन एवं अग्रज स्वर्गीय साज जबलपुरी जी द्वारा स्थापित की गई संस्था ‘वर्तिका’ के कार्यक्रम में भी 2015 में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ था। अस्सी के दशक के प्रारम्भ में भाई साज जबलपुरी जी के साथ मिलकर वाहन निर्माणी, जबलपुर में स्थापित की गई संस्था ‘साहित्य परिषद, वाहन निर्माणी, जबलपुर’ एवं गृह पत्रिका ‘प्रेरणा’ के माध्यम से मेरी स्मृतियाँ मेरे हृदय को संस्कारधानी जबलपुर से जोड़े रखती हैं। संभवतः इसलिए मेरी जड़ें जबलपुर से जुडी हुई हैं। जबलपुर की विभिन्न संस्थाओं से इस जुड़ाव में डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’ जी का अभिन्न योगदान है। डॉ राजेश पाठक ‘प्रवीण’ का मृदुभाषी व्यक्तित्व और उनका सशक्त मंच संचालन अक्सर जबलपुर के साहित्यिक मंचों की स्मृति कराता रहता है। मुझ पर पितातुल्य गुरुवर डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी का आशीर्वाद है, जो यदा कदा जबलपुर खींच लाता है।

विगत जबलपुर यात्राओं के समय अन्य साहित्यकार मित्रों से संपर्क एवं साहित्यिक वातावरण की अनुभूति स्वरूप मुझे कई विस्मयकारी अनुभव हुए। संस्कारधानी की एक विशाल परंपरा रही है जिसके अंतर्गत हम अतिथि साहित्यकारों को समादरित-सम्मानित कर अतिथि धर्म को निभाकर गौरवान्वित अनुभव करते हैं। यहाँ की स्थानीय बुन्देली भाषा के अतिरिक्त अभूतपूर्व गंगा-जमुनी संस्कृति एवं साहित्य का साहित्य में अपना अलग स्थान है। सत्तर के दशक से आदरणीय ज्ञानरंजन जी की ‘पहल’ का कोई सानी नहीं है।

मेरे अल्प ज्ञान के अनुसार नगर की प्रतिष्ठित संस्थाओं में पाथेय साहित्य एवं कला अकादमी, वर्तिका, मित्र संघ, मिलन, प्रसंग, विवेचना, राष्ट्रीय कवि सङ्गम महाकौशल प्रान्त, विश्व हिंदी संस्थान सृजन अभियान जबलपुर , मप्र. आंचलिक साहित्यकार परिषद, गूंज, गुंजन कला सदन, व्यंग्यम, जागरण साहित्य मंच,  नाट्य कला मंच आदि संस्थाएं अपनी सेवाएँ दे रही हैं।

सबसे आश्चर्यजनक बात जो मुझे बहुत अच्छी लगी और जिसे मैं गर्वपूर्वक अपने मित्रों से साझा करता रहता हूँ कि जबलपुर ही एक ऐसा शहर है जहां एक ही सदस्य विभिन्न संस्थाओं से जुड़े रहते हुए भी अन्य संस्थाओं के प्रति उतना ही समर्पित है, जितना कि अपनी संस्था के प्रति समर्पित है। वर्ष भर उत्सव होते रहते हैं, विभिन्न मत और मतांतर हो सकते हैं। किन्तु, जब आवश्यकता पड़ती है तो सभी सदस्य सब कुछ भुलाकर एक परिवार की तरह अन्य संस्थाओं के उत्सव में सहभागी होकर गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

इतना सब कुछ होकर भी अक्सर मेरे हृदय को यह बात अक्सर कचोटती रहती है कि- स्व. हरिशंकर परसाई, आचार्य रजनीश, डॉ सुमित्र, ज्ञानरंजन और अन्य बड़ी-बड़ी हस्तियों को जन्म देने वाली संस्कारधानी जिसकी सम्पूर्ण विश्व में एक पहचान बनी है उस नगर की संस्थाएं संयुक्त रूप से एक साहित्य, रंगमंच एवं कला के प्रति समर्पित अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव मनाने में क्यों पीछे छूट गया? क्यों हम मात्र अपनी संस्था का वार्षिकोत्सव मनाकर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं और अन्य शहर ऐसे तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लिटफ़ेस्ट आयोजित कर पाते हैं?

नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ मैं आव्हान करता हूँ संस्कारधानी की समस्त साहित्य, रंगमंच एवं कला के प्रति समर्पित संस्थाओं को नववर्ष में संकल्प लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर “संस्कारधानी जबलपुर अंतर्राष्ट्रीय कला एवं साहित्य महोत्सव (Sanskardhani  Jabalpur International Arts & Literary Festival) (SJIALF)” को मूर्तरूप देने के लिए। निश्चय ही मेरी यह परिकल्पना संस्कारधानी को ऐसा महोत्सव आयोजित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अवश्य चिन्हांकित करेगी।

© हेमन्त बावनकर 

5 Comments

  • अनुकरणीय आलेख है।
    संस्कारधानी के साहित्यकारों
    को आगे आना चाहिए।
    मैं भी व्यक्तिगत स्तर पर भी सहयोग
    करने तत्पर रहूँगा।

    • हेमन्त बावनकर

      मेरे विचारों से सहमत होने के लिए धन्यवाद विजय जी।

  • Indrs Bahadur Shrivastav

    बहुत ही प्रेरणा दायक विचार हैं। संस्कार धानी के साहित्कारों को इस पर विचार कर सहभागिता करना चाहिए।

  • गिरीश बिल्लोरे

    बावनकर साहब मेरे लायक क्या सेवाएं सुनिश्चित की गई है अवगत करा दीजिए वैसे आपने संस्था एवं व्यक्ति रूपी संस्थानों के नामों का उल्लेख कर ही दिया है फिर भी गिलहरी की तरह अगर कोई आवश्यकता हो तो उसे बताएं मामला साहित्य का है

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